Tuesday, August 18, 2009

ब्लॉगर जगत के सभी मित्रो से एक और सवाल !

दोस्तों ! जैसा कि आप सभी लोग जानते है कि आजकल कुछ समय से हमारे देश में इस बात पर काफी गरमागरम बहस हो रही है कि अमेरिका वाले हमारे देश की महान हस्तियों की तकलीफों का ख्याल नहीं रखते और उन्हें एअरपोर्ट पर तंग करते है ! कहना मुश्किल है कि बात कहाँ तक सत्य है, किन्तु एक बात के लिए अमेरिका की दाद देनी होगी कि २००१ के बाद कोई भी माई का लाल उस धरती पर आतंक नहीं फैला सका! हमारे प्रधान मंत्री जी तो मुख्यमंत्रियों के सम्मलेन में यह कहकर भविष्य में होने वाले किसी आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी से खुद को बचा चुके कि पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी फिर से हमला करने की फिराक मैं है ! लेकिन मानो न मानो अमेरिकियों की इस बात के लिए दाद देनी पड़ेगी कि वे उनके घर में घुसकर उन्हें मार रहे है ! हम लोग तो ज्यादा से ज्यादा यही कर सकते है, जैसा कि शाहरुख़ खान एपिसोड के बाद हमारे देश के दो मंत्रियो ने प्रतिक्रिया दी ! उनकी प्रतिक्रया अगर अमेरिकियों ने सुनी होगी तो जोर से हँसे होंगे !

खैर अब सवाल पर आता हूँ ; आप लोगो में से अधिकाँश हवाई यात्रा करते होंगे, और शायद आपने कभी हमारे एयरपोर्टो पर टंगी उस तालिका-पट पर नजर दौडाई हो, जिसमे उन वीवीआईपी लोगो के नाम ( जैसे राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मुख्य न्यायाधीश इत्यादि ) लिखे है जिन्हें सुरक्षा एजेंसियों द्बारा की जाने वाली सिक्यूरिटी स्कैनिंग से मुक्त रखा गया है, अर्थात वे बिना सिक्यूरिटी चेक के एयर पोर्ट के अन्दर जा सकते है ! उनमे सबसे नीचे एक नाम लिखा होता है " रॉबर्ट बढेरा " ,
क्या आप बता सकते है कि यह रॉबर्ट बढेरा कौन है और उन्हें किस वजह से इस तरह की छूट दी गई है ?

Monday, August 17, 2009

सभी ब्लोगर मित्रो से एक सवाल !

दोस्तों ! हो सकता है कि मेरा सवाल आप लोगो के लिए कोई विशेष महत्व ना रखता हो, फिर भी आप लोगो से निवेदन करूंगा कि यदि आप लोग इस बारे में कोई विशेष जानकारी रखते हो, तो कृपया देने का कष्ट करे! मेरे जहन में यह सवाल बहुत लम्बे अरसे से घूम रहा है, जिसका मै ठोस जबाब अभी तक नहीं ढूंढ पाया !

क्या भारत के राष्ट्रपति लाल किले पर आयोजित होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लेते है ? यदि नहीं तो क्यों ?

Sunday, August 16, 2009

एक कहानी- बयाल

पिछली दफ़ा दिल्ली से गांव जाते वक्त, एक दिन के लिये ऋषिकेश मे अपने चचेरे भाई के पास रुका था! बातो-बातो मे, कुछ सालों से अपने दिल मे पाले रखी यह भडांस मैने जमकर निकाली थी कि वे लोग गांव की अपनी जमीन-जायदाद बस यूं ही छोड आये थे, और पिछले पांच सालो से वे वहां देखने भी नही गये थे ! इस बात पर मै उन्हे ढेर सारे उपदेश भी दे आया था, खासकर भाभी को ! भाभी जी ने मेरी हर इक बात को बडे ध्यान से सुना था, और वे मेरी किसी बात का बुरा भी नही मानती ! वे मुझे तभी से अपने छोटे भाई की तरह मानती है, जबसे मेरे स्कूल के दिनो मे वे नई- नई गांव मे ब्याहकर आई थी, और गांव के कुछ असामाजिक तत्वों ने उन्हे एक झूठे इल्जाम मे फ़सांने की चेष्ठा की थी, किन्तु मैं उस घटना का एक चश्मदीद गवाह था, अत: मैने सारा सच घर-गांव के बडे-बुजुर्गो के समक्ष प्रमाण सहित प्रस्तुत कर दिया था ! तभी से भाभी मेरी बडी इज्जत करती है और मुझे कई बार यह भी कह चुकी है कि तुम एकदम मेरे छोटे भाई जैसे हो ! ऋषिकेश मे मेरे उनके यहां ठहरने के दर्मियां मैने यह भी नोट किया था कि कुछ सवाल जो मैने भाभी जी से पूछे थे, उन्हे सुनकर वह थोडा असहज सी हो गई थी, और उस वक्त सफ़ाई से उन सवालो को टाल भी गई थीं !

उत्तरांचल के एक पहाडी भू-भाग मे बसा, हमारा वह छोटा सा गांव ! यूं तो कहने को वह १५-२० परिवारों का गांव है, किन्तु एक-एक कर लोग गांव से खिसकते और मैदानी प्रदेशो तथा शहरों की ओर प्लायन करते चले गये ! आज स्थिति यह है कि पूरा का पूरा गांव वीरान पडा है, उन इधर-उधर बिखरे घरों मे से कुछ ही घर अब ऐसे है, जिनमे इक्का-दुक्का लोग रहते है! मेरा अपने गांव के प्रति भरपूर लगाव है और जीवन की मजबूरियों के चलते मै भी एक तरह से उसे छोड आया हूं, किन्तु जब कभी अपने बचपन की यादें वहा खींच ले जाती है तो हमेशा यही कोशिश बनाये रखनी पडती है कि रात होने से पहले नजदीकी कस्बे तक पहुंच जाऊ, जहां ठहरने के लिये छोटे होटल इत्यादि हैं ! मुझे याद है कि जब मैं गांव मे पढता था तो बुनियादी सुविधावों के नाम पर गांव मे कुछ भी नही था, सिवाये पास मे स्थित एक इन्टरमीडियेट स्कूल के ! रात-विरात अगर पेट खराब हो जाये तो पहाडो के बीच बसे उस गांव मे, पहाडो की छाया के घुप अन्धेरे मे ही पास के जंगल मे जाना पडता था, घर और उसके आस-पास भी टायलेट जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी! और ऐसे मे जंगल जाते वक्त हाथ मे रोशनी के नाम पर होता था सिर्फ़ चीड के पेड की वह लकडी जो लीसे की वजह से किसी पैट्रोल मे भीगी लकडी के जैसे जलती थी ! अगर तेज हवा के झोंके मे वह बुझ जाये तो फिर सब कुछ भगवान भरोसें ही चलता था! जब मैं बारह्वीं मे पढता था, उस समय गांव मे उन भाभी जी के परिवार मे वह, उनका एक नन्हा बेटा, देवर बीरु, जोकि मेरा क्लासमेट भी था, और ससुर यानि मेरे चाचा रहते थे, मेरी चाची यानि उनकी सासू मां की उनकी शादी से पूर्व ही मृत्यु हो चुकी थी ! उनके पति भारतीय सेना मे कमीशन्ड आफीसर है !



कुछ साल पहले वीरु भी ग्रेजुएशन करने के उपरान्त आई एम ए की परीक्षा पास कर, खड्गवास्ला से तीन साल की ट्रेनिंग समाप्त करने के बाद, सेना मे कमीशन्ड आफीसर बन गया था ! करीब पांच साल पहले पिता की मृत्यु के दौरान वह दो महिने के वार्षिक अवकाश पर गांव आया था तो एक रात जंगल गया और अगले दिन सुबह वहीं गांव के पास के जंगल से उसकी लाश मिली थी ! उसकी गर्दन पर पीछे बाघ के पंजे का निशान पाया गया था, और गांव के लोगो का यह मानना था कि जंगल से नित्यकर्म से लौटते वक्त बाघ ने पीछे से उस पर हमला कर दिया होगा , जिससे उसकी मृत्यु हो गई ! उसके अगले ही दिन बडे भाई सहाब, जो पिता की मृत्यु की सूचना मिलने के बाद छुट्टी लेकर गांव आये थे, पिता और भाई के क्रिया-क्रम के उपरान्त अपने बच्चो को लेकर गांव से चले गये थे ! चूंकि उस समय उनकी पोस्टिंग लेह थी, अत: बच्चो को वे पढाने के उद्देश्य से ऋषिकेश मे अपने एक रिश्तेदार के घर के समीप एक घर किराये पर लेकर, भाभी जी और बच्चो को वहां सेट्ल कर गये थे !

ऋषिकेश मे एक रात उनके घर मे रुकने के बाद, मैं गांव गया और एक दिन वहीं पास के कस्बे मे रुकने के बाद वापस अपने शहर लौट आया था ! कुछ दिनों तक अपने गांव की माटी की खुशबू और यादें दिलो-दिमाग मे बसाये रखने के बाद, मैं धीरे-धीरे उन यादों को भुलाता चला जा रहा था कि अचानक एक दिन जब शाम को मैं दफ़्तर से घर लौटा तो मेरी पत्नी ने विस्मित सा चेहरे बनाया हुआ था और पानी का गिलास मुझे देने के बाद उसने डाईनिंग टेबल के ऊपर रखा एक लिफ़ाफ़ा मुझे थमा दिया था ! पत्र उन भाभी जी का भेजा हुआ था! मैने वह पत्र पढा और कुछ लम्हों के लिये मै भी एक विस्मय भरे संसार मे खो सा गया था! मुझे याद आने लगे थे वो बचपन के अपने बडे-बुजुर्गों के मुख से सुने गांव मे प्रचलित वे तरह-तरह के किस्से ! उस खत को मै कुछ जरूरी बातों के स्पष्ठीकरण के साथ यहां ज्यों का त्यों रख रहा हूं :
प्रिय देवर जी,
छुटकू-छुट्की और भुली (यानि देवरानी) को मेरी ओर से शुभ-चिरमजीव एवं आपको सपरिवार पवित्र रक्षाबन्धन की हार्दिक शुभकामनाये ! भगवान आप सब लोगो को सदा सुखी रखे !

पिछली बार आप जब यहां हमारे घर आये थे, तो आपने मुझसे कुछ सवाल पूछे थे! मैने जानबूझकर आपके सवालों को इसलिये अनसुना कर दिया था, क्योकि मेरे दोनो बच्चे, नेहा और राहुल पास बैठे हमारी बातों को गौर से सुन रहे थे, और मै यह नही चाहती थी कि उनके नन्हे दिमाग पर हमारी बातों का कोई बुरा असर पडे ! हालांकि बर्षो से उस तूफ़ान को मैं अपने अन्दर समेटे हुए हूं और चाहती थी कि उस घटना की एक-एक बात आपको बताऊ, क्योंकि मै अच्छी तरह से जानती हूं कि आप जैसे साहित्यकार लोग तो इसी तरह के चटपटे और सनसनीखेज मसाले की हरदम तलाश मे रहते है ! पता नही आप मेरे इस पत्र को किस रूप मे लेते है, और मै भी एक शिक्षित महिला होने के नाते यह बात भली भांति समझती हूं कि आज के इस शिक्षित, सभ्य और वैज्ञानिक समाज मे यह महज एक दकियानूसी और अन्धविस्वास से परिपूर्ण बात है ! लेकिन जो चीज मैने अपने पूरे होशो-हवाश मे अपनी आंखो से देखी हो, अपने कानों से सुनी हो, उसे भला मैं कैसे झुठला सकती हूं ? आपके लिये भले ही यह महज एक चट्पटा और सनसनीखेज मसला हो, लेकिन मै वह सब देखने-सुनने के बाद भी किस आधार पर सिर्फ़ विज्ञान जगत की ही दुहाई देती फिरु ?

अपनी इन बातों की शुरुआत मैं उस घटना से करती हूं, जब राहुल चार साल का था और नेहा उस वक्त गर्भ मे थी ! ऐसी अवस्था मे एक स्त्री को बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पडता है और आपको तो मालूम ही है कि हमारे गांव मे तो रात को अगर इन्सान को लघुशंका की भी शिकायत हो तो घर से बाहर निकलने के लिये भी दस बार सोचना पडता है ! उस रात भी मै कुछ इसी समस्या से दो-चार हो रही थी और जाग रही थी ! गर्मी की वजह से मेरे बुजुर्ग ससुर जी बाहर खुले बरामदे मे एक कोने पर चारपाई डाल सो रहे थे ! कि तभी हमारे घर से थोडा नीचे की तरफ़ बडे से पेड के पास एक जोर की चीख सुनाई दी ! वह चीख सुन मेरे कान कुछ देर के लिये मानो सांय-सांय करने लगे थे ! अभी मुश्किल से दो मिनट ही गुजरे होंगे कि बाहर सो रहे ससूर जी ने गले से एक अजीब तरह की जोर की आवाज निकाली ! यह तुम भी जानते होंगे कि कभी जब गांव मे कोई पूजा-पाठ होता था तो उन पर स्थानीय कुल-देवता प्रकट होते थे! फिर उसके थोडी देर बाद गांव के देवी मां के मंदिर के पास से वही चीख पुन: सुनाई दी ! अन्दर ही अन्दर मैं बहुत डर गयी थी, मैने अपनी बगल मे सो रहे बेटे राहुल के ऊपर हाथ धरा तो वह भी जाग रहा था, और बोल पडा कि ममा कौन रो रहा है इतनी रात को ? मैने उसे कहा कि कुछ नही बेटा, तुम सो जावो और मै उसे थपकी देकर सुलाने लगी !

अगले दिन सुबह उठी तो सिर भारी था और बुरी तरह दुख रहा था ! रोज की भांति जब मै ससुर जी के लिये चाय बनाकर देने गई तो ससुर जी भी जाग गये थे और चारपाई पर उठ बैठे थे ! मैने गरम चाय का गिलास कटोरी समेत उनके हाथ मे पकडाया, तो वे रोज की तरह गिलास पकडते हुए बस इतना ही बोले, हां ला बेटा! मुझे वहीं खडी देख उन्होने फिर कहा, क्या बात है बेटा ? कुछ पूछना है ? …. मैने झिझकते हुए कहा, पिता जी….. वो कल रात को…… वो चीख….. आपने भी सुनी ? वो बोले, अरे बेटा, तुम डर गई थी क्या….? इसमे डरने की कोई बात नही है ! वो क्या है कि असूज (आश्विन) का महिना चल रहा है, सुदूर चमोली जिले के मैठाणा नामक भगवती के प्रसिद्ध मन्दिर मे सप्ताह भर चलने वाले अठारह पुराण और यज्ञ चल रहे थे, अत: आस-पास के इलाकों से सभी देवियां भी वहां गई हुई थी ! कल शाम इसका समापन होने के उपरान्त अपनी देवी मां भी रात को अपने थान ( मंदिर) लौट आई ! मैने पूछा तो क्या वे चीखें देवी मां की थी ? ससुर जी बोले, हां उनके साथ-साथ पूरा बयाल ( परियों और देवियों का रथ) भी चलता है, तुम बिल्कुल मत डरो, बेटा …!!

इस घटना के बाद से कई बार देर रातों को मैने ससुर जी को पुकारते हुए सुना था कि हे बच्चों ! बाहर मत निकलना, बयाल चल रही है ! मेरे दिलो-दिमाग पर इन बातों ने एक डर की सी स्थिति पैदा कर दी थी ! एक-डेढ साल बाद जिस रात ससुर जी का देहावासन हुआ, मै घर पर अपने दोनो मासूम बच्चों के साथ अकेली थी ! शाम का खाना-पीना निपटाने के बाद, मुझे अभी मुश्किल से बिस्तर पर लेटे पन्द्रह मिनट ही हुए थे कि बाहर चौक(आगंन) के किनारे पर बने टिन के छप्पर, जिसे हम सर्दियों के लिये लकडियां इत्यादि संग्रह करने के लिये इस्तेमाल करते थे, के ऊपर टिन के बजने की कुछ ऐसी जोर की आवाज आई मानो, किसी ने उस पर लाठी से वार किया हो ! उस दिन ससुर जी अपने कमरे मे दरवाजा खुला छोड सो रहे थे ! कुछ देर बाद मुझे ससुर जी की बहु- बहु पुकारने की आवाज सुनाई दी ! मैने अपने कमरे मे जल रही लालटेन जिसे मैने सोते वक्त बिल्कुल धीमी लौ पर कर दिया था, उसे फिर से तेज किया और आहिस्ता से अपने कमरे की सांकल ( चट्कनी) खोल बाहर निकली और फिर बाहर से कमरे के किवाड पुन: बन्द कर दिये, ताकि अन्दर सो रहे मेरे दोनो बच्चो पर अन्धेरे मे कोई जंगली जानवर हमला न कर सके ! मै लालटेन हाथ मे लिये ससुर जी के कमरे की तरफ़ बढी, ज्यों ही मैने उनके कमरे के पायदान से कदम अन्दर कमरे मे रखे, कि वहां का नजारा देख, मेरे मुंह से एक जोर की चीख निकल गई ! ससुर जी चारपाई के बगल मे ठीक नीचे फर्श पर अचेतावस्था मे पडे थे! इस बीच मेरी चीख-पुकार सुन गांव के कुछ लोग घर पर पहुंच चुके थे ! उनमे से एक बुजुर्ग ने ससुर जी की नब्ज टटोली और बोले कि वह मर चुके है, शायद उन्हे दिल का दौरा पडा है ! मै भय से थर-थर कांप रही थी, कुछ बुजुर्ग लोग वहीं रत जगे के लिये ससुर जी की लाश के पास ही बैठ गये थे, एवं चार लोगों को उन्होने बगल के गांव स्थित पोस्ट आफ़िस जाने को कहा, ताकि वहां लगे टेलीफोन से वीरु, जोकि उस समय कोट्द्वार मे पोस्टेड था, को फोन कर सकें ! इन्हें तुरन्त बुलाना सम्भव नही था, क्योंकि ये उस समय लेह मे पोस्टेड थे, अत: इनके लिये टेलीग्राम करने की बात कही गई !

खबर पाते ही अगले दिन करीब बारह बजे के आस-पास बीरु घर पहुच गया था ! गांव के लोगो की सलाह पर, इनका इन्तजार किये बगैर ससुर जी का वीरु के हाथों उसी दिन अन्तिम संस्कार कर दिया गया ! ससुर जी के देहान्त की दूसरी रात, मेरे लाख मना करने पर भी बीरु तकिया के नीचे खुंखरी रखकर बाहर बरामदे मे पडी चारपाई पर ही सो गया ! वह पूर्णिमा की रात थी, अत: बाहर खूब चांदनी फैली थी ! रोज की भांति मै अपने साथ घटित हुई घट्नाऒं से दुखी, यु ही बिचारों मे खोई थी कि एक बार फिर बाहर छप्पर पर जोर की लठ्ठी मारने की वही चिरपरिचित आवाज मेरे कानों मे गूंज उठी ! सिर से पैर तक मेरे शरीर मे एक ठण्डी सिहरन सी दौड गई थी ! मै तेजी से बिस्तर से उठी और मैने दरवाजे पर लगी सांकल के बीचोबीच दरवाजे के उस मोटे तख्ते पर बने सुराख से अपनी एक आंख चिपका कर बाहर का जायजा लिया ! बीरु खर्राटे मारकर सो रहा था कि तभी मुझे एक कुत्ते जैसी आकृति की छाया चांदनी की रोशनी मे फर्श पर पडती दिखी ! मै चिल्लाना चाह रही थी, मगर मेरे गले से आवाज नही निकल रही थी ! मै सांस रोककर यह सब देख रही थी कि तभी वह छाया एकदम वीरु की चारपाई के पास आ गई थी और मुझे लगा कि जैसे वह आकृति धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थी ! कुछ पल बाद यह देख मेरी आंखे फटी की फटी रह गई कि वह आकृति एक पहाडी भेष-भूषा वाली महिला के रूप मे परिवर्तित हो गई थी ! उसने काले रंग की पाहडी आंग्डी (कम्बलनुमा धोती ) पहन रखी थी और कमर पर सफ़ेद रंग का पठवा ( सांफ़ा) बांध रखा था! करीब एक मिनट तक वह औरत वहां खडी रही और फिर धीरे-धीरे डग बढाती हुई बरामदे से बाहर निकली, उसके तुरन्त बाद बीरु भी उठ खडा हुआ और उसके पीछे-पीछे चल दिया ! मै दरवाजे के पीछे से बस हाथ खडा कर उसे रुक जाने का मौन ईशारा करती रह गई थी और वहीं पर कब बेहोश होकर गिर पडी, मै नही जानती ! और फिर अगले दिन सुबह लोग जब बीरु की लाश उठाकर दरवाजे पर लाये तो……….. ! मैने अगले दिन जब यह बात गांव की कुछ सयानी औरतों को बताई तो वे कहने लगी कि हो सकता है कि तुम्हारे घर पर किसी भूत-प्रेत का साया हो ! कुछ का कहना था कि वह कोई बोक्सु ( आधा मनुष्य, आधा बाघ ) रूप वाली कोई चुडैल या प्रेतात्मा हो सकती है जिसने पहले बीरु को बसीभूत कर अपने साथ ले गई और फिर बाघ का रूप धारण कर उसे मार दिया !

अब तुम्हीं बतावो कि मै किस आधार पर आधुनिकता का लिवास पहन उन सब बातों को भुला दू और किस हिम्मत पर गांव जाने का दुस्साह्स करु ? खैर, बहुत दिनो से सोच रही थी कि ये सब बातें तुम लोगों को बता कर किसी तरह अपने मन का बोझ हल्का करु ! उम्मीद करती हूं कि मेरी बातों को आप लोग अन्यथा नही लोगे !
आपकी भाभी,

Saturday, August 15, 2009

सूक्ष्म व्यंग्य- "कमीने" देखने की ख्वाइश !

स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी है ! सुबह सबेरे बिस्तर से खडा हुआ.. नहा-धोकर तैयार हो गया! मेरी इस तत्परता पर बीबी ने आर्श्चय व्यक्त करते हुए आँखे तरेरी और पूछा क्यों जनाव, जब दफ्तर जाना हो तो दस बार उठाना पड़ता है कि देर हो रही है, खड़े हो जावो ! और आज जबकि छुट्टी है तो इतनी जल्दी तैयार हो गए, आखिर जाना कहां है ? मैंने सूक्ष्म सा जबाब दिया. कमीने देखने, कल से दिखने शुरू हो गए है! वह बोली, तुम्हे क्या जरुरत आन पडी कमीने देखने की ? बीबी के इस व्यंग्य पर मै अन्दर ही अन्दर तिलमिला गया था! उसने फिर कहा तो बाहर जाने की जरुरत क्या है, बारिश का मौसम है, भीग जावोगे! आराम से बैठो,. थोड़ी देर बाद टीवी पर ही दिख जायेंगे! मैंने भी एक बारी नजर आसमा की तरफ उठाई और महसूस किया कि वह ठीक ही कह रही है ! फिर बैठे-बैठे मैं सोच रहा था कि कितनी समानता है हम दोनों पति-पत्नी की सोच में ! वह कितनी जल्दी समझ गई कि मैं क्या देखने की ख्वाइश रखता हूँ ! किसी ने ठीक ही कहा "राम मिलाये जोड़ी, एक अंधा, एक कोडी" !

Friday, August 14, 2009

६२ सालो से चला आ रहा अल्पसंख्यक मिथ्या भरम !

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर इस ब्लॉग जगत पर काफी लोगो के लेख पढ़े! ऐसा ही एक सूक्ष्म लेख पढ़ा, जिसमे लेखक का मानना था कि आज इस देश में सबसे पहले हिन्दू एकता की जरूरत है! मेरी अंतर्रात्मा से तुंरत एक आवाज आई कि यह एक नामुमकिन सी बात है! इसके पीछे कारण चाहे जो भी हो, लेकिन सभी लोग यहाँ मिथ्या-भरम में ही जी रहे है! हाल के दिनों में इसी ब्लॉग जगत पर एक मुस्लिम जगत के तथाकथित विद्वान् के महान विचार भी पढ़े, जिसमे कि एक अहम् बात उन्होंने कही कि वे भी एक हिन्दू है, क्योंकि हिन्दुस्तान में रहने वाला हर एक नागरिक हिन्दू है! अगर उनकी बात को एकदम सत्य मान लिया जाए तो फिर ज़रा सोचिये कि इस देश के लोग मुर्खता के कितने बड़े अन्धकार में डूबे बैठे है ! फिर अचानक नजर उस समाचार की और गया, जिसमे अमेरिका की एक तथाकथित अल्पसंख्यको की रक्षा संस्था द्बारा भारत को उन देशो की श्रेणी में रखे जाने की खबर थी, जो अल्पसंख्यको को पूर्ण संरक्षण नहीं दे पाते ! उस तथाकथित सस्था का साफ़ तौर पर इशारा कंधमाल में ईसाइयों के साथ हुई हिंसा की और है, मगर क्या वह संस्था निम्नांकित आंकडो को देखने के बाद भी अपनी राय पर कायम रहेगी कि इस देश में वास्तविक तौर पर अल्प्संखयक कौन है?

जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि अगर इस बात को मान लिया जाए कि हिन्दुस्तान में रहने वाला हर नागरिक हिन्दू है तो फिर इस देश का वास्तविक अल्प्संखयक कौन है, और नकली अल्पसंख्यक बनकर अल्पसंख्यको वाले कल्व का लुफ्त सही मायने में कौन उठा रहा है ! १९९१ की देश की जनगणना के आंकडो पर अगर नजर डाले तो कुल आवादी ८४,६३,०२, ६८८ थी, जो २१.४ % की अनुमानित दर से बढ़कर २००१ में १,०२,७०,१५,२४७ हो गई ! अब आये देखे कि उस आवादी में जो इस देश में मौजूद विभिन्न धर्मो और जातियों का प्रतिशत था उसी को लगभग आधार मानकर यह मान ले कि आज की तारीख में देश की कुल आवादी लगभग एक अरब बीस करोड़ है ! एवं मान लो कि यहाँ पर हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं, सिर्फ इस देश में चार धर्म; मुस्लिम, सिख, ईसाई और बौध है तथा कुछ जातिया है जो इस कुल आवादी का प्रतिनिधित्व १९९१ एवं २००१ की जनगणना के प्रतिशत की आधार पर निम्न लिखित समीकरण बनाती है:

जैसा कि मैंने कहा कि आज की अनुमानित आवादी = १,२०,०००००००० (एक अरब बीस करोड़ )
धर्म:
कुल आवादी का मुस्लिम प्रतिशत (१५ %) .= १८,००,००००० (अठारह करोड)
कुल आवादी का सिख प्रतिशत (२.२ %) = २,६४,००००० (दो करोड़ चौसट लाख)
कुल आवादी का ईसाई प्रतिशत (३.१ %) = ३,७२,००००० (तीन करोड़ बहतर लाख)
कुल आवादी का बौध प्रतिशत (१%) १,२०,००००० (एक करोड़ बीस लाख )

जाति:
पिछडी जातिया कुल आवादी का प्रतिशत (३७ %) ४४,००००००० ( चवालीस करोड़ )
अनुसूचित जाति कुल आवादी का (१६.२ % ) १९,५०,००००० (साडे उन्नीस करोड़ )
अनुसूचित जन जाति कुल आवादी का (८.५%) १०,२०,००००० (दस करोड़ बीस लाख )
वैश्य जाति कुल आवादी का (१% ) १,२०,००००० (एक करोड़ बीस लाख )
क्षत्रिय जाति कुल आवादी का (९ % ) १०,८०,००००० ( दस करोड़ अस्सी लाख)
ब्राह्मण जाति कुल आवादी का (४.३२ %) ५,१८,००००० (पांच करोड़ अठारह लाख)

अन्य धर्म /जातियाँ जैसे यहूदी, जैन इत्यादि २,५०,००००० (ढाई करोड़ )
अन्य मानव प्रजातिया जैसे हिजडा/ साधू कुछ आदिवासी इत्यादि ५०,० ०००० (पचास लाख )
( नोट: सभी आंकडे केवल अनुमानित है, इन्हें अन्यथा न लिया जाए)

अब आप उपरोक्त आंकडो पर खुद गौर फ़रमा कर सहज अंदाजा लगा सकते है कि इस देश में वास्तविक अल्पसंख्यक कौन है, और मिथ्या आंकडो के तहत अल्प्संखयक होने का असली लुफ्त कौन उठा रहा है ! साथ ही जानकारी के लिए यह भी बता दू कि इन तथाकथित उच्च जाति में क्षत्रियों की आवादी का ५० % से अधिक और ब्राह्मणों की आवादी का ४५ % से अधिक जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे है, और बेरोजगार है !

मेरा भारत महान ! आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये !

Wednesday, August 12, 2009

’सिस्स्स्स….! इन्डिया स्वाइनिंग - माइंड यौर टंग…..एन्ड बैटर कीप शट’ !!

सरकार को दोष क्यों न दे ? आखिर सरकार ने इस बारे मे किया ही क्या, सिवाए अपने देश के इन तमाम महान संचार माध्यमों के मार्फ़त आम जनता के दिलो-दिमाग पर स्वाइन फ्लू का आतंक फैलाने के ? एक अपने स्वास्थ्य मन्त्री जी है, जिन्हें खुद को नही मालूम होता कि वे बोल क्या रहे है ! इस बारे मे आम नागरिक क्या कर सकता है, सिवाये भुगतने के ? आज से पांच महिने पहले इस लाइलाज बीमारी के जब अमेरिका मे पांव पसारने की बात सामने आ गई थी, तो तब से क्या हम और हमारी यह सरकार सो रही थी ? इस पांच महिने का वक्त इसलिये मिल गया था, चूंकि फ्लू का वायरस यहां की गर्मी मे पैर पसारने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था ! आज जब देश के अन्य भागों की तुलना मे, अपेक्षाकृत थोडा ठंडी जगहों और खासकर उन जगहों पर जहां विदेशो से वापस लौटे लोग ज्यादा पहुंचे, अफ़रा-तफ़री मच चुकी है, तब जाकर इस सरकार की नींद खुली! क्या ही अच्छा होता कि तुंरत अप्रैल मे ही १५-२० मेडिकल से जुडे लोगो का एक दल बनाकर प्रशिक्षण के लिए वहाँ भेजा जाता, जहां इसकी तकनीक उपलब्ध थी ! आवश्यक बुनियादी उपकरण खरीद लिए जाते, और हर उस विदेश से आने वाले के ऊपर नजर रखी जाती, जो इससे संक्रमित पाया जाता ! और ज्यादा नहीं तो चार महानगरो में, चार अलग मोबाईल चिकित्सालय खोले जाते ताकि ऐसे लोगो का वहा उपचार किया जा सके !

लेकिन इसके लिए सरकार के पास संसाधनों की कमी थी, क्योंकि यह एक आम नागरिक के स्वास्थ्य से जुड़ा मसला था ! हां, अगर कोमंवेल्थ गेम के लिए विश्वस्तरीय खेल सुविधावो का जायजा लेने का बहाना होता, तो सरकार के सारे मंत्री और उच्च तब्के के नौकरशाह, अपने परिवारों के साथ एथेंस और जापान घूम-घूम के अब तक आ चुके होते ! कहाँ तक कोसें सरकार को, कोसते-कोसते उम्र गुजर जाएगी !
"हर डाल पे.............." !

खैर, मित्रो, समस्या इतनी गंभीर भी नहीं है, जितना कि हमारे इस ग्रेट मीडिया ने हौवा खडा कर रखा है ! जैसा कि आप लोग स्वयं जानते है कि फिलहाल यह एक लाइलाज बीमारी की तरह है ! चिकित्सा जगत के पास इसका कोई सुनिश्चित उपचार अभी तक नहीं है ! फिर भी आप इसे बहुत ज्यादा गंभीरता से ना ही ले तो बढिया, क्योंकि मैं आपको एक उदाहरण से समझाता हूँ ! आजकल देश में, खासकर उत्तरभारत में मौसम के बदमिजाजी की वजह से बहुत सी शारीरिक बीमारियाँ चली हुई है, जिसमे सामान्य फ्लू, बुखार, बदनदर्द इत्यादि-इत्यादि से लोग पीड़ित है ! लेकिन प्रचार माध्यमो ने स्वाइन फ्लू का जो हौवा खडा किया, उससे लोग इन सामान्य बीमारियों को भी उसी नजरिये से देख रहे है, और अत्यधिक डरे हुए है ! जबकि ऐंसा कुछ भी नहीं है ! मैं मानता हूँ कि यह स्वाइन फ्लू की बीमारी एक घातक बीमारी है, मगर ऐसा कतई नहीं है कि इसके एक बार हो जाने से मनुष्य ठीक ना हो ! अगर मरीज की ठीक तरह से उचित देखभाल की जाए तो कुछ ही दिनों में मरीज ठीक हो सकता है ! ठीक उसी तरह जिस तरह सामान्य सर्दी जुकाम से पीडित होने के बाद ! साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अब, जब यह बीमारी हमारे देश में आ ही गई, तो निकट भविष्य में ख़त्म नहीं होने वाली ! बहुत लम्बी खिचेगी और सर्दियां तो अभी आनी बाकी है !

अतः जब हम यह सब जानते ,है तो डरना किस बात का ? जरुरत है तो सिर्फ सावधानिया बरतने की ! कुछ घरेलू सावधानिया है, जिन पर आप लोग भी गौर फरमा सकते है;

१.स्वच्छ रहिये
२.अमूमन हर घर में लोग तुलसी का पौधा रखते है, रोज सुबह उठकर पांच पत्तिया तुलसी की निकाल कर धोने के बाद चबा ले !
३.चाय में भी आप अदरक और तुलसी की पत्तिया डालकर उसे खूब उबालकर पिए
४. चाहे अभी आपको जुकाम लगा हो अथवा नहीं, मगर रोज रात को सोते वक्त शरीर पर छाती और गर्दन पर विक्स मले! ५. अगर नाक बह रही हो तो सोने से पहले एक बर्तन में उबलता पानी लेकर उसमे विक्स डालकर गहरी-गहरी साँसे ले ! रोज सुबह शाम व्यायाम करे, आप कमरे के अन्दर भी कर सकते है !
६. प्रारंभिक जुकाम, बदनदर्द महसूस होने पर सामान्य सर्दी जुकाम में ली जाने वाली परम्परागत दवाई की हल्की डोज ले सकते है, उसके बाद लगे कि नहीं फर्क पद रहा तो तब डॉक्टर को दिखाए !
७. खुश रहने की चेष्टा करे, क्योंकि आपने देखा होगा कि एक हंसमुख इंसान को जुकाम कम ही लगता है ! छोटे बच्चो को रोने न दे, क्योंकि रोने के बाद बच्चा अक्सर खांसी करता है !
८. प्रारंभिक तौर पर आयुर्वेदिक दवा Influenzinum डॉक्टर की सलाह पर लेने में भी कोई बुराई नहीं, क्योंकि इनका साइड इफेक्ट कम होता है !
९. जैसा कि एक मित्र ने कल अपने ब्लॉग पर लिखा था कि जब भीड़ वाली जगहों पर जा रहे हो तो कमीज की जेब में कुछ कपूर या फिनाइल की गोलिया रखे ! अगर अफोर्ड कर पाने की स्थिति में हो तो कमीज के कालरो अथवा गर्दन के आस पास कुरते पर इत्र छिड़ककर भी जा सकते है, क्योंकि इसकी गंध जीवाणुओ को दूर भगाती है !


और अंत में यही कहूंगा कि अपने इन महान चैनलों से तो हम कुछ नहीं कह सकते, किन्तु कोशिश कीजिये कि इन्हें जितना कम देखे, उतना बढिया ! जिस अखबार को आप पढ़ते है उसके सम्पादक को लिखित में निवेदन करे कि अखबार के प्रथम प्रष्ट पर इस तरह की भयभीत करने वाली सामग्री ना छापे, क्योंकि इससे इंसान के अन्दर डर पैदा होता है और रिसिस्टिंग पावर कम होती जाती है ! जब हमें मालूम है कि इसका कोई प्रामाणिक इलाज मौजूद नहीं, तो बस यही गुनगुनाते रहे कि
" दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है..... जिन्दगी और कुछ भी नहीं ......"

Wednesday, August 5, 2009

55 शब्दिया कहानिया : थैंक्स टु अमित गुप्ता !

अमित गुप्ता जी से मिले ५५ शब्दों वाली कहानी (55 Fiction stories) के आइडिया से प्रेरित हो कुछ कहानिया यहाँ पेश है :

माँ:- बेटा, दुनिया बेईमान है! खरीदने से पहले ठीक से देख-परख लेना!
माँ की हिदायतों के अनुरूप बेटे ने संतुष्ट हो बैल खरीद लिया! घर लौटते, रास्ते में एक तालाब पडा, बैल को पानी पिलाने लगा, पानी पीते हुए बैल पेशाब भी करने लगा, यह देख, वह चीखा, धोखा ! बैल में तो रिसाव(लीकेज) है... !

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रोज-रोज की सासू की मार से सहमी नंदिता ने पिछले दो दिनों से सावधानी पूर्वक कोई भी ऐसी गलती नहीं की कि सास को उसे मारने का बहाना मिलता ! वह खुश थी, आज मार नहीं पडी ! शाम को आटा गूंद रही थी, कि तभी पीछे से सास की लात पडी कि आटा गूंदते हिलती क्यों है.... ?

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सब उग जाता, सिर्फ नमक लेने शहर जाना पड़ता ! दोनों भाइयों ने सोचा, नमक खेत में बोकर देखते है ! महीनो हुए नमक नहीं उगा, खेत खोदकर देखा, नमक पर तिलचट्टे (ग्राशोपर्स ) लगे थे, क्रोधित हो, तिल्चट्टों पर गोलिया बरसाई ! एक तिलचट्टा उछलकर सीने पर जा बैठा, दूसरे भाई को इशारा किया, इस्स्स्स्स्स,

और दूसरे भाई ने बिना देर किये ठाँ......!

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बाहर बर्फ और कडाके की सर्दी थी, सातो भाई सोने के लिए रजाई में दुबक गए! दरवाजा तो खुला रह गया, कौन बंद करेगा, बड़े ने पूछा ! एक-एक कर हरेक ने अपने से छोटे को हुक्म सुनाया ! जब सबसे छोटे भाई को बोला गया तो वह जोर से रोने लगा ! बड़े ने कहा, अबे चुपकर, मैं अभी जंगल जाकर एक लंबा बांस काट लाता हूँ, फिर लेटे-लेटे ही बंद कर देंगे किवाड़.......!