Saturday, November 14, 2009

भेडे प्रतिकार नही करती !

हमारे इस लोकतन्त्र मे भ्रष्ठाचारियों के हौंसले किस कदर बुलंद है, इसकी एक मिशाल निर्दलीय विधायक होने के वावजूद आंटी सोनिया, हेर-फेर के भीष्म पितामह लालू और गुरुऒं के गुरु, शोरेन गुरुजी के आशिर्वाद से एक जमाने मे झारखण्ड की सत्ता के प्रमुख बने, वहां के भूतपूर्व सम्मानित मुख्यमन्त्री श्री मधु कोडा के इस एक लाईन के बयान से मिलता है, जिसमे कल ही उन्होने कहा कि यदि उन पर आरोप साबित हो गये तो वे राजनीति से सन्यास ले लेंगे। बयान भले ही बहुत छोटा सा लगता हो, मगर खुद मे बहुत से गूढ अर्थ समेटे है। मसलन पहली बात तो यह कि हमारे प्रवर्तन निदेशालय और अन्य जांच अजेंसियों द्वारा उसके पास से जुटाये गये इतने बडे हेर-फ़ेर की सामग्री और अन्य बडे-बडे दावों के वावजूद, मधु कोडा को पूरा भरोशा है कि ये ऐजेंसियां और सरकार उन पर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध नही कर पायेंगी। दूसरी बात यह कि मधु कोडा इस बात से भी आस्वस्थ हैं कि जहां तक राजनीतिज्ञ विरादरी की भ्रष्ठता का मुद्दा है, हमारा न्यायतंत्र और कानून, खास कुछ नही कर पाते । तीसरी महत्वपूर्ण बात उनके बयान से यह निकलती है कि जैसा कि उन्होने कहा कि वे राजनीति से सन्यास ले लेंगे, इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि इस देश मे आरोप सिद्ध हो जाने के बाद भी भ्रष्ठ लोग राजनीति से जुडे रहते है।

इससे भी आगे चलकर देखें तो जैसा कि हम सभी लोग इस बात से वाकिफ़ है कि इस देश मे आजतक हुए बडे-बडे घोटालो की जांच का क्या हश्र हुआ ? मसलन चारा घोटाला, सुखराम टेलीफोन घोटाला, बोफ़ोर्स घोटाला, हाल के सडक और मोबाईल लाइसेंस घोटाले, इत्यादि । ठीक उसी तरह अगर आप मधु कोडा से जुडे प्रकरण पर भी गौर करें तो यह जांच तबसे ठण्डी पडती दिख रही है, जबसे कोडा की डायरी का जिक्र आया। मतलब सीधा सा है कि बडी मछलियों को पकडने का आह्वान करने वाली केन्द्र सरकार इस घोटाले मे भी बडी मछलियों पर आंच आने की सम्भावना से, उन्हे बचाने की कवायद के चलते, इस केस को भी ठ्न्डे बस्ते मे डालने की तैयारी मे है। आश्चर्य तो तब होता है कि जब इस देश का तथाकथित बुद्धि जीवी वर्ग यह तर्क देने लगता है कि ’लौ विल टेक इट्स ओन कोर्स’ (कानून अपना काम करेगा)। अब कौन इन महापुरुषो से पूछे कि भाई आप किस लौ(कानून) की बात कर रहे है? उस कानून की जो सिर्फ़ एक कमजोर किस्म के नागरिक पर लागू होता है, किसी बलशाली पर नही ? अन्य शब्दो मे कहुं तो गडरिये इस बात को बखूबी जानते है कि स्वभाव से भॆडे प्रतिकार नही किया करती, और कभी कर भी लेती हैं तो भी झुण्ड की साथी भेडो पर ही अपना गुस्सा निकालती है, गडरिये को कोई नुकशान नही पहुचाती और कभी अगर झुण्ड मे से कोई नरभेड तंग आकर प्रतिकार करने भी लगे, तो उसे गडरिये द्वारा मरवा दिया जाता है। अन्त मे बस यही कहुगा कि जागो !!

Monday, October 26, 2009

लघु कथा- वह एक नर्स थी !

डा० मार्क, डा० श्रीवास्तव के एक अजीज मित्र थे, और डा० श्रीवास्तव के ही आमत्रण पर अमेरिका से भारत आये थे। डा० मार्क से डा० श्रीवास्तव की जान पहचान तब हुई थी, जब डा० श्रीवास्तव अमेरिका मे डाक्टरी कोर्स कर रहे थे। कोर्स खत्म होने के उपरान्त देश सेवा और खासकर ग्रामीण समाज की सेवा का जज्बा डा० श्रीवास्तव को स्वदेश खींच लाया था। यहां लौटकर उन्होने सरकारी नौकरी ज्वाइन की और राज्य सरकार के दूर-दराज के ग्रामीण अस्पतालों मे मरीजो को अपनी सेवायें प्रदान करने लगे। उस वक्त तक उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश से अलग राज्य नही था, अत: डा० श्रीवास्तव का तबाद्ला पहाडो की तलहटी मे बसे उस कस्बे के एक सरकारी अस्पताल मे हो गया था, जिसमे केरल की रहने वाली जैनी बतौर नर्स पिछले चार-पांच सालो से कार्यरत थी।

हालांकि तब मै बहुत छोटा था, और शायद छठी कक्षा में पढता था। मुझे याद है कि सुन्दर और चुलबुले किस्म की जैनी स्वभाव से बहुत मिलनसार और भावनात्मक तौर पर दिल खोलकर दूसरों की मदद करने वाली थी। वह भारत के केरल प्रान्त के कोच्चि से करीब साठ किलोमीटर दूर अथीरापल्ली इलाके की मूल निवासी थी, और वाईएमसीए दिल्ली से प्रशिक्षित थी। उस कस्बे और आस-पास के गांवो के जरुरतमंद लोगो की मदद के लिये वह हमेशा तत्पर रहती थी। अस्पताल के आस-पास के इलाके मे और उस से सठे आस-पास के गांवो मे जब भी कोई प्रसव का इमरजेंसी केस होता, जैनी बिना देरी किये मदद के लिये वहां पहुंच जाती। धीरे-धीरे जैनी उस पूरे इलाके मे एक लोकप्रिय हस्ती बन गई थी। वह किसी से भी अपनी सेवाओं का कोई शुल्क नही लेती थी, अत: इलाके के जिन लोगो के यहां प्रसव के वक्त जैनी अपनी सेवायें देती, वे लोग उस वक्त जैनी को अपनी हैसियत के मुताविक इक्कीस अथवा इक्कावन रुपये तिलक के तौर पर भेंट और एक लड्डू का डब्बा पकडाने मे अपनी शान समझते थे। कम हिन्दी जानने वाली जैनी मरीज को अपने हिन्दी के रटे-रटाये दो वाक्य कि तुम चिन्ता नही करते, गौड सब ठीक करता जी , और फिर सब ठीक-ठाक निपट जाने पर खुशी-खुशी शुक्रिया और थैंकयू बोल लौट आती।

डा० मार्क को डा० श्रीवास्तव के पास आये तीन रोज हो गये थे कि अचानक डा० श्रीवास्तव को जिला मुख्यालय से सी एम ओ (चीफ़ मेडिकल आफिसर) का फोन आया और उन्हे एक जरूरी मीटिंग के लिये राज्य मुख्यालय, लखनऊ तलब किया गया। डा० श्रीवास्तव ने डा० मार्क की आवाभगत का भार जेनी के ऊपर डालते हुए, उसे कुछ जरूरी निर्देश दे, लखनऊ के लिये प्रस्थान किया। जैनी, मार्क के साथ व्यस्थ हो गई। चुंकि जैनी उस इलाके मे पिछ्ले चार-पांच सालो से रह रही थी, अत: वहां के कुछ जाने माने दर्शनीय इलाकों मे डा० मार्क को घुमाने ले गई। मार्क जिज्ञासू था और जैनी ज्ञाता, दोनो को एक दूसरे से जानकारी लेने और उसे समझने मे एक असीम किस्म का आनंद प्राप्त होता था। और इस समझने-समझाने के चक्कर मे कब दोनो एक दूसरे के इतने नजदीक आ गये , इसका अह्सास दोनो को ही तब हुआ, जब डा० मार्क के प्रस्थान का समय नजदीक आया। “मै तुम्हे छोड्कर नही जा सकता” डा० मार्क ने कहा। “मै भी तुम्हारे बगैर नही रह सकती” जैनी ने धीरे से गम्भीर स्वर मे कहा। “एक साथ रहने के लिये हममे से किसी एक को अपना देश छोडना पडेगा और मुझे तुम्हारा देश पसन्द है “ डा० मार्क ने कुछ सोचते हुए कहा ।

और फिर कुछ दिनो की छुट्टी लेकर जैनी और मार्क ने शहर आकर एक चर्च मे शादी रचा ली। शादी के बाद दोनो ही बहुत खुश थे, उनकी इस शादी से बस अगर खुश नही थे तो सिर्फ़ उस इलाके के लोग। न जाने उन्हे क्यो यह एक गोरे और एक काले का मेल पच नही रहा था। दो साल तक तो सब कुछ ठीक-ठाक ही चला, इस दर्मियान जब डा० श्रीवास्तव का वहां से तवाद्ला हो गया और महिनों तक जब रिक्त स्थान के लिये कोई डाक्टर उस अस्पताल मे नही आया तो डा० मार्क ही स्थानीय मरीजो की चिकित्सकीय मदद करते। और फिर वह हो गया जिसका अन्देशा कुछ स्थानीय लोग पहले ही जतला चुके थे।

जैनी करीब पांच-छ: माह के गर्भ से थी, काफ़ी दिनो से बात-बात पर जेनी और डा० मार्क्स के बीच खट-पट चल रही थी, और उनकी बातों से ऐसा लगता था कि उनके बीच गलत फहमी की कोई दीवार खडी हो गई थी। उस दिन सुबह-सबेरे भी उनकी किसी बात पर बहस हो गई थी। उनकी बातों से लगता था कि मानो डा० मार्क्स जेनी से नर्स की नौकरी छोड्ने की बात कह रहा था। जेनी गुस्से मे डा० मार्क को कह रही थी “आई हैडन्ट एक्स्पेक्टेड यू टु से इट वज औल राइट फ़ौर अ मैन टु गो आउट ऐन्ड अर्न हिज लिविंग, बट नौट अ ओमन” (मैने तुमसे यह उम्मीद नही की थी, आदमी के लिये तो बाहर जाकर नौकरी करना ठीक है, लेकिन एक औरत के लिये नही ) डा० मार्क ने भी उसी अन्दाज मे फिर जबाब दिया था “आइ डिडन्ट से इट. ऐज फार ऐज आइ एम कन्सर्न्ड,वोमन कैन डू व्हट एवर दे वान्ट” ( अर्थात मैने यह तो नही कहा। जहा तक मेरा सवाल है, औरत वह सब कर सकती है जो वह करना चाहे ) फिर ज्यों ही मार्क अपना बैग उठा चलने को हुआ, जेनी ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा था “ व्हेन आर यू कमिंग बैक टु इन्डिया मार्क ?” (तुम वापस भारत कब आ रहे हो मार्क्स ?), डा० मार्क ने हल्के स्वर मे बुद-बुदाते हुए छोटा सा जबाब दिया था ’आई डोन्ट नो’ (अर्थात मुझे नही मालूम) ।

डा० मार्क के अचानक जैनी को ऐसे वक्त पर जिस वक्त पर कि जैनी को उसके सहारे की सख्त जरुरत थी,ऐसी परिस्थितियों मे इस तरह छोड्कर चले जाने से, वह टूटकर रह गई थी। नतीजन दिन प्रतिदिन उसकी हालत गिरती चली गई। और फिर वह एक दिन भी आया जब कस्बे के बीचों-बीच स्थित अस्पताल के ठीक बगल पर बने उस मकान की उपरी मंजिल से, जिस पर जैनी पिछले पांच सालो से किराए पर रह रही थी, रुक-रुककर असहाय अबला के छटपटाने की कराहे और दर्द भरी चीखे उस सुनशान कस्बे को हिलाने लगी। लेकिन इलाके के जिन लोगो की उसने लग्न और मेह्नत से पिछले छह सालो से सेवा की थी, जो लोग कल तक उसे जैनीजी-जैनीजी कहकर पुकारते थे, वहीं आज मदद करना तो दूर, उधर से गुजरते हुए जैनी पर फब्तियां कसने से तनिक भी नही हिचकिचा रहे थे। उसकी बदकिस्मती देखो कि हाल ही में उस अस्पताल में नया आया डाक्टर भी हफ्ते रोज की छुट्टी पर अपने गाँव गोरखपुर गया था। कस्बे में एक छोटा सा निजी चिकित्सालय भी था, मगर जैनी को वहाँ पहुंचाता कौन ? और हद तो तब हो गई जब ६५ वर्षीय मकान मालकिन, जिसे जैनी रमा चाची कह कर पुकारती थी, उसके दरवाजे के समीप गई और जब जैनी अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, उस रमा चाची से मदद की गुहार लगा रही थी, तभी उसके यह कटु बोल जैनी के कानो में पड़े कि रांड, चली थी अंग्रेज बनने, अब मर, सड यहीं पर। यह सुनकर जैनी करीब १५ मिनट के लिए अपने ओठों को चबाकर कसकर बंद करके एकदम खामोश सी हो गई थी। मानो इस बीच सोच रही हो कि इन लोगो को, जिन्हें वह अपना समझकर, सुख-दुःख में इनकी इतनी सेवा करती रही, क्या उनसे उसे इसी सिले की उम्मीद थी? माना कि डा० मार्क के साथ उसका शादी रचाना लोगो को पचा न हो, लेकिन वह उसका अपना, अपनी निजी जिन्दगी के बारे में लिया गया फैसला था, उसे सही या गलत ठहराने वाले ये लोग होते कौन है ?

किसी अनजान भय की लकीरे उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई देती थी । लोग अपने घरो-गलियों में तरह-तरह की बाते करते रहे, मगर एक भी माई का लाल ऐसा न निकला जो उसकी मदद के लिए आगे आ सके। रात करीब एक डेड बजे तक जैनी की दर्द भरी कराहे वातावरण में गूंजती रही, और फिर कुछ पल बाद एक नन्हे मेहमान की रूंधन भी वातावरण में गूंजी । मगर जब कुछ जिज्ञासू तमाशबीन सुबह जैनी की देहरी पर अन्दर झाँकने के लिए पहुचे तो जैनी और उसका नन्हा मेहमान बिस्तर पर शांत सो चुके थे, सदा के लिए !

Tuesday, October 13, 2009

चोरो के पैसो पर ऐश करता एक देश !

ऐसा अनुमान है कि १९४७ में आजादी के तुंरत बाद से अब तक हम भारतीय, जिनमे हमारे नेता, अफसर और कुछ व्यावसायिक घराने शामिल है, अपने देश का धन चुराकर तकरीबन बारह खरब रूपये अकेले सिर्फ स्विस बैंक के खातो में जमा कर चुके है ! यूँ तो समय-समय पर इस देश में यह मांग उठती रही है कि विदेशी बैंको में पडा इस देश का काला धन वापस देश में लाया जाए और इस देश के विकास कार्यो में लगे, मगर यह बात भी किसी से छुपी नहीं कि हम लोग और हमारी सरकारे इस दिशा में कितनी ईमानदारी से पहल करने की कोशिश करते है ! अभी हाल के चुनावों से पहले भी यह मुद्दा खूब उछला लेकिन उसके बाद क्या हुआ ? वही ढाक के तीन पात ! सबके पास रटा-रटाया एक ही एक्सक्यूज होता है कि स्विस राष्ट्रीय बैंक अपनी गुप्त नीति के तहत इन खातो के आंकडे मुहैया नहीं करा सकती ! दुनिया भर में लोगो के बढ़ते विरोध के बाद स्विस बैंकर एसोशियेसन ने एक नया सगूफा छोड़ दिया है ! अब वे कहते है कि इस बर्ष दिसम्बर माह से वे खातेदार का अता-पता बताये बगैर जिन देशो के साथ उनकी दोहरी कर संधि है उन देशो के खाता धारियों की आय पर वे टैक्स लगाकर उस पैसे को उस देश को दे देंगे जिसके ये खाते है ! अकेले अमेरिका के खाताधारियों के ही स्विस बैंक में ४४५० खाते इस वक्त है !

कितनी हास्यास्पद बात है कि हम लोग अपने देश से धन चोरी करके ले जाकर एक विदेशी देश के हवाले कर देते है और वह मजे में बैठकर हमारे उस चोरी के माल से अर्जित कमाई से ही मोटा सेठ हुए जा रहा है और ऐश कर रहा है ! आइये एक नजर कुछ उन आंकडो पर डाले !
२००६ में प्रकाशित कुछ आंकडो के हिसाब से स्विस बैंक में शीर्ष पांच चोरो में से भारत के चोर सबसे ऊपर थे :

स्विट्जरलैंड में जमा शीर्ष पांच देशो के खाताधारियों का धन :

India-------$1456 billion (यानी करीब सात खरब तीस अरब रूपये)
Russia------$ 470 billion
UK----------$ 390 billion
Ukraine-----$ 100 billion
China-------$ 96 billion


यानी भारत से ही करीब सात खरब तीस अरब रूपये खातेदारों द्बारा स्विस खाते में जमा थे, और ८ % साधारण ब्याज की दर से भी स्वीटजरलैंड साल के ५६ अरब रूपये सिर्फ हमारे चोरो द्बारा जमा किये गए काले धन में से ही कमा लेता है ! तो अब आप ही बतावो कि जब बैठे -बिठाये उनकी इतनी कमाई हो जाती है तो उन्हें और कुछ करने की जरुरत क्या है ? हम दुनिया में तरह-तरह के अपराधो की बात करते है और उन देशो पर पश्चिमी राष्ट्र कारवाही करने की कोशिशे भी करते रहते है जो इन अपराधो को बढावा देते है ! मगर जो एक देश खुले आम आर्थिक अपराधो को इस तरह बढावा दे रहा है, उसके खिलाप कार्यवाही की कोई बात नहीं करता !

Saturday, September 19, 2009

लघु कथा- और ताऊ मर गया !

सन् ८७-८८ की बात है, महानगरी में ताऊ ( दोस्तों द्वारा दिया गया उपनाम ) की पहली नौकरी लगी थी। सुदूर गाँव से चलते वक्त ताऊ को उसके दोस्तों और परिवार के छोटे बडो ने महानगरी के बारे में काफ़ी हिदायते दी थी; मसलन सड़क ढंग से पार करना, पैसे/पर्स जेब में संभाल के रखना, किसी से झगडा मत करना, इत्यादि -इत्यादि ।

धोखे ही धोखे है चिरागों की चकाचौंध में,
दर्रे-दर्रे पर वहाँ कई राज छुपे बैठे है !
हर चीज़ को ज़रा खुली आँखों से देखना,
कबूतर के चेहरे में बाज़ छुपे बैठे है !!

ताऊ का क्रूरता से तो सामना उसी वक्त हो गया था, जब अंतराष्ट्रीय बस अड्डे पर रोडवेज से उतर उसने नारायणा के लिए डीटीसी की मुद्रिका बस पकड़ी थी। हुआ यह कि उसने कंक्टर से पूछना चाहा कि भाई साहब ,क्या यह बस नारायणा जायेगी, तो तपाक से जबाब मिला था "हौर तन्ने के यह मारे घर जात्ती दिख री सै, बोर्ड नि दिख रिया कै" वो तो भला हो उस दूसरे सवारी का जिसने कहा, हां जायेगी, चढ़ जा।

कुछ दिन बाद लाजपत नगर में ताऊ को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में एक ७५०/- रूपये प्रतिमाह की नौकरी मिल गई। मालिक था एक खूसट बनिया । कर्मचारियो का शोषण कैसे किया जाता है, कोई उनसे सीखे । महानगरी में ताऊ कुछ ही दिन में एक कोल्हू का बैल बन के रह गया । दिन भर लाला ऑफिस में काम करवाता और शाम होते ही कहता कि आज तुझे ट्रक के साथ मुज़फ्फरनगर जाना है, वहां पर लाला को एक पाइप फैक्ट्री लगाने का ठेका मिला था। और आखिर ताऊ के लिए एक मनहूस दिन आया। लाला ने उसे सुबह बिक्री-कर विभाग जाने और वहा से सी फार्म लाने का हुक्म सुनाया। साथ ही १०० रूपये( पचास-पचास के दो नोट) भी दिए और कहा कि यह बाबू को दे देना, साथ ही हिदायत भी दी कि पहले सिर्फ़ एक पचास का नोट ही पकडाना, नही माने तो तब पचास और दे देना। बिक्री कर विभाग पहुच कर ताऊ ने वही किया जो लाला ने सिखा कर भेजा था, लेकिन बाबू नही माना, फ़िर उसने पूरे १०० रूपये और ऍप्लिकेशन फार्म बाबू को दिए और सी फार्म देने को कहा। बाबू ने १०० रूपये जेब में रखे और ताऊ को ५ सी फार्म पकड़ाकर बोला, अन्दर साहब से साइन करवा ले। ताऊ फार्म लेकर अन्दर बैठे उस बाबू के पास गया। उसने पुछा क्या है ? ताऊ ने कहा " साब ये सी-फार्म साइन करने थे ", बाबू बोला कितने लाया है? ताऊ बोला, ५ फार्म । बाबू चिड़ते हुए और हाथ का अंगूठा ऊँगली पर रगड़ते हुए बोला " अरे वो कितने लाया है ?" ताऊ उसका इशारा समझ कर बोला, साब १०० लाया था, मगर जिन साब ने ये फार्म दिए, उन्होंने ले लिए। बाबू बोला "तो ठीक है साइन भी उसी से करवाले, मेरे पास क्यो आया ? "..... ताऊ हडबडाकर उस बाबू की सीट की तरफ़ लपका जिसने फार्म दिए थे, मगर बाबू सीट से गायब था ! ताऊ अन्दर वाले बाबू के पास जाकर इंतज़ार करने लगा। आधा घंटा बीत गया, मगर वह नही लौटा। अन्दर वाला बाबू बोला, चल १००/- रूपये निकाल, मैं साइन कर देता हू। ताऊ क्या करता, अपने पैसो में से १००/- रूपये उसको दिए, उसने साइन किया और कहा कि चपरासी से स्टैंप लगा ले।

ताऊ चपरासी के पास गया, चपरासी ने स्टैंप लगायी और २० रूपये मागने लगा, ताऊ ने किसी तरह १० रूपये में जान छुडाई। चपरासी बोला अरे साब! यहाँ एक फार्म पे स्टैंप लगाने के ५ रुपए होते है, सो आपके २५ रूपये बनते थे, मैं तो २० ही मांग रहा था । चलो खैर, मानो वह ताऊ के ऊपर एहसान कर रहा हो। ऑफिस पहुंचकर ताऊ ने फार्म लाला को दिए, लाला बोला रूपये ५० ही दिए न ? ताऊ इस डर से की कही लाला नौकरी से न निकाल दे, बोला नही साब, १०० रूपये लिए उसने ! और लग गया सीधा सीधा ११०/- रूपये का चूना ताऊ पर ! रात को लाला ने फिर ताऊ को सामान के साथ मुज्ज़फरनगर जाने का हुक्म सुनाया। ताऊ ट्रक लेकर मुज्ज़फरनगर के लिए चल पड़ा। ट्रक में सेरामिक ईंट लदी थी, जबकि बिल में लाला ने लिखवाया था गलवानाइजिंग प्लांट एक्सेसरीज। बागपत चुंगी पर जब ड्राईवर फार्म और बिल लेकर पास बनाने गया, तो उसने फार्म भरने वाले से फार्म पर ईंट लिखा दिया।

फार्म और बिल में अंतर्विरोध देख चुंगी वाले बाबु की बांछे खिल उठी। उसने सारे कागजाद अपने टेबल की दराज में रख दिए और चाय पीने लगा। एक घंटा गुजरा, दो घंटे गुजरे, मगर कागजाद नही मिले। बाबू ने ड्राईवर से ५००/- रुपयों की मांग की थी, रात के ग्यारह बज चुके थे। ड्राईवर लोगो के लिए तो मानो यह रोज की दिनचर्या थी। ड्राईवर पास के ढाबे में खाना खाने चला गया । ताऊ उस उमस भरी गर्मी में ट्रक में बैठा एक अखबार के टुकड़े से हवा कर अपने व्यथित मन को शांत करने में लगा रहा, भूखा-प्यासा! ड्राईवर और क्लीनर खाना खा कर लौटे तो बाबू अंदर की बेंच पर खर्राटे भर रहा था। होते-करते सुबह के तीन बज गए। ड्राईवर ने हिम्मत कर बाबू को उठाया। बाबू ड्राईवर को लगभग गालिया देता हुआ उठा और बोला, यह कंपनी मुझे संदेहास्पद लगती है, इसके सारे बिल पहले मेरे पास लावो, फिर गाड़ी छोडूंगा। ड्राईवर वापस ताऊ के पास आया और उसे एक कहानी समझाई और बाबू के पास भेजा। ताऊ हाथ जोड़कर बाबू के पास पंहुचा और उससे कहा, साब मेरी अभी-अभी नौकरी लगी है, यह मेरा पहला जॉब है, मुझे एक्सपीरिएंस नही है, इसलिए फार्म में यह गलती कर गया। मगर साब, लाला मेरे को नौकरी से निकाल देगा । प्लीज़, कुछ करे ! बाबू को मानो दया आ गई हो , बोला अच्छा तेरी बात पर मै गाड़ी छोड़ रहा हूँ, मगर बर्रिएर वाले को २०० रूपये दे देना ! ताऊ मन ही मन सोच रहा था कि घूस खाने का यह भी एक अच्छा तरीका है। क्या करता, बाप बोलकर बैरियर पर बैठे शख्स को २०० रूपये दिए।

सुबह के चार बज चुके थे, ट्रक अपने गंतव्य की और निकल पड़ा। ताऊ सोच रहा था की ३१ दिन काम करने के ७५० रूपये मिलेंगे और ३६० रूपये अब तक वह अपने जेब से लगा चुका, यानि पहली पगार सिर्फ़ ३९० रूपये। चूँकि यह गलती सीधे-सीधे लाला की ही थी , जिसने ड्राइवर को खुद ही ईंट लिखवाने को कहा था! ताऊ झूट नहीं बोल सकता था क्योंकि वह उसने अपने सस्कारों में नहीं पाया था । मगर उसकी जेब पर घर से लाये जो भी पैसे थे वह ख़त्म हो चुके थे। लाला वेतन तो अभी देगा नहीं, झूठ वह बोल सकता नहीं कि चुंगी वाले ने ५००/- रूपये ही लिए ! अब क्या करे ? बड़ी दिमागी कशमकश के बाद उसने दृढ निश्चय लिया, ट्रक ड्राइवर से कुछ खुसफुसाहट की, उसे अपनी सारी मजबूरी बयान की । ड्राइवर नरम दिल हो गया और गाडी रोक, ताऊ से यह कहा कि अगर लाला तुम्हे फ़ोन पर आने को कहे तो तुम भी यही कहना कि हां, बाबू १०००/- रूपये मांग रहा है, पास के पी सी ओ पर लाला को फोन करने गया,और बोला कि गाडी पकड़ ली गई है, और बाबू १०००/- रूपये मांग रहा है। लाला ने पूछा, तुम्हारे पास इतने पैसे है ? ड्राइवर बोला हाँ ! और इस तरह ताऊ मर गया, हमेशा के लिए, इस महानगरी में !

Sunday, September 13, 2009

गरीब-गुरबों की भाषा का दिवस !

बडी खुशी की बात है कि आज हमारा देश ’राष्ट्र भाषा हिन्दी दिवस’ इस खास दिन पर मना रहा है । मगर वास्तविक तौर पर इस राष्ट्र भाषा की स्थिति क्या है, यह बताने की जरुरत नही। तारीफ़ करनी होगी उन अंग्रेजो की, जिन्होने न सिर्फ़ दुनिया को गुलामी की जंजीरो मे जकडा, अपितु हर एक इन्सान पर गुलामियत की एक ऐसी अनोखी छाप भी छोड दी जो, अब शायद मिटाये ना मिटे। उनकी वह भाषा अब सभ्य और अमीर कहलाने वाले लोगो की भाषा बन चुकी है। हमारे इस भारत देश मे ही देख लीजिये कि हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी आज एक गरीब-गुरबे की भाषा बन कर रह गई है। भाषा ने दिमागी तौर पर भी इन्सान-इन्सान मे अमीर-गरीब का एक ऐसा खासा अन्तर खडा कर दिया है कि यहां आपके मुख से निकले शुरुआती शब्द आपकी पह्चान और समाज मे आपकी हैसियत का माप-दण्ड बन जाते है। इसे एक उदाहरण के तौर पर इस तरह से देख सकते है कि मान लीजिये, आप देश के किसी अजनवी शहर मे जाते है, और एक होटल मे कमरा पूछने हेतु उसके स्वागत कक्ष मे पहुचकर कमरे और किराये के बारे मे जानकारी लेते है। अगर आपने अपना सुरुआती परिचय हिन्दी मे देकर पूछताछ की तो आप पायेंगे कि आपके साथ उस होटल के कर्मचारियों का व्यवहार उतना गर्मजोशी भरा नही है, जितना कि तब होता, यदि आपने अंग्रेजी मे पूछताछ की होती ।


मै यह एक भाषायी मानसिकता का अन्तर बता रहा हूं, जो हमारे बीच है। दक्षिण के राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु मे चले जाइये, आपको अंग्रेजी और हिन्दी की मह्ता मे क्या फर्क है, एकदम साफ मह्सूस हो जायेगा। ऐसा भी नही है कि सारा दक्षिण भारत ही हिन्दी से नफ़रत करता हो , कुछ लोग इसके अपवाद भी है, जो अपनी इस राष्ट्र भाषा से लगाव भी रखते है, ऐसे ही लोगो मे यहां इस चिठठा जगत मे अनेकों सम्मानित चिठ्ठाकार भी है, जो दक्षिण से सम्बद्ध होते हुए भी, जिन्हे हिन्दी से प्रेम है, कुछ उम्र दराज दक्षिण भारतीय चिट्ठाकारो का हिन्दी प्रेम मुझे नितांत सराह्नीय लगा ।

खैर, इन सब बातों से आप सभी लोग भी भली भांति परिचित है, इसलिये इस बारे मे अधिक कुछ नही कहुंगा ! जो मै आज के इस सुअवसर पर यहां कहना चाहता हूं, वह यह कि आज हम हिन्दी के हजारों चिठ्ठाकार यहां अपनी-अपनी मौलिक, समसामयिक, राजनैतिक, आर्थिक और मनोरंजनात्मक रचनाओ और विचारो को इस प्लेटफार्म पर एक दूसरे से न सिर्फ़ बांटते है अपितु एक दूसरे के सुख-दुख मे भी भागीदार बनते जा रहे है । और यह सब सम्भव हो पाया है उन लोगो और सस्थाओं के अथक प्रयास से, जिन्होने हमे यहां हिन्दी मे लेखन की सुविधा उपलब्ध कराई ।

तो आईये, आज हम सब "गरीब" हिन्दी चिठ्ठाकार मिलकर इस खास अवसर पर और कुछ नही तो उन सब लोगो और संस्थाओ का अभिनन्दन एवं हार्दिक धन्यवाद करें, जिन्होने अपने अथक प्रयास से हमारे लिये हिन्दी लेखन को आसान बनाने मे अपना मह्त्वपूर्ण योगदान दिया ।
तज दिया सबल ने, निर्बल के मुख है डेरा,
हिन्दी हूँ मै, वतन है हिन्दोस्तां मेरा !!
जय हिन्द !

Tuesday, September 8, 2009

लघुकथा- कमीना शेर !

अभी शादी हुए मात्र चार ही साल तो हुए थे! बहुत खुश रहती थी ऋचा अपने उस भरे पूरे परिवार के साथ ! पति के साथ ही उसी दफ्तर में नौकरी करती थी! बेटा जब तीन महीने का था, दोनों बेफिक्र हो उसे उसके दादा- दादी के पास छोड़ उसी बाइक में सवार हो ऑफिस आते-जाते, जो ऋचा को उसके मामा ने शादी पर उपहार में दी थी! ऋचा के जेठ-जेठानी भी दोनों बैक मैं नौकरी करते थे, घर में हर तरफ खुशहाली थी! मगर अचानक एक दिन न जाने उनकी खुशहाली को किसकी नजर लग गई ! ऋचा फिर एक बार उम्मीद से थी, और तबियत ढीली होने की वजह से उस दिन छुट्टी कर गई थी ! दीपक सुबह अकेले ही ऑफिस गया था! और शाम को लौटते वक्त ब्लू लाइन बस रूपी काल का ग्रास बन गया!

अशक्त ऋचा बहुत तड़पी! बार-बार सिर पीटकर किस्मत को यही कोसती रही कि मैं क्यों नहीं आज दीपक संग दफ्तर गई ! खैर, समय बलवान होता है, और उसके समक्ष सभी को झुकना पड़ता है! कुछ दिनों के रोने पीटने के बाद घर के हालात कुछ सामान्य तो हुए, मगर अमूमन जैसा कि देखने में आता है, हवाए अब बदली-बदली सी थी!सास-ससुर और घर के अन्य सदस्यों का बर्ताव एकदम अलग था, ऋचा के साथ ! तंग आकार ऋचा उस घर को सदा के लिए छोड़, पिता के घर वापस आ गई !

दोनों बच्चो, प्रतीक और दीपिका को नाना-नानी की देखरेख में छोड़ उसने फिर से अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली ! लेकिन बूढे माँ-बाप दिन रात इसी चिंता में डूबे थे कि हमारे बाद ऋचा किस तरह इतना लंबा जीवन सफ़र तय करेगी? काफी सोच विचार कर, और गहमा-गहमी के बाद उन्होंने ऋचा को दोबारा शादी के लिए राजी कर लिया था ! अखबारों में इश्तिहार दिए गए, लेकिन कोई सुयोग्य रिश्ता नहीं मिला! फिर एक दिन शाम को कालोनी के पार्क में बैठे-बैठे मोहल्ले के एक अन्य वृद्ध सज्जन ने उन्हें अपनी जान-पहचान में एक रिश्ता बताया!

साहिबाबाद के एक स्टील प्लांट में मैनेजर, मुकेश सिंह एक नहीं, अपितु दो बार का विधुर था ! पहली शादी के चंद रोज के बाद कुल्लू में हनीमून के दौरान ही एक दुर्घटना में पत्नी को खो देने के बाद, उसने दूसरी शादी की थी, मगर प्रसव के दौरान वह भी चल बसी ! माता-पिता द्बारा प्रारम्भिक जांच पड़ताल के बाद मुकेश और ऋचा की मुलाकात कराई गई, और दोनों ने एक दूसरे को पसंद कर लिया! मुकेश को ऋचा की सारी शर्ते भी मंजूर थी! अतः साधे ढंग से दोनों की शादी करा दी गई! प्रारम्भिक छह महीनो तक तो ऋचा ने अपने दोनों बच्चे, सात साल के प्रतीक और तीन साल की ऋचा को माँ-बाप के पास ही छोडे रखा, लेकिन मुकेश की बच्चो के प्रति आत्मीयता और लगाव को देख, अच्छी तरह से आस्वस्थ हो जाने के बाद, जुलाई में अपने घर के नजदीकी पब्लिक स्कूल में दोनों का दाखिला करवा कर अपने साथ ले आई थी! करीब दो महीने तो सब कुछ सामान्य चला, बच्चे भी नए घर में काफी खुश थे!

मगर जंगल के उस नए राजा के दीमाग में तो कुछ और ही पक रहा था! चूँकि शेरनी ने उससे पहले ही यह शर्त मनवा ली थी कि उसके इन दो बच्चो के अलावा तीसरा नही ! मगर जंगल का वह कमीना राजा कैसे दूसरे शेर के बच्चो को अपना बच्चा मान लेता! उसे तो अपना बंश आगे बढाने की चिंता खाए जा रही थी! शैतानी दिमाग झाडियों में पड़े-पड़े तरकीबे सोचने में लगा था! और फिर उसके दिमाग ने वह शैतानी चाल चलने की सोच डाली जिसकी शेरनी ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी! कमीने शेर को तो बस शेरनी को किसी तरह आगे संतान उत्पत्ति के लिए विवश करना था! स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चे सीधे क्रेच में जाते थे, और शाम को जब ऋचा घर लौटती तो उन्हें भी साथ घर ले आती ! एक दिन जब शेरनी भोजन की तलाश में गई थी, मौका पाकर शेर ने दोपहर के समय ही बच्चो को क्रेच से उठा लिया और फिर ...................! पुलिस ने नाले से दोनों बच्चो के अवशेष निकाल पोस्ट मॉर्टम के लिए भेज दिए थे ! पुलिस की शक्ति बरतने के बाद मुकेश ने भी सच्चाई उगल दी थी, और जड़-पत्थर बनी ऋचा सोच रही थी कि एक शिक्षित और सभ्य सा दिखने वाला इंसान भी कहां तक अपने कमीनेपन की हदे लाँघ देता है !

घर में अगर कुछ बचा-खुचा भोजन है तो दे दे माई !

इ-मेल के मार्फ़त यह मेसेज मुझे अभी प्राप्त हुआ ! मुझे भी नहीं मालूम कि इसको मैं अगर अपने ब्लॉग पर डालू तो क्या किसी के लिए लाभदायक सिद्ध होगा ! लेकिन हाँ , अगर यहाँ पोस्ट करने से यह सचमुच किसी के काम आता है तो मैं खुद को धन्य समझूंगा !
If you have a function/party at your home and if there is excess food available at the end, don't hesitate to call 1098 (only in India) - child helpline. They will come and collect the food.

Please circulate this message which can help feed many children.

PLEASE, DON'T BREAK THIS CHAIN....

"Helping hands are better than Praying Lips".

Pass this to all whom you know and whom you dont know as well.
फोटो को अगर बड़े आकर में देखना चाहते हो तो कृपया फोटो पर किल्क करे !