Sunday, February 8, 2009

जरुरत है उनके खुफिया तंत्र को समझने और उसे नेस्तनाबूद करने की !

भारत द्वारा पाकिस्तान को मुंबई हमलो पर दिए गए डोजिएर का बहुप्रतीक्षित जबाब शायद आज कल में मिलने की उम्मीद है, इस जबाब से मेरी नजर में, शायद भारत को खास उम्मीद नही रखनी चाहिए, मगर भारत का अगला कदम बहुत कुछ इस जबाब पर निर्भर करेगा, यह उम्मीद की जा रही है ! २६/११ के बाद दक्षिण एशिया क्षेत्र में जो आतकवाद और उससे जुड़े संगठनो के नए समीकरण उभर का सामने आए है, उसमे न सिर्फ़ हमारे देश को अपितु दुनिया भर के उन तमाम देशो, जो आतंकवाद के मुख्य निशाने पर है, उन्हें यह समझने की जरुरत है कि आतंकवाद का यह खतरा उनको न सिर्फ़ किसी खूंखार आतंकवादी संघठन से है, बल्कि सबसे बड़ा खतरा उस इंजीनियरिंग डिजायिनर से है जो इसका खाका और ड्राइंग तैयार करता है ! और इसमे कोई संदेह नही होना चाहिए कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई, एक कुशल डिजाईन इंजिनियर की भूमिका दशको से बड़े ही अनुभवी ढंग से निभाती आ रही है! वो एक अंग्रेजी कहावत है कि अपराधी बिना पूछे बहुत सारे तर्क दे डालता है, हाल के जनरल मुसर्रफ के आईएसआई पर दीगयी सफाई को भी इसी दृष्टीकोण से देखा जाना चाहिए !

आपको याद होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति जब अपना चुनाव प्रचार कर रहे थे, तो उन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा हालत पर कुछ ऐसे कठोर संकेत पाकिस्तान को दिए थे जिससे इनकी यह विश्व कुख्यात एजेंसी, बुरी तरह से डर गई थी ! और यही वजह है कि समय-समय पर भ्रमित करने के लिए यह अपने पुराने मातहत रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल हामिद गुल को आगे करदेती है, या यु कहे कि एक अनोखे किस्म का आंतरिक भय इस पुराने चीफ को आगे आने के लिए मजबूर कर देता है ! और यही भय इनकी जुबान से हाल में रावलपिंडी में हुई पाकिस्तान के उच्च पदस्त सैन्य और अन्य अधिकारियो की मीटिंग में इनके सिरकत करते वक्त निकल गया था जब इन्होने ख़ुद कहा कि पाकिस्तान अन्दर से बहुत डरा हुआ है औरवह ऐंसे हालत में परमाणु हमला भी करसकता है !


मार्च १९८७ में तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने इन हामिद साहब को पाकिस्तान की खुपिया एजेन्सी आईएसआई का चीफ नियुक्तकिया था, इससे पहले ये सेना में रहते हुए, अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए के लिए अफगानिस्तान में रुसी सेनावो के खिलाप काम करते थे और यूँ कहे कि इस क्षेत्र में सीआईए के दाहिने हाथ थे ! और भारत के खिलाप इन्होने ही वक्त-वक्त पर सुई चुभो कर खून बहाने की रूपरेखा (प्रोक्सी वार) बखूबी तैयार की थी ! पहले पंजाबमें, और फिर कश्मीर मैं और इसके अलावा असम और उत्तर पूरब के इलाको में सक्रीय नागा, मिजो और उल्फा संगठनों के चरमपंथियों को तैयार करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, और कहा तो यह भी जा रहा है कि इस देश में मावो और नक्श्ली गुटों को भी यही हथियार और उनके इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने वालो में से है !

अब जो मुख्य बात मैं कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि २६/११ के बाद अमेरिका ने जिन चार लोगो को संयुक्त राष्ट से आतंकवादी घोषित करने का आग्रह किया था उसमे से एक है, यह हामिद गुल साहब ! खैर मुझे नही लगता कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में कोई ऐसा खास कदम उठाने वाले है जो कि पाकिस्तान में मौजूद आतंकवाद की रीढ़ की हड्डी को तोडे सके , मगर फिर भी पाकिस्तान के आतंकवाद के इन आंकवो को कहीं न कहीं यह डर जरूर सता रहा है कि आने वाले वक्त में कुछ होगा जरूर ! और यही वजह थी इन हामिद साहब ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के समक्ष यह कहना शुरू कर दिया कि अमेरिका में घटित ०९/११ अमेरिका द्वारा स्वयं रचित एक ड्रामा था ! वैसे ये ख़ुद भी जानते है कि यह आरोप स्वयं में एक हास्यास्पद सी बात है मगर इनका मकसद कुछ और है , ये यह कहकर, या इस पर किताब लिखकर अंतराष्ट्रीय समुदाय को इस बहकावे में रखना चाहते है कि अमेरिका में हुए हमलो के बारे में पाकिस्तान की खुपिया एजेन्सी को कुछ नही मालुम, अगर इनको मालुम होता तो उसका चीफ इस तरह की उल-जुलूल बातें क्यो कहता ! जबकि वास्तविकता इससे बहुत परे है ! जिस तरह से ०९/११ और २६/११ हुआ उसमे बहुत सी समानताये थी और जिसमे से एक प्रमुख समानता थी, हिट एंड रन ! यानि मुख्य काम को अंजाम देने वाले या तो खुदा को प्यारे हो जाए या फिर वापस इनके पास पहुच जाए! आई एस आई के ब्लू प्रिंट के सिद्धांत के मुताविक ये पहले आप्शन यानि खुदा को प्यारा हो जाने को ज्यादा प्राथमिकता देते है ! अन्दर से इनके सपोर्टिंग एजेंट बहुत सारे रहे हो लेकिन वास्तविक घटना को अंजाम तक पहुचने वाले अलकायदा के ४ या ५ आत्मघाती और लस्करे तयिबा के सिर्फ़ १० कमांडो ही थे, जिसमे से आई एस आई के सर्बोत्तम ब्लूप्रिंट के ठीक विपरीत, इनके दुर्भाग्यबस एक कमांडो यानि कसाब जिन्दा हाथ आ गया , नही तो इन जनाब ने अब तक मुंबई हमले पर भी एक किताब लिख डाली होती और इसे भारत की भगवा ब्रिगेड का मालेगांव घटना से ध्यान बटाने का एक ड्रामा मात्र करार दिया होता !

मेरा यह मानना है कि अगर हमें अथवा पश्चिमी देशो को ईमानदारी से इस आतंकवाद के ताने बाने को ख़त्म करना है तो पहली जरुरत है, पाकिस्तान की इस बदनाम एजेन्सी को नेश्तनाबूद कर देना ! अगर भारत अथवा अमेरिका और नाटो संघटन इस कार्य में सफल हो जाए तो समझो कि आतंकवाद के खात्मे का ५० फीसदी काम पुरा हो गया ! हमें भी अपने देश के दुश्मन आतंकवाद के विरुद्ध उतनी सफलता पाकिस्तान पर प्रत्यक्ष युद्ध अथवा सर्जिकल स्ट्राइक से नही मिलेगी जितनी की इस एजेन्सी के खात्मे पर !अगर गौर से देखे तो अलकायदा और तालिबान का फिर से सिर उठाने की एक सबसे बड़ी वजह है आई एस आई ! यह आज तक इस तरह का रोल अदा करती आ रही है कि अमेरिका के साथ भी भले बन गए, और आतंकवादियों के साथ भी ! इसकी थोडी सी ख़बर उसे दे दो और उसकी थोडी सी ख़बर इसे दे दो और ख़ुद को भला आदमी साबित करो दोनों की नजर में ! जबकि वास्तविकता यह है कि यह दोना का ही एक खतरनाक शत्रु है!

Thursday, February 5, 2009

श्रीकृष्ण सेना !

हे भिडू ! नोट करले कहीं पर, इस सेना का संस्थापक मैं हूँ मैं, पीसी गोदियाल ! मैंने गूगल में भी सर्च मार के देख लिया है, भगवान के नाम वाला एक ही ट्रेडमार्क खाली पड़ा था, बाकि सब पर तो सारे सज्जन लोगो ने बहुत पहले ही कब्जा जमा रखा है! तो बस समझ ले , आज से ये ट्रेड मार्क मेरा ! हे सर्किट ! वो बाहर खड़े बबंडर टीवी के संवाददाता को जाके बोल कि जाकर अपने 24x365 वाले न्यूज़ चेनल पर ऐलान कर दे कि श्रीकृष्ण सेना के संस्थापक ने चेतावनी दी है कि इस वेलेनटाईन डे पर कोई भी लड़की दूध से बनी आइस्क्रीम नही खायेगी, क्यूंकि दूध वाले हर आइटम पर पहला अधिकार श्रीकृष्ण सेना के जवानों(ग्वालो) का है !इससे सभ्यता पर आंच आती है और संस्कृति ख़राब होती है ! अगर सड़क पर कोई लड़की उस दिन ऐसा करते पायी गई तो हम आईसक्रीम वाले की ठेली उठा लेंगे !

वाह मुन्ना भाई ! क्या दिमाग पाएला, क्या कमाल का आईडिया आयिरेला है आपकी खाली खोपडी में! अब तक किसी भी समाज विरोधी तत्व की नजर नही पड़ी इस ट्रेड मार्क पर ! बोले तो एकदम पियोर, फिर तो मुन्ना भाई, आपको जेड प्लस सिक्यूरिटी भी मिल जायेगी, वो अपुन बोले तो शिवजी की सेना, रामजीकी सेना और बानारजी की सेना के प्राप्राईटरो की तरह ! अरे मुन्ना भाई, फिर तो आप भी वीआईपी लगोगे !

हां, ठीक है-ठीक है, तुम जावो सर्किट और पहले उस टीवी रिपोर्टर को पकडो और फिर ये चाटुकार जगत को भी बोलो कि जो भी अपनी पहले टिपण्णी भेजेगा, समझो उसको हमने इस सेना में भरती कर दिया,और सुन एक काम और करियो, पता लगा की कौन से दूध की डेरी पर लड़किया दूध लेने ज्यादा पहुँचती है ? वो किस लिए मुन्ना भाई ? अरे सर्किट, खIली पीली खोपडी ख़राब मत कर , अब अगर प्रसिद्धि पानी है तो एक आध तोड़-फोड़ तो करनी ही पड़ेगी न ! अब तुम जावो !

Sunday, February 1, 2009

व्यंग्य- घरेलु हिंसा को रोकिये- बेल बजाये !

टीवी पर यह विज्ञापन आपने भी देखा होगा, आजकल खूब चल रहा है! "घरेलु हिंसा को रोकिये- बेल बजाये" ! सर्वप्रथम तो उस विज्ञापन एजेन्सी के क्रिएटिव मेनेजर की तारीफ़ करना चाहूँगा जिसने अपना दिमाग चलाकर इतने सूक्ष्म शब्दों में इतनी गूढ़ बात कह डाली ! एक बहुत ही अहम् तथ्य को उजागर करता है यह विज्ञापन !

कभी आपने भी गौर किया इस बात पर कि कितना निठल्ला और स्वार्थी है हमारा यह पुरूष वर्ग ! सुबह जब उठता है तो उम्मीद करता है कि पत्नी सिरहाने पर चाय का कप हाथ में पकड़े खड़ी हो , वाथरूम में घुसे जनाब तो, गीजर में पानी पहले से ही गर्म मिले! कच्छा बनियान बाथरूम की खूंटी पर टंगा मिले ! नाह-धोकर जब बाहर आए तो डायनिंग पर नाश्ता सजा हुआ हो ! ऑफिस के लिए तैयार होने लगे तो सारे कपड़े प्रेस होकर आलमारी में रखे मिले, और श्रीमतीजी उन्हें कोट पहनाने ,उनके चश्मे, पर्स रूमाल इत्यादि उन्हें पकडाने में भी मदद करे !

उसके बाद ये जनाब ताजे किए नाश्ते का एक लंबा डकार छोड़कर निकल पड़े, नौकरी अथवा पेशे के बहाने मटरगस्ती करने ! ऑफिस में टेबल पर जो काम है उसका एक तिहाई ही किया और बाकि कल के लिए रख दिया , और कंप्यूटर पर चैटिंग शुरू कर दी! दोपहर में लंच के बाद निकल पड़े ऑफिस काम्प्लेक्स और शोपिंग काम्प्लेक्स में हसीनावो के संग चक्षु पान करने ! बस हो गई दिनचर्या ख़त्म !शाम को अगर काम ठीक से न करने पर नाराज बॉस ने डांट डपट दिया तो जनाब, बॉस के सामने तो भीगी बिल्ली बन जायेंगे मगर गुस्सा निकलेगा शराब के ठेके पर बोतल और तंदूरी चिकन पर ! तंदूरी चिकन अगर थोड़ा अधपका मिला, ठेके पर मौजूद बौन्सरो के डर से वहा तो जुबान नही खुलेगी लेकिन बाकि का रहा सहा गुस्सा घरवाली पर !

जनाब जब घर के गेट पर पहुँचते है तो अपने थोबडे में उनके भले ही बारह बज रहे हो मगर बीबी से उम्मीद करते है कि वह अपने पूरे श्रृंगार में मुश्कुराते हुए जनाब का स्वागत करे, इनका ब्रीफकेश उठाये और इनकी टाई और कोट उतारे ! और इसमे अगर जरा भी कोताही हो गई तो उस अधपके चिकन का सारा गुस्सा बेचारी उस मासूम पर, जो शाम होते ही जनाब की राह तकने लगी थी, और दिनभर इनके लिए शाम के खाने पहनने का इंतजाम करती रही, और इस सबका उसे पारितोषिक क्या मिला, इन जनाब की डांट डपट और मार ! सचमुच बहुत ही घटिया किस्म की प्रजाति है यह पुरूष वर्ग !

लेकिन जैसा कि अमूमन देखा गया है कि हर प्रजाति में थोड़ा बहुत भिन्न किस्म के प्राणी भी जन्म ले लेते है जो एक अपवाद बन जाते है ! ऐंसा ही अनुभव आपके साथ बाँटना चाहूँगा ! अभी पिछले हफ्ते रात करीब साड़े दस-ग्यारह बजे, भोजन के उपरांत, अपने पालतू कुत्ते को घुमा कर ला रहा था तो अपने मोहल्ले के नुक्कड़ वाले चौधरी साहब के घर के नीचे से जब गुजरा तो मुझे मिसेज चौधरी के चिल्लाकर बोलने और चौधरी साहब के चीखने की आवाज सुनाई दी ! मेरे पैर ठिठक कर रुक गए ! मिसेज चौधरी कहे जा रही थी " अरे थोड़ा तो शर्म करो , मच्छर को देखा है तुमने ? वह कितना बहादुर होता है , उसे यह पता होते हुए भी कि इंसान एक ताली बजा कर उसका काम तमाम करसकता है, फिर भी वह खून चूसने के लिए सायरन बजा कर जाता है ! और एक तुम हो .....".बीच बीच में किसी चप्पल अथवा झाडू नुमा चीज के बजने की भी आवाज आ रही थी और चौधरी साहब चीख रहे थे , अरे मेरी माँ... हाथ जोड़ता हूँ अब बस भी कर ...!

मैंने अभी जो थोडी देर पहले अपने टीवी पर वह घरेलु हिंसा वाला विज्ञापन देखा था मुझे तुंरत उसका स्मरण आ गया ! मुझे मेरी इंसानियत ने मेरी नैतिक जिम्मेदारी का अहसास कराया और मैं पहुँच गया सीधे उनके गेट पर ! मैंने गेट पर लगी बेल को जोर से बजाया और एक हाथ में कुत्ते की चेन पकड़े रखी और दूसरा हाथ कमर पर लगाकर अकड़कर थोड़ा तिरछा होकर खड़ा हो गया ! मिसेज चौधरी ने गेट खोलते हुए पुछा कौन है ? मैंने उस विज्ञापन वाले किरदार की तरह मिसेज चौधरी को घूरा तो वह तुंरत बोल पड़ी, ओये, ऐंसे क्या घूर रहा है, आँख निकाल दूँगी, मैं थोड़ा सहमा मगर अपने को फिर से नियंत्रित करते हुए रोबदार आवाज में बोला, थोड़ा दूध मिलेगा ? मिसेज चौधरी बोली , तो ऐंसे बोल न कि दूध चाहिए ! वह अन्दर गई दूध लेने और मैं खिसक लिया !

मगर तब गजब हो गया जब साड़े ग्यारह बजे रात मेरी गली में हंगामा खड़ा हो गया ! मिसेज चौधरी हाथ में दूध की कटोरी पकड़े खड़ी थी और मेरी पत्नी का नाम ले-लेकर आवाज दे रही थी ! मेरी पत्नी बाहर निकली तो उसने कहा, वो थारा खसम कहाँ है ? इत्ती रात गए दूध माग रहा था, ये ले, उसने दूध की कटोरी मेरी बीबी को पकडाई ! गेट बंद कर मेरी पत्नी हक्की - बक्की, क्रोध से लाल-पीली हुए अन्दर आई, मेरी तरफ़ खा जाने वाली नजरो से देखते हुए बोली, अच्छा तो उस दिन जो चाँद मुहम्मद बनने के जो सपने देखे जा रहे थे, वो सब इस चौधराहन की वजह से.... आज दूध मांगने गए थे..... ठहरो ! मैं पिलाती हूँ तुम्हे दूध... .... और फिर जनाब ...... क्या बताऊ ? मैं चीखता रहा मगर अडोष पडोश का कोई कमवक्त मेरे गेट पर घंटी बजाने नही आया, इसे कहते है, नेकी कर जूते खा...!

Friday, January 23, 2009

गाली, जो पुरुष्कार के बोझ तले दब गई !

कभी सोचता हूँ कि कितने भोले है हम हिन्दुस्तानी! क्या वाकई भोले है या फिर यें कहे कि मक्कार है ? अपने फायदे के लिए, पैसे के लिए क्या इज्जत और क्या आत्मसम्मान, सब कुछ दाँव पर लगा देते है ! या यूँ कहू कि इस नाम की कोई वस्तु कभी हमारे पास थी ही नही, तो दांव पर कहा से लगेगी ? वैसे भी कोरी ही सही, मगर इस अफवाह से कि हिन्दुस्तान आर्थिक प्रगति कर रहा है और आने वाले सालो में इनको पछाड़ सकता है, से परेशान पश्चिमी राष्ट्र, खासकर अमेरिका और ब्रिटेन हर उस पल के इंतज़ार में रहते है, जहाँ पर वो हिन्दुस्तान को किसी तरह नीचा दिखा सके ! आख़िर उनका एक पुराना गुलाम उनसे आगे निकलने की बात करता है !

वो हर उस मौके को बढ़ा चढा कर पेश करने से नही चूकना चाहते, जहाँ पर कि भारत की कोई कमजोरी, कोई नकारात्मक बिन्दु उजागर किया गया हो ! और ठीक यही मौका मिला उन्हें, एक ब्रिटिश डाईरेक्टर डैनी बोयले द्वारा निर्देशित फिल्म "सलम डॉग मिलिअनरी" के निर्माण के बाद ! मुंबई की सलम बस्ती पर बनी इस फ़िल्म में कहानी क्या है , मैं भी नही जानता और न ही जानना चाहता हूँ ! जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह कि इस फ़िल्म के माध्यम से एक ब्रिटिश निर्देशक ने बड़े प्यार के साथ, हमारे लोगो, सलम बस्ती में रहने वाले हमारे गरीब लोगो गाली दी है, जी जनाब ! हमारे देश को न सिर्फ़ गाली दी गई अपितु उस गाली को सम्मानित कर हमारे देश को चौतरफा नीचा भी दिखने की कोशिश की गई है! और इससे क्रोधित होने की वजाए हम ज्यादातर हिन्दुस्तानी खुस हुए, बहुत खुस हुए और हमने जश्न मनाया !

जो लोग मेरी बात से सहमत न हो उनसे मेरे कुछ सवाल है :
१. इस फिल्म का नाम स्लम डॉग मिलिनरी न रख कर सिर्फ़ स्लम मिलिनरी भी तो रखा जा सकता था, इसमे "डॉग" शब्द जोड़ने का क्या आशय था, क्या जरुरत थी ?
२. एक विदेशी को इस तरह के नाम वाली फिल्म की सूटिंग हमारे देश में करने क्यो दी गई ?
३. इसके अधिकतर किरदारों के मुस्लिम नाम है ! क्या यह मुसलमानों को नीचा दिखाने और दुनिया के मुसलमानों के दिल में यह नफरत पैदा करने के उद्देश्य से तो नही बनाई गई कि इस देश में यें लोग कितनी दयनीय स्थिति है ?
४. फिल्म बना भी ली गई थी तो इतनी जल्दी, इतनी हडबडाहट में इसे गोल्डन ग्लोब पुरुष्कार और आस्कर ने लिए नामांकित करना क्या दर्शाता है ? हो सकता है कि फिल अच्छी भी हो लेकिन यह नही झलकता कि चूँकि इसका निर्माता निर्देशक विदेशी है, खासकर गोरी चमड़ी वाले है इसलिए इसे इतना महत्व दिया गया !
५. क्या हमारी फिल्मे 'सलाम बॉम्बे' , 'चक्रा' या फिर 'तारे जमीन पर' इत्यादि इससे बेहतर फिल्मे नही थी, उन्हें क्यो नही यें सब सम्मान दिए गए ?
६. इस फिल्म से उस गरीब जनता का क्या भला होता है, या उनको क्या मेसेज जाता है जिन्हें झुग्गी वाला कुत्ता कहकर नवाजा गया ?

खैर, यें तो था मेरा अपना दृष्टिकोण, अब देखना यह है कि वोट बैंक की राजनीती के लिए हाय तोबा मचने वाले इस देश के कर्णधार आगे चलकर इसे किस पुरुष्कार से नवाजते है !

Friday, January 16, 2009

ये पैसा इतना क्यो बोलता है ?


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
जैसा कि आप सभी जानते है कि पैसा और ईमानदारी एक ही सिक्के के दो पहलु है ! अगर सिक्के पर पैसे वाला ठप्पा ऊपर तो इमानदारी दूसरी तरफ नीचे, और यदि ईमानदारी का ठप्पा ऊपर, जिसके कि आज के युग में ऊपर रहने के कम ही चांस होते है, तो पैसा विपरीत दिशा में नीचे ! दोनों साथ साथ चले, ये नामुमकिन !

काफ़ी समय से पत्र-पत्रिकावो, संचार माध्यमो में कुछ अफ्रीकी देशो में फैली भुखमरी और भूख से विलखते बच्चो की तस्वीरे देख, मैंने अपनी धर्मपत्नी से कहा कि अब हमारे बच्चे सयाने हो गए है, भगवान् की कृपा से इतना तो कमा ही लेते है कि एक और बच्चे की ठीक-ठाक परवरिश कर सके, क्यों न हम एक अफ्रीकी नवजात शिशु को गोद ले ले ! यह सुनकर बच्चे तो तैयार हो गए थे, मगर बीबी बोली, अंजाम मालूम है जब कहीं निकलेंगे उसे गोद में लेकर तो, दूर वालो की तो बात छोडो, ये अपने मुहल्ले वाले ही, बातें बना के और फब्तिया कस-कस कर पागल बना देंगे ! मैं चुप हो गया !

अभी कुछ दिनों पहले कहीं पर यूनायिटेड नेशन्स के एक अधिकारी का कथन पढ़ रहा था !"मैं यूनीसेफ की एक योजना के तहत नैरोबी मैं तैनात था ! अफ्रीका में कुपोषण, भुखमरी और बीमरी से ग्रस्त बच्चो की सहायता के लिए यूनिसेफ प्रतिमाह, प्रति बच्चा २५ डालर की सहायता उन बच्चो के अभिभावकों के माध्यम से देता है ! एक किसान के चार बच्चे थे, हम हर माह उसे १०० डालर भेजते थे ! एक दिन हमे उस किसान से एक पत्र मिला लिखा था महोदय, मेरा एक बच्चा मर गया है अतः आप जब अगले महीने की सहायता भेजें तो उसमे से २५ डालर काट कर भेजना ! "

पढ़कर, कुछ पल के लिए आँखे स्वतः ही बंद हो गई, अंतरात्मा से आवाज आई, हे प्रभो ! जब छोटा था तो आज की लूट-खसौट को देखकर अपने बड़े बूढों को अक्सर कहता सुनता आया था कि घोर कलयुग आ गया है, अग्रेजो के जमाने में इंसान भले ही गरीब था मगर ईमानदार था ! मेरे दादाजी अक्सर कहा करते थे कि तब उत्तरांचल में ऋषिकेश से यातायात के लिए सड़क मार्ग सिर्फ़ कीर्तिनगर तक ही था, बीच में अलकनंदा पर वाहनों के लिए पुल न होने की वजह से बस-ट्रक सिर्फ़ कीर्तिनगर तक ही आते थे, वहाँ से आगे का सफर घोडो और खच्चरों के जरिये होता था ! गर्मियों के दिनों में डाक रात को दस बजे श्रीनगर से खच्चरों में लदकर आगे चमोली गढ़वाल को निकलती थी ! उन डाक के तेलों में देश विदेश में काम करने वाले लोग, अपने घरो को जो पत्र और मनीआडर भेजते थे, यहातक कि सरकारी खजाने का पैसा भी, और वह सब इन्ही डाक के खच्चरों में लद कर जाता था ! घने जंगलो से होकर, और साथ में चलने वाले डाक विभाग के कर्मचारी के हाथ में सुरक्षा के नाम पर सिर्फ़ एक वरछा होता था ! क्या आज हम इस तरह खच्चर पर लादकर पैसा ले जा सकते है ?

अभी कल ही एक ख़बर पढ़ी कि झारखण्ड में एक शख्स ने १५ रूपये के लिए अपनी माँ को मार डाला, तो यह लेख लिखने का मन किया !

आजकल एक ही चर्चा गरम है , झुग्गियों में रहने वाला करोड़पति कुत्ता ! अब इन्हे कौन समझाए कि करोड़पति ये कुत्ता नही, करोड़पति है वो फ़िल्म बनाने वाला ! कुत्ते के पास चाहे एक रुपया हो या करोड़ रूपये हो, वह रूपये खा कर तो जिन्दा नही रह सकता उसे चाहिए एक रोटी, एक अदद हड्डी, नोट नही !मगर बेचारे कुत्ते का नसीब ! चूँकि पिक्चर एक अंग्रेज ने बनाई इस लिए झट से ढेरो इनाम भी मिल गए, आस्कर की दौड़ में भी शामिल हो गयी फिल्म और जो वाकियी आस्कर की दौड़ के लिए थी ( तारे जमीन पर ) उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया क्योंकि वह एक ऐसे व्यक्ति ने बनाया थी जिसके पास पैसा तो बहुत है मगर चमड़ी सफ़ेद नही है !

और लंबा नही खींचना चाहता, संक्षेप में कहूँगा, वाकई में ये पैसा बहुत बोलता है, मेरा बस चलता तो इसका मुह नोच डालता, मगर क्या करू अपनी परिस्थिति भी उस झुग्गी वाली करोड़पति कुत्ते से कुछ कम नही !
गोदियाल

Thursday, January 15, 2009

एक सच यह भी !

शनिवार का दिन था, शाम के करीब सवा पाँच बजे होगे। दफ़्तर से थोड़ा जल्दी निकल पड़ा था घर के लिए । सराए काले खाँ पार कर जैसे ही निजामुद्दीन पुल की तरफ़ मुडा, एक तेज रफ़्तार बाइक कुछ अजीबोगरीब ढंग से मेरी बाए ओर से मुझे ओवरटेक करते हुए निकली। मैं अपनी गाड़ी सँभालते हुए बस इतना ही बडबड़ाया, " मरेगा इडीयट "। कुछ दूर तक मै उस बाइक को जाते देखता रहा, एक २५-३० साल की उम्र का युवा जोडा कुछ ज्यादा ही जल्दी में लगता था। शनिवार को अधिकांश दफ़्तरो मे छुट्टी होने की वजह से सड्को पर भीड अन्य दिनो के मुकाबले थोडा कम होती है अतः मै भी अपनी ६०-६५ की स्पीड में चलता रहा। मुश्किल से आधा किलोमीटर चला हूंगा कि यकायक यातायात धीमा पड़ गया, आगे सड़क पर एक टेंपो ख़राब पड़ा था। वह जोडा जो बाइक पर जा रहा था, एक बार फ़िर से मेरी गाड़ी के आगे था। जैसे ही खराब पडे टेंपो को पार किया, यातायात ने फ़िर से गति पकड़ ली थी ! मै भी अपनी पुरानी ६०-६५ वाली स्पीड में आ गया था। वेंसे तो जब मेरे आगे कोई परिवार वाला किसी दुपहिये पर जा रहा हो, तो मैं कुछ ज्यादा ही सतर्क हो जाता हू , लेकिन इस बार आगे वाले की ग़लत ड्राइविंग की खीज मुझे उसी रफ़्तार पर चलते रहने को मजबूर कर रही थी।

नॉएडा मोड़ करीब आधा किलोमीटर दूर था, सबसे बाहर वाली लेन पर एक ऑटोरिक्शा चल रहा था, उसके पीछे एक स्कूटर सवार था और उसी लाइन पर स्कूटर के पीछे वह जोडा अपने आगे चल रहे वाहन को ओवरटेक करने की उतावली में था। मै बीच वाली लेन पर पहले की भांति चल रहा था। जैसे ही बाइक सवार ने अपनी बाइक किनारे वाली लाइन से हटा कर बीच वाली लाइन पर डालनी चाही , कि तभी इत्तेफाक से स्कूटर सवार ने भी अपना स्कूटर, ऑटो के पीछे से हटाते हुए बीच वाली लाइन की ओर मोड़ दिया। बस इतनी बात थी कि बाइक सवार जल्दी में होने की वजह से संतुलन खो बैठा, नतीजन बीच सड़क पर ठीक मेरे आगे बाइक पलट गई । मेरे तो हाथ पांव फूल गए थे , फिर भी मैंने पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिए। मेरी गाडी के टायर चर्ररर्र की एक जोर की आवाज निकालते हुए रुक गये, पीछे से आ रही दूसरी कार ने भी बचते-बचाते मेरी गाड़ी के बम्पर को ठोक ही दिया।

मै बाहर निकला, वह युवक और युवती पलटी हुई बाइक से अपने को अलग करने की कोशिश कर रहे थे। मैंने देखा, बाइक और मेरी गाड़ी के बीच मुश्किल से ६ इंच का फासला रहा होगा। मेंने पहले अपनी गाडी किनारे की और फिर बाइक को उठाया और उसे किनारे खड़ा किया, साथ ही मै अपने गुस्से को काबू मे करने की कोशिश भी कर रहा था। इस बीच वह युवक और युवती भी लचकते हुए किनारे पर आ गए थे। युवती के पैर में एक छोटी मगर गहरी खरोंच आ गई थी और हल्का खून बह रहा था। काफ़ी तादाद में बाइक और साईकिल सवार तमाशबीन भी इक्कठा हो गए थे ! उनमे से कुछ तो मेरी तरफ़ इस गलत पहमी मे कि शायद मैंने बाइक को टक्कर मारी है, कातिलाना अन्दाज मे देख रहे थे। मैंने अपनी गाड़ी की डिक्की खोली और पीछे पड़े बैग में से एक बैनडेड और थोडा सी रुंई निकालकर उस युवक की ओर बढाते हुए थोड़े गुस्सैले स्वर-अंदाज़ में कहा, "यार तुम लोगो को अपनी जिंदगी प्यारी नही तो कम से कम दूसरो को तो प्रॉब्लम मे मत डालो। " युवक अपनी सफाई देने लगा " मैं...मैं....आगे निकलने की कोशिश कर रहा था..........." !

वहां पर हुजूम लगाये लोग भी उसकी बात सुन खिसक लिए। युवक के बात करने के लहजे से मै इतना तो भांप चुका था कि वह भी कोई पहाड़ी लोग हैं। मैने युवक को जोर देते हुए मैंने कहा कि युवती के घाव वाली जगह पर बैनडेड लगा दो, खून बह रहा है, उसने बैन्डेड छिलकर घाव के आस-पास के खून को रुई से साफ़ कर बैनडेड लगा दी। फिर मैंने पूछा, कहा के रहने वाले हो आप लोग ? पिथोरागड़, युवक ने छोटा सा जबाब दिया । मैंने कहा, मै भी उत्तरांचल का ही हूँ, पर यार भाई ! जरा सम्भाल के चला करो, जल्दी करके क्या फायदा, अभी अगर मेरा थोडा सा भी ध्यान बंटा रहता और ब्रेक न लगते तो न जाने क्या हो जाता। इस बीच वह युवती जो एक भलीभांति दिल्ली के माहोल में ढली हुई प्रतीत होती थी और अब तक खामोश बैठी थी, आँखे छलछलाती हुई रुंधे गले से बोली " सौरी भाई साब, हमे माफ कर दो, एक्चुअली घर में दो छोटे बच्चे फ्लैट के अंदर बंद किए हुए है, इसलिए जल्दी कर रहे थे। कल सुबह गाँव जाना है इसलिये दिन मे बच्चो को सुलाकर लाजपत नगर शोपिंग के लिए निकल गए थे। "

युवती की बात सुनकर मानो मेरे पैरो तले जमीन खिसक गई थी। अपने हाव-भाव को कंट्रोल करते हुए मैंने युवक के कंधे पर हाथ रखा और पूछा आपको तो कोई चोट नही लगी? जबाब में युवक ने ना कहने के लिये सिर्फ़ मुंडी हिलाई। कई बार ऐसा होता है कि हकीकत जान लेने के उपरान्त और समय की कसौटी को समझ लेने पर इन्सान का दिल करता है कि मै, पीडित पक्ष की क्या मदद कर सकता हू, और ऐसा ही कुछ मेरे भी दिल मे पक रहा था, दिल कह रहा था । मैंने पूछा- अगर आप बाइक चलाने में कोई दिक्कत महसूस कर रहे हो तो मै घर तक छोड़ दूं? युवक ने कहा "नही भाई सहाब, हम चले जायेंगे " अच्छा देर मत करो , जरा चेक करो कि गाड़ी स्टार्ट होती भी है या नही, मै बोला । काफ़ी किक मारने के बाद युवक ने गाड़ी स्टार्ट कर दी, युवती भी उठ खड़ी हो गई, मैंने उन्हे आहिस्ता बैठने और संभालकर गाडी चलाने की नसीहत दी और अपनी गाड़ी की तरफ़ बढा ।

सारे रास्ते भर और घर पहुंचकर रात भर इसी सोच मे डूबा रहा कि अगर उन दोनो को कुछ हो जाता तो उन दो मासूमो का क्या होता, जो फ्लैट के अन्दर तालाबंद थे? इस महानगरी मे जिस तरह की मानसिकता के लोग रहते है, तो क्या कोई उन बच्चो की भी खोस-खबर लेता या नहीं! हे भगवान् ! आपका लाख-लाख शुक्रिया, वरना बाद में यह सब जानकर, क्या मैं चैन से जी पाता ?

वो वही थी !

उनकी पहली मुलाकात गर्मियों के दिनों में गाँव में खेली जा रही रामलीला के सेट पर हुई थी।  इस रामलीला में कृष्णा सूपर्णखा का और मुकेश लक्ष्मण का पाठ अदा कर रहे थे। पहली ही नजर दो  दिलों को इसकदर  भेद जायेगी, दोनों ने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा।  गर्मियों की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुले तो चूँकि दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे, मुकेश बारहवी में था और कृष्णा दसवी कक्षा में थी, तो दोनों का मिलना-जुलना जारी रहा।  अब तक वे दोनों एक दूसरे को मन ही मन चाहने भी लगे थे। पहाडी इलाका होने की वजह  से सर्दियों के दिनों में स्कूल के अध्यापक गुनगुनी  धूप सेखने के उद्देश्य से बच्चो की अलग-अलग कक्षाएं, बाहर स्कूल के प्रागण में लगाते थे । दसवी, ग्यारहवी और बारहवी की कक्षाए पास-पास ही लगती थी । जब भी कृष्णा घर से कोई ख़ास पकवान बनाकर लंच के लिए टिफिन में लाती, तो मुकेश को लंच-ब्रेक पर इशारों-इशारों में स्कूल के पीछे की सीढीनुमा क्यारियों में बुला लेती, और फिर दोनों वहीँ बैठकर लंच करते ।

दोनों का प्यार परवान चढ़ता गया और मुकेश के बारहवी पास कर जाने के बाद भी मिलना-जुलना जारी रहा। चंडीगढ़ से होटल मैनेजमेंट का डिप्लोमा करने के तुंरत बाद मुकेश को रियाद, सऊदी अरब   के  एक होटल में नौकरी मिल गई, और वह साउदी अरब चला गया। इतनी दूर जाकर उसे अपने देश, गाँव, परिवार और कृष्णा की याद हमेशा सताती रहती। वह वहाँ नौकरी तो कर रहा था, मगर दिल में हर वक्त अपने वतन की ही खुसबू समेटे रहता। और सच बात यह थी कि उसे वहाँ की आबो-हवा, रहनसहन, वहाँ  के शेखो का , वहाँ काम करने वाले एशियाई मूल के लोगों,  खासकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों के साथ किया जाने वाला पक्षपातपूर्ण बर्ताव ज़रा भी रास नहीं आता था।     

वहाँ पहुँचकर उसने उसी होटल में काम करने वाले केरल के अपने एक साथी के मार्फ़त,शहर के एक कोने पर मकान किराये पर लिया था । जबसे उस केरल के मित्र  ने वहाँ के रीति रिवाज और कुछ भेदभावपूर्ण  बातों के बारे में उसे बताया था, उसे  खुद पर खीझ सी आने लगी थी , मगर क्या करता, एक तो रोजी-रोटी का सवाल और ऊपर से उस कंपनी के साथ दो साल का लिखित अनुबंध । 

दो साल दो जुगों की तरह बीते। और आखिरकार वह घड़ी आई, जब वह घर को लौट चला। दिल्ली एअरपोर्ट से रात को टैक्सी पकड़कर  सुबह  ऋषिकेश पहुँच गया और फिर  वहां से आगे के सफ़र के लिए पहाडी बस पकड़ी और अपने पहाडी गाँव के समीप  के कसबे, जो कि गाँव से तकरीबन ३० किलोमीटर दूर था, वहाँ तकरीबन सुबह ११ बजे पहुँच गया था। उस कस्बे से उसके गाँव के लिए रोजाना दिन में सिर्फ़ दो ही बसे जाती थी, एक १० बजे सुबह  और दूसरी ४ बजे शाम को । शाम वाली बस का कोई निश्चित तौर पर जाने का  कार्यक्रम नही होता था , सिर्फ सवारियों की तादाद पर उसका जाना निर्भर होता था। चूंकि प्रात:  १० बजे वाली बस निकल चुकी थी और वहाँ कोई टैक्सी भी उपलब्ध नही थी, अतः उसने बिना समय गंवाए, अपनी अटेची अपने कंधे में रखी और पैदल ही गाँव को कूच कर गया।

उसके गाँव पहुँचने के लिए पहले एक खड़ी पहाडी चढ़ाई पार करनी पड़ती थी , और फिर ढलान उतरकर नीचे तलहटी में उसका गाँव पड़ता था। गाँव से करीब तीन किलोमीटर दूर जब वह लगभग वह चढ़ाई शिखर पार करने के बिल्कुल करीब था तो उसने देखा कि उससे कुछ दूरी पर एक   युवती जंगल से घास काटकर, घास की गठरी अपनी पीठ पर लादे, उसी रास्ते पर आगे बढ़ी जा रही थी । जब वह उसके करीब पहुँचा तो यह देख उसकी खुसी का ठिकाना नही रहा कि वह कोई और नही बल्कि कृष्णा ही थी, उसकी वही कृष्णा,  जिसे वह दिलोजान से चाहता था । जैसे ही उसने उसे उसके नाम से पुकारा, कृष्णा ने तुंरत घास की गठरी पीठ पर से उतार जमीन पर रख दी और मुकेश से प्रेमालिंगन हो गई और उसके गले में अपनी बाहों का फंदा बनाकर  जी-भरकर  रोई ।

पांच बज चुके थे , पहाडी खाइयों  में शाम दस्तक देने लगी थी । वहाँ से ऊपर पहाड़ की चोटी पर पहुँचकर वे लोग एक पेड़ के पास बैठ गए और फिर कुछ देर तक बातें करते रहे । जब अँधेरा छाने लगा तो मुकेश ने उसे चलने को कहा, कृष्णा ने फिर घास की गठरी पीठ पर रखी और मुकेश से अटेची भी उसकी पीठ पर ही  रखने को कहा । मुकेश ने मना किया तो वह जिद करने लगी , न चाहते हुए भी मुकेश ने अटेची भी कृष्णा की पीठ पर घास की गठरी के उपर रख दी ।

हौले-हौले डग बढाते जब दोनों मुकेश के गाँव से करीब पहुंचे तो कृष्णा रुक गई। , उसने बड़े ही उदास चेहरे और सुर्ख आँखों  से मुकेश की ओर देखा । इस जगह, जहाँ वे खड़े थे, मुकेश और कृष्णा के गाँव के रास्ते अलग हो जाते थे । मुकेश ने उसकी पीठ से अपनी अटेची उतारी और उसके सिर पर ज्यो ही हाथ फेरा वह फिर से फफककर रो पड़ी । मुकेश ने उसे पुचकारा, समझाया और जल्दी ही उसे उसके साथ परिणय-सूत्र में बंधने का आश्वासन देते हुए कहा कि अब तुम रुको मत, अँधेरा होने लगा है, फटाफट घर जावो। सुबकती कृष्णा एक बार पुन; उससे आलिंगनबद्ध  गई, और कुछ देर उपरान्त दोनों ही अपने-अपने रास्ते पर चल दिए। काफ़ी दूर तक दोनों एक दूसरे को मुड-मुड़कर देखते भी रहे थे।

घर पहुंचकर मुकेश अपने माता-पिता और परिजनों से मिलकर बहुत खुश हुआ, मानो वह उसके लिए कोई दिवा-स्वपन हो। कृष्णा से हुई मुलाकात ने मुकेश को कुछ ज्यादा ही उतावला कर दिया था।   घर के सभी सदस्यों से मिलने के बाद, उसने तुंरत माँ और बापूजी से कृष्णा के साथ अपनी शादी की बात छेड़नी चाही तो माँ पल्लू से अपना मुहँ ढककर दूसरे कमरे में चली गई और बापूजी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, बेटे अभी आराम कर, इतनी दूर से यात्रा करके आया है। खाना खा और फिर सो जा,  हम लोग इसके बारे में कल सुबह बात करेंगे ।

सुबह जब मुकेश उठा तो नहा-धोकर, नाश्ता करने के बाद पुनः बापूजी के पास गया, और थोड़ा इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने सीधे कृष्णा की बात उठाई। हुक्का गुडगुडाते उसके पिता ने हुक्के का नाय्चा अपनी बगल में रखते हुए एक लम्बी साँस छोड़ते हुए बुजुर्गिया अंदाज में उसे समझाते हुए कहना शुरू किया। ब्योरेवार विवरण उसके समक्ष रखते हुए उन्होंने कहा; बेटा, तू अब कृष्णा को भूल जा, वह अब इस दुनिया से बहुत दूर चली गई है। अभी एक साल पहले की तो बात है, कृष्णा के बारहवी पास करने के बाद, मैंने उन लोगो से बहुत कहा,बहुत गुजारिश की,  मगर उसके मां-बाप तेरे इन्तजार में अपनी जवान बेटी को घर पर रखने को तैयार नहीं थे। उसके सगे-संबधियों  ने उसका रिश्ता बगल वाले गाँव के एक परिवार के साथ तय कर दिया था।  सगाई के दूसरे ही दिन कृष्णा  घर से जंगल  घास लेने के बहाने गई और वही एक पेड से लटककर उसने आत्महत्या कर ली।

पिता के मुहं से यह सब सुनकर मुकेश हक्का-बक्का सा रह गया था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वो उनसे क्या कहे, क्या करे। रूढ़िवादिता और भूत-प्रेत पर उसे तनिक भी विश्वास नहीं था, और गाँव वाले अगर कोई ऐसी बात कभी उसके समक्ष करते तो वह उनका मजाक उडाता नहीं थकता था। इस वक्त वह कभी अपने बापूजी को और कभी माँ को देखे जा रहा था । अवाक सा खड़ा  मुकेश अपने माँ-बाप को अब यह भी कैसे बताये कि अभी पिछली ही शाम को  तो कृष्णा रास्ते में उसे मिली थी और वे तकरीबन एक घंटा साथ रहे। कृष्णा उससे चिपककर रोई भी थी, उसने उसे समझाया-बुझाया  भी था।   हाँ, उसे इतना जरूर अनुभव हो रहा था कि उसे उस वक्त यह महसूस नही हुआ था कि कोई उसके शरीर से लिपटा हुआ है।  तो क्या वो वही थी, क्या वह कृष्णा ही थी ? वो-वो-वो………  वह बस, अपना दाहिना हाथ हवा में उठाये वो… वो. ही किये जा रहा था, और घर के सभी सदस्य एकटक उसका मुहं देखे जा रहे थे।