एक ज़माना था जब हम चड्डी और कच्छा जैसे शब्द किसी सार्वजनिक जगह पर प्रयुक्त करने में भी हिजकते थे, लेकिन अब कोई हिजक नही क्योंकि हमारा देश अब तरक्की कर गया है, सब लोग पढ़े लिखे हो गए है ! कल जब यह ख़बर पढ़ी कि हमारी मातावो और बहनों ने श्रीराम सेना के कमांडो, श्री प्रमोद मुतालिक को सबक सिखाने के लिए उन्हें वेलेंटाईन डे के उपलक्ष में पीली चड्डीयो का एक पार्सल भेट करने की ठान ली है ! तो एक पल को लगा कि सचमुच हमारा देश काफ़ी तरक्की कर गया है, जो हमारी माँ-बहने, इतने उम्दा आइटम किसी को खास तौर पर भेंट करने लगे है! मैं तब से मन ही मन इनकी हिम्मत की दाद दिए जा रहा था कि रात को जब ऑफिस से घर पहुँचा तो देखा कि मेरी श्रीमती जी ने सारे बक्से और दीवान के अन्दर के कपड़े फर्श पर फैला रखे है, कारण पुछा तो बोली, अपनी पुरानी चद्दीयाँ ढूंड रही थी ! मैं समझ गया कि ये मोहतरमा भी महिलावो के इस नेक कैम्पेन में अपनी हिस्सेदारी दर्ज करवाना चाह रही है !
फर्श पर एक तरफ़ ८-१० चद्दियो का एक ढेर लगा था ! मैंने उसकी तरफ़ ऊँगली कर पुछा, अब क्या ढूंढ़ रही हो, ये पड़ी तो है इनमे से कोई एक भेज दो ! वह बोली, अरे नही तुम नही समझोगे ! मैंने कहा इसमे समझने वाली क्या बात है , मैंने ऑफिस में इन्टरनेट पर पढ़ ली थे वह ख़बर, कि महिलावो ने श्रीराम सेना........ ! वह बोली, अरे नही बुद्धू , बात कुछ और है ! फिर उसने मुझे टीवी चलाने को कहा, मैंने टीवी का स्विच आन किया तो एक ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही थी कि श्रीराम सेना के इस जाबांज सैनिक ने भी बैक फुट पर जाकर स्टेडियम की तरफ़ एक लंबा शॉट खेला है और इस मंदी के दौर में भी दुनिया के तमाम पूंजीवादी देशो में अपने देश की आर्थिक प्रगति की धाक ज़माने के लिए एक ऐसा आफर लॉन्च किया है , जो कि आजतक इस देश का नामी-गिनामी, कोई भी अच्छे से अच्छा व्यावसायिक घराना नही कर पाया था और जिसे सुनकर अच्छे- अच्छो के इस सर्दी के मौसम में भी पसीने छूट जाए! आफ़र है चड्डी लावो और साड़ी ले जावो !
मैं ख़बर सुनकर वही सोफे पर बैठ गया और महिलावो के प्रति इर्ष्या के वजह से मेरे छाती पर एक अजीब किस्म की जलन होने लगी, मैं सोच रहा था कि ये लोग सिर्फ़ महिलावो के सामान पर ही क्यो लुभावने आफर पेश करते है ! पुरुषों के साथ क्यो इतना भेदभाव होता है इस आधुनिक समाज में ? आज तक किसी बिजिनिस घराने ने यह आफर नही दिया कि कच्छा लावो और पैंट ले जावो ! पास में डायिजीन की गोली रखी थी, मैंने उसे मुह में डाला और तब जाकर मेरी जलन शांत हुई !
Wednesday, February 11, 2009
Tuesday, February 10, 2009
ये अलकायदा वाले "भी" हमें बेवकूफ समझते है !
अभी-अभी इन्टरनेट पर यह समाचार पढ़ रहा था कि दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन अलकायदा ने भारत को पाक पर हमला न करने की धमकी दी है ! उसने कहा है कि अगर पाकिस्तान पर हमला किया तो भारत की खैर नहीं! अलकायदा की तरफ से ये धमकी अफगानिस्तान में अलकायदा के प्रमुख मुस्तफा अबु यजीद ने दी ! अलकायदा के कमांडर यजीद ने कहा है कि अगर भारत ने पाकिस्तान पर हमला करने की कोशिश की, तो उस पर मुंबई जैसे और भी हमले किए जाएंगे !
यह पढने के बाद मैंने थोडी देर के लिए आँखे मूंदकर इन जनाब की धमकी पर गौर करना शुरू किया तो मुझे इस बात पर हँसी आ गई कि पठान भी अपने को हिन्दुस्तानियों से ज्यादा अक्लमंद समझने लगे है ! क्या वाकई में हम लोग शक्ल से इतने बेवकूफ नजर आते है ? इन्होने या इनके भाइयो ने ( लश्करे तयिबा ) ने यह सोच कर मुंबई पर हमला किया था कि इसके बाद भारत पाकिस्तान पर हमला कर देगा और फिर इनके मजे , क्योंकि दुनिया का सारा ध्यान इस लड़ाई की ओर चला जाएगा, लेकिन इन गdho को मालूम ही नही था कि भारत में कितने शांत स्वभाव का व्यक्ति प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठा है, और पाकिस्तान को मारना तो दूर ये जनाब मैडम के कहे बगैर क्षींक भी नही मारते ! अब जब ये इसमे सफल होते नही दीखे तो इन्हे मालूम है कि भारत द्वारा दिए गए डोजियर के जबाब में पाकिस्तान ने जो उत्तर दिया है उससे भारत खुस नही, अतः इस अवसर को सही मौका समझ इन्होने झट से अपना वो कुख्यात वीडियो जारी कर दिया और धमकी डे डाली कि तू जरा हमला करके तो देख, फिर देख हम क्या करते है ! ताकि इंडिया तैश में आकर पकिस्तान पर हमला कर दे ! बेचारा पाकिस्तान! कितने सारे शुभचिंतक पाले बैठा है अपने लिए ! अगर कोई इस पर नही भी हमला करना चाह रहा हो तो इनके उकसावे और कोरी धमकियों में आकर, कर डाले,वाह !
क्या ही अच्छा होता कि तुंरत भारत की तरफ़ से भी एक संदेश भेजा जाता कि चूँकि अलकायदा और तालिबान नही चाहता कि भारत पाकिस्तान पर हमला करे इसलिए भारत पाकिस्तान पर हमला नही करेगा और उसे प्यार से समझायेगा कि २६/११ के दोषियों के खिलाप कारवाही करे ! और अगर नही करता तो जैसा चल रहा है चलता रहेगा ! फिर देखो ये बेकायदा लोग कैसे अपनी मुंडी नोचते है !
वैसे कभी आप लोगो ने भी सोचा है कि मान लो अचानक अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान दो शांत देश बन जाते है जहा कोई खून खराबा नही, कोई आतंकवाद नही, बिल्कुल शांत ! तो क्या अमेरिका और पश्चमी देश उसमे कोई दिलचस्पी रखेगे ? अगर नही, तो ये पाकिस्तानी खायेंगे क्या ?
यह पढने के बाद मैंने थोडी देर के लिए आँखे मूंदकर इन जनाब की धमकी पर गौर करना शुरू किया तो मुझे इस बात पर हँसी आ गई कि पठान भी अपने को हिन्दुस्तानियों से ज्यादा अक्लमंद समझने लगे है ! क्या वाकई में हम लोग शक्ल से इतने बेवकूफ नजर आते है ? इन्होने या इनके भाइयो ने ( लश्करे तयिबा ) ने यह सोच कर मुंबई पर हमला किया था कि इसके बाद भारत पाकिस्तान पर हमला कर देगा और फिर इनके मजे , क्योंकि दुनिया का सारा ध्यान इस लड़ाई की ओर चला जाएगा, लेकिन इन गdho को मालूम ही नही था कि भारत में कितने शांत स्वभाव का व्यक्ति प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठा है, और पाकिस्तान को मारना तो दूर ये जनाब मैडम के कहे बगैर क्षींक भी नही मारते ! अब जब ये इसमे सफल होते नही दीखे तो इन्हे मालूम है कि भारत द्वारा दिए गए डोजियर के जबाब में पाकिस्तान ने जो उत्तर दिया है उससे भारत खुस नही, अतः इस अवसर को सही मौका समझ इन्होने झट से अपना वो कुख्यात वीडियो जारी कर दिया और धमकी डे डाली कि तू जरा हमला करके तो देख, फिर देख हम क्या करते है ! ताकि इंडिया तैश में आकर पकिस्तान पर हमला कर दे ! बेचारा पाकिस्तान! कितने सारे शुभचिंतक पाले बैठा है अपने लिए ! अगर कोई इस पर नही भी हमला करना चाह रहा हो तो इनके उकसावे और कोरी धमकियों में आकर, कर डाले,वाह !
क्या ही अच्छा होता कि तुंरत भारत की तरफ़ से भी एक संदेश भेजा जाता कि चूँकि अलकायदा और तालिबान नही चाहता कि भारत पाकिस्तान पर हमला करे इसलिए भारत पाकिस्तान पर हमला नही करेगा और उसे प्यार से समझायेगा कि २६/११ के दोषियों के खिलाप कारवाही करे ! और अगर नही करता तो जैसा चल रहा है चलता रहेगा ! फिर देखो ये बेकायदा लोग कैसे अपनी मुंडी नोचते है !
वैसे कभी आप लोगो ने भी सोचा है कि मान लो अचानक अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान दो शांत देश बन जाते है जहा कोई खून खराबा नही, कोई आतंकवाद नही, बिल्कुल शांत ! तो क्या अमेरिका और पश्चमी देश उसमे कोई दिलचस्पी रखेगे ? अगर नही, तो ये पाकिस्तानी खायेंगे क्या ?
Sunday, February 8, 2009
जरुरत है उनके खुफिया तंत्र को समझने और उसे नेस्तनाबूद करने की !
भारत द्वारा पाकिस्तान को मुंबई हमलो पर दिए गए डोजिएर का बहुप्रतीक्षित जबाब शायद आज कल में मिलने की उम्मीद है, इस जबाब से मेरी नजर में, शायद भारत को खास उम्मीद नही रखनी चाहिए, मगर भारत का अगला कदम बहुत कुछ इस जबाब पर निर्भर करेगा, यह उम्मीद की जा रही है ! २६/११ के बाद दक्षिण एशिया क्षेत्र में जो आतकवाद और उससे जुड़े संगठनो के नए समीकरण उभर का सामने आए है, उसमे न सिर्फ़ हमारे देश को अपितु दुनिया भर के उन तमाम देशो, जो आतंकवाद के मुख्य निशाने पर है, उन्हें यह समझने की जरुरत है कि आतंकवाद का यह खतरा उनको न सिर्फ़ किसी खूंखार आतंकवादी संघठन से है, बल्कि सबसे बड़ा खतरा उस इंजीनियरिंग डिजायिनर से है जो इसका खाका और ड्राइंग तैयार करता है ! और इसमे कोई संदेह नही होना चाहिए कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई, एक कुशल डिजाईन इंजिनियर की भूमिका दशको से बड़े ही अनुभवी ढंग से निभाती आ रही है! वो एक अंग्रेजी कहावत है कि अपराधी बिना पूछे बहुत सारे तर्क दे डालता है, हाल के जनरल मुसर्रफ के आईएसआई पर दीगयी सफाई को भी इसी दृष्टीकोण से देखा जाना चाहिए !
आपको याद होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति जब अपना चुनाव प्रचार कर रहे थे, तो उन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा हालत पर कुछ ऐसे कठोर संकेत पाकिस्तान को दिए थे जिससे इनकी यह विश्व कुख्यात एजेंसी, बुरी तरह से डर गई थी ! और यही वजह है कि समय-समय पर भ्रमित करने के लिए यह अपने पुराने मातहत रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल हामिद गुल को आगे करदेती है, या यु कहे कि एक अनोखे किस्म का आंतरिक भय इस पुराने चीफ को आगे आने के लिए मजबूर कर देता है ! और यही भय इनकी जुबान से हाल में रावलपिंडी में हुई पाकिस्तान के उच्च पदस्त सैन्य और अन्य अधिकारियो की मीटिंग में इनके सिरकत करते वक्त निकल गया था जब इन्होने ख़ुद कहा कि पाकिस्तान अन्दर से बहुत डरा हुआ है औरवह ऐंसे हालत में परमाणु हमला भी करसकता है !
मार्च १९८७ में तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने इन हामिद साहब को पाकिस्तान की खुपिया एजेन्सी आईएसआई का चीफ नियुक्तकिया था, इससे पहले ये सेना में रहते हुए, अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए के लिए अफगानिस्तान में रुसी सेनावो के खिलाप काम करते थे और यूँ कहे कि इस क्षेत्र में सीआईए के दाहिने हाथ थे ! और भारत के खिलाप इन्होने ही वक्त-वक्त पर सुई चुभो कर खून बहाने की रूपरेखा (प्रोक्सी वार) बखूबी तैयार की थी ! पहले पंजाबमें, और फिर कश्मीर मैं और इसके अलावा असम और उत्तर पूरब के इलाको में सक्रीय नागा, मिजो और उल्फा संगठनों के चरमपंथियों को तैयार करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, और कहा तो यह भी जा रहा है कि इस देश में मावो और नक्श्ली गुटों को भी यही हथियार और उनके इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने वालो में से है !
अब जो मुख्य बात मैं कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि २६/११ के बाद अमेरिका ने जिन चार लोगो को संयुक्त राष्ट से आतंकवादी घोषित करने का आग्रह किया था उसमे से एक है, यह हामिद गुल साहब ! खैर मुझे नही लगता कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में कोई ऐसा खास कदम उठाने वाले है जो कि पाकिस्तान में मौजूद आतंकवाद की रीढ़ की हड्डी को तोडे सके , मगर फिर भी पाकिस्तान के आतंकवाद के इन आंकवो को कहीं न कहीं यह डर जरूर सता रहा है कि आने वाले वक्त में कुछ होगा जरूर ! और यही वजह थी इन हामिद साहब ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के समक्ष यह कहना शुरू कर दिया कि अमेरिका में घटित ०९/११ अमेरिका द्वारा स्वयं रचित एक ड्रामा था ! वैसे ये ख़ुद भी जानते है कि यह आरोप स्वयं में एक हास्यास्पद सी बात है मगर इनका मकसद कुछ और है , ये यह कहकर, या इस पर किताब लिखकर अंतराष्ट्रीय समुदाय को इस बहकावे में रखना चाहते है कि अमेरिका में हुए हमलो के बारे में पाकिस्तान की खुपिया एजेन्सी को कुछ नही मालुम, अगर इनको मालुम होता तो उसका चीफ इस तरह की उल-जुलूल बातें क्यो कहता ! जबकि वास्तविकता इससे बहुत परे है ! जिस तरह से ०९/११ और २६/११ हुआ उसमे बहुत सी समानताये थी और जिसमे से एक प्रमुख समानता थी, हिट एंड रन ! यानि मुख्य काम को अंजाम देने वाले या तो खुदा को प्यारे हो जाए या फिर वापस इनके पास पहुच जाए! आई एस आई के ब्लू प्रिंट के सिद्धांत के मुताविक ये पहले आप्शन यानि खुदा को प्यारा हो जाने को ज्यादा प्राथमिकता देते है ! अन्दर से इनके सपोर्टिंग एजेंट बहुत सारे रहे हो लेकिन वास्तविक घटना को अंजाम तक पहुचने वाले अलकायदा के ४ या ५ आत्मघाती और लस्करे तयिबा के सिर्फ़ १० कमांडो ही थे, जिसमे से आई एस आई के सर्बोत्तम ब्लूप्रिंट के ठीक विपरीत, इनके दुर्भाग्यबस एक कमांडो यानि कसाब जिन्दा हाथ आ गया , नही तो इन जनाब ने अब तक मुंबई हमले पर भी एक किताब लिख डाली होती और इसे भारत की भगवा ब्रिगेड का मालेगांव घटना से ध्यान बटाने का एक ड्रामा मात्र करार दिया होता !
मेरा यह मानना है कि अगर हमें अथवा पश्चिमी देशो को ईमानदारी से इस आतंकवाद के ताने बाने को ख़त्म करना है तो पहली जरुरत है, पाकिस्तान की इस बदनाम एजेन्सी को नेश्तनाबूद कर देना ! अगर भारत अथवा अमेरिका और नाटो संघटन इस कार्य में सफल हो जाए तो समझो कि आतंकवाद के खात्मे का ५० फीसदी काम पुरा हो गया ! हमें भी अपने देश के दुश्मन आतंकवाद के विरुद्ध उतनी सफलता पाकिस्तान पर प्रत्यक्ष युद्ध अथवा सर्जिकल स्ट्राइक से नही मिलेगी जितनी की इस एजेन्सी के खात्मे पर !अगर गौर से देखे तो अलकायदा और तालिबान का फिर से सिर उठाने की एक सबसे बड़ी वजह है आई एस आई ! यह आज तक इस तरह का रोल अदा करती आ रही है कि अमेरिका के साथ भी भले बन गए, और आतंकवादियों के साथ भी ! इसकी थोडी सी ख़बर उसे दे दो और उसकी थोडी सी ख़बर इसे दे दो और ख़ुद को भला आदमी साबित करो दोनों की नजर में ! जबकि वास्तविकता यह है कि यह दोना का ही एक खतरनाक शत्रु है!
आपको याद होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति जब अपना चुनाव प्रचार कर रहे थे, तो उन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा हालत पर कुछ ऐसे कठोर संकेत पाकिस्तान को दिए थे जिससे इनकी यह विश्व कुख्यात एजेंसी, बुरी तरह से डर गई थी ! और यही वजह है कि समय-समय पर भ्रमित करने के लिए यह अपने पुराने मातहत रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल हामिद गुल को आगे करदेती है, या यु कहे कि एक अनोखे किस्म का आंतरिक भय इस पुराने चीफ को आगे आने के लिए मजबूर कर देता है ! और यही भय इनकी जुबान से हाल में रावलपिंडी में हुई पाकिस्तान के उच्च पदस्त सैन्य और अन्य अधिकारियो की मीटिंग में इनके सिरकत करते वक्त निकल गया था जब इन्होने ख़ुद कहा कि पाकिस्तान अन्दर से बहुत डरा हुआ है औरवह ऐंसे हालत में परमाणु हमला भी करसकता है !
मार्च १९८७ में तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने इन हामिद साहब को पाकिस्तान की खुपिया एजेन्सी आईएसआई का चीफ नियुक्तकिया था, इससे पहले ये सेना में रहते हुए, अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए के लिए अफगानिस्तान में रुसी सेनावो के खिलाप काम करते थे और यूँ कहे कि इस क्षेत्र में सीआईए के दाहिने हाथ थे ! और भारत के खिलाप इन्होने ही वक्त-वक्त पर सुई चुभो कर खून बहाने की रूपरेखा (प्रोक्सी वार) बखूबी तैयार की थी ! पहले पंजाबमें, और फिर कश्मीर मैं और इसके अलावा असम और उत्तर पूरब के इलाको में सक्रीय नागा, मिजो और उल्फा संगठनों के चरमपंथियों को तैयार करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, और कहा तो यह भी जा रहा है कि इस देश में मावो और नक्श्ली गुटों को भी यही हथियार और उनके इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने वालो में से है !
अब जो मुख्य बात मैं कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि २६/११ के बाद अमेरिका ने जिन चार लोगो को संयुक्त राष्ट से आतंकवादी घोषित करने का आग्रह किया था उसमे से एक है, यह हामिद गुल साहब ! खैर मुझे नही लगता कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में कोई ऐसा खास कदम उठाने वाले है जो कि पाकिस्तान में मौजूद आतंकवाद की रीढ़ की हड्डी को तोडे सके , मगर फिर भी पाकिस्तान के आतंकवाद के इन आंकवो को कहीं न कहीं यह डर जरूर सता रहा है कि आने वाले वक्त में कुछ होगा जरूर ! और यही वजह थी इन हामिद साहब ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के समक्ष यह कहना शुरू कर दिया कि अमेरिका में घटित ०९/११ अमेरिका द्वारा स्वयं रचित एक ड्रामा था ! वैसे ये ख़ुद भी जानते है कि यह आरोप स्वयं में एक हास्यास्पद सी बात है मगर इनका मकसद कुछ और है , ये यह कहकर, या इस पर किताब लिखकर अंतराष्ट्रीय समुदाय को इस बहकावे में रखना चाहते है कि अमेरिका में हुए हमलो के बारे में पाकिस्तान की खुपिया एजेन्सी को कुछ नही मालुम, अगर इनको मालुम होता तो उसका चीफ इस तरह की उल-जुलूल बातें क्यो कहता ! जबकि वास्तविकता इससे बहुत परे है ! जिस तरह से ०९/११ और २६/११ हुआ उसमे बहुत सी समानताये थी और जिसमे से एक प्रमुख समानता थी, हिट एंड रन ! यानि मुख्य काम को अंजाम देने वाले या तो खुदा को प्यारे हो जाए या फिर वापस इनके पास पहुच जाए! आई एस आई के ब्लू प्रिंट के सिद्धांत के मुताविक ये पहले आप्शन यानि खुदा को प्यारा हो जाने को ज्यादा प्राथमिकता देते है ! अन्दर से इनके सपोर्टिंग एजेंट बहुत सारे रहे हो लेकिन वास्तविक घटना को अंजाम तक पहुचने वाले अलकायदा के ४ या ५ आत्मघाती और लस्करे तयिबा के सिर्फ़ १० कमांडो ही थे, जिसमे से आई एस आई के सर्बोत्तम ब्लूप्रिंट के ठीक विपरीत, इनके दुर्भाग्यबस एक कमांडो यानि कसाब जिन्दा हाथ आ गया , नही तो इन जनाब ने अब तक मुंबई हमले पर भी एक किताब लिख डाली होती और इसे भारत की भगवा ब्रिगेड का मालेगांव घटना से ध्यान बटाने का एक ड्रामा मात्र करार दिया होता !
मेरा यह मानना है कि अगर हमें अथवा पश्चिमी देशो को ईमानदारी से इस आतंकवाद के ताने बाने को ख़त्म करना है तो पहली जरुरत है, पाकिस्तान की इस बदनाम एजेन्सी को नेश्तनाबूद कर देना ! अगर भारत अथवा अमेरिका और नाटो संघटन इस कार्य में सफल हो जाए तो समझो कि आतंकवाद के खात्मे का ५० फीसदी काम पुरा हो गया ! हमें भी अपने देश के दुश्मन आतंकवाद के विरुद्ध उतनी सफलता पाकिस्तान पर प्रत्यक्ष युद्ध अथवा सर्जिकल स्ट्राइक से नही मिलेगी जितनी की इस एजेन्सी के खात्मे पर !अगर गौर से देखे तो अलकायदा और तालिबान का फिर से सिर उठाने की एक सबसे बड़ी वजह है आई एस आई ! यह आज तक इस तरह का रोल अदा करती आ रही है कि अमेरिका के साथ भी भले बन गए, और आतंकवादियों के साथ भी ! इसकी थोडी सी ख़बर उसे दे दो और उसकी थोडी सी ख़बर इसे दे दो और ख़ुद को भला आदमी साबित करो दोनों की नजर में ! जबकि वास्तविकता यह है कि यह दोना का ही एक खतरनाक शत्रु है!
Thursday, February 5, 2009
श्रीकृष्ण सेना !
हे भिडू ! नोट करले कहीं पर, इस सेना का संस्थापक मैं हूँ मैं, पीसी गोदियाल ! मैंने गूगल में भी सर्च मार के देख लिया है, भगवान के नाम वाला एक ही ट्रेडमार्क खाली पड़ा था, बाकि सब पर तो सारे सज्जन लोगो ने बहुत पहले ही कब्जा जमा रखा है! तो बस समझ ले , आज से ये ट्रेड मार्क मेरा ! हे सर्किट ! वो बाहर खड़े बबंडर टीवी के संवाददाता को जाके बोल कि जाकर अपने 24x365 वाले न्यूज़ चेनल पर ऐलान कर दे कि श्रीकृष्ण सेना के संस्थापक ने चेतावनी दी है कि इस वेलेनटाईन डे पर कोई भी लड़की दूध से बनी आइस्क्रीम नही खायेगी, क्यूंकि दूध वाले हर आइटम पर पहला अधिकार श्रीकृष्ण सेना के जवानों(ग्वालो) का है !इससे सभ्यता पर आंच आती है और संस्कृति ख़राब होती है ! अगर सड़क पर कोई लड़की उस दिन ऐसा करते पायी गई तो हम आईसक्रीम वाले की ठेली उठा लेंगे !
वाह मुन्ना भाई ! क्या दिमाग पाएला, क्या कमाल का आईडिया आयिरेला है आपकी खाली खोपडी में! अब तक किसी भी समाज विरोधी तत्व की नजर नही पड़ी इस ट्रेड मार्क पर ! बोले तो एकदम पियोर, फिर तो मुन्ना भाई, आपको जेड प्लस सिक्यूरिटी भी मिल जायेगी, वो अपुन बोले तो शिवजी की सेना, रामजीकी सेना और बानारजी की सेना के प्राप्राईटरो की तरह ! अरे मुन्ना भाई, फिर तो आप भी वीआईपी लगोगे !
हां, ठीक है-ठीक है, तुम जावो सर्किट और पहले उस टीवी रिपोर्टर को पकडो और फिर ये चाटुकार जगत को भी बोलो कि जो भी अपनी पहले टिपण्णी भेजेगा, समझो उसको हमने इस सेना में भरती कर दिया,और सुन एक काम और करियो, पता लगा की कौन से दूध की डेरी पर लड़किया दूध लेने ज्यादा पहुँचती है ? वो किस लिए मुन्ना भाई ? अरे सर्किट, खIली पीली खोपडी ख़राब मत कर , अब अगर प्रसिद्धि पानी है तो एक आध तोड़-फोड़ तो करनी ही पड़ेगी न ! अब तुम जावो !
वाह मुन्ना भाई ! क्या दिमाग पाएला, क्या कमाल का आईडिया आयिरेला है आपकी खाली खोपडी में! अब तक किसी भी समाज विरोधी तत्व की नजर नही पड़ी इस ट्रेड मार्क पर ! बोले तो एकदम पियोर, फिर तो मुन्ना भाई, आपको जेड प्लस सिक्यूरिटी भी मिल जायेगी, वो अपुन बोले तो शिवजी की सेना, रामजीकी सेना और बानारजी की सेना के प्राप्राईटरो की तरह ! अरे मुन्ना भाई, फिर तो आप भी वीआईपी लगोगे !
हां, ठीक है-ठीक है, तुम जावो सर्किट और पहले उस टीवी रिपोर्टर को पकडो और फिर ये चाटुकार जगत को भी बोलो कि जो भी अपनी पहले टिपण्णी भेजेगा, समझो उसको हमने इस सेना में भरती कर दिया,और सुन एक काम और करियो, पता लगा की कौन से दूध की डेरी पर लड़किया दूध लेने ज्यादा पहुँचती है ? वो किस लिए मुन्ना भाई ? अरे सर्किट, खIली पीली खोपडी ख़राब मत कर , अब अगर प्रसिद्धि पानी है तो एक आध तोड़-फोड़ तो करनी ही पड़ेगी न ! अब तुम जावो !
Sunday, February 1, 2009
व्यंग्य- घरेलु हिंसा को रोकिये- बेल बजाये !
टीवी पर यह विज्ञापन आपने भी देखा होगा, आजकल खूब चल रहा है! "घरेलु हिंसा को रोकिये- बेल बजाये" ! सर्वप्रथम तो उस विज्ञापन एजेन्सी के क्रिएटिव मेनेजर की तारीफ़ करना चाहूँगा जिसने अपना दिमाग चलाकर इतने सूक्ष्म शब्दों में इतनी गूढ़ बात कह डाली ! एक बहुत ही अहम् तथ्य को उजागर करता है यह विज्ञापन !
कभी आपने भी गौर किया इस बात पर कि कितना निठल्ला और स्वार्थी है हमारा यह पुरूष वर्ग ! सुबह जब उठता है तो उम्मीद करता है कि पत्नी सिरहाने पर चाय का कप हाथ में पकड़े खड़ी हो , वाथरूम में घुसे जनाब तो, गीजर में पानी पहले से ही गर्म मिले! कच्छा बनियान बाथरूम की खूंटी पर टंगा मिले ! नाह-धोकर जब बाहर आए तो डायनिंग पर नाश्ता सजा हुआ हो ! ऑफिस के लिए तैयार होने लगे तो सारे कपड़े प्रेस होकर आलमारी में रखे मिले, और श्रीमतीजी उन्हें कोट पहनाने ,उनके चश्मे, पर्स रूमाल इत्यादि उन्हें पकडाने में भी मदद करे !
उसके बाद ये जनाब ताजे किए नाश्ते का एक लंबा डकार छोड़कर निकल पड़े, नौकरी अथवा पेशे के बहाने मटरगस्ती करने ! ऑफिस में टेबल पर जो काम है उसका एक तिहाई ही किया और बाकि कल के लिए रख दिया , और कंप्यूटर पर चैटिंग शुरू कर दी! दोपहर में लंच के बाद निकल पड़े ऑफिस काम्प्लेक्स और शोपिंग काम्प्लेक्स में हसीनावो के संग चक्षु पान करने ! बस हो गई दिनचर्या ख़त्म !शाम को अगर काम ठीक से न करने पर नाराज बॉस ने डांट डपट दिया तो जनाब, बॉस के सामने तो भीगी बिल्ली बन जायेंगे मगर गुस्सा निकलेगा शराब के ठेके पर बोतल और तंदूरी चिकन पर ! तंदूरी चिकन अगर थोड़ा अधपका मिला, ठेके पर मौजूद बौन्सरो के डर से वहा तो जुबान नही खुलेगी लेकिन बाकि का रहा सहा गुस्सा घरवाली पर !
जनाब जब घर के गेट पर पहुँचते है तो अपने थोबडे में उनके भले ही बारह बज रहे हो मगर बीबी से उम्मीद करते है कि वह अपने पूरे श्रृंगार में मुश्कुराते हुए जनाब का स्वागत करे, इनका ब्रीफकेश उठाये और इनकी टाई और कोट उतारे ! और इसमे अगर जरा भी कोताही हो गई तो उस अधपके चिकन का सारा गुस्सा बेचारी उस मासूम पर, जो शाम होते ही जनाब की राह तकने लगी थी, और दिनभर इनके लिए शाम के खाने पहनने का इंतजाम करती रही, और इस सबका उसे पारितोषिक क्या मिला, इन जनाब की डांट डपट और मार ! सचमुच बहुत ही घटिया किस्म की प्रजाति है यह पुरूष वर्ग !
लेकिन जैसा कि अमूमन देखा गया है कि हर प्रजाति में थोड़ा बहुत भिन्न किस्म के प्राणी भी जन्म ले लेते है जो एक अपवाद बन जाते है ! ऐंसा ही अनुभव आपके साथ बाँटना चाहूँगा ! अभी पिछले हफ्ते रात करीब साड़े दस-ग्यारह बजे, भोजन के उपरांत, अपने पालतू कुत्ते को घुमा कर ला रहा था तो अपने मोहल्ले के नुक्कड़ वाले चौधरी साहब के घर के नीचे से जब गुजरा तो मुझे मिसेज चौधरी के चिल्लाकर बोलने और चौधरी साहब के चीखने की आवाज सुनाई दी ! मेरे पैर ठिठक कर रुक गए ! मिसेज चौधरी कहे जा रही थी " अरे थोड़ा तो शर्म करो , मच्छर को देखा है तुमने ? वह कितना बहादुर होता है , उसे यह पता होते हुए भी कि इंसान एक ताली बजा कर उसका काम तमाम करसकता है, फिर भी वह खून चूसने के लिए सायरन बजा कर जाता है ! और एक तुम हो .....".बीच बीच में किसी चप्पल अथवा झाडू नुमा चीज के बजने की भी आवाज आ रही थी और चौधरी साहब चीख रहे थे , अरे मेरी माँ... हाथ जोड़ता हूँ अब बस भी कर ...!
मैंने अभी जो थोडी देर पहले अपने टीवी पर वह घरेलु हिंसा वाला विज्ञापन देखा था मुझे तुंरत उसका स्मरण आ गया ! मुझे मेरी इंसानियत ने मेरी नैतिक जिम्मेदारी का अहसास कराया और मैं पहुँच गया सीधे उनके गेट पर ! मैंने गेट पर लगी बेल को जोर से बजाया और एक हाथ में कुत्ते की चेन पकड़े रखी और दूसरा हाथ कमर पर लगाकर अकड़कर थोड़ा तिरछा होकर खड़ा हो गया ! मिसेज चौधरी ने गेट खोलते हुए पुछा कौन है ? मैंने उस विज्ञापन वाले किरदार की तरह मिसेज चौधरी को घूरा तो वह तुंरत बोल पड़ी, ओये, ऐंसे क्या घूर रहा है, आँख निकाल दूँगी, मैं थोड़ा सहमा मगर अपने को फिर से नियंत्रित करते हुए रोबदार आवाज में बोला, थोड़ा दूध मिलेगा ? मिसेज चौधरी बोली , तो ऐंसे बोल न कि दूध चाहिए ! वह अन्दर गई दूध लेने और मैं खिसक लिया !
मगर तब गजब हो गया जब साड़े ग्यारह बजे रात मेरी गली में हंगामा खड़ा हो गया ! मिसेज चौधरी हाथ में दूध की कटोरी पकड़े खड़ी थी और मेरी पत्नी का नाम ले-लेकर आवाज दे रही थी ! मेरी पत्नी बाहर निकली तो उसने कहा, वो थारा खसम कहाँ है ? इत्ती रात गए दूध माग रहा था, ये ले, उसने दूध की कटोरी मेरी बीबी को पकडाई ! गेट बंद कर मेरी पत्नी हक्की - बक्की, क्रोध से लाल-पीली हुए अन्दर आई, मेरी तरफ़ खा जाने वाली नजरो से देखते हुए बोली, अच्छा तो उस दिन जो चाँद मुहम्मद बनने के जो सपने देखे जा रहे थे, वो सब इस चौधराहन की वजह से.... आज दूध मांगने गए थे..... ठहरो ! मैं पिलाती हूँ तुम्हे दूध... .... और फिर जनाब ...... क्या बताऊ ? मैं चीखता रहा मगर अडोष पडोश का कोई कमवक्त मेरे गेट पर घंटी बजाने नही आया, इसे कहते है, नेकी कर जूते खा...!
कभी आपने भी गौर किया इस बात पर कि कितना निठल्ला और स्वार्थी है हमारा यह पुरूष वर्ग ! सुबह जब उठता है तो उम्मीद करता है कि पत्नी सिरहाने पर चाय का कप हाथ में पकड़े खड़ी हो , वाथरूम में घुसे जनाब तो, गीजर में पानी पहले से ही गर्म मिले! कच्छा बनियान बाथरूम की खूंटी पर टंगा मिले ! नाह-धोकर जब बाहर आए तो डायनिंग पर नाश्ता सजा हुआ हो ! ऑफिस के लिए तैयार होने लगे तो सारे कपड़े प्रेस होकर आलमारी में रखे मिले, और श्रीमतीजी उन्हें कोट पहनाने ,उनके चश्मे, पर्स रूमाल इत्यादि उन्हें पकडाने में भी मदद करे !
उसके बाद ये जनाब ताजे किए नाश्ते का एक लंबा डकार छोड़कर निकल पड़े, नौकरी अथवा पेशे के बहाने मटरगस्ती करने ! ऑफिस में टेबल पर जो काम है उसका एक तिहाई ही किया और बाकि कल के लिए रख दिया , और कंप्यूटर पर चैटिंग शुरू कर दी! दोपहर में लंच के बाद निकल पड़े ऑफिस काम्प्लेक्स और शोपिंग काम्प्लेक्स में हसीनावो के संग चक्षु पान करने ! बस हो गई दिनचर्या ख़त्म !शाम को अगर काम ठीक से न करने पर नाराज बॉस ने डांट डपट दिया तो जनाब, बॉस के सामने तो भीगी बिल्ली बन जायेंगे मगर गुस्सा निकलेगा शराब के ठेके पर बोतल और तंदूरी चिकन पर ! तंदूरी चिकन अगर थोड़ा अधपका मिला, ठेके पर मौजूद बौन्सरो के डर से वहा तो जुबान नही खुलेगी लेकिन बाकि का रहा सहा गुस्सा घरवाली पर !
जनाब जब घर के गेट पर पहुँचते है तो अपने थोबडे में उनके भले ही बारह बज रहे हो मगर बीबी से उम्मीद करते है कि वह अपने पूरे श्रृंगार में मुश्कुराते हुए जनाब का स्वागत करे, इनका ब्रीफकेश उठाये और इनकी टाई और कोट उतारे ! और इसमे अगर जरा भी कोताही हो गई तो उस अधपके चिकन का सारा गुस्सा बेचारी उस मासूम पर, जो शाम होते ही जनाब की राह तकने लगी थी, और दिनभर इनके लिए शाम के खाने पहनने का इंतजाम करती रही, और इस सबका उसे पारितोषिक क्या मिला, इन जनाब की डांट डपट और मार ! सचमुच बहुत ही घटिया किस्म की प्रजाति है यह पुरूष वर्ग !
लेकिन जैसा कि अमूमन देखा गया है कि हर प्रजाति में थोड़ा बहुत भिन्न किस्म के प्राणी भी जन्म ले लेते है जो एक अपवाद बन जाते है ! ऐंसा ही अनुभव आपके साथ बाँटना चाहूँगा ! अभी पिछले हफ्ते रात करीब साड़े दस-ग्यारह बजे, भोजन के उपरांत, अपने पालतू कुत्ते को घुमा कर ला रहा था तो अपने मोहल्ले के नुक्कड़ वाले चौधरी साहब के घर के नीचे से जब गुजरा तो मुझे मिसेज चौधरी के चिल्लाकर बोलने और चौधरी साहब के चीखने की आवाज सुनाई दी ! मेरे पैर ठिठक कर रुक गए ! मिसेज चौधरी कहे जा रही थी " अरे थोड़ा तो शर्म करो , मच्छर को देखा है तुमने ? वह कितना बहादुर होता है , उसे यह पता होते हुए भी कि इंसान एक ताली बजा कर उसका काम तमाम करसकता है, फिर भी वह खून चूसने के लिए सायरन बजा कर जाता है ! और एक तुम हो .....".बीच बीच में किसी चप्पल अथवा झाडू नुमा चीज के बजने की भी आवाज आ रही थी और चौधरी साहब चीख रहे थे , अरे मेरी माँ... हाथ जोड़ता हूँ अब बस भी कर ...!
मैंने अभी जो थोडी देर पहले अपने टीवी पर वह घरेलु हिंसा वाला विज्ञापन देखा था मुझे तुंरत उसका स्मरण आ गया ! मुझे मेरी इंसानियत ने मेरी नैतिक जिम्मेदारी का अहसास कराया और मैं पहुँच गया सीधे उनके गेट पर ! मैंने गेट पर लगी बेल को जोर से बजाया और एक हाथ में कुत्ते की चेन पकड़े रखी और दूसरा हाथ कमर पर लगाकर अकड़कर थोड़ा तिरछा होकर खड़ा हो गया ! मिसेज चौधरी ने गेट खोलते हुए पुछा कौन है ? मैंने उस विज्ञापन वाले किरदार की तरह मिसेज चौधरी को घूरा तो वह तुंरत बोल पड़ी, ओये, ऐंसे क्या घूर रहा है, आँख निकाल दूँगी, मैं थोड़ा सहमा मगर अपने को फिर से नियंत्रित करते हुए रोबदार आवाज में बोला, थोड़ा दूध मिलेगा ? मिसेज चौधरी बोली , तो ऐंसे बोल न कि दूध चाहिए ! वह अन्दर गई दूध लेने और मैं खिसक लिया !
मगर तब गजब हो गया जब साड़े ग्यारह बजे रात मेरी गली में हंगामा खड़ा हो गया ! मिसेज चौधरी हाथ में दूध की कटोरी पकड़े खड़ी थी और मेरी पत्नी का नाम ले-लेकर आवाज दे रही थी ! मेरी पत्नी बाहर निकली तो उसने कहा, वो थारा खसम कहाँ है ? इत्ती रात गए दूध माग रहा था, ये ले, उसने दूध की कटोरी मेरी बीबी को पकडाई ! गेट बंद कर मेरी पत्नी हक्की - बक्की, क्रोध से लाल-पीली हुए अन्दर आई, मेरी तरफ़ खा जाने वाली नजरो से देखते हुए बोली, अच्छा तो उस दिन जो चाँद मुहम्मद बनने के जो सपने देखे जा रहे थे, वो सब इस चौधराहन की वजह से.... आज दूध मांगने गए थे..... ठहरो ! मैं पिलाती हूँ तुम्हे दूध... .... और फिर जनाब ...... क्या बताऊ ? मैं चीखता रहा मगर अडोष पडोश का कोई कमवक्त मेरे गेट पर घंटी बजाने नही आया, इसे कहते है, नेकी कर जूते खा...!
Friday, January 23, 2009
गाली, जो पुरुष्कार के बोझ तले दब गई !
कभी सोचता हूँ कि कितने भोले है हम हिन्दुस्तानी! क्या वाकई भोले है या फिर यें कहे कि मक्कार है ? अपने फायदे के लिए, पैसे के लिए क्या इज्जत और क्या आत्मसम्मान, सब कुछ दाँव पर लगा देते है ! या यूँ कहू कि इस नाम की कोई वस्तु कभी हमारे पास थी ही नही, तो दांव पर कहा से लगेगी ? वैसे भी कोरी ही सही, मगर इस अफवाह से कि हिन्दुस्तान आर्थिक प्रगति कर रहा है और आने वाले सालो में इनको पछाड़ सकता है, से परेशान पश्चिमी राष्ट्र, खासकर अमेरिका और ब्रिटेन हर उस पल के इंतज़ार में रहते है, जहाँ पर वो हिन्दुस्तान को किसी तरह नीचा दिखा सके ! आख़िर उनका एक पुराना गुलाम उनसे आगे निकलने की बात करता है !
वो हर उस मौके को बढ़ा चढा कर पेश करने से नही चूकना चाहते, जहाँ पर कि भारत की कोई कमजोरी, कोई नकारात्मक बिन्दु उजागर किया गया हो ! और ठीक यही मौका मिला उन्हें, एक ब्रिटिश डाईरेक्टर डैनी बोयले द्वारा निर्देशित फिल्म "सलम डॉग मिलिअनरी" के निर्माण के बाद ! मुंबई की सलम बस्ती पर बनी इस फ़िल्म में कहानी क्या है , मैं भी नही जानता और न ही जानना चाहता हूँ ! जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह कि इस फ़िल्म के माध्यम से एक ब्रिटिश निर्देशक ने बड़े प्यार के साथ, हमारे लोगो, सलम बस्ती में रहने वाले हमारे गरीब लोगो गाली दी है, जी जनाब ! हमारे देश को न सिर्फ़ गाली दी गई अपितु उस गाली को सम्मानित कर हमारे देश को चौतरफा नीचा भी दिखने की कोशिश की गई है! और इससे क्रोधित होने की वजाए हम ज्यादातर हिन्दुस्तानी खुस हुए, बहुत खुस हुए और हमने जश्न मनाया !
जो लोग मेरी बात से सहमत न हो उनसे मेरे कुछ सवाल है :
१. इस फिल्म का नाम स्लम डॉग मिलिनरी न रख कर सिर्फ़ स्लम मिलिनरी भी तो रखा जा सकता था, इसमे "डॉग" शब्द जोड़ने का क्या आशय था, क्या जरुरत थी ?
२. एक विदेशी को इस तरह के नाम वाली फिल्म की सूटिंग हमारे देश में करने क्यो दी गई ?
३. इसके अधिकतर किरदारों के मुस्लिम नाम है ! क्या यह मुसलमानों को नीचा दिखाने और दुनिया के मुसलमानों के दिल में यह नफरत पैदा करने के उद्देश्य से तो नही बनाई गई कि इस देश में यें लोग कितनी दयनीय स्थिति है ?
४. फिल्म बना भी ली गई थी तो इतनी जल्दी, इतनी हडबडाहट में इसे गोल्डन ग्लोब पुरुष्कार और आस्कर ने लिए नामांकित करना क्या दर्शाता है ? हो सकता है कि फिल अच्छी भी हो लेकिन यह नही झलकता कि चूँकि इसका निर्माता निर्देशक विदेशी है, खासकर गोरी चमड़ी वाले है इसलिए इसे इतना महत्व दिया गया !
५. क्या हमारी फिल्मे 'सलाम बॉम्बे' , 'चक्रा' या फिर 'तारे जमीन पर' इत्यादि इससे बेहतर फिल्मे नही थी, उन्हें क्यो नही यें सब सम्मान दिए गए ?
६. इस फिल्म से उस गरीब जनता का क्या भला होता है, या उनको क्या मेसेज जाता है जिन्हें झुग्गी वाला कुत्ता कहकर नवाजा गया ?
खैर, यें तो था मेरा अपना दृष्टिकोण, अब देखना यह है कि वोट बैंक की राजनीती के लिए हाय तोबा मचने वाले इस देश के कर्णधार आगे चलकर इसे किस पुरुष्कार से नवाजते है !
वो हर उस मौके को बढ़ा चढा कर पेश करने से नही चूकना चाहते, जहाँ पर कि भारत की कोई कमजोरी, कोई नकारात्मक बिन्दु उजागर किया गया हो ! और ठीक यही मौका मिला उन्हें, एक ब्रिटिश डाईरेक्टर डैनी बोयले द्वारा निर्देशित फिल्म "सलम डॉग मिलिअनरी" के निर्माण के बाद ! मुंबई की सलम बस्ती पर बनी इस फ़िल्म में कहानी क्या है , मैं भी नही जानता और न ही जानना चाहता हूँ ! जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह कि इस फ़िल्म के माध्यम से एक ब्रिटिश निर्देशक ने बड़े प्यार के साथ, हमारे लोगो, सलम बस्ती में रहने वाले हमारे गरीब लोगो गाली दी है, जी जनाब ! हमारे देश को न सिर्फ़ गाली दी गई अपितु उस गाली को सम्मानित कर हमारे देश को चौतरफा नीचा भी दिखने की कोशिश की गई है! और इससे क्रोधित होने की वजाए हम ज्यादातर हिन्दुस्तानी खुस हुए, बहुत खुस हुए और हमने जश्न मनाया !
जो लोग मेरी बात से सहमत न हो उनसे मेरे कुछ सवाल है :
१. इस फिल्म का नाम स्लम डॉग मिलिनरी न रख कर सिर्फ़ स्लम मिलिनरी भी तो रखा जा सकता था, इसमे "डॉग" शब्द जोड़ने का क्या आशय था, क्या जरुरत थी ?
२. एक विदेशी को इस तरह के नाम वाली फिल्म की सूटिंग हमारे देश में करने क्यो दी गई ?
३. इसके अधिकतर किरदारों के मुस्लिम नाम है ! क्या यह मुसलमानों को नीचा दिखाने और दुनिया के मुसलमानों के दिल में यह नफरत पैदा करने के उद्देश्य से तो नही बनाई गई कि इस देश में यें लोग कितनी दयनीय स्थिति है ?
४. फिल्म बना भी ली गई थी तो इतनी जल्दी, इतनी हडबडाहट में इसे गोल्डन ग्लोब पुरुष्कार और आस्कर ने लिए नामांकित करना क्या दर्शाता है ? हो सकता है कि फिल अच्छी भी हो लेकिन यह नही झलकता कि चूँकि इसका निर्माता निर्देशक विदेशी है, खासकर गोरी चमड़ी वाले है इसलिए इसे इतना महत्व दिया गया !
५. क्या हमारी फिल्मे 'सलाम बॉम्बे' , 'चक्रा' या फिर 'तारे जमीन पर' इत्यादि इससे बेहतर फिल्मे नही थी, उन्हें क्यो नही यें सब सम्मान दिए गए ?
६. इस फिल्म से उस गरीब जनता का क्या भला होता है, या उनको क्या मेसेज जाता है जिन्हें झुग्गी वाला कुत्ता कहकर नवाजा गया ?
खैर, यें तो था मेरा अपना दृष्टिकोण, अब देखना यह है कि वोट बैंक की राजनीती के लिए हाय तोबा मचने वाले इस देश के कर्णधार आगे चलकर इसे किस पुरुष्कार से नवाजते है !
Friday, January 16, 2009
ये पैसा इतना क्यो बोलता है ?
जैसा कि आप सभी जानते है कि पैसा और ईमानदारी एक ही सिक्के के दो पहलु है ! अगर सिक्के पर पैसे वाला ठप्पा ऊपर तो इमानदारी दूसरी तरफ नीचे, और यदि ईमानदारी का ठप्पा ऊपर, जिसके कि आज के युग में ऊपर रहने के कम ही चांस होते है, तो पैसा विपरीत दिशा में नीचे ! दोनों साथ साथ चले, ये नामुमकिन !
काफ़ी समय से पत्र-पत्रिकावो, संचार माध्यमो में कुछ अफ्रीकी देशो में फैली भुखमरी और भूख से विलखते बच्चो की तस्वीरे देख, मैंने अपनी धर्मपत्नी से कहा कि अब हमारे बच्चे सयाने हो गए है, भगवान् की कृपा से इतना तो कमा ही लेते है कि एक और बच्चे की ठीक-ठाक परवरिश कर सके, क्यों न हम एक अफ्रीकी नवजात शिशु को गोद ले ले ! यह सुनकर बच्चे तो तैयार हो गए थे, मगर बीबी बोली, अंजाम मालूम है जब कहीं निकलेंगे उसे गोद में लेकर तो, दूर वालो की तो बात छोडो, ये अपने मुहल्ले वाले ही, बातें बना के और फब्तिया कस-कस कर पागल बना देंगे ! मैं चुप हो गया !
अभी कुछ दिनों पहले कहीं पर यूनायिटेड नेशन्स के एक अधिकारी का कथन पढ़ रहा था !"मैं यूनीसेफ की एक योजना के तहत नैरोबी मैं तैनात था ! अफ्रीका में कुपोषण, भुखमरी और बीमरी से ग्रस्त बच्चो की सहायता के लिए यूनिसेफ प्रतिमाह, प्रति बच्चा २५ डालर की सहायता उन बच्चो के अभिभावकों के माध्यम से देता है ! एक किसान के चार बच्चे थे, हम हर माह उसे १०० डालर भेजते थे ! एक दिन हमे उस किसान से एक पत्र मिला लिखा था महोदय, मेरा एक बच्चा मर गया है अतः आप जब अगले महीने की सहायता भेजें तो उसमे से २५ डालर काट कर भेजना ! "
पढ़कर, कुछ पल के लिए आँखे स्वतः ही बंद हो गई, अंतरात्मा से आवाज आई, हे प्रभो ! जब छोटा था तो आज की लूट-खसौट को देखकर अपने बड़े बूढों को अक्सर कहता सुनता आया था कि घोर कलयुग आ गया है, अग्रेजो के जमाने में इंसान भले ही गरीब था मगर ईमानदार था ! मेरे दादाजी अक्सर कहा करते थे कि तब उत्तरांचल में ऋषिकेश से यातायात के लिए सड़क मार्ग सिर्फ़ कीर्तिनगर तक ही था, बीच में अलकनंदा पर वाहनों के लिए पुल न होने की वजह से बस-ट्रक सिर्फ़ कीर्तिनगर तक ही आते थे, वहाँ से आगे का सफर घोडो और खच्चरों के जरिये होता था ! गर्मियों के दिनों में डाक रात को दस बजे श्रीनगर से खच्चरों में लदकर आगे चमोली गढ़वाल को निकलती थी ! उन डाक के तेलों में देश विदेश में काम करने वाले लोग, अपने घरो को जो पत्र और मनीआडर भेजते थे, यहातक कि सरकारी खजाने का पैसा भी, और वह सब इन्ही डाक के खच्चरों में लद कर जाता था ! घने जंगलो से होकर, और साथ में चलने वाले डाक विभाग के कर्मचारी के हाथ में सुरक्षा के नाम पर सिर्फ़ एक वरछा होता था ! क्या आज हम इस तरह खच्चर पर लादकर पैसा ले जा सकते है ?
अभी कल ही एक ख़बर पढ़ी कि झारखण्ड में एक शख्स ने १५ रूपये के लिए अपनी माँ को मार डाला, तो यह लेख लिखने का मन किया !
आजकल एक ही चर्चा गरम है , झुग्गियों में रहने वाला करोड़पति कुत्ता ! अब इन्हे कौन समझाए कि करोड़पति ये कुत्ता नही, करोड़पति है वो फ़िल्म बनाने वाला ! कुत्ते के पास चाहे एक रुपया हो या करोड़ रूपये हो, वह रूपये खा कर तो जिन्दा नही रह सकता उसे चाहिए एक रोटी, एक अदद हड्डी, नोट नही !मगर बेचारे कुत्ते का नसीब ! चूँकि पिक्चर एक अंग्रेज ने बनाई इस लिए झट से ढेरो इनाम भी मिल गए, आस्कर की दौड़ में भी शामिल हो गयी फिल्म और जो वाकियी आस्कर की दौड़ के लिए थी ( तारे जमीन पर ) उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया क्योंकि वह एक ऐसे व्यक्ति ने बनाया थी जिसके पास पैसा तो बहुत है मगर चमड़ी सफ़ेद नही है !
और लंबा नही खींचना चाहता, संक्षेप में कहूँगा, वाकई में ये पैसा बहुत बोलता है, मेरा बस चलता तो इसका मुह नोच डालता, मगर क्या करू अपनी परिस्थिति भी उस झुग्गी वाली करोड़पति कुत्ते से कुछ कम नही !
गोदियाल
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