प्राइवेट नौकरी में उसकी तनख्वाह बहुत कम थी । घर में दो बच्चे पढने वाले थे, और महीने के आखिर में तनख्वाह में से मुश्किल से बच्चो की फीस निकाल पाते थे । कमाई का और कोई जरिया भी न था, उस पर आये दिन बच्चो के स्कूल से नई-नई डिमांड । बड़े शहर में घर से दफ्तर भी काफी दूर था, और वेतन में से एक अच्छी-खासी रकम बस के किराये पर ही खर्च हो जाती थी। वह हर समय यही कोशिश करता रहता कि किसी तरह किराए के खर्च को न्यूनतम रख सकू ।
एक सुबह बस से वह अपने घर से अपने दफ्तर आ रहा था, प्राइवेट बस सवारियों से खचाखच भरी थी। ड्राइवर की सीट के ठीक पीछे खड़े-खड़े लोहे का डंडा पकडे वह कुछ सोचते हुए ध्यान मग्न था कि अचानक उसकी नजर अपनी बस के आगे-आगे जा रही एक और प्राइवेट बस के पिछले हिस्से पर पडी, यह बस भी उसके घर से दफ्तर वाले रूट की ही थी। बस के पिछले हिस्से में नीचे की ओर मोटे-मोटे अक्षरो में लिखा था " बुरी नजर वाले के लिए फ्री सेवा " और उसके आगे एक जूते जैसी आकृति बनाई हुई थी । उसके दिमाग में एक आइडिया आया और उसने ठान ली कि वह कल से उसी बस में यात्रा करेगा।
अगले दिन वह पुनः आफिस जाने के लिए बस स्टैंड पर आया और उस बस का इन्तजार करने लगा । शीघ्र ही वह बस आई और वह उसमे चढ़ गया। कुछ दूर चलने के बाद कंडक्टर ने आकर उससे टिकट खरीदने को कहा, लेकिन उसने यह कहकर टिकट लेने से मना कर दिया कि वह बुरी नजर वाला है । काफी बहस हुई, झगड़ते-झगड़ते कंडक्टर ने अपना जूता भी निकाल दिया कि अगर तुम बुरी नजर वाले हो तो तुम्हारे लिए जूता फ्री है । उसने उसे रोकते हुए चेतावनी दी कि अगर उसने जूता इस्तेमाल किया तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे । अब मामला इतना बढ़ गया कि पहले बात बस मालिक तक गई और फिर कोर्ट तक जा पहुँची। जज ने दोनों पक्षों को सुना । उसने कहा कि श्रीमान, चूँकि मैं एक बुरी नजर वाला हूँ और इन्होने अपनी बस के पीछे लिखा है कि ये बुरी नजर वाले को फ्री सेवा देंगे, अतः अब इनका यह फर्ज बनता है कि ये मुझे अपनी बस में मुफ्त में यात्रा करने दे । इस पर बस मालिक ने कहा कि नहीं श्रीमान, हमने अपनी बस के पीछे जहां पर यह लिखा है कि बुरी नजर वाले के लिए फ्री सेवा है उसके आगे हमने एक जूते का चित्र भी बनाया है, अतः हमारा आशय यह है कि हम बुरी नजर वाले को जूते से फ्री सेवा देंगे ।
जज ने दोनों पक्षों को गौर से सुना, उन्होंने फिर पहले पक्ष से पूछा कि इस बात के तुम्हारे पास क्या सबूत है कि तुम बुरी नजर वाले हो ? वह बोला, श्रीमान, मैं बहुत दिनों से इनकी बस पर नजर गडाए हुए हूँ, यह एक नई और अच्छे डिजाइन की बस है, इसका मालिक मेरा पडोसी है । मैं इसको फलता-फूलता नहीं देखना चाहता, इसलिए मैंने यह प्लान बनाया है कि मैं इसमें सफ़र करने वाले अपने इलाके के सभी लोगो को इस तरह भड़काऊ कि वे सभी भी खुद को बुरी नजर वाला बता कर इनकी बस में बिना टिकट यात्रा करने लगे, इससे क्या होगा कि इनकी आमदानी ख़त्म हो जायेगी, और ये इस बस की किश्त और ड्राइवर-कंडक्टर का वेतन भी नही निकाल सकेगे । उसकी बात सुनकर जज पहले थोडा हंसा और फिर जज ने व्यवस्था दी कि चूँकि बुरी नजर का यह अर्थ कदापि नहीं होता कि किसी ने किसी की चीज को देखा और वह बिगड़ जाए, या फिर कुछ अशुभ हो जाए । लेकिन बुरी नजर का यह आशय जरूर होता है कि कोई दुराग्रह से गर्षित होकर किसी को नुकशान पहुंचाने की ताक में रहे, और प्रथम पक्ष की बातो से यह स्पष्ट है कि वह बस मालिक की संपत्ति पर बुरी नजर गडाए हुए था, और चूँकि बस मालिक ने अपनी बस के पीछे लिखित मैं यह घोषणा कर रखी है कि बुरी नजर वाले के लिए फ्री सेवा, और चूँकि जूते के चित्र बना लेने से यह स्पष्ट नहीं होता कि इनका आशय जूते की फ्री सेवा से है, अतः बस मालिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपना वचन निभाए, और जब तक यह बस उनके पास मौजूद है, वे पहले पक्ष को उसकी फ्री सेवा मुहैया करवाए ।
तो आजकल वे जनाव, ऑफिस से आने जाने और शहर के अन्य स्थानों पर फ्री में यात्रा करते है। तनख्वाह में से अब महीने के पांच सौ रूपये भी बच जाते है ।
नोट : घटना काल्पनिक है!
Monday, June 8, 2009
Saturday, June 6, 2009
अरे पहले ठीक से पता करलेना की वह डोक्टर ही है...
और सुनो, अगर आस-पास कोई ढंग का दिखे तो उससे भी पूछ लेना कि वह पक्का 'डोकटर' ही है ,कोई ऐरा-गैरा 'डोनकोटा' तो नहीं ! अरे भाग्यवान वो तो मै पता कर लूँगा, लेकिन ये तो बतावो कि ये 'डोनकोटा' किस बला का नाम है, मैंने पुछा ! माथा पीटते हुए पत्नी ने जबाब दिया, हे भगवान्, ये किस किस्म के इंसान से मुझे बाँध दिया, (शुक्र था कि उसने इंसान कहा, खूंटा नहीं कहा) अरे कितनी बार समझाया कि आजकल सडको पर बतेरे डोनेसन और कोटे वाले डोकटर घूम रहे है, उनको अगर बतावोगे कि सिर में दर्द है तो वे सिर पर ही इंजेक्सन घोप देते है! पत्नी की यह बात सुनकर मैं भी ज़रा सहम सा गया था और साथ ही मुझे अपनी MEI (middle educated indian ) बीबी की समझदारी पर गर्व और खुद से घृणा सी होने लगी थी ! अब मेरी समझ में आने लगा था कि बहुत पहले जब मेरी बीबी प्रेग्नेंट थी, और हम किसी डाक्टर के पास चलने को होते थे तो वह मुझसे यह सवाल क्यों करती थी कि तुमने डोकटर का नाम और जाति पूछी ! उस समय तो मैं उसकी इस बात पर भड़क जाया करता था, और कहता था कि यार, तुम औरतो में यही तो बीमारी है, जरा दो-चार अक्षर क्या पढ़ लेती हो, अपने को तीस मारखां समझने लगती हो ! डाक्टर का नाम और जाति पता पूछकर हमें क्या करना, हमें उससे कोई रिश्तेदारी थोड़े ही जोड़नी है ! फिर वो कहती, अरे तुम तो बस जरा-ज़रा सी बात पर भड़कने लगते हो, नाम, जाति, पता जान लेने से यह मालूम पड़ जाता है कि वह कहीं कोटे का डोकटर तो नहीं ! मै कहता, अरे वह जयपुर का रहने वाला है कोटा का नहीं ! वह माथा पीटकर चुप हो जाती !
अब मैं समझने लगा था कि मेरी पत्नी कितनी समझदारी वाली बाते करती है, उसके शब्दों में कितनी गूढ़ता छिपी है ! हाल ही के चेन्नई स्थित प्राइवेट मेडिकल कालेजो का स्टिंग ऑपरेशन देख कर तो मुझे भी यही लगता है !
अब मैं समझने लगा था कि मेरी पत्नी कितनी समझदारी वाली बाते करती है, उसके शब्दों में कितनी गूढ़ता छिपी है ! हाल ही के चेन्नई स्थित प्राइवेट मेडिकल कालेजो का स्टिंग ऑपरेशन देख कर तो मुझे भी यही लगता है !
Thursday, June 4, 2009
शोध तृष्णा !
उनके इकलौते बेटे गुलाब के उनसे अलग होकर डॉ खुसबू के साथ चले जाने के तीन साल बाद, उन दो ढलती शामों के लिए घनघोर काली रात के आगमन की प्रतीक्षा से पहले आज की सुबह एक खुशनुमा सुबह की तरह थी । लॉन की हरी घास पर शांत और शिथिल कदमो से चहलकदमी करते हुए दोनों चारदीवारी के आखिरी छोर पर जाकर बैठ गए थे, बिना किसी संवाद और विचारों के, मानो कि जिन्दगी में अब उनके लिए बदलाव के कोई ख़ास मायने न रह गए हो। वह भी वक्त था, जब कभी अपने जमाने की ये दो शख्सियत, फुर्सत के पलों में इस तरह जब भी साथ होते थे, तो घंटो बस एक दूसरे के उन हंसमुख और जीवंत चेहरों को ही पढ़ते रहते थे, मगर आज उनके लिए वक्त काफी बदल चूका था, चिपककर साथ-साथ बैठे होने के वावजूद भी नजरे तक मिलाने की चाह भी दिल में नहीं रही थी। हर इंसान के लिए किसी बात का अर्थ और वास्तविकता यकायक कितना बदल जाते है, जीवन जीने के मायने कितने अलग हो जाते है, आज भला उनसे ज्यादा और कौन जान सकता था।
कुछ दिन पहले गुलाब का फोन आया था, एक व्यथित उदास लहजे में उसने अपनी माँ से अगले शनिवार को वापस उनके पास लौट आने की बात कही थी । बस, इसीलिए आज उन दो झुरियों से भरे मुरझाये चेहरों पर कहीं कोई हल्की सी भोर की बयार कुछ छटा बिखेरती नजर आ रही थी। कभी सामने की दूर तक स्लोप में फैली पहाडियों के ऊपर विखरी कुहरे की एक सफ़ेद चादर और उनपर पड़ती भोर की पहली किरणों की एक पीली छटा को शून्य में निहारते हुए और फिर कभी नीचे तलहटी में कल-कल ध्वनि से बहती नदी को टकटकी लगाकर देखते हुए प्रोफेसर काला उस एकदम खामोश वातावरण की शांति को जब-तब अपने गले से निकलने वाली खांसी की कर्कस ध्वनी से बाधित कर देते थे। फिर खांसते-खांसते ही, नजरो को सामने पहाडी पर टिकाये रखते हुए एक भर्राई सी आवाज में उन्होंने मिसेज काला को संबोधित कर पूछा था; गुल्लू ने आज आने को कहा था? ( वे लोग बचपन से गुलाब को प्यार से गुल्लू कहकर पुकारते थे ) हँ, जबाब में बिना शरीर को हिलाए डुलाये निर्जीव आधे से ही 'हाँ' शब्द में मिसेज काला ने जबाब दिया था, और उसके बाद पुनः एक गहरी खामोशी वातावरण में छा गई ।
डाक्टर खुसबू से शादी के एक साल बाद तक तो मिसेज काला, प्रोफेसर काला और उन्हें मिलने आने वाले नाते-रिश्तेदारो के साथ रोजाना गुलाब और खुसबू को उनसे सम्बन्धित हर बात पर कोसती रहती थी और तब प्रोफेसर काला उसे यह कहते हुए शांत करवाते रहते थे कि इसमें उन लोगो का कोई दोष नहीं, शायद हम ही से कहीं गुल्लू की परवरिश में कोई कमी रह गयी । लेकिन न चाहते हुए भी, जबसे प्रोफेसर काला ने डाक्टर खुसबू की पुरानी जिन्दगी की सारी हकीकत मिसेज काला को सुनाई थी, वह जड़वत हो गई थी । पहले तो वह इस तरह की आस लिए फिरती थी कि उनके लिये न सही मगर गुलाब और खुसबू के लिये कभी तो जिन्दगी बद्लेगी, कभी न कभी गुलाब को अपनी गलती का अहसास तो जरूर होगा और वह डाक्टर खुसबू के साथ वापस लौटकर उनके पास माफी मागने आयेगा, लेकिन डाक्टर खुसबू की इस सच्चाई से वाकिफ होने के बाद उसका वह भरम टूट्कर एकदम चकनाचूर हो गया था । अब अगर उसे गलती का अहसास हुआ भी, और वे लोग वापस आ भी गए तो भी उसके लिए क्या खुशी ? उनकी झोली में तो अब सब गम ही गम भरे पडे थे।
पुराने दिनों में प्रोफेसर काला जब उत्तराँचल के विश्वविद्यालय में कार्यरत थे, तभी एक तेज-तर्रार और पढाई में बहुत ही कुशल लडकी, खुसबू बडोला ने यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था और विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रहने लगी थी। यूनिवर्सिटी में जहां एक ओर कुछ लोग उसकी कौशलता और निपुणता की तारीफे करते नहीं थकते थे, वही कई बार हास्टल वार्डेन, प्रोफेसर से उसकी तरह-तरह की शिकायत भी कर चुकी थी। चार साल में ही खुसबू का पूरे कैम्पस में एक अलग रुतवा था, और तब एक दिन यह रुतवा अपने परवान चढ़ गया, जब यह खबर आई कि खुसबू बडोला को कनाडा के क्युवेक प्रान्त में स्थित कैलिगरी यूनिवर्सिटी से बौट्नी में रिसर्च फैलोशिप मिल गई है, और वह कनाडा जा रही है। पूरी यूनिवर्सिटी में खुसबू का कद एकदम बढ़ सा गया था, और वहां के लेक्चरर और प्रोफेसर सभी लोग , उसे बड़े इज्जत की नजरो से देखने लगे थे ।
एक बार जब खुसबू कनाडा पहुची तो सात साल तक नहीं लौटी। वहाँ जाकर अपनी वाक- पटुता और बला की खूबसूरती के बल पर खुसबू बडोला से वह डॉक्टर खुसबू मौलिनी बन गई थी, उसने अपने ही विभाग के फ्रेंच मूल के अपने से करीब बीस साल बड़े, प्रोफ़ेसर पीटर मौलिनी से वहीं पर शादी रचा ली थी। लेकिन उनका यह साथ बहुत दिनों तक नहीं चल सका, शादी के डेड-साल बाद ही प्रोफेसर मौलिनी की ऐड्स से पीढित होकर मृत्यु हो गई । सुनने में तो यह भी आया था कि उसके बाद डाक्टर खुसबू ने वही टोरंटो में अपने ही विभाग के एक और शोध-कर्ता से भी शादी की थी, मगर वह भी साल भर के अन्दर-अन्दर चल बसा था। सात साल बाद जब डॉक्टर खुसबू हिंदुस्तान लौटी तो पुनः उसी विश्वविद्यालय में बौट्नी की लेक्चरर बन गई थी।
प्रोफेसर काला अब रिटायर हो चुके थे, और उनका बेटा गुलाब भी पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए बौट्नी में मास्टर डिग्री हासिल कर अब पी.एच.डी. करने की तैयारी कर रहा था। तभी डॉक्टर खुसबू ने बौट्नी विभाग का अपना पदभार संभल लिया था, और गुलाब उसी के अधीनस्थ एक शोधकर्ता की हैसियत से अपने शोध कार्यो में जुट गया था। अपने समय के एक बहुत ही अनुभवी शिक्षाविद, प्रोफेसर काला को तब इस बात का शायद कहीं दूर-दूर तक कोई अहसास भी नहीं रहा होगा कि जिस खुशी के साथ उन्होंने अपने बेटे को डॉक्टर खुशबू के अधीनस्थ शोधकार्य करने के लिए अपनी स्वीकृति दी है, वही इतनी सी छोटी बात एक दिन उनकी सारी खुशिया ही छीन ले जायेगी। शोधकार्य में जुटे गुलाब को अब दो साल से अधिक समय हो गया था, और वह अपने तीन शोध पत्र भी प्रस्तुत एवं प्रकाशित कर चुका था। इस बीच उसकी डॉक्टर खुसबू से नजदीकियां इतनी बढ़ गई कि अब हर रोज डॉक्टर खुसबू , सुबह ही विभाग की जीफ लेकर उसे लेने उसके घर तक पहुँच जाती थी। रिसर्च के लिये दूसरे विश्वविध्यालयो से सामग्री जुटाने के बहाने हफ़्तो डाक्टर खुसबू के संग मौज-मस्ती के लिये, घर शहर से दूर रहता, और उस दिन तो प्रोफेसर काला पर मानो बज्र का पहाड़ ही टूट पड़ा था, जब उनके बेटे गुलाब ने डॉक्टर खुसबू से अपनी सगाई की बात उनके समक्ष रखी ।
प्रोफेसर काला, डाक्टर खुसबू के अतीत से पूरी तरह वाकिफ थे, अतः उन्होंने गुलाब को अपनी ओर से हर तरह से समझाने की पुरजोर कोशिश की, मगर गुलाब था कि डॉक्टर खुसबू के जादुई आकर्षण और उसके झांसे में बुरी तरह फँस चुका था, अतः उसने साफ़-साफ कह दिया था कि अगर आप लोग राजी नहीं भी हुए, तो भी मैं आपकी मर्जी के खिलाफ खुसबू से शादी करूँगा। माँ ने भी यह कहकर उसे जब समझाने की कोशिश की कि कहाँ तू अभी मात्र चौबीस-पच्चीस साल का युवा है, और कहां वह तेरे से आठ-नौ साल बड़ी औरत है, तो उसने उन्हें यह कहकर डपट सा दिया था कि अरे माँ, मैं तो आप लोगो को एक बहुत ही शिक्षित किस्म का इंसान समझता था, लेकिन आप लोग भी अनपढ़-गवार लोगो की तरह पुराने ख्यालातों के लोग हो । आजकल के जमाने में पत्नी का पति से उम्र में बड़ा होना कोई ख़ास मायने नहीं रखता ।
गुलाब को बहुत समझाने के बाद भी जब कोई बात नही बनती दिखी, तो आखिरी हथियार के तौर पर प्रोफ़ेसर काला ने खुद ही डाक्टर खुसबू से स्वयं जाकर मिलने और उसे समझाने की सोची, और एक दिन वे उसके विभाग मे पहुंच भी गये। उन्होने उसे उसकी अतीत की जिन्दगी याद दिलाई और समझाया कि वह क्यों उनके इकलौते बेटे की जिन्दगी खराब करने पर तुली हुई है? लेकिन डाक्टर खुसबू के पास तो मानो इन सब सवालों के जबाब पहले से ही मौजूद थे, अत: उसने आखिरी मे प्रो. काला को यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि उससे शादी करने का इकतरफ़ा फैसला उनके बेटे का है, उसका नही, अत: वे उससे यह सब कहने की बजाये अपने बेटे को ही क्यों नही समझा लेते ।
और फिर एक दिन सबकी नाखुशी के बीच ही एक सादे समारोह मे गुलाब और खुसबू औपचारिक ढंग से परिणय-सुत्र मे बंध गये थे । माता-पिता और नाते-रेश्तेदारो की नाराजगी के चलते खुसबू के कहने पर प्यार मे अन्धा हो चुका गुलाब, अपने माता-पिता का घर छोड अलग अपनी ही दुनिया मे चला गया था । और अब तीन साल के बाद वह पुन: अपने घर लौट रहा था, यूं तो वह लौट अपनी ही मर्जी से रहा था किन्तु हालात और कुदरत के हाथो मजबूर होकर । लाईलाज बीमारी के चलते वह अन्दर से, दीमक लगे उस दरख्त की भांति खोखला हो चुका था, जो न जाने कब एक हल्के हवा के झोंके से भी धराशाही होकर जमीन पर गिर पडे । डाक्टरों ने भी उसके आगे और जीने का अनुमानित समय भी उसे बता दिया था और इसी के चलते उसने मात-पिता की शरण मे लौट जाने का निश्चय किया था । वह खुसबू की मानसिकता से भली भांति वाकिफ था, और उसके वे शब्द उसे भली-भांति याद थे, जिसमे वह कहती थी कि दुनिया को देख्नने-समझने का उसका नजरिया भिन्न है और वह अपने जीवन के एक-एक लहमे को अपनी सुविधा और मर्जी के हिसाब से जीना जानती है । जब परीक्षण के दौरान इस बात के पक्के सबूत मिले थे कि गुलाब ऐड्स से जूझ रहा है, तो यह जानकर भी उसके चेहरे पर तनिक भी सिकन नहीं आई थी, मानो इस बात का उसे पहले से ही पता था । और जिस दिन डॉक्टर ने गुलाब को उसकी बची हुई जिन्दगी की गढ़ना करके बताई थी, उसी के अगले दिन डॉक्टर खुसबू ने विश्वविद्यालय से इस्तीफा देकर, सुदूर रूहेलखंड के विद्यालय में नौकरी के लिए आवेदन कर दिया था ।
दिन ढलने को था, सूरज देव सुदूर पश्चिम की पहाडियों के पीछे धीरे-धीरे डग बढाते चले जा रहे थे, मानो उन्हें भी इस जग की रीत का भली भांति ख्याल था, कि यहाँ हर एक सुबह की शाम होना भी निश्चित है । दोनों बूढी आत्माए बरामदे के बाहर आगन में पलास्टिक की कुर्सिया डाल, उनमे खामोश समाई बैठी थी, और तभी घरघराती हुई महेन्द्रा की जीफ आकर घर के आगे सड़क में रुकी थी। उससे उतरकर दो बैग उठाये, गुलाब धीरे-धीरे अपने घर के गेट की तरफ बढा था। माता-पिता के समीप जाकर उसने बैग जमीन पर रख दिए और बिना कुछ कहे गर्दन झुका खड़े-खड़े जमीन पर पैर के अंगूठे से मिट्टी में कुछ आकृतिया सी बनाने लगा था। एक लम्बे विराम के बाद प्रोफ़ेसर काला ने पूछा था, खुसबू नहीं आई? उसने बिना उनकी तरफ देखे नजरे झुकाए ही उत्तर दिया था, नहीं पापा, वह भी आज ही रूहेलखंड चली गई है।रूहेलखंड क्यों ? प्रोफेसर काला ने पूछा। यहाँ से जॉब छोड़कर उसने वहाँ ज्वाइन करने का फैसला कर लिया है, गुलाब ने जबाब दिया। पिता ने चेहरे पर एक असीम पीडा के भाव लाते हुए बेटे की तरफ देखा और लम्बी साँस छोड़ते हुए बस इतना ही बड़बडाये कि फिर निकल पडी, एक और शोधकर्ता की तलाश में !
कुछ दिन पहले गुलाब का फोन आया था, एक व्यथित उदास लहजे में उसने अपनी माँ से अगले शनिवार को वापस उनके पास लौट आने की बात कही थी । बस, इसीलिए आज उन दो झुरियों से भरे मुरझाये चेहरों पर कहीं कोई हल्की सी भोर की बयार कुछ छटा बिखेरती नजर आ रही थी। कभी सामने की दूर तक स्लोप में फैली पहाडियों के ऊपर विखरी कुहरे की एक सफ़ेद चादर और उनपर पड़ती भोर की पहली किरणों की एक पीली छटा को शून्य में निहारते हुए और फिर कभी नीचे तलहटी में कल-कल ध्वनि से बहती नदी को टकटकी लगाकर देखते हुए प्रोफेसर काला उस एकदम खामोश वातावरण की शांति को जब-तब अपने गले से निकलने वाली खांसी की कर्कस ध्वनी से बाधित कर देते थे। फिर खांसते-खांसते ही, नजरो को सामने पहाडी पर टिकाये रखते हुए एक भर्राई सी आवाज में उन्होंने मिसेज काला को संबोधित कर पूछा था; गुल्लू ने आज आने को कहा था? ( वे लोग बचपन से गुलाब को प्यार से गुल्लू कहकर पुकारते थे ) हँ, जबाब में बिना शरीर को हिलाए डुलाये निर्जीव आधे से ही 'हाँ' शब्द में मिसेज काला ने जबाब दिया था, और उसके बाद पुनः एक गहरी खामोशी वातावरण में छा गई ।
डाक्टर खुसबू से शादी के एक साल बाद तक तो मिसेज काला, प्रोफेसर काला और उन्हें मिलने आने वाले नाते-रिश्तेदारो के साथ रोजाना गुलाब और खुसबू को उनसे सम्बन्धित हर बात पर कोसती रहती थी और तब प्रोफेसर काला उसे यह कहते हुए शांत करवाते रहते थे कि इसमें उन लोगो का कोई दोष नहीं, शायद हम ही से कहीं गुल्लू की परवरिश में कोई कमी रह गयी । लेकिन न चाहते हुए भी, जबसे प्रोफेसर काला ने डाक्टर खुसबू की पुरानी जिन्दगी की सारी हकीकत मिसेज काला को सुनाई थी, वह जड़वत हो गई थी । पहले तो वह इस तरह की आस लिए फिरती थी कि उनके लिये न सही मगर गुलाब और खुसबू के लिये कभी तो जिन्दगी बद्लेगी, कभी न कभी गुलाब को अपनी गलती का अहसास तो जरूर होगा और वह डाक्टर खुसबू के साथ वापस लौटकर उनके पास माफी मागने आयेगा, लेकिन डाक्टर खुसबू की इस सच्चाई से वाकिफ होने के बाद उसका वह भरम टूट्कर एकदम चकनाचूर हो गया था । अब अगर उसे गलती का अहसास हुआ भी, और वे लोग वापस आ भी गए तो भी उसके लिए क्या खुशी ? उनकी झोली में तो अब सब गम ही गम भरे पडे थे।
पुराने दिनों में प्रोफेसर काला जब उत्तराँचल के विश्वविद्यालय में कार्यरत थे, तभी एक तेज-तर्रार और पढाई में बहुत ही कुशल लडकी, खुसबू बडोला ने यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था और विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रहने लगी थी। यूनिवर्सिटी में जहां एक ओर कुछ लोग उसकी कौशलता और निपुणता की तारीफे करते नहीं थकते थे, वही कई बार हास्टल वार्डेन, प्रोफेसर से उसकी तरह-तरह की शिकायत भी कर चुकी थी। चार साल में ही खुसबू का पूरे कैम्पस में एक अलग रुतवा था, और तब एक दिन यह रुतवा अपने परवान चढ़ गया, जब यह खबर आई कि खुसबू बडोला को कनाडा के क्युवेक प्रान्त में स्थित कैलिगरी यूनिवर्सिटी से बौट्नी में रिसर्च फैलोशिप मिल गई है, और वह कनाडा जा रही है। पूरी यूनिवर्सिटी में खुसबू का कद एकदम बढ़ सा गया था, और वहां के लेक्चरर और प्रोफेसर सभी लोग , उसे बड़े इज्जत की नजरो से देखने लगे थे ।
एक बार जब खुसबू कनाडा पहुची तो सात साल तक नहीं लौटी। वहाँ जाकर अपनी वाक- पटुता और बला की खूबसूरती के बल पर खुसबू बडोला से वह डॉक्टर खुसबू मौलिनी बन गई थी, उसने अपने ही विभाग के फ्रेंच मूल के अपने से करीब बीस साल बड़े, प्रोफ़ेसर पीटर मौलिनी से वहीं पर शादी रचा ली थी। लेकिन उनका यह साथ बहुत दिनों तक नहीं चल सका, शादी के डेड-साल बाद ही प्रोफेसर मौलिनी की ऐड्स से पीढित होकर मृत्यु हो गई । सुनने में तो यह भी आया था कि उसके बाद डाक्टर खुसबू ने वही टोरंटो में अपने ही विभाग के एक और शोध-कर्ता से भी शादी की थी, मगर वह भी साल भर के अन्दर-अन्दर चल बसा था। सात साल बाद जब डॉक्टर खुसबू हिंदुस्तान लौटी तो पुनः उसी विश्वविद्यालय में बौट्नी की लेक्चरर बन गई थी।
प्रोफेसर काला अब रिटायर हो चुके थे, और उनका बेटा गुलाब भी पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए बौट्नी में मास्टर डिग्री हासिल कर अब पी.एच.डी. करने की तैयारी कर रहा था। तभी डॉक्टर खुसबू ने बौट्नी विभाग का अपना पदभार संभल लिया था, और गुलाब उसी के अधीनस्थ एक शोधकर्ता की हैसियत से अपने शोध कार्यो में जुट गया था। अपने समय के एक बहुत ही अनुभवी शिक्षाविद, प्रोफेसर काला को तब इस बात का शायद कहीं दूर-दूर तक कोई अहसास भी नहीं रहा होगा कि जिस खुशी के साथ उन्होंने अपने बेटे को डॉक्टर खुशबू के अधीनस्थ शोधकार्य करने के लिए अपनी स्वीकृति दी है, वही इतनी सी छोटी बात एक दिन उनकी सारी खुशिया ही छीन ले जायेगी। शोधकार्य में जुटे गुलाब को अब दो साल से अधिक समय हो गया था, और वह अपने तीन शोध पत्र भी प्रस्तुत एवं प्रकाशित कर चुका था। इस बीच उसकी डॉक्टर खुसबू से नजदीकियां इतनी बढ़ गई कि अब हर रोज डॉक्टर खुसबू , सुबह ही विभाग की जीफ लेकर उसे लेने उसके घर तक पहुँच जाती थी। रिसर्च के लिये दूसरे विश्वविध्यालयो से सामग्री जुटाने के बहाने हफ़्तो डाक्टर खुसबू के संग मौज-मस्ती के लिये, घर शहर से दूर रहता, और उस दिन तो प्रोफेसर काला पर मानो बज्र का पहाड़ ही टूट पड़ा था, जब उनके बेटे गुलाब ने डॉक्टर खुसबू से अपनी सगाई की बात उनके समक्ष रखी ।
प्रोफेसर काला, डाक्टर खुसबू के अतीत से पूरी तरह वाकिफ थे, अतः उन्होंने गुलाब को अपनी ओर से हर तरह से समझाने की पुरजोर कोशिश की, मगर गुलाब था कि डॉक्टर खुसबू के जादुई आकर्षण और उसके झांसे में बुरी तरह फँस चुका था, अतः उसने साफ़-साफ कह दिया था कि अगर आप लोग राजी नहीं भी हुए, तो भी मैं आपकी मर्जी के खिलाफ खुसबू से शादी करूँगा। माँ ने भी यह कहकर उसे जब समझाने की कोशिश की कि कहाँ तू अभी मात्र चौबीस-पच्चीस साल का युवा है, और कहां वह तेरे से आठ-नौ साल बड़ी औरत है, तो उसने उन्हें यह कहकर डपट सा दिया था कि अरे माँ, मैं तो आप लोगो को एक बहुत ही शिक्षित किस्म का इंसान समझता था, लेकिन आप लोग भी अनपढ़-गवार लोगो की तरह पुराने ख्यालातों के लोग हो । आजकल के जमाने में पत्नी का पति से उम्र में बड़ा होना कोई ख़ास मायने नहीं रखता ।
गुलाब को बहुत समझाने के बाद भी जब कोई बात नही बनती दिखी, तो आखिरी हथियार के तौर पर प्रोफ़ेसर काला ने खुद ही डाक्टर खुसबू से स्वयं जाकर मिलने और उसे समझाने की सोची, और एक दिन वे उसके विभाग मे पहुंच भी गये। उन्होने उसे उसकी अतीत की जिन्दगी याद दिलाई और समझाया कि वह क्यों उनके इकलौते बेटे की जिन्दगी खराब करने पर तुली हुई है? लेकिन डाक्टर खुसबू के पास तो मानो इन सब सवालों के जबाब पहले से ही मौजूद थे, अत: उसने आखिरी मे प्रो. काला को यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि उससे शादी करने का इकतरफ़ा फैसला उनके बेटे का है, उसका नही, अत: वे उससे यह सब कहने की बजाये अपने बेटे को ही क्यों नही समझा लेते ।
और फिर एक दिन सबकी नाखुशी के बीच ही एक सादे समारोह मे गुलाब और खुसबू औपचारिक ढंग से परिणय-सुत्र मे बंध गये थे । माता-पिता और नाते-रेश्तेदारो की नाराजगी के चलते खुसबू के कहने पर प्यार मे अन्धा हो चुका गुलाब, अपने माता-पिता का घर छोड अलग अपनी ही दुनिया मे चला गया था । और अब तीन साल के बाद वह पुन: अपने घर लौट रहा था, यूं तो वह लौट अपनी ही मर्जी से रहा था किन्तु हालात और कुदरत के हाथो मजबूर होकर । लाईलाज बीमारी के चलते वह अन्दर से, दीमक लगे उस दरख्त की भांति खोखला हो चुका था, जो न जाने कब एक हल्के हवा के झोंके से भी धराशाही होकर जमीन पर गिर पडे । डाक्टरों ने भी उसके आगे और जीने का अनुमानित समय भी उसे बता दिया था और इसी के चलते उसने मात-पिता की शरण मे लौट जाने का निश्चय किया था । वह खुसबू की मानसिकता से भली भांति वाकिफ था, और उसके वे शब्द उसे भली-भांति याद थे, जिसमे वह कहती थी कि दुनिया को देख्नने-समझने का उसका नजरिया भिन्न है और वह अपने जीवन के एक-एक लहमे को अपनी सुविधा और मर्जी के हिसाब से जीना जानती है । जब परीक्षण के दौरान इस बात के पक्के सबूत मिले थे कि गुलाब ऐड्स से जूझ रहा है, तो यह जानकर भी उसके चेहरे पर तनिक भी सिकन नहीं आई थी, मानो इस बात का उसे पहले से ही पता था । और जिस दिन डॉक्टर ने गुलाब को उसकी बची हुई जिन्दगी की गढ़ना करके बताई थी, उसी के अगले दिन डॉक्टर खुसबू ने विश्वविद्यालय से इस्तीफा देकर, सुदूर रूहेलखंड के विद्यालय में नौकरी के लिए आवेदन कर दिया था ।
दिन ढलने को था, सूरज देव सुदूर पश्चिम की पहाडियों के पीछे धीरे-धीरे डग बढाते चले जा रहे थे, मानो उन्हें भी इस जग की रीत का भली भांति ख्याल था, कि यहाँ हर एक सुबह की शाम होना भी निश्चित है । दोनों बूढी आत्माए बरामदे के बाहर आगन में पलास्टिक की कुर्सिया डाल, उनमे खामोश समाई बैठी थी, और तभी घरघराती हुई महेन्द्रा की जीफ आकर घर के आगे सड़क में रुकी थी। उससे उतरकर दो बैग उठाये, गुलाब धीरे-धीरे अपने घर के गेट की तरफ बढा था। माता-पिता के समीप जाकर उसने बैग जमीन पर रख दिए और बिना कुछ कहे गर्दन झुका खड़े-खड़े जमीन पर पैर के अंगूठे से मिट्टी में कुछ आकृतिया सी बनाने लगा था। एक लम्बे विराम के बाद प्रोफ़ेसर काला ने पूछा था, खुसबू नहीं आई? उसने बिना उनकी तरफ देखे नजरे झुकाए ही उत्तर दिया था, नहीं पापा, वह भी आज ही रूहेलखंड चली गई है।रूहेलखंड क्यों ? प्रोफेसर काला ने पूछा। यहाँ से जॉब छोड़कर उसने वहाँ ज्वाइन करने का फैसला कर लिया है, गुलाब ने जबाब दिया। पिता ने चेहरे पर एक असीम पीडा के भाव लाते हुए बेटे की तरफ देखा और लम्बी साँस छोड़ते हुए बस इतना ही बड़बडाये कि फिर निकल पडी, एक और शोधकर्ता की तलाश में !
Tuesday, June 2, 2009
क्रिया प्रतिक्रिया !
निठल्ला बैठा था, अचानक एक खबर पर नजर गई, और मुझे न्यूटन याद आ गया ! जनाब ने बहुत पहले फरमाया था कि 'Every action has a reaction'. उनके इस डायलौग को आज के परिपेक्ष में देखे तो, जरा उस खबर की बात करे, खबर यह थी कि पाकिस्तान की अदालत ने मुंबई हमलो के मास्टर माइंड हाफिज मोहम्मद सईद को बरी कर दिया ! हमें इस बारे में दिमाग पर जोर नहीं डालना चाहिए, क्योंकि ये तो होना ही था और सभी को पहले से मालूम था ! हां सोचने लायक बात यह है कि जैसा भारत और पाकिस्तान के बीच भूतकाल में होता आया है कि एक देश क्रिया करता है तो दूसरा देश भी तुंरत प्रतिक्रिया देता है ! एक ने अगर दुसरे के दो राजनयिक निकाल दिए तो दूसरा भी पहले वाले के दो राजनयिक निकाल बाहर कर देता है ! चूँकि हम हिन्दुस्तानियों से,इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरुप ज्यादा कुछ तो होने से रहा, इसलिए मैं सोच-सोच के डर रहा था कि कहीं हमारे ये धुरंधर इस घटना के प्रतिक्रिया स्वरुप गुस्से में नथुने फुलाकर कसाब को ही न कहीं बरी कर दे ! हा-हा-हा-हा- हा- हा !
Sunday, May 31, 2009
लघु कथा- आस और पडोस
नगर निगम द्वारा कुछ साल पहले ही नई विकसित की गई कालोनी अब तो लगभग भर चुकी है, लेकिन शुरु के दिनो मे काफी बिखरी-बिखरी सी थी । नेगी जी ने भी किराये के मकान की रोज की झझंटो से मुक्ति पाने के लिये हिम्मत कर एक मकान इस कालोनी मे खरीद लिया था । मकान की रजीस्ट्री अपने नाम करवा लेने के उपरान्त, एक शुभ मुहुर्त पर वे किराये के मकान से अपने इस नये घर मे शिफ़्ट हो गये।
जिस मुहल्ले मे उन्होने घर खरीदा था, उसमे उस दौरान मात्र छह-सात परिवार ही वहां पर रह रहे थे । ज्यादातर लोग नौकरी पेशा वाले ही थे, लेकिन कुछ खुद का व्यवसाय करने वाले लोग भी थे। कुछ परिवार पंजाबी, कुछ पहाडो के तथा कुछ देश के अन्य भागो से आकर बसे थे, नेगी जी के ठीक पडोस मे सरदार जसवन्त सिंह सपरिवार रहते है। उनका खुद का ट्रांसपोर्ट का धन्धा है और घर बैठकर ही वह यह धन्धा चलाते है । कुछ सालो तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन ज्यों-ज्यो बस्ती भरने लगी, समस्याओं के साथ-साथ लोगो के बीच आपसी तकरारें भी बढने लगी । उस समय अधिकांश लोगो के पास दुपहिया वाहन ही थे और कुछ के पास तो साइकिल भी नही थी, पूरे मोहल्ले मे मुश्किल से एक या दो लोगो के पास ही अपनी कारें थी । क्योंकि सरदार जी का टैक्सी ट्रासपोर्ट का धन्धा था इसलिये पूरी गली मे और खाली पडे प्लोटो मे उन्की ही गाडियां खडी रहती थी । गली मे छोटे प्लोट होने, अथवा यूं कहें कि नगर निगम द्वारा शुरु मे कम आय वर्ग के लोगो के लिये बनाई गई इस कालोनी मे मकानो के बीच की गलियों की चौडाई जहां सिर्फ़ बीस फुट थी, वहीं आमने-सामने लोगो द्वारा अपने घर के मुख्य गेटों के आगे गली मे लम्बे-लम्बे रैम्प निकाल दिये गये थे, और तो और कुछ ने तो बगीचे भी सडक मे बना डाले थे, अत: गली इतनी सिमट गयी थी कि उसमे अगर आमने-सामने दो कारें खडी हो जायें तो बीच से एक बाइक निकलनी भी मुश्किल हो जाती थी।
यहां एक बात और गौर फरमाने लायक है कि जहां सरदार जी, उनके ठीक सामने वाले और थोडी दूरी पर रहने वाला एक और पंजाबी परिवार, मुहल्ले मे जहां इन तीन पंजाबी परिवारो के बीच काफ़ी मित्रता और सहयोग था, वहीं गली मे बसे तीन-चार पहाडी मूल के परिवारों के बीच अक्सर आपसी कटुता ही रहती थी। वे लोग एक दूसरे को देखकर ही कूढ्ते रहते थे, और गढ्वाली-कुमाऊनी के अन्तर मे ही उल्झे रहते थे। एक ओर जहां पंजाबी लोग काफ़ी लम्बी-चौडी प्रस्नैलिटी के लोग थे, वहीं पहाडी लोग अमुमन औसत कद-काठी के थे, अत: अपनी बाचाल वाक क्षमता और इसी शारीरिक गुण के कारण वे अन्य लोगो पर हर वक्त हावी रहते। मुख्य सडक से गली मे घुसने के दो द्वार थे और जब कभी सरदार जी गाडी लेकर गली मे घुसते और अगर उन्हे किसी का दुपहिया भी सडक मे गलत ढंग से पार्क किया मिल जाये तो सरदार जी उसकी अच्छी खासी क्लास ले लेते थे, जबकि इसके ठीक उलट उनके अपने घर के आगे उनका एक लम्बा रैम्प था, फिर उस रैम्प के आगे वे एक कार खडी करते और चुंकि उनके सामने वाले घर मे जो पंजाबी परिवार रहता था, उनके पास कोई वाहन नही था, अत: वह इनका दोस्त होने के नाते, सरदार जी एक गाडी उनके रैम्प के ठीक आगे खडी कर देते थे।
एक बार इस बात से तंग आकर जब नेगी जी ने सरदार जी से कहा कि हमें अपनी बाइक गली से बाहर निकालनी मुश्किल पड जाती है, इसलिये आप या तो अपने घर के आगे का रैम्प तुडवाये या फिर इस तरह साथ-साथ दो गाडियां गली मे खडी न करें, तो इतना सुनते ही सरदार जी फैल गये। उन्होने कहा कि मैने गाडियां अपने और अपने दोस्त के घर के आगे पार्क की है, तुम्हारे नही । सरदार जी के वे ऊंचे स्वर-संवाद पूरी गली सुन रही थी, लेकिन कोई भी यह कहने नही आया कि जब तुम, हमें हमारे दुपहिया वाहनों को ठीक से पार्क करने की नसीहत देते फिरते हो तब आपका यह तर्क कहां चला जाता है ?
ज्यों-ज्यों दिन गुजरे, गली मे आवाजाही की समस्या बढ्ती गई । सयोग बस नेगी जी के पुराने दोस्त रावत जी भी उसी मुह्ल्ले मे मकान लेकर आ बसे ! स्वभाव से मिलनसार और तेज-तर्रार रावत जी को जब नेगी जी ने अपनी समस्या बताई तो उन्होने उन्हे उसका समाधान जल्दी ढुढने का भरोसा दिलाया। उन्होने नेगी जी से मिलकर पहले यह पता लगाया कि पूरे मुह्ल्ले मे कितने पहाडी लोग रहते है। कुल मिलाकर तीस परिवार पहाडी लोग के थे, उसके बाद उन्होने पचास रुपये की सदस्यता पर उनकी एक उत्तरांचल विकास समिति बना डाली। धीरे-धीरे सभी तीस परिवार उस समिति से जुड गये और उन सभी परिवारो के आपसी मेल-जोल बढ गया। बस फिर क्या था, पह्ले से पूरा खाका बनाये रावत जी ने अपनी रणनीति उन्हे समझा दी, और अपनी कम्पनी से दो पुराने बडे ट्रक लाकर उस मुह्ल्ले की गली के दोनो मुहानो पर इस तरह खडे कर दिये कि सिर्फ़ पैदल लोग और दुपहिया वाहन ही निकल सके। सौभाग्य बस, गली के मुहाने पर के दोनो तरफ़ के मकान पहाडियों के ही थे ।
बस, फिर क्या था, सरदार जी की गली के अन्दर की गाडियां अन्दर और बाहर की बाहर ही रह गयी थी। सरदार जी यह सब देख तिलमिला उठे और हल्ला करते हुए जब वहां पहुचे तो सभी तीस के तीस पहाडी परिवार भी वहां इकठ्ठा होकर एक टका सा जबाब सरदार जी को दे गये कि उन्होने भी ट्रक अपने घर के आगे खडा कर रखा है, तुम्हारे नही। भन्नाये हुए सरदार जी पास के थाने पहुच गये और पुलिस के दो सिपाहियों को लेकर आ गये, मगर पहले से तैयार सभी तीस परिवारों ने उन्हे घेर लिया, अब बात ऊपर तक पहुच चुकी थी। जब आला अधिकारी पहुचे और दोनो पक्ष की बातें सुनी तो उन्होने सीधे-सीधे सरदार जी को दोषी ठहराया और उन्हे हिदायत दी कि वे रिहायस वाली जगह से अपना धन्धा नही चला सकते, क्योंकि यह गैर-कानूनी है। यह सुनकर सरदार जी की घिग्घी बंध गयी।
अगले दिन शाम को जब नेगी जी दफ़्तर से लौटे तो सरदार जी गेट पर हाथ जोडे खडे थे, ज्यों ही नेगी जी अपनी बाइक से उतरे, सरदार जी ने अदब से उन्हें सतश्रीकाल बोला और कहना शुरु किया ; नेगी जी, तुस्सी हम पर इक मेहरबानी करदो जी, रात को बाहर सड़क पर गाडी छोड़ने से चोरी का डर है जी, अतः आप हमें सिर्फ इतनी अनुमति दे दो की हम रात १० बजे बाद गाडियों को गली में खड़ी कर सके और जी हम सबेरे पांच बजे से पहले-पहले सारी गड्डी बाहर निकाल देंगे जी पांच बजे बाद आप लोगो को गली एकदम किलियर मिलेगी जी।
नोट: कहानी किसी के प्रति दुराग्रह से प्रेरित नही है, बल्कि यह दर्शाने के लिये है कि एकता मे कितनी शक्ति होती है ।
जिस मुहल्ले मे उन्होने घर खरीदा था, उसमे उस दौरान मात्र छह-सात परिवार ही वहां पर रह रहे थे । ज्यादातर लोग नौकरी पेशा वाले ही थे, लेकिन कुछ खुद का व्यवसाय करने वाले लोग भी थे। कुछ परिवार पंजाबी, कुछ पहाडो के तथा कुछ देश के अन्य भागो से आकर बसे थे, नेगी जी के ठीक पडोस मे सरदार जसवन्त सिंह सपरिवार रहते है। उनका खुद का ट्रांसपोर्ट का धन्धा है और घर बैठकर ही वह यह धन्धा चलाते है । कुछ सालो तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन ज्यों-ज्यो बस्ती भरने लगी, समस्याओं के साथ-साथ लोगो के बीच आपसी तकरारें भी बढने लगी । उस समय अधिकांश लोगो के पास दुपहिया वाहन ही थे और कुछ के पास तो साइकिल भी नही थी, पूरे मोहल्ले मे मुश्किल से एक या दो लोगो के पास ही अपनी कारें थी । क्योंकि सरदार जी का टैक्सी ट्रासपोर्ट का धन्धा था इसलिये पूरी गली मे और खाली पडे प्लोटो मे उन्की ही गाडियां खडी रहती थी । गली मे छोटे प्लोट होने, अथवा यूं कहें कि नगर निगम द्वारा शुरु मे कम आय वर्ग के लोगो के लिये बनाई गई इस कालोनी मे मकानो के बीच की गलियों की चौडाई जहां सिर्फ़ बीस फुट थी, वहीं आमने-सामने लोगो द्वारा अपने घर के मुख्य गेटों के आगे गली मे लम्बे-लम्बे रैम्प निकाल दिये गये थे, और तो और कुछ ने तो बगीचे भी सडक मे बना डाले थे, अत: गली इतनी सिमट गयी थी कि उसमे अगर आमने-सामने दो कारें खडी हो जायें तो बीच से एक बाइक निकलनी भी मुश्किल हो जाती थी।
यहां एक बात और गौर फरमाने लायक है कि जहां सरदार जी, उनके ठीक सामने वाले और थोडी दूरी पर रहने वाला एक और पंजाबी परिवार, मुहल्ले मे जहां इन तीन पंजाबी परिवारो के बीच काफ़ी मित्रता और सहयोग था, वहीं गली मे बसे तीन-चार पहाडी मूल के परिवारों के बीच अक्सर आपसी कटुता ही रहती थी। वे लोग एक दूसरे को देखकर ही कूढ्ते रहते थे, और गढ्वाली-कुमाऊनी के अन्तर मे ही उल्झे रहते थे। एक ओर जहां पंजाबी लोग काफ़ी लम्बी-चौडी प्रस्नैलिटी के लोग थे, वहीं पहाडी लोग अमुमन औसत कद-काठी के थे, अत: अपनी बाचाल वाक क्षमता और इसी शारीरिक गुण के कारण वे अन्य लोगो पर हर वक्त हावी रहते। मुख्य सडक से गली मे घुसने के दो द्वार थे और जब कभी सरदार जी गाडी लेकर गली मे घुसते और अगर उन्हे किसी का दुपहिया भी सडक मे गलत ढंग से पार्क किया मिल जाये तो सरदार जी उसकी अच्छी खासी क्लास ले लेते थे, जबकि इसके ठीक उलट उनके अपने घर के आगे उनका एक लम्बा रैम्प था, फिर उस रैम्प के आगे वे एक कार खडी करते और चुंकि उनके सामने वाले घर मे जो पंजाबी परिवार रहता था, उनके पास कोई वाहन नही था, अत: वह इनका दोस्त होने के नाते, सरदार जी एक गाडी उनके रैम्प के ठीक आगे खडी कर देते थे।
एक बार इस बात से तंग आकर जब नेगी जी ने सरदार जी से कहा कि हमें अपनी बाइक गली से बाहर निकालनी मुश्किल पड जाती है, इसलिये आप या तो अपने घर के आगे का रैम्प तुडवाये या फिर इस तरह साथ-साथ दो गाडियां गली मे खडी न करें, तो इतना सुनते ही सरदार जी फैल गये। उन्होने कहा कि मैने गाडियां अपने और अपने दोस्त के घर के आगे पार्क की है, तुम्हारे नही । सरदार जी के वे ऊंचे स्वर-संवाद पूरी गली सुन रही थी, लेकिन कोई भी यह कहने नही आया कि जब तुम, हमें हमारे दुपहिया वाहनों को ठीक से पार्क करने की नसीहत देते फिरते हो तब आपका यह तर्क कहां चला जाता है ?
ज्यों-ज्यों दिन गुजरे, गली मे आवाजाही की समस्या बढ्ती गई । सयोग बस नेगी जी के पुराने दोस्त रावत जी भी उसी मुह्ल्ले मे मकान लेकर आ बसे ! स्वभाव से मिलनसार और तेज-तर्रार रावत जी को जब नेगी जी ने अपनी समस्या बताई तो उन्होने उन्हे उसका समाधान जल्दी ढुढने का भरोसा दिलाया। उन्होने नेगी जी से मिलकर पहले यह पता लगाया कि पूरे मुह्ल्ले मे कितने पहाडी लोग रहते है। कुल मिलाकर तीस परिवार पहाडी लोग के थे, उसके बाद उन्होने पचास रुपये की सदस्यता पर उनकी एक उत्तरांचल विकास समिति बना डाली। धीरे-धीरे सभी तीस परिवार उस समिति से जुड गये और उन सभी परिवारो के आपसी मेल-जोल बढ गया। बस फिर क्या था, पह्ले से पूरा खाका बनाये रावत जी ने अपनी रणनीति उन्हे समझा दी, और अपनी कम्पनी से दो पुराने बडे ट्रक लाकर उस मुह्ल्ले की गली के दोनो मुहानो पर इस तरह खडे कर दिये कि सिर्फ़ पैदल लोग और दुपहिया वाहन ही निकल सके। सौभाग्य बस, गली के मुहाने पर के दोनो तरफ़ के मकान पहाडियों के ही थे ।
बस, फिर क्या था, सरदार जी की गली के अन्दर की गाडियां अन्दर और बाहर की बाहर ही रह गयी थी। सरदार जी यह सब देख तिलमिला उठे और हल्ला करते हुए जब वहां पहुचे तो सभी तीस के तीस पहाडी परिवार भी वहां इकठ्ठा होकर एक टका सा जबाब सरदार जी को दे गये कि उन्होने भी ट्रक अपने घर के आगे खडा कर रखा है, तुम्हारे नही। भन्नाये हुए सरदार जी पास के थाने पहुच गये और पुलिस के दो सिपाहियों को लेकर आ गये, मगर पहले से तैयार सभी तीस परिवारों ने उन्हे घेर लिया, अब बात ऊपर तक पहुच चुकी थी। जब आला अधिकारी पहुचे और दोनो पक्ष की बातें सुनी तो उन्होने सीधे-सीधे सरदार जी को दोषी ठहराया और उन्हे हिदायत दी कि वे रिहायस वाली जगह से अपना धन्धा नही चला सकते, क्योंकि यह गैर-कानूनी है। यह सुनकर सरदार जी की घिग्घी बंध गयी।
अगले दिन शाम को जब नेगी जी दफ़्तर से लौटे तो सरदार जी गेट पर हाथ जोडे खडे थे, ज्यों ही नेगी जी अपनी बाइक से उतरे, सरदार जी ने अदब से उन्हें सतश्रीकाल बोला और कहना शुरु किया ; नेगी जी, तुस्सी हम पर इक मेहरबानी करदो जी, रात को बाहर सड़क पर गाडी छोड़ने से चोरी का डर है जी, अतः आप हमें सिर्फ इतनी अनुमति दे दो की हम रात १० बजे बाद गाडियों को गली में खड़ी कर सके और जी हम सबेरे पांच बजे से पहले-पहले सारी गड्डी बाहर निकाल देंगे जी पांच बजे बाद आप लोगो को गली एकदम किलियर मिलेगी जी।
नोट: कहानी किसी के प्रति दुराग्रह से प्रेरित नही है, बल्कि यह दर्शाने के लिये है कि एकता मे कितनी शक्ति होती है ।
Friday, May 29, 2009
फिर उच्च जाति वर्ग और सवर्णों को किस बात का दोष ?
जब मौका मिले , हमारा यह तथाकथित दलित समाज, उच्च जाति वर्ग और सवर्णों को इस बात के लिए कोसता फिरता है कि उन्होंने समाज में अपने उच्च और सवर्ण होने का फायदा उठाकर दलितों का शोषण किया और उन्हें दबाये रखकर सिर्फ अपना भला किया ! मैं इनसे पूछता हूँ कि इस देश के सवर्णों ने तो फिर भी आपको कई मौके दिए कि आप भी अपना उत्थान कर सको, मगर क्या कभी तनिक आप लोगो ने अपने गिरेवान में झाँककर देखा कि तुम लोग क्या करते हो ?अभी ताजा-ताजा हमारे समक्ष बहुत सारी मिसाले है लेकिन मैं बहुत सारी मिसाले पेश नही करूँगा, क्योंकि आप लोग सब जानते हुए भी अगर अनजान बनने की कोशिश करे तो कोई क्या कर सकता है? लेकिन जिस तरह आपके कुछ तथाकथित दलित बाहुबली मसलन तमिलनाडु के एम्. करुणानिधी, समय-समय पर सब कुछ ताक पर रखकर सिर्फ अपना और अपने परिवार( तीन बीबियाँ और उनके रिस्तेदार ) का ही भला सोचते है, और आप उसे उचित ठहराते है (वोट देकर ), तो यदि सवर्णों और उच्च जाति वर्ग के लोगो ने भी जब उन्हें मौका मिला,ठीक वैसा ही किया जैसा आज आप लोग कर रहे हो, (आरक्षण भी चाहिए और पूरे परिवार का भला भी) तो उन्होंने कौन सा गुनाह किया?
सिपै चचा !
सूबेदार पूरण सिंह अपने गाँव के वे पहले व्यक्ति थे, जो आजादी के बाद सेना में भर्ती हुए थे । अतः रंगरूटी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब वह पहली बार गाँव आये तो गाँव के बच्चो ने उनका नया नामकरण कर डाला था 'सिपै चचा' यानि सिपाही चाचा । कुछ सालो बाद न सिर्फ बच्चे, अपितु गाँव के बड़े-बूढे सभी उनके लिए इसी नाम का संबोधन करने लगे थे, और तब से आज तक वे इसी नाम से जाने जाते है। अपने जवानी के दिनों में जब सिपै चचा छुट्टी आते थे और अपनी फौजी ड्रेस में एक बिस्तरबंद और एक काला बक्सा लिए गाँव की पहाडी धार वाली सड़क में बस से उतरते थे, तो गाँव में एक अलग ही किस्म का उत्साह सा फैल जाता था। गाँव के कुछ युवा दौड़कर सड़क में ही पहुच जाते और कोई चचा का बैग उठाता, कोई बक्सा और कोई विस्तरबंद । वे ज्यों-ज्यों गाँव के नजदीक पहुँचते, शाम को हुक्का गुडगुडाते हुए चौपाल में बैठे लोग आपस में काना-फूसी करते " सिपै चचा लगता है इस बार माल-ताल काफी लाया है, बक्सा भारी प्रतीत हो रहा है। " माल-ताल से उनका एक ही तात्पर्य होता था, वह था, रम की बोतल ।
इस बार सिपै चचा की भतीजी, रूपा तकरीबन २ साल के बाद गर्मियों की छुट्टिया बिताने दिल्ली से कल ही अपने मायके आयी थी। साथ में वह चचा के लिए कुछ फल-फ्रूट लाई थी, इसलिए आज दिन में ही वह अपने मायके के घर से करीब १५० मीटर की दूरी पर स्थित, सिपै चचा के कुटिया-नुमा घर में उनसे मिलकर आयी थी, और चचा की दयनीय हालत देखकर मन ही मन बहुत खिन्न थी । उनके पैर पर लकवे के दुबारा मार जाने की वजह से वे अब ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे । चचा के प्रति वह सालो से मन में पल रहे एक अपराधबोध से घुटती रहती थी । जब कभी वह रणु और उसकी पत्नी तारा को आपस में खिलखिलाकर हँसते हुए देखती थी तो उसका खून खौल जाता था, और उसका मन करता कि वह इन दोनों का क्या कर दे। रणु तो रूपा से ठीक से नजरें भी नहीं मिला पाता था, उसे देखते ही उसकी घिग्घी सी बंध जाती थी, किन्तु तारा पर उसके सामने होने न होने का कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता था ।
चूँकि गर्मियों के दिन थे, अतः रात्री भोजन के उपरांत अपने डेड बर्षीय बेटे को कमरे में सुला, वह पिता द्बारा हाल ही में बनाये गए ईंट, सीमेंट और कंक्रीट के नए मकान की छत पर बैठ, ख्यालो में गुमसुम, भीनी-भीनी चांदनी में दूर सिपै चचा की कुटिया को निहारते हुए कहीं अपने अतीत में खो गयी थी । वह तब ८ साल की थी, जब उसने वह भयावह मंजर अपनी नन्ही आँखों से देखा था। उसे याद है कि सिपै चचा और चाची अपने इकलौते बेटे रणु को कितना प्यार करते थे, और शायद उनका उसके लिए वह अपार प्यार, प्रेम ही एक नासूर बन बैठा था । चाची अपने इस कुपूत को बस दिन भर कुछ ना कुछ खिलाती रहती थी। और जब भी वह आस-पास होता था, बार-बार उसे यही पूछती रहती कि बेटा तुझे भूख तो नहीं लगी । अगर उसने थोड़ी देर पहले ही पेट भर खाना खाया भी हो तो भी एक-दो घंटे बाद पुनः चाची कहती, बेटा आज तूने खाना कम खाया, तुझे भूख लग गयी होगी, ठहर मैं तेरे लिए एक-दो गरमा-गरम रोटी पकाती हूँ । और फिर कुछ देर बाद उसे रोटी और घी की कटोरी थमा देती थी । सिपै चचा भी जब छुट्टियां लेकर गाँव आते तो पूरे दो महीने की छुट्टियों भर उसी के आगे पीछे घूमते रहते । चचा की दिली तमन्ना थी कि रणु के साथ उसकी एक बहन भी हो, किन्तु रणु के जन्म के समय चाची को अनेक शल्य-चिकित्साओ से गुजरना पड़ा था, और उसकी वजह से यह नामुमकिन हो गया था ।
माता-पिता को इस अपने इकलौते बुढापे के सहारे, रणु से बहुत अपेक्षाए थी, मगर माँ-बाप के अथाह लाड-प्यार ने रणु के दिमाग को कदाचित सातवे आसमान पर पंहुचा दिया था । पंद्रह साल का होते होते उसने न सिर्फ कई व्यश्न अपना लिए थे अपितु पास के गाँव की ही अपनी हमउम्र तारा से इश्क का चक्कर भी शुरु कर दिया था । नतीजन, पढाई-लिखाई सब चौपट हो गए थे । दसवी में फेल होने और उसके बाद उसके तारा से संबंधो का पता चलने के बाद चाची भी दुखी थी । अब वह उसे डांटने के साथ-साथ उस पर कभी-कभार हाथ भी उठा देती थी। लेकिन सत्रह साल की उम्र तक पहुंचते-पहुँचते रणु के दिमाग और ज्यादा खराब हो गए थे, और अब तो जब कभी चाची उससे पढने की बात को लेकर, लड़ते-झगड़ते उस पर हाथ उठाने की कोशिश करती थी तो वह भी साथ में चाची पर हाथ चला देता था।
और उस दिन तो उसने अपनी सारी हदे ही पार कर दी, जब सुबह के वक्त चाची उसे स्कूल जाने के लिए कह रही थी, मगर वह था कि मना कर रहा था। जब लाख बोलने पर भी वह नहीं माना तो घर के ऊपरी हिस्से में बने बरामदे में चाची पास पडी एक लकडी उठा गुस्से में मारने के लिए उसकी तरफ बड़ी तो उसने चाची को खींच कर तकरीबन चार मीटर ऊँची घर की मोटे-मोटे नोकीले पत्थरों की सीडियों से नीचे धकेल दिया था । पास खडी रूपा यह देख हतप्रभ रह गयी और उसके मुह से चीख निकल गयी। आस-पास के घरो के लोग या तो घर के अन्दर काम में व्यस्त थे या फिर खेत-खलिहानों में निकल गए थे। नोकीले पत्थरो में टकराने से चाची के सिर पर गहरी चोट लग गयी थी, और थोड़ी देर छटपटाने के बाद उसके प्राण-पखेरू उड़ गए। रणु ने जल्दी से रूपा का मुह दबाया और उठाकर अन्दर कमरे में लेजाकर उसे डराने धमकाने लगा कि अगर उसने इस बात के बारे में किसी को भी बताया, तो वह उसको भी कहीं पहाडी से फ़ेंक देगा । साथ ही उसने उसे रोज एक टॉफी लाकर देने का लालच भी दिया था। थोड़ी देर बाद जब रूपा की माँ की नजर सीडियों के नीचे औंधे मुह गिरी, खून से लथपथ चाची पर पडी तो उसने चीख-चिल्लाकर गाँव के लोगो को इकठ्ठा किया। रणु अन्दर कमरे में बैठा इस तरह का नाटक कर रहा था, मानो उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं। जब माँ ने उसे रणु-रणु की आवाज लगाईं थी, तो तब जाकर वह कमरे से बाहर निकला था और चाची के शव पर लोटकर रोने का नाटक करने लगा था।
गाँव के लोग इसे चाची के सीढियों से फिसलकर गिरने की महज एक दुर्घटना मान बैठे थे । सिपै चचा उस समय सियाचिन में पोस्टेड थे, उन्हें टेलीग्राम किया गया । आनन-फानन में चचा तीसरे दिन घर पहुचे थे और पत्नी के इस असामयिक निधन से टूट गए थे । लेकिन दूसरी तरफ मानो रणु की लॉटरी खुल गयी थी, गाँव के बड़े-बुजुर्गो ने जब चचा को रणु की शादी कर देने की सलाह दी तो रणु ने भी झट से तारा से शादी करवाने की बात कही । न चाहते हुए भी चचा ने लडकी वालो की रजामंदी के बाद उसकी शादी तारा से कर दी, क्योंकि उन्हें वापस अपनी ड्यूटी पर लौटना था और घर में रणु अकेला हो गया था । मगर वो कहावत है कि मुसीबत जब आती है तो चारो तरफ से आती है। चूँकी चचा सियाचिन के उस हाई अल्टीट्युड इलाके में पिछले काफी समय से पोस्टेड थे, और उस समय सियाचिन को हथियाने के लिए पाकिस्तानी सैनिक कई नाकाम कोशिश कर चुके थे, इसलिए वे हर वक्त अपनी टुकडी के साथ पेट्रोलिंग पर रहते थे। कदाचित उन्हें वहाँ अनेको मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा था, जिसमे से एक प्रमुख समस्या यह भी थी कि घंटो पेट्रोलिंग पर रहते हुए तमलेट में मौजूद पीने का पानी जम जाता था, अतः सैनिको के पास कोई व्यैकल्पिक साधन न होने से प्यास से बुरी तरह जूझना पड़ता था। दिन के समय ऊपर से तेज धूप और नीचे बर्फ ही बर्फ । चचा ने इसका तोड़ यह निकाला कि खाली तमलेट में आधे से अधिक जगह में कैम्प से बाहर निकलते वक्त गरम पानी भर देना और फिर उसके ऊपर एक गिलास रम डाल देना । इससे तमलेट में पानी के साथ एल्कोहल मिल जाने की वजह से पानी शीघ्र जमता नहीं था। साथ ही वे लोग अपने शरीर में गर्मी भी महसूस करते थे । सामान्य परिस्थितियों में इस तरह के हाई अल्टीट्युड जगहों पर सैनिको को भेजने-लाने से पहले उस माहोल में रहने के लिए उन्हें उचित जगह पर तैयार किया जाता है, किन्तु जब अचानक चचा को इमरजेंसी छुट्टी आना पड़ा तो उनके शरीर पर इसका बुरा असर हो गया, और उनके दाहिने पैर के एक हिस्से को लकवा मार गया था ।
करीब एक साल तक दिल्ली के सुब्रतो पार्क स्थित आर-आर सेंटर में इलाज करवाने के बाद चचा ठीक भी हो गए थे, और उसके छह महीने बाद उनका रिटायर्मेंट भी हो गया था। लेकिन घर पहुँचने पर उनको शकून नहीं मिला । तारा और रणु की हरकतों से तंग आकर उन्होंने वहीं गाँव में थोड़ी दूरी पर एक चौडे खेत में अपनी कुटिया बना डाली और उसमे वे आस-पास के गाँव के गरीब बच्चो को पढाने का काम भी करने लगे थे। लेकिन रणु इतने से भी कहा मानने वाला था, उसने बहला-फुसला और जोर जबरदस्ती से चचा का सारा जो रिटायरमेंट का फंड था, वह भी हड़प लिया था। चाची की हत्या के बाद वह कुछ दिनों तक रूपा को टॉफी खिलाकर बहलाता-फुसलाता रहता था, वह कई बार सोचती थी कि घरवालो को साफ़-साफ़ बता दे, लेकिन फिर रणु की धमकिया याद आने पर वह डर जाती और उसके करीब तीन साल बाद रूपा के पिता रूपा और परिवार को अपने साथ कुछ सालो के लिए शहर ले गए थे । रूपा जब समझदार हुई तो उसे हरवक्त यही अपराधबोध सताता रहता था कि उसने उस घटना की सच्चाई लोगो को उस समय साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताई ।
आज जब उसने चचा की हालत देखी तो उसका रोम-रोम रो उठा था । कभी दुश्मन के दांत खट्टे करने वाला वह हृष्ट-पुष्ट इंसान जीवन के इस मोड़ पर शारीरिक विकलांगता और अपने घर में अपनों से ही जंग हारकर अलग एक कुटिया में बैठा, अपनी कर्कश आवाज में रोज देर रात को सोने से पहले दो लाईने 'पिंजडे के पंछी रे...' वाले गीत की गाया करता। वह इन्ही सोचो में डूबी मन ही मन भगवान् से प्रार्थना कर रही थी कि हे भगवान्, इस जालिम कुपूत रणु को इसी जन्म में यह अहसास अवस्य दिलाना कि माँ-बाप को अपनी बिगड़ी औलाद के प्रति क्या दुःख रहता है, तथा औलाद का माँ-बाप के प्रति क्या फर्ज बनता है, कि तभी माँ ने ऊपर छत में आकर रूपा के कंधे पर हाथ रखकर पुछा था कि बेटी, बहुत रात हो चुकी, तू यहाँ अकेली बैठी क्या कर रही है, अब जा सो जा । उसे उदास देख सिर पर हाथ फेर उससे फिर पुछा था कि क्या उसे विनय की याद आ रही है ? उसने न माँ में जबाब दे, अपनी भीगी पलकों को पोंझ, ज्यों ही खड़े होकर अपने कमरे की और रुख किया कि सिपै चचा की वही कर्कस आवाज उन शांत और सुनशान पहाडी फिजावो में एक बार फिर गूँज उठी;
चुपके-चुपके रोने वाले, रखना छुपा के दिल के छाले रे,
ये पत्थर का देश है पगले, कोई न तेरा होए,
तेरा दर्द न जाने कोए...... !
इस बार सिपै चचा की भतीजी, रूपा तकरीबन २ साल के बाद गर्मियों की छुट्टिया बिताने दिल्ली से कल ही अपने मायके आयी थी। साथ में वह चचा के लिए कुछ फल-फ्रूट लाई थी, इसलिए आज दिन में ही वह अपने मायके के घर से करीब १५० मीटर की दूरी पर स्थित, सिपै चचा के कुटिया-नुमा घर में उनसे मिलकर आयी थी, और चचा की दयनीय हालत देखकर मन ही मन बहुत खिन्न थी । उनके पैर पर लकवे के दुबारा मार जाने की वजह से वे अब ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे । चचा के प्रति वह सालो से मन में पल रहे एक अपराधबोध से घुटती रहती थी । जब कभी वह रणु और उसकी पत्नी तारा को आपस में खिलखिलाकर हँसते हुए देखती थी तो उसका खून खौल जाता था, और उसका मन करता कि वह इन दोनों का क्या कर दे। रणु तो रूपा से ठीक से नजरें भी नहीं मिला पाता था, उसे देखते ही उसकी घिग्घी सी बंध जाती थी, किन्तु तारा पर उसके सामने होने न होने का कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता था ।
चूँकि गर्मियों के दिन थे, अतः रात्री भोजन के उपरांत अपने डेड बर्षीय बेटे को कमरे में सुला, वह पिता द्बारा हाल ही में बनाये गए ईंट, सीमेंट और कंक्रीट के नए मकान की छत पर बैठ, ख्यालो में गुमसुम, भीनी-भीनी चांदनी में दूर सिपै चचा की कुटिया को निहारते हुए कहीं अपने अतीत में खो गयी थी । वह तब ८ साल की थी, जब उसने वह भयावह मंजर अपनी नन्ही आँखों से देखा था। उसे याद है कि सिपै चचा और चाची अपने इकलौते बेटे रणु को कितना प्यार करते थे, और शायद उनका उसके लिए वह अपार प्यार, प्रेम ही एक नासूर बन बैठा था । चाची अपने इस कुपूत को बस दिन भर कुछ ना कुछ खिलाती रहती थी। और जब भी वह आस-पास होता था, बार-बार उसे यही पूछती रहती कि बेटा तुझे भूख तो नहीं लगी । अगर उसने थोड़ी देर पहले ही पेट भर खाना खाया भी हो तो भी एक-दो घंटे बाद पुनः चाची कहती, बेटा आज तूने खाना कम खाया, तुझे भूख लग गयी होगी, ठहर मैं तेरे लिए एक-दो गरमा-गरम रोटी पकाती हूँ । और फिर कुछ देर बाद उसे रोटी और घी की कटोरी थमा देती थी । सिपै चचा भी जब छुट्टियां लेकर गाँव आते तो पूरे दो महीने की छुट्टियों भर उसी के आगे पीछे घूमते रहते । चचा की दिली तमन्ना थी कि रणु के साथ उसकी एक बहन भी हो, किन्तु रणु के जन्म के समय चाची को अनेक शल्य-चिकित्साओ से गुजरना पड़ा था, और उसकी वजह से यह नामुमकिन हो गया था ।
माता-पिता को इस अपने इकलौते बुढापे के सहारे, रणु से बहुत अपेक्षाए थी, मगर माँ-बाप के अथाह लाड-प्यार ने रणु के दिमाग को कदाचित सातवे आसमान पर पंहुचा दिया था । पंद्रह साल का होते होते उसने न सिर्फ कई व्यश्न अपना लिए थे अपितु पास के गाँव की ही अपनी हमउम्र तारा से इश्क का चक्कर भी शुरु कर दिया था । नतीजन, पढाई-लिखाई सब चौपट हो गए थे । दसवी में फेल होने और उसके बाद उसके तारा से संबंधो का पता चलने के बाद चाची भी दुखी थी । अब वह उसे डांटने के साथ-साथ उस पर कभी-कभार हाथ भी उठा देती थी। लेकिन सत्रह साल की उम्र तक पहुंचते-पहुँचते रणु के दिमाग और ज्यादा खराब हो गए थे, और अब तो जब कभी चाची उससे पढने की बात को लेकर, लड़ते-झगड़ते उस पर हाथ उठाने की कोशिश करती थी तो वह भी साथ में चाची पर हाथ चला देता था।
और उस दिन तो उसने अपनी सारी हदे ही पार कर दी, जब सुबह के वक्त चाची उसे स्कूल जाने के लिए कह रही थी, मगर वह था कि मना कर रहा था। जब लाख बोलने पर भी वह नहीं माना तो घर के ऊपरी हिस्से में बने बरामदे में चाची पास पडी एक लकडी उठा गुस्से में मारने के लिए उसकी तरफ बड़ी तो उसने चाची को खींच कर तकरीबन चार मीटर ऊँची घर की मोटे-मोटे नोकीले पत्थरों की सीडियों से नीचे धकेल दिया था । पास खडी रूपा यह देख हतप्रभ रह गयी और उसके मुह से चीख निकल गयी। आस-पास के घरो के लोग या तो घर के अन्दर काम में व्यस्त थे या फिर खेत-खलिहानों में निकल गए थे। नोकीले पत्थरो में टकराने से चाची के सिर पर गहरी चोट लग गयी थी, और थोड़ी देर छटपटाने के बाद उसके प्राण-पखेरू उड़ गए। रणु ने जल्दी से रूपा का मुह दबाया और उठाकर अन्दर कमरे में लेजाकर उसे डराने धमकाने लगा कि अगर उसने इस बात के बारे में किसी को भी बताया, तो वह उसको भी कहीं पहाडी से फ़ेंक देगा । साथ ही उसने उसे रोज एक टॉफी लाकर देने का लालच भी दिया था। थोड़ी देर बाद जब रूपा की माँ की नजर सीडियों के नीचे औंधे मुह गिरी, खून से लथपथ चाची पर पडी तो उसने चीख-चिल्लाकर गाँव के लोगो को इकठ्ठा किया। रणु अन्दर कमरे में बैठा इस तरह का नाटक कर रहा था, मानो उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं। जब माँ ने उसे रणु-रणु की आवाज लगाईं थी, तो तब जाकर वह कमरे से बाहर निकला था और चाची के शव पर लोटकर रोने का नाटक करने लगा था।
गाँव के लोग इसे चाची के सीढियों से फिसलकर गिरने की महज एक दुर्घटना मान बैठे थे । सिपै चचा उस समय सियाचिन में पोस्टेड थे, उन्हें टेलीग्राम किया गया । आनन-फानन में चचा तीसरे दिन घर पहुचे थे और पत्नी के इस असामयिक निधन से टूट गए थे । लेकिन दूसरी तरफ मानो रणु की लॉटरी खुल गयी थी, गाँव के बड़े-बुजुर्गो ने जब चचा को रणु की शादी कर देने की सलाह दी तो रणु ने भी झट से तारा से शादी करवाने की बात कही । न चाहते हुए भी चचा ने लडकी वालो की रजामंदी के बाद उसकी शादी तारा से कर दी, क्योंकि उन्हें वापस अपनी ड्यूटी पर लौटना था और घर में रणु अकेला हो गया था । मगर वो कहावत है कि मुसीबत जब आती है तो चारो तरफ से आती है। चूँकी चचा सियाचिन के उस हाई अल्टीट्युड इलाके में पिछले काफी समय से पोस्टेड थे, और उस समय सियाचिन को हथियाने के लिए पाकिस्तानी सैनिक कई नाकाम कोशिश कर चुके थे, इसलिए वे हर वक्त अपनी टुकडी के साथ पेट्रोलिंग पर रहते थे। कदाचित उन्हें वहाँ अनेको मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा था, जिसमे से एक प्रमुख समस्या यह भी थी कि घंटो पेट्रोलिंग पर रहते हुए तमलेट में मौजूद पीने का पानी जम जाता था, अतः सैनिको के पास कोई व्यैकल्पिक साधन न होने से प्यास से बुरी तरह जूझना पड़ता था। दिन के समय ऊपर से तेज धूप और नीचे बर्फ ही बर्फ । चचा ने इसका तोड़ यह निकाला कि खाली तमलेट में आधे से अधिक जगह में कैम्प से बाहर निकलते वक्त गरम पानी भर देना और फिर उसके ऊपर एक गिलास रम डाल देना । इससे तमलेट में पानी के साथ एल्कोहल मिल जाने की वजह से पानी शीघ्र जमता नहीं था। साथ ही वे लोग अपने शरीर में गर्मी भी महसूस करते थे । सामान्य परिस्थितियों में इस तरह के हाई अल्टीट्युड जगहों पर सैनिको को भेजने-लाने से पहले उस माहोल में रहने के लिए उन्हें उचित जगह पर तैयार किया जाता है, किन्तु जब अचानक चचा को इमरजेंसी छुट्टी आना पड़ा तो उनके शरीर पर इसका बुरा असर हो गया, और उनके दाहिने पैर के एक हिस्से को लकवा मार गया था ।
करीब एक साल तक दिल्ली के सुब्रतो पार्क स्थित आर-आर सेंटर में इलाज करवाने के बाद चचा ठीक भी हो गए थे, और उसके छह महीने बाद उनका रिटायर्मेंट भी हो गया था। लेकिन घर पहुँचने पर उनको शकून नहीं मिला । तारा और रणु की हरकतों से तंग आकर उन्होंने वहीं गाँव में थोड़ी दूरी पर एक चौडे खेत में अपनी कुटिया बना डाली और उसमे वे आस-पास के गाँव के गरीब बच्चो को पढाने का काम भी करने लगे थे। लेकिन रणु इतने से भी कहा मानने वाला था, उसने बहला-फुसला और जोर जबरदस्ती से चचा का सारा जो रिटायरमेंट का फंड था, वह भी हड़प लिया था। चाची की हत्या के बाद वह कुछ दिनों तक रूपा को टॉफी खिलाकर बहलाता-फुसलाता रहता था, वह कई बार सोचती थी कि घरवालो को साफ़-साफ़ बता दे, लेकिन फिर रणु की धमकिया याद आने पर वह डर जाती और उसके करीब तीन साल बाद रूपा के पिता रूपा और परिवार को अपने साथ कुछ सालो के लिए शहर ले गए थे । रूपा जब समझदार हुई तो उसे हरवक्त यही अपराधबोध सताता रहता था कि उसने उस घटना की सच्चाई लोगो को उस समय साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताई ।
आज जब उसने चचा की हालत देखी तो उसका रोम-रोम रो उठा था । कभी दुश्मन के दांत खट्टे करने वाला वह हृष्ट-पुष्ट इंसान जीवन के इस मोड़ पर शारीरिक विकलांगता और अपने घर में अपनों से ही जंग हारकर अलग एक कुटिया में बैठा, अपनी कर्कश आवाज में रोज देर रात को सोने से पहले दो लाईने 'पिंजडे के पंछी रे...' वाले गीत की गाया करता। वह इन्ही सोचो में डूबी मन ही मन भगवान् से प्रार्थना कर रही थी कि हे भगवान्, इस जालिम कुपूत रणु को इसी जन्म में यह अहसास अवस्य दिलाना कि माँ-बाप को अपनी बिगड़ी औलाद के प्रति क्या दुःख रहता है, तथा औलाद का माँ-बाप के प्रति क्या फर्ज बनता है, कि तभी माँ ने ऊपर छत में आकर रूपा के कंधे पर हाथ रखकर पुछा था कि बेटी, बहुत रात हो चुकी, तू यहाँ अकेली बैठी क्या कर रही है, अब जा सो जा । उसे उदास देख सिर पर हाथ फेर उससे फिर पुछा था कि क्या उसे विनय की याद आ रही है ? उसने न माँ में जबाब दे, अपनी भीगी पलकों को पोंझ, ज्यों ही खड़े होकर अपने कमरे की और रुख किया कि सिपै चचा की वही कर्कस आवाज उन शांत और सुनशान पहाडी फिजावो में एक बार फिर गूँज उठी;
चुपके-चुपके रोने वाले, रखना छुपा के दिल के छाले रे,
ये पत्थर का देश है पगले, कोई न तेरा होए,
तेरा दर्द न जाने कोए...... !
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