जब कभी इंसान अपने फुरसत के पलो को जी रहा होता है और एक सरसरी निगाह अपने गुजरे वक्त पर डालता है तो उसे महसूस होता है कि समय कितनी जल्दी पंख लगाकर उड़ गया । वह उन लम्हों को याद करता है जो उसकी जीवनचर्या पर एक अमिट छाप छोड़ जाते है । और कुछ ख़ास किस्म के गुजरे लम्हे तब अक्सर याद आ जाते है जब उस आतीत में घटी घटना से मिलता जुलता कोई नज़ारा अचानक आँखों के सामने आ जाए । ऐंसा ही कुछ ख़ास मेरे साथ भी घटित हुआ था, या यह कहना उचित होगा कि मेरी आँखों के आगे घटित हुआ था। शायद गुजरे साल की 'आखिरी संध्या' शब्द प्रयोग करना ठीक नही है, अपितु नए साल की 'पूर्व संध्या' शब्द एक सकारात्मक सोच की ओर ध्यान अग्रसर करता है । आने वाले साल की ओर एक आशावादी दृष्टीकोण परिलक्षित करता है । अभी कुछ दिन पहले, नए साल की पूर्व संध्या पर दफ्तर से घर लौट रहा था तो सड़क पर दो मोटरसाईकिल सवारों के, नशे में धुत होकर मचाये जा रहे हुडदंग ने मुझे मेरे अतीत में लौटने पर मजबूर कर दिया ।
३१ दिसम्बर, २००२ की शाम, हर नए साल की पूर्व शाम की तरह ही एक ख़ास शाम थी, २००३ के आगमन का वेसब्री से, जश्न मनाकर इंतज़ार किया जा रहा था । मैं ओर मेरी कम्पनी के विदेश स्थित कार्यालय के तीन इंजीनियर शाम करीब ५ बजे, जेट एयरवेज की उड़ान से बेल्लारी, कर्नाटक में जेटी के निर्माणाधीन विधुत प्लांट से कुछ जरुरी कार्य निपटाकर दिल्ली स्थित अपने ऑफिस पहुंचे थे । परम्परा के हिसाब से 'न्यू इयर इव' मनाने की पूरी तयारी हो चुकी थी ओर हमारे दफ्तर के सभी मित्रगण बस हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे । शाम करीब करीब सवा छः बजे, कॉकटेल पार्टी शुरु हुई ओर गपो ही गपो में रात के कब नौ बज गए थे, पता ही नही चला। नौ सवा नौ के बीच मैं घर के लिए निकला था । मुझे ध्यान था कि मैंने बंगलोर से विमान में बैठते वक्त फोन पर अपने बच्चो से प्रोमिस किया था कि मैं जल्दी घर पहुँच जाऊंगा, और साथ ही अपनी पत्नी से उसे रात का खाना न बनाने को कहा था । मैंने कहा था कि ऑफिस से घर लौटते वक्त मैं किसी रेस्टोरेंट अथवा ढाबे से खाना पैक करवाकर ले आऊंगा ।
दफ्तर से निकल कर जब मुख्य सड़क पर पहुँचा तो पूरा शहर कोहरे की एक पतली चादर ओढ़ चुका था । मण्डी हाउस का गोल चक्कर पार करते ही ट्रैफिक रेंगने लगा था । सड़क पर वाहनों का एक लंबा जाम लग गया था, और कोहरे की वजह से सड़क पर दृश्यता भी कम हो गई थी । मैं यधपि घर पहुँचने और बच्चो के साथ न्यू इयर इव मनाने की जल्दी में था, मगर फिर भी सड़क पर बिना किसी हडबडाहट के आराम से ड्राइव कर रहा था । वैसे तो मैं कभी भी पीकर ड्राइव करना पसंद ही नही करता, मगर उस दिन एक खास अवसर होने और कंपनी के कुछ मित्रो द्वारा जोर जबरदस्ती करने पर थोड़ा पी भी गया था, इसलिए भी ड्राइव में पूरी सावधानी बरत रहा था । मण्डी हाउस से मुश्किल से १०० मीटर आगे ही पहुँचा हूँगा, कि मेरी गाड़ी के ठीक आगे जा रही एक सेंट्रो कार में बैठे तीन लोगो की हरकतों ने मेरा ध्यान बरबस खींच लिया । तीनो करीब २० से २५ साल के युवा थे, और शायद जवानी, पैसा और शराब तीनो के नशे में चूर थे । बगल से जा रही किसी गाड़ी में अगर कोई महिला या युवती देखते तो तीनो एकटक वहीँ नज़र गडा लेते। फिर जब स्कूटी पर सवार एक युवती उनके बगल से गुजरी तो सेंट्रो में पीछे बैठे शख्स ने खिड़की से उसका दुपट्टा खींचने की कोशिश की । मैं उनकी हरकतों पर नज़र गडाये सतर्कता से ड्राइव करता चला जा रहा था ।
आईटीओ चौराहे की लाल बत्ती पार की तो विकास मार्ग पर यातायात और भी धीमा हो गया था, क्योंकि विपरीत दिशा में लोकनायक सेतु पर एक डीटीसी की बस और एक कार में जबरदस्त भिडंत हो गई थी, और तमाशबीनों ने सड़क पर हुजूम खड़ा कर दिया था । मेरे आगे जा रही सैंट्रो अब दो कारो को ओवरटेक कर मेरे से थोड़ा दूरी पर निकल गई थी । थोड़ा और आगे बढे तो आगे चडाई पर एक सुनशान ( तब सुनशान था मगर अब सुनशान नही रहा ) रास्ता बगल की तरफ़ से राजघाट को जाता है । सड़क के उस कटाव के दूसरी पार एक आल्टो कार खड़ी थी और एक २०-२१ साल की औसत कद की युवती कभी कार की ड्राइविंग सीट पर बैठती, फिर कभी बाहर उतर कर कार का बोनट खोल अंधेरे में अपने मोबाइल की लाईट से इंजन में कुछ देखने का प्रयास करती और कभी मोबाइल पर किसी को फोन लगाने की कोशिश करती। नए साल के आगमन के संदेशो की वजह से नेटवर्क व्यस्त हो गए थे, और शायद फ़ोन नही लग पा रहा था । दूर से तथा धुंद होने की वजह से मैं उसे ठीक से तो नही देख पा रहा था मगर उसके हाव भावों से लगता था की वह काफ़ी घबराई हुई और परेशान है । फिर मैंने देखा कि जो तीन युवा सैंट्रो कार से जा रहे थे उन्होंने उस युवती से कुछ बात की, और फिर अपनी सेंट्रो उसकी आल्टो के आगे लगा दी, मानो इसी मौके की तलाश में हों ।
मुझे किसी अनहोनी का अंदेशा होने लगा था, इसलिए अपनी गाड़ी को कटाव के इस पार ही रोककर शौच जाने का दिखावा करने लगा । एक बारी तो मन में आया कि जाकर उस लड़की को सावधान कर दू, मगर फिर सोचा कि इस तरह बिना किसी सबूत के किसी के बारे में क्या कहूँगा ? और अगर वो तीनो युवक मुझ से उलझ गए तो फिर रंग में भंग पड़ जायेगा । कुछ देर बात करने के बाद उन लड़को ने अपने सेंट्रो की डिक्की खोल, एक तार जैंसी कोई पतली और नोकीली वस्तु निकाली और उस आल्टो को अपनी सेंट्रो के पीछे बाधने लगे । एक बारी तो मुझे लगा कि शायद इन लोगो को इसी युवती ने मदद के लिए बुलाया है, फिर भी कुछ देर पहले की उनकी हरकते देखकर मैं उनपर कम से कम लक्ष्मीनगर तक पीछे से नज़र रखना चाहता था । फिर उनमे से दो लड़के सैंट्रो की अगली सीट पर बैठ गए और एक लड़का आल्टो की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया, उन्होंने उस युवती को सेंट्रो की पिछली सीट पर बिठा दिया ।
ट्राफिक अब थोड़ा गति पकड़ने लगा था । जैसे ही वो लोग आगे बढे मैं उनके पीछे-पीछे हो लिया था । सेंट्रो और मेरी कार के बीच में आल्टो कार आ जाने की वजह से, सैंट्रो पर ठीक से नज़र नही रख पा रहा था । वैसे भी सेंट्रो के शीशो पर एक घनी ओंस की परत जमी हुई थी । सिर्फ़ प्रयाप्त रोशनी में ही अन्दर की गतिबिधियों पर नज़र रखी जा सकती थी । एक किलोमीटर चले होंगे कि मैंने देखा कि सड़क के नीचे ढलान पर जहाँ झुग्गियां थी, उधर की तरफ़, सैंट्रो की खिड़की से तेजी से एक सफ़ेद किस्म का कपड़ा फेंका गया । मुझे समझते देर न लगी कि यह उस युवती द्वारा पहनी हुई सफ़ेद जाकेट थी । रात के साढ़े दस बज चुके थे, सड़क पर वाहनों का जमावडा छंटने लगा था । चुंगी के पास की लाल बत्ती से उन्होंने कार अक्षरधाम को जाने वाले रास्ते की तरफ को मोड़ दी । उस समय अक्षरधाम से लक्ष्मीनगर चुंगी को जोड़ने वाला सेतु निर्माणाधीन था अतः कार की गति बढाते हुए उन्होंने कार को भेरों मार्ग पंटून पुल की तरफ़ मोड़ दिया । अब मेरा शक यकीन में बदल चुका था । क्योंकि अगर ये लड़के उस युवती की मदद के लिए आए हुए होते, तो इतना लंबा चक्कर काटने के बाद वापस पंटून पुल की तरफ़ क्यो जाते? और जब से विकास मार्ग के चौडीकरण का काम पुरा हुआ था तो पंटून पुल का लगभग सारा ट्राफिक विकास मार्ग से होकर जाने लगा था, और इस पंटून पुल वाले रास्ते को सिर्फ़ साईकिल वाले या एक्का- दुक्का वाहन वाले ही इस्तेमाल करते थे । मैं अपनी गाड़ी उनके पीछे लगाये रखा, और अपने मोबाइल से पुलिस कंट्रोल रूम को फ़ोन किया और उस सैंट्रो का व्योरा दिया । मैंने उन्हें अपनी गाड़ी का नम्बर भी दिया और कहा कि मैं उनका पीछा कर रहा हूँ ।
हालांकि मेरे मस्तिस्क मे घर पर बच्चो के भूखा होने की फिक्र थी, और एक बारी दिमाग मे आया भी था कि छोड़ मुझे झंझट मे पड़ने से क्या फायदा, अपने रास्ते चलते बनू । लेकिन फिर दिल के किसी कोने से मुझे मेरा फ़र्ज़ आवाज़ दे रहा था । मैं अकेला था और वो तीन , और निहायत शरीफ किस्म के इंसानों की श्रेणी मे आने की वजह से मेरे पास कोई हथियार भी नही था । सिर्फ़ एक छोटा पेंचकस डेशबोर्ड पर पड़ा था । मेरा दिमाग तेजी से घूम रहा था कि मैं क्या करू ? अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने अपनी गाड़ी के बम्पर के नीचे एक स्टील का पतला, एक मीटर लंबा स्केल रखा है इस स्केल की भी एक दिलचस्प कहानी थी ।
हुआ यूँ कि सन् २००२ के आसपास मेरी गाड़ी एक दिन इंडिया हैबीटैट सेंटर की पार्किंग मे खड़ी थी, जब मैं अपने ज़रूरी काम निपटाकर वापस गाड़ी के पास लौटा, और मैंने गाड़ी स्टार्ट की तो अचानक ऑफिस के बॉस का फ़ोन आ गया । बेसमेंट मे पार्किंग होने की वजह से मोबाइल पर ठीक से सुनाई नही दे रहा था और उस ज़माने मे मोबाइल फ़ोन के नेटवर्को की हालत भी पतली ही थी । मैं, हडबडाहट मे गाड़ी से बाहर निकल फ़ोन पर बातें करने लगा और चाबी कार के इग्निसन पर ही लगी रह गई । अतः गाड़ी के दरवाजे अन्दर से बंद हो गए, शीशे भी चड़े हुए थे । फ़ोन सुनकर जब वापस गाड़ी के पास लौटा तो अपनी गलती का अहसास हो गया, अब क्या करू ? तभी पार्किंग बॉय ने मुझे कहा कि साब मेरे पास स्केल है, मैं खोल देता हूँ । मैंने कहा नही खुलेगा, क्योंकि मैंने सुरक्षा की वजह से दरवाजे के लॉक पर एल्यूमिनियम की पत्ती मुड़वा रखी है । कुछ देर रूककर वह बोला, फिर तो ये बड़े वाले स्केल से खुलेगा । मैंने पूछा कि बड़े स्केल से कैसे खुलेगा? तो वह बोला, साब, लाक का दूसरा बटन दरवाजे की तलहटी मे होता है वहाँ तक अगर स्केल पहुँच जाए तो खुल जाता है । मैंने फिर उससे पूछा कि यहाँ पर किसी के पास है वह स्केल ? वह बोला, ऊपर तीसरी मंजिल मे ऑफिस मे मेरा एक जानने वाला है उसके पास है। वक्त की नजाकत को समझते हुए मैंने जेब से बटुआ निकIला और दस-दस के दो नोट उसके हाथ मे रखते हुए कहा, यार भाई, तुम उससे ले आवो और इसे खोलो । रूपये जेब मे रखते हुए वह लिफ्ट की और मुडा और कहा, साब बस पाँच मिनट इन्तजार करो, अभी लाया । थोडी देर मे उसने स्केल से मेरी गाड़ी के दरवाजे खोल दिए थे । मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और चल दिया । ऑफिस पहुँच, ऑफिस बॉय को बुला कर उसी तरह का एक बड़ा स्केल, स्टेशनरी की दुकान से खरीदकर मंगवाया । जब वह स्केल लेकर आया तो मेरे एक साथी मित्र ने पूछा कि तुम इस स्केल को रखोगे कहाँ ? मैंने तुंरत, बिना सोचे जबाब दिया, अपनी गाड़ी मे । आसपास के सभी साथी मेरी बात सुन जोर से हंस पड़े । मैं फिर भी नही समझ पाया था, और तब मुझे शर्मिन्दिगी सी महसूस हुई जब मेरे मित्र ने समझाया कि अगर तू इसको गाड़ी मे रख देगा और गाड़ी इसी तरह बंद हो जायेगी तो फिर इसको प्रयोग मे लाएगा कैंसे ? ये तो बंद पड़ी गाड़ी के अन्दर होगा । फिर एक बारी सोचा कि इसको घर पर रखु ,किंतु फिर दिमाग ने कहा कि अगर घर पर रखेगा और गाड़ी कहीं रास्ते मे बंद हुई तो ? अतः फिर मैंने उसके लिए गाड़ी के अगले बम्बर के नीचे लोहे की पत्तिया वेल्ड करवाकर जगह बनाई थी ।
जैसे ही लोहे के उस स्केल का मुझे ध्यान आया, मैंने अपनी गाड़ी की रफ़्तार बढ़ा दी । मैंने मन ही मन ठान लिया था कि या तो आज मेरी न्यू इयर इव मनेगी या फिर इनकी । वैसे भी दो-तीन पैग मेरे अन्दर गए हुए थे जो मेरे पुरुषार्थ को उकसा रहे थे कि कर दे इनका कल्याण । कुछ आगे जाकर उन्होंने अपनी कार यमुना के किनारे की झाडियों की ओर घुमा दी । मुझे मालूम था कि इन झाडियों और दलदल मे ये ज्यादा दूर नही जा सकते, अतः मैंने अपनी गाड़ी रोड पर ही उस दिशा में मोड़कर छोड़ दी, जिस दिशा में वे सेंट्रो और अल्टो को ले गए थे । मैंने अपनी गाड़ी के हेड लाईट जलती रहने दी ताकि सामने रौशनी पड़े । उनकी गाड़ी दस -पन्द्रह कदम दूर जाकर रुक गई थी । मैंने पेंचकस जेब मे डाल दिया तथा बम्पर के नीचे रखे स्केल को निकाल हाथो से कसकर पकड़ लिया, और उनको ललकारते हुए मैं उनकी गाड़ी की तरफ़ बढ़ा I वे सभी गाड़ी के अन्दर ही थे, जैसे ही मैं सेंट्रो के करीब पहुँचा, बिना देर किए स्केल से सेंट्रो के पीछे के शीशे को चकनाचूर कर दिया ।कार के अन्दर की लाईट जल रही थी ,सेंट्रो की पिछली सीट पर एक युवक उस युवती के कपड़े फाड़ रहा था और युवती रोते चिल्लाते, पूरे जी-जान से अपने को उसके चंगुल से छुडाने की कोशिश कर रही थी । अचानक हुए इस हमले से घबराकर पिछली सीट पर बैठा युवक सहम कर दरवाजा खोल बाहर निकला। मैंने यह भी नोट किया कि यह जानते हुए भी कि कोई पीछा कर रहा है वे लोग जिस तरह फिक्रमंद थे वह यह दर्शाता था कि नशे में वो अपने होशो-हवास खो बैठे थे । वह युवक अभी कार से पूरा उतरा भी नही था कि मैंने उसके दाहिने कंधे पर लोहे के खड़े स्केल से जोर का वार कर दिया I वह वहीँ पर अधखुले दरवाजे के बीच फंसकर लुड़क गया । इस बीच पीछे से आल्टो मे बैठा युवक चाकू निकाल कर, मुझे गालियाँ देता हुआ मेरी तरह लपका । जैसे ही उसने मुझ पर चाकू का वार किया, मैंने बांये हाथ से एक कुशल कराटेबाज़ की तरह उसके वार को रोक कर उस पर भी स्केल का वार किया । उसका चाकू का वार बचाते-बचाते भी मेरे बांये बाजू पर एक हल्का जख्म आ गया था । मैंने जोर के एक दहाड़ मारी और दोबारा उसकी ओर झपटा तो वह भाग खड़ा हुआ । तीसरा युवक, जो कि सेंट्रो ड्राइव कर रहा था, इस बीच अंधेरे में कब और कहाँ खिसक लिया, कुछ पता ही नही चला ।
जब मैं निश्चिंत हो गया कि अब वो दोनों युवक आस-पास नही है और तीसरा बेहोश पड़ा है, तो मैंने अपने मोबाइल से दोबारा पुलिस को फ़ोन लगाया, और उन्हें घटना की जानकारी दी । मेरे से उस जगह की सही लोकेशन पूछने के बाद पुलिस ने जल्दी पहुँचने का आश्वाशन दिया और मुझे पुरी तरह सतर्क रहने को कहा । इस बीच आगे सड़क पर जहा मेरी गाड़ी खड़ी थी तीन चार दुपहिया और साईकिल सवार भी खड़े हो गए थे, जिससे मेरे अन्दर भी थोड़ा और आत्मविश्वास आ गया था । न्यू इयर इव होने की वजह से सारे टेलीफोन नेटवर्क बाधित थे और कंही भी फ़ोन नही लग रहा था । मैंने अपने घर फ़ोन करना चाहा तो वहाँ भी नही मिला। मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाल अपने हाथ के घाव को बाँधा और फिर मैंने बदहवास और थरथर काँप रही उस युवती की ओर रुख किया । वह भी गाड़ी के दूसरी तरफ़ बाहर निकल गई थी और अपने बचे हुए फटे कपड़ो से अपना अर्धनग्न शरीर ढकने की कोशिश कर रही थी । परिस्थिति को समझ मैंने झट से अपना स्वेटर उतारा और उसके शरीर पर पहना दिया। वह एक २०-२१ साल की एक अच्छे नयन नक्श वाली युवती थी । उसने रोते हुए मुझे 'थैंकयू अंकल' कहा । मैंने उसे ढIडस बंधाया और कहा कि अब आपको घबराने की जरुरत नही। फिर उसके फटे हुए एक कपड़े को जो सेंट्रो की पिछली सीट पर पड़ा था, उठाया और उस युवक के जो अभी भी बेहोश पड़ा था, पीछे हाथ बाँधकर उसे सेंट्रो के अंदर डाल दिया और कार के दरवाजे बाँध कर मैं युवती का हाथ पकड़ उसे सड़क पर खड़ी अपनी गाड़ी के पास ले आया ।
थोड़ा खामोश रहने के बाद मैंने उससे उसका नाम पता पूछा, वह बोली अंकल, मेरा नाम संध्या है, मैं प्रीतविहार इलाके मे रहती हूँ अपने मामी पापा के साथ । चार्टर्ड एकाउंटेंट के फाईनल इयर की स्टुडेंट हूँ और हौज़ खास में एक सी ए फर्म में आरटीकल कर रही हूँ । मेरे पापा केन्द्र सरकार में एक बरिष्ट अधिकारी है । फिर मैंने पूछा बेटा क्या हो गया था, जो तुम्हे इन गुंडे-मवालियों की मदद लेनी पड़ी ? गाड़ी तो तुम्हारी नई लगती है फिर कैंसे ख़राब हो गई ? सिसकते हुए वह बोली, पता नही अंकल, ऑफिस से निकलने के बाद, दो ढाई घंटे से जाम मे फसी थी इसलिए टॉयलेट के लिए वहाँ पर उतरी थी, लेकिन जब वापस गाड़ी स्टार्ट करने लगी तो गाड़ी स्टार्ट नही हुयी । इन कमीनो ने कहा की ये भी दिलशाद गार्डन की तरफ जा रहे है अतः मेरी गाड़ी को टोकर प्रीत विहार मेन रोड तक छोड़ देंगे ।
इस बीच पुलिस की जिप्सी भी वहाँ पहुँच गई थी, मैंने उन्हें घटना के बारे में विस्तार से बताया। फिर मैंने कहा कि फ़ोन नही लग पा रहे है, संध्या से उसके घर का पता माँगा और पुलिस के उस अधिकारी को आग्रह किया कि अगर आप नजदीकी थाने को अपने वायरलेस से, उन्हें संध्या के घरवालो को सूचित करने के लिए कहे तो मेहरबानी होगी , उस अधिकारी ने तुंरत वैसा ही किया । और वे लोग उस युवक को अपने कब्जे में लेकर उनकी गाड़ी और उस इलाके की छानबीन करने लगे । थोडी देर में वहाँ पर एक सफ़ेद जिफ्सी आकर रुकी, उसपर नंबर प्लेट के ऊपर लाल रंग से भारत सरकार लिखा था । एक अधेड़ उम्र, अच्छी पर्सनैलिटी के व्यक्ति उससे उतरे। मुझे समझते देर न लगी कि वह संध्या के पिताजी होंगे । पास आकर उन्होंने पुलिस वालो से घटना की सारी जानकारी ली । फिर संध्या, जो कि मेरी गाड़ी में बैठी थी उसके पास गए, वह अपने पिता से लिपटकर, फफककर रो पड़ी । काफी देर तक वे उसे सँभालते रहे । जब संध्या कुछ सामान्य हूई तो उन्होंने मेरा रुख किया, और दोनों हाथ जोड़ मेरे आगे अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने लगे । मैंने उन्हें कहा कि यह सब ऊपर वाले की कृपा थी जो एक बड़ी अनहोनी होने से बच गई । पुलिस वालो ने हमें उनके साथ पास वाले थाने में चलने और ज़रूरी कारवाही पूरी करने को कहा । इस बीच संध्या के पिता ने भी संध्या से वही सवाल किया कि गाड़ी ऐसे कैसे ख़राब हो गई । तभी मेरी दिमाग में एक संभावना ने कुरेदा । मैंने संध्या से पूछा कि उसकी गाड़ी की चाभी कहाँ है ? क्या गाड़ी में रिमोट कंट्रोल है? संध्या के पिता ने कहा हाँ, सेंट्रल लोक्किंग के अलावा सिक्यूरिटी अलारम भी गाड़ी में लगा है। मैंने फिर संध्या से पूछा कि क्या ड्राइविंग सीट पर बैठने के बाद गलती से दोबारा रिमोट का बटन तो नही दबा लिया था। वह बोली हा दबा तो था और रिमोट की आवाज भी आई थी । मेरा शक सही निकला । मैं उसकी गाड़ी की और बढ़ा चाबी गाड़ी पर ही लगी थी । मगर दरवाजा खुला था, मैंने इग्निशन से चाबी निकाल फिर से रिमोट का बटन दबाया और फिर चाबी इग्निशन में डाल गाड़ी स्टार्ट की तो गाड़ी स्टार्ट हो गई । संध्या मेरी ओर आंखे फाड़कर देख रही थी । पुलिस के एक सिफाही ने आल्टो कार को सेंट्रो से खोलकर अलग किया तो मैं उसे सड़क पर ले आया । फिर मैंने संध्या को समझाया कि अगर गाड़ी में रिमोट लोक्किंग हो और हालाँकि तुम गाड़ी के अन्दर हो लेकिन तुमने गाड़ी स्टार्ट करने से पहले रिमोट का लाक बटन दबा दिया तो गाड़ी स्टार्ट नही होगी । वह भी शायद नौसिखिया ही थी, बोली, अंकल ये तो मुझे पहले किसी ने बताया ही नही था ।
खैर, हम पुलिसवालों के साथ पास के थाने आ गए थे । संध्या के पिता मुझे रह रहकर जोर दे रहे थे कि मैं आपको पहले डॉक्टर के पास ले चलता हूँ । मैंने उनसे कहा कि आप मत परेशान होईये, घर लौटते वक्त किसी नर्शिंग होम से पट्टी करवा लूँगा । मैंने उनसे आग्रह किया कि मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता हूँ , और कानूनी प्रक्रिया के लिए बहुत समय नही निकाल पाऊँगा, अतः आप कोशिश कीजिय कि मुझे कम से कम बार कहीं गवाही इत्यादि देने आना पड़े । उन्होंने मुझे आश्वस्त किया । अब तक नया साल भी आ गया था, मैंने संध्या और ओके पिता को नए साल की मुबारकबाद दी और निकलने लगा तो संध्या मेरे पैर छूने के लिए नीच झुकी, मैंने उसे कहा, अरे-अरे ये क्या कर रही हो बेटे । वह झट से मेरे सीने से लग फिर जोर से रो पड़ी । मैंने उसे ढाडस बंधाया और साथ ही उसे और उसके पिता को यह भी समझाया कि इस घटना का अगर जिक्र अपने अडोस- पड़ोस अथवा सगे संबंधियों से कम ही करो, तो अच्छा होगा । क्योंकि आज के जमाने में लोग नमक-मिर्च लगा कर बात का बतडंग बना देते है और एक जवान बेटी के करियर का सवाल है । यह कहकर मैं अपने घर को निकल पड़ा । घर पहुँचा तो दो बज चुके थे, बच्चे सो गए थे और पत्नी भूखी प्यासी घबरायी हुई मेरे इंतज़ार में बैठी थी । खैर, मैंने उसे घटना के बारे में बताया और समझाया कि ऐसे न्यू इयर इव भी कभी-कभार ही मनाये जाते है ।
दिन गुजरे, साल गुजरे । मैं भी उस बात को लगभग भुला चुका था, क्योंकि उस घटना से सम्बंधित किसी बात के लिए मुझे कहीं भी नही बुलाया गया था । फिर अचानक एक दिन, सन् २००६ में नवम्बर के महीने में रविवार को घर पर ही बैठा था कि गेट पर एक मारुती बलेनो आकर रुकी । संध्या, उसके पिता और माँ गाड़ी से उतरे, मेरे घर के गेट पर लगे बोर्ड को गौर से पढ़ा , फिर डूअर बेल बजायी मैं बाहर निकला तो संध्या सबसे आगे खड़ी एक हाथ में दो पोलिथीन के लिफाफे पकडी थी । उसने झुक कर मेरे पैरो में हाथ रखे और मुझे अपने पिता और माँ से मिलवाया । वे शायद घर के गेट पर से ही लौट जन चाहते थे । मैंने उन्हें अन्दर आने का आग्रह किया।
बैठक में पहुँच, मैंने उन्हें अपनी पत्नी से मिलवाया और संध्या से उनके अचानक इस तरह आने का कारण पूछा । संध्या चेहरे पर एक खुबसूरत मुस्कान, मगर आँखों में पानी छलकाकर बोली " अंकल अगले हफ्ते मेरी शादी है उसी के लिए आपको आमंत्रित करने आई हूँ । मैंने उसकी भावनावो को समझते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और उसे शुभकामनाये दी । उसने उन दो पकेटो को मेरी पत्नी को पकडाया, एक में मिठाई का डिब्बा था और एक में ड्राईकिलीन की हुई मेरी वह स्वेटर जो घटना के बाद मैंने उसे पहनाई थी। हलाँकि हर माँ-बाप, जिनकी बेटी इस प्रकार के हादसे से बचायी गई हो, वो अगर बहुत ज्यादा मतलबी और खुद्दार किस्म के नही हो तो हमेशा ही बचाने वाले के प्रति कृतज्ञ रहते ही है, मगर मैं नोट कर रहा था कि जिस तरह से उसके माता पिता एक बड़े ही शालीन ढंग से बेटी की शादी का आमंत्रण मुझे और मेरी पत्नी को दे रहे थे, उससे मैं तो क्या मेरी पत्नी भी गदगद थी । और जिस प्रकार की आत्मीयता, संध्या ने घटना के बाद से अब तक दिखाई थी, उससे यह स्पष्ट झलकता था कि माँ-बाप की शिक्षा और परिवार के ऊँचे संस्कार उसमे कूट-कूट कर भरे थे । सच ही कहा गया है कि परिवार और खानदान में जिस तरह के संस्कार होते है वही बच्चो पर भी कही न कही अपनी अमिट छाप छोड़ जाते है । और मैं समझता हूँ कि शायद काफ़ी हद तक इंसान को समय पर पहुँची मदद, उसके और परिवार के संस्कारों और उसकी अच्छाईयों, अच्छे कर्मो को कहीं न कहीं इससे जोड़ती है ।
चाय नाश्ते के बाद जाते वक्त एक बार पुनः संध्या और उसके माता-पिता ने जोर देकर हमें शादी में उपस्थित होने का आग्रह किया। शादी के दिन, नियत समय पर हम संध्या के घर पहुँच गए थे । हमारे साथ एक विशिष्ट अथिति जैसा सत्कार और व्यवहार हो रहा था, किंतु तुंरत ही मेरे पत्नी ने उनके और उनके सगे संबंधियों के बीच इस तरह की पैठ बना ली थी कि वे अब हमें अपने घर के एक सदस्य जैसा समझने लगे थे । मेरी पत्नी ने भी बढ़चढ़ कर संध्या की सजावट और अन्य कामो में भाग लिया। रात्रि भोजन के बाद मेरी पत्नी मेरे पास आई, और उसने बताया कि संध्या और उसकी माँ सुबह डोली विदाई के वक्त तक रुकने की जिद कर रहे है, उन्होंने बच्चो को भी एक कमरे में सुला दिया है। मैंने भी रुकने की हामी भर दी।
सुबह विदाई की घड़ी भी आ गई, वर-वधु ने सभी उपस्थित परिजनो से आशीर्वाद लिया । और फिर संध्या निकल पड़ी अपने पिया के घर को । कार में उसे विदा होते देखते मेरे मन को कहीं पर एक बड़ी आत्मसंतुष्टि हो रही थी । घर लौटते वक्त, रास्ते भर हम उन लोगो के बारे में ही चर्चा करते रहे । मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि रात को जब मैं संध्या की साड़ी ठीक कर रही थी तो वह मेरे से लिपट पड़ी और सिसकते हुए कहा कि आंटी अगर उस दिन अंकल समय पर ........ .... । तो मैं आज यह दिन कभी नही देख पाती। संध्या के कहने का आशय हम समझ गए थे । ड्राइव करते हुए मैं सोच रहा था कि इस संध्या को तो मैंने बचा लिया, मगर न जाने इस देश में कितनी ऐसी अभागी संध्या भी होंगी जो इन दरिंदो के हबस का शिकार हो जाती है, मगर उनकी चितकार कोई नही सुन पाता ।
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Sunday, January 4, 2009
Wednesday, December 31, 2008
अमेरिकी बिखराव की भविष्यबाणी और हम !
सर्वप्रथम आप सभी को नववर्ष-२००९ की हार्दिक शुभकामनाये !
रूस के एक प्रोफ़ेसर ने क्या कहा, ये कोई ज्यादा मायने नही रखता ! जो बात रूस का प्रोफेसर अब कह रहा है कि रूस और चीन बड़ी शक्ति के रूप में उभरेंगे, और अमेरिका ६ भागो में विभक्त हो जाएगा ! अगर यह ६ भागो में विभक्त होने जैसी बात को हम अलग कर दे, तो आपको भी मालूम होगा कि कुछ समय पहले अमरीकी नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल का भी यही कहना था कि आने वाले वर्षों में चीन, भारत और रूस से अमरीका को कड़ी चुनौती मिलेगी ! काउंसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया में मुख्य मुद्रा के रुप में स्वीकार्य अमरीकी डॉलर अपनी चमक खो बैठेगा ! चीन के बारे में कहा गया है कि यह वर्ष 2025 तक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और बड़ी सैनिक ताकत के रुप में उभरेगा !
समय कभी एक सा नहीं रहता, आज जो शीर्ष पर है कल उसे नीचे भी आना ही है, यही दुनिया के पहिये का दस्तूर भी है ! एक समय था जब रोम और फिर इंगलैडं का एक छत्र राज हुआ करता था विश्व के बहुत से देशों पर ! इसलिए सुपरपावर की दौड़ में कल अगर अमेरिका पिछड़ गया तो कोई बड़ा आश्चर्य नही ! निश्चित रूप से वह समय भी आयेगा जब दुनिया पर अमेरिका दबदबा भी ज्यादा दिन नहीं रहने वाला ! शीत युद्ध के बाद अमेरिका ने दुनिया पर एक छत्र राज सा ही किया पर कुछ समय से रूस और चीन ने जिस तरह अपने को उभारा है वो अमेरिकी दबदबे को एक चुनोती है! इस आर्थिक मंदी ने अमेरिका को और भी बडा झटका दिया है जिससे उभारना उसके लिए बड़ा मुश्किल हो रहा है ! लेकिन कई मामलों में उसका महत्व बरक़रार रहेगा! चीन की यथास्थिति से तो मैं ज्यादा परिचित नहीं लेकिन दावे के साथ कह सकता हूँ कि भारत को अमेरिका जैसा बनाने में १०० साल से ज्यादा का समय लगेगा ! ऐसा इसलिए की भौतिक परिवर्तन से पहले मानसिक परिवर्तन जरूरी है जिसको कि बहुत समय लगेगा और बहुत कठिन भी है ! हम कितनी बडी महाशक्ति बनने जा रहे है इसकी पोल २६/११ ने खोल दी है ! सोचने की बात यह है कि 'शक्तिशाली' होने तथा 'शक्तिशाली और संपन्न' होने में अंतर है सरकारी तंत्र में कूट कूट कर भरी नाकामी और नपुंसकता पर जीत हासिल करनी एक टेडी खीर के समान है ! यह सच है कि वतर्मान आर्थिक मंदी की दौर में अमरीकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती नज़र आ रही है पर इसका मतलब ये नहीं कि अमरीका अब बिखर जायेगा !
चीन और रूस कुछ आगे बढ़ सकता है लेकिन भारत को तो अभी 100 साल लगेंगे ! वह भी तब सम्भव है जब कि भारत में गरीबी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, पक्षपात, भय, भूख और भृष्टाचार का पूरी तरह से खात्मा हो ! यह तभी संभव है जब निःस्वार्थ दृढ़निश्चयी नेतृत्व हो ! जिसकी कथनी-करनी में कोई अंतर नहीं हो! भारत को ऐसा अलौकिक-कुशल नेतृत्व निकट भविष्य में मिलेगा, मुझे तो कहीं दूर-दूर तक नज़र नही आता !अगर अमरीका का पतन होता है तो ये तय मानिए कि इस सारी प्रक्रिया में महाविनाश के बाद ही कुछ और स्थापित हो सकेगा! अमरीकी दबदबा मेरे आकलन के अनुसार अच्छा नही है तो बुरा भी नहीं है ! सभी देश अपनी-अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं, और मनमानी करते रहते हैं ! ज्यादातर मुस्लिम राष्ट्र बेगुनाहों पर जुल्म ढाने में कोई कसर नही छोड़ते ! अमरीका एक पुराना प्रजातांत्रिक देश है ! वह अगर दुनिया में एक अच्छे गार्जियन जैसी भूमिका सही तरह से निभाए ( जो वह सही तरीके से नही निभा रहा और जिसका परिणाम आज उसे आर्थिक मंदी के रूप में भोगना पड़ रहा है ), तो इस विश्व रूपी घर में अनुशासन की दृष्टि से एक अच्छी बात है ! अतः सभी को इस बात पर सकारात्मक ढंग से सोचना चाहिए कि कौन सी चीज़ हमारे हित में है
रूस के एक प्रोफ़ेसर ने क्या कहा, ये कोई ज्यादा मायने नही रखता ! जो बात रूस का प्रोफेसर अब कह रहा है कि रूस और चीन बड़ी शक्ति के रूप में उभरेंगे, और अमेरिका ६ भागो में विभक्त हो जाएगा ! अगर यह ६ भागो में विभक्त होने जैसी बात को हम अलग कर दे, तो आपको भी मालूम होगा कि कुछ समय पहले अमरीकी नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल का भी यही कहना था कि आने वाले वर्षों में चीन, भारत और रूस से अमरीका को कड़ी चुनौती मिलेगी ! काउंसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया में मुख्य मुद्रा के रुप में स्वीकार्य अमरीकी डॉलर अपनी चमक खो बैठेगा ! चीन के बारे में कहा गया है कि यह वर्ष 2025 तक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और बड़ी सैनिक ताकत के रुप में उभरेगा !
समय कभी एक सा नहीं रहता, आज जो शीर्ष पर है कल उसे नीचे भी आना ही है, यही दुनिया के पहिये का दस्तूर भी है ! एक समय था जब रोम और फिर इंगलैडं का एक छत्र राज हुआ करता था विश्व के बहुत से देशों पर ! इसलिए सुपरपावर की दौड़ में कल अगर अमेरिका पिछड़ गया तो कोई बड़ा आश्चर्य नही ! निश्चित रूप से वह समय भी आयेगा जब दुनिया पर अमेरिका दबदबा भी ज्यादा दिन नहीं रहने वाला ! शीत युद्ध के बाद अमेरिका ने दुनिया पर एक छत्र राज सा ही किया पर कुछ समय से रूस और चीन ने जिस तरह अपने को उभारा है वो अमेरिकी दबदबे को एक चुनोती है! इस आर्थिक मंदी ने अमेरिका को और भी बडा झटका दिया है जिससे उभारना उसके लिए बड़ा मुश्किल हो रहा है ! लेकिन कई मामलों में उसका महत्व बरक़रार रहेगा! चीन की यथास्थिति से तो मैं ज्यादा परिचित नहीं लेकिन दावे के साथ कह सकता हूँ कि भारत को अमेरिका जैसा बनाने में १०० साल से ज्यादा का समय लगेगा ! ऐसा इसलिए की भौतिक परिवर्तन से पहले मानसिक परिवर्तन जरूरी है जिसको कि बहुत समय लगेगा और बहुत कठिन भी है ! हम कितनी बडी महाशक्ति बनने जा रहे है इसकी पोल २६/११ ने खोल दी है ! सोचने की बात यह है कि 'शक्तिशाली' होने तथा 'शक्तिशाली और संपन्न' होने में अंतर है सरकारी तंत्र में कूट कूट कर भरी नाकामी और नपुंसकता पर जीत हासिल करनी एक टेडी खीर के समान है ! यह सच है कि वतर्मान आर्थिक मंदी की दौर में अमरीकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती नज़र आ रही है पर इसका मतलब ये नहीं कि अमरीका अब बिखर जायेगा !
चीन और रूस कुछ आगे बढ़ सकता है लेकिन भारत को तो अभी 100 साल लगेंगे ! वह भी तब सम्भव है जब कि भारत में गरीबी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, पक्षपात, भय, भूख और भृष्टाचार का पूरी तरह से खात्मा हो ! यह तभी संभव है जब निःस्वार्थ दृढ़निश्चयी नेतृत्व हो ! जिसकी कथनी-करनी में कोई अंतर नहीं हो! भारत को ऐसा अलौकिक-कुशल नेतृत्व निकट भविष्य में मिलेगा, मुझे तो कहीं दूर-दूर तक नज़र नही आता !अगर अमरीका का पतन होता है तो ये तय मानिए कि इस सारी प्रक्रिया में महाविनाश के बाद ही कुछ और स्थापित हो सकेगा! अमरीकी दबदबा मेरे आकलन के अनुसार अच्छा नही है तो बुरा भी नहीं है ! सभी देश अपनी-अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं, और मनमानी करते रहते हैं ! ज्यादातर मुस्लिम राष्ट्र बेगुनाहों पर जुल्म ढाने में कोई कसर नही छोड़ते ! अमरीका एक पुराना प्रजातांत्रिक देश है ! वह अगर दुनिया में एक अच्छे गार्जियन जैसी भूमिका सही तरह से निभाए ( जो वह सही तरीके से नही निभा रहा और जिसका परिणाम आज उसे आर्थिक मंदी के रूप में भोगना पड़ रहा है ), तो इस विश्व रूपी घर में अनुशासन की दृष्टि से एक अच्छी बात है ! अतः सभी को इस बात पर सकारात्मक ढंग से सोचना चाहिए कि कौन सी चीज़ हमारे हित में है
Tuesday, December 30, 2008
दर्जी काका और पाकिस्तान का झंडा !
तब हम गुरुदासपुर के तिब्डी कैन्ट में रहते थे, मैं शायद तब सातवी कक्षा में पढता था । जिस मोहल्ले में हम रहते थे उसी के नुक्कड़ पर एक दूकान थी, हम लोग उसे दर्जी काका की दुकान कहकर पुकारा करते थे । दर्जी काका एक अधेड़ उम्र के मुस्लिम थे । परिवार में वो कुल तीन जने थे, वे, उनकी बेगम और एक बेटी । घर की माली हालात थे । साल के शायद १२ महीने ही वो अडोस-पड़ोस वालो से कुछ न कुछ मांगते रहते थे, खासकर मेरे पिताजी से तो दर्जी काका महीने में कम से कम दो बार अवस्य ही कुछ पैंसे मागने जरूर आते थे । क्योकि जो काम उनका था, उसमे शायद किसी खास वक्त पर ही कमाई हो पाती थी, अन्यथा साल के अन्य दिनों में वे छोटे-मोटे सिलाई-तुल्पायी के ही काम कर गुजारा करते थे ।
इस व्यवसाय में उनका जो मुख्य काम था, वह था झंडे बनाना । जब कभी चुनाव होते तो वे राजनीतिक पार्टियों के झंडे बनाते थे । २६ जनवरी और १५ अगस्त के आस-पास वे अकसर देश का झंडा बना रहे होते थे, और जब अप्रैल, मई जून का महिना होता था तो वे पास ही स्थित नाथ मन्दिर के चढावे के तथा सिख तीर्थ यात्रियों के झुंडों में आनंदपुर साहिब, हेमकुंट साहिब और पोंटा साहिब जाते वक्त के लिए झंडे बनाते थे । क्योंकि गर्मी के सीजन में पड़ने वाले त्यौहार में सिख सर्धालू गुरुद्वारों में दर्शनार्थ बड़ी तादाद में जाते है । स्कूल से लाने, लेजाने वाला रिक्शा अक्सर हमें उसी नुक्कड़ पर उतारता था जहाँ पर दर्जी काका की दुकान थी। दर्जी काका मेरे पिताजी से काफ़ी घुलामिला होने की वजह से, मुझे भी काफ़ी प्यार और सम्मान देते थे । जब कभी वे देश का झंडा सिल रहे होते थे तो मैं अगर आस-पास होता तो वहाँ जाकर दूकान के फ्रंट टेबल के आगे खड़ा होकर बड़े कौतुहल से दर्जी काका को झंडा बनाते देखता रहता था । एक दिन जब स्कूल से लौटा तो क्या देखता हूँ की दर्जी काका अपने काम में मग्न कोई हरा झंडा सिल रहे थे । मैंने पूछा, काका ये किसका झंडा है ? वे बोले, बेटा ये पाकिस्तान का झंडा है । मेरे अबोध मस्तिष्क ने फिर प्रश्न किया, काका पाकिस्तान का झंडा आप क्यो बना रहे है यहाँ ? पाकिस्तान वाले अपने देश में नही बना सकते क्या ? दर्जी काका ने दाढ़ी से भरे अपने मुरझाये चेहरे पर एक तेज हँसी बखेरी और बोले, मिंया तुम अभी छोटे हो, नही समझ पाओगे, बस इतना कहकर वो फिर से अपने काम में मग्न हो गए थे ।
दुसरे दिन मैं स्कूल गया तो अपनी क्लास के एक खास दोस्त से इस बात का जिक्र किया । मेरा वह क्लासमेट भी पहले उसी मुहल्ले में रहता था और दर्जी काका की मागने की आदत से नाखुश था । वह बोला अरे वो बुढउ ऐसा ही है । अपनी कमाई के पैसे ऐसे ही फालतू चीजो पर ख़त्म कर देता है और फिर मांगता फिरेगा । मैंने पूछा, लेकिन यार वो पाकिस्तान के झंडे पर क्यो अपना पैसा खर्च करता है ? इतनी तो उसको समझ होगी की पाकिस्तान का झंडा यहाँ कौन लेगा ? वह बोला, अबे यार, तू भी बहुत भोला है । अरे, ये मुसलमान अन्दर ही अन्दर पाकिस्तान को बहुत चाहते है इसलिए । तुने देखा नही जब क्रिकेट का मैच होता है तो पाकिस्तान के जीतने पर कैसे तालिया बजाते है । मेरी समझ में भी उसकी बात कुछ हद तक आ गई थी, अतः उस दिन के बाद से जब मैं दर्जी काका की दुकान से होकर गुजरता था तो वहाँ रुकना तो दूर, उनकी दूकान की तरफ़ देखता तक नही था । मेरे अन्दर ही अन्दर, दर्जी काका के प्रति किसी ख़ास किस्म की घृणा ने जगह बना ली थी ।
यह शायद १९७७-७८ के आस पास की बात होगी, पाकिस्तान में जनरल जियाउलहक़ का शासन था और क्योंकि मैं छोटा था और मुझे ठीक से नही मालूम कि जाने किस बात पर दोनों देशो के बीच तनातनी चल रही थी । यकायक तनाव बहुत बढ़ गया था और जगह-जगह शहरो में प्रदर्शन भी हो रहे थे । उस दिन मैं स्कूल से लौट रहा था और रिक्शे वाले ने रोज की तरह उसी नुक्कड़ पर हमें उतार दिया था । मैंने देखा कि दर्जी काका की दूकान पर बहुत भीड़ लगी थी । लोग मुह मांगे दामो पर काका से पाकिस्तान का झंडा खरीद रहे थे । काका अन्दर से ढूंड- ढूंड कर अपने बनाये पाकिस्तान के झंडे निकाल बाहर ला रहे थे । कुछ देर बाद मुहल्ले के चौराहे पर बहुत भीड़ इकठ्ठा हो गई थी, कई नेता भी वहा आए हुए थे, वे पाकिस्तान के खिलाप नारे लगा रहे थे और फिर उन्होंने बारी-बारी से पाकिस्तान का झंडा जलाना शुरू किया ।
दूसरे दिन सुबह जब मैं स्कूल जा रहा था तो दर्जी काका दूकान के बाहर खड़े थे, मुझे देखकर बोले , छोटे मिंया तुम उस दिन पूछ रहे थे न कि मैं पाकिस्तान का झंडा क्यो बनाता हूँ ? तो आपने कल देखा होगा कि पाकिस्तान के झंडे की कितनी डिमांड थी ? दर्जी काका की बात सुन, मेरा दिल दर्जी काका के लिए श्रदा से भर गया था । मैं सोच रहा था कि बिना सोचे समझे इंसान कितनी नादानियां और बेवकूफियां कर बैठता है, जो दीखता है, वो वास्तव में होता नही । एक दोस्त के कहने पर, बेचारे काका के बारे में कितना कुछ ग़लत सोच लिया था, मैंने ।
गोदियाल
इस व्यवसाय में उनका जो मुख्य काम था, वह था झंडे बनाना । जब कभी चुनाव होते तो वे राजनीतिक पार्टियों के झंडे बनाते थे । २६ जनवरी और १५ अगस्त के आस-पास वे अकसर देश का झंडा बना रहे होते थे, और जब अप्रैल, मई जून का महिना होता था तो वे पास ही स्थित नाथ मन्दिर के चढावे के तथा सिख तीर्थ यात्रियों के झुंडों में आनंदपुर साहिब, हेमकुंट साहिब और पोंटा साहिब जाते वक्त के लिए झंडे बनाते थे । क्योंकि गर्मी के सीजन में पड़ने वाले त्यौहार में सिख सर्धालू गुरुद्वारों में दर्शनार्थ बड़ी तादाद में जाते है । स्कूल से लाने, लेजाने वाला रिक्शा अक्सर हमें उसी नुक्कड़ पर उतारता था जहाँ पर दर्जी काका की दुकान थी। दर्जी काका मेरे पिताजी से काफ़ी घुलामिला होने की वजह से, मुझे भी काफ़ी प्यार और सम्मान देते थे । जब कभी वे देश का झंडा सिल रहे होते थे तो मैं अगर आस-पास होता तो वहाँ जाकर दूकान के फ्रंट टेबल के आगे खड़ा होकर बड़े कौतुहल से दर्जी काका को झंडा बनाते देखता रहता था । एक दिन जब स्कूल से लौटा तो क्या देखता हूँ की दर्जी काका अपने काम में मग्न कोई हरा झंडा सिल रहे थे । मैंने पूछा, काका ये किसका झंडा है ? वे बोले, बेटा ये पाकिस्तान का झंडा है । मेरे अबोध मस्तिष्क ने फिर प्रश्न किया, काका पाकिस्तान का झंडा आप क्यो बना रहे है यहाँ ? पाकिस्तान वाले अपने देश में नही बना सकते क्या ? दर्जी काका ने दाढ़ी से भरे अपने मुरझाये चेहरे पर एक तेज हँसी बखेरी और बोले, मिंया तुम अभी छोटे हो, नही समझ पाओगे, बस इतना कहकर वो फिर से अपने काम में मग्न हो गए थे ।
दुसरे दिन मैं स्कूल गया तो अपनी क्लास के एक खास दोस्त से इस बात का जिक्र किया । मेरा वह क्लासमेट भी पहले उसी मुहल्ले में रहता था और दर्जी काका की मागने की आदत से नाखुश था । वह बोला अरे वो बुढउ ऐसा ही है । अपनी कमाई के पैसे ऐसे ही फालतू चीजो पर ख़त्म कर देता है और फिर मांगता फिरेगा । मैंने पूछा, लेकिन यार वो पाकिस्तान के झंडे पर क्यो अपना पैसा खर्च करता है ? इतनी तो उसको समझ होगी की पाकिस्तान का झंडा यहाँ कौन लेगा ? वह बोला, अबे यार, तू भी बहुत भोला है । अरे, ये मुसलमान अन्दर ही अन्दर पाकिस्तान को बहुत चाहते है इसलिए । तुने देखा नही जब क्रिकेट का मैच होता है तो पाकिस्तान के जीतने पर कैसे तालिया बजाते है । मेरी समझ में भी उसकी बात कुछ हद तक आ गई थी, अतः उस दिन के बाद से जब मैं दर्जी काका की दुकान से होकर गुजरता था तो वहाँ रुकना तो दूर, उनकी दूकान की तरफ़ देखता तक नही था । मेरे अन्दर ही अन्दर, दर्जी काका के प्रति किसी ख़ास किस्म की घृणा ने जगह बना ली थी ।
यह शायद १९७७-७८ के आस पास की बात होगी, पाकिस्तान में जनरल जियाउलहक़ का शासन था और क्योंकि मैं छोटा था और मुझे ठीक से नही मालूम कि जाने किस बात पर दोनों देशो के बीच तनातनी चल रही थी । यकायक तनाव बहुत बढ़ गया था और जगह-जगह शहरो में प्रदर्शन भी हो रहे थे । उस दिन मैं स्कूल से लौट रहा था और रिक्शे वाले ने रोज की तरह उसी नुक्कड़ पर हमें उतार दिया था । मैंने देखा कि दर्जी काका की दूकान पर बहुत भीड़ लगी थी । लोग मुह मांगे दामो पर काका से पाकिस्तान का झंडा खरीद रहे थे । काका अन्दर से ढूंड- ढूंड कर अपने बनाये पाकिस्तान के झंडे निकाल बाहर ला रहे थे । कुछ देर बाद मुहल्ले के चौराहे पर बहुत भीड़ इकठ्ठा हो गई थी, कई नेता भी वहा आए हुए थे, वे पाकिस्तान के खिलाप नारे लगा रहे थे और फिर उन्होंने बारी-बारी से पाकिस्तान का झंडा जलाना शुरू किया ।
दूसरे दिन सुबह जब मैं स्कूल जा रहा था तो दर्जी काका दूकान के बाहर खड़े थे, मुझे देखकर बोले , छोटे मिंया तुम उस दिन पूछ रहे थे न कि मैं पाकिस्तान का झंडा क्यो बनाता हूँ ? तो आपने कल देखा होगा कि पाकिस्तान के झंडे की कितनी डिमांड थी ? दर्जी काका की बात सुन, मेरा दिल दर्जी काका के लिए श्रदा से भर गया था । मैं सोच रहा था कि बिना सोचे समझे इंसान कितनी नादानियां और बेवकूफियां कर बैठता है, जो दीखता है, वो वास्तव में होता नही । एक दोस्त के कहने पर, बेचारे काका के बारे में कितना कुछ ग़लत सोच लिया था, मैंने ।
गोदियाल
Saturday, December 27, 2008
वो कौन थी ?
हर इंसान की जिंदगी से जुड़े कुछ वे ख़ास संस्मरण भी होते है जिन्हें इंसान दिल के किसी कोने में संजो कर तो रखता है, हर एक को खुलकर नहीं बता पाता। कुछ बाते ऐसी होती है जो इंसान सीधे वार्तालाप में अभिव्यक्त करता है और कुछ ऐसी, जो लिखकर व्यक्त की जाती है । अभी पिछले हफ्ते मेरा एक जिगरी दोस्त मेरे घर पर आया था, वह स्वभाव से बहुत बातुनी है, उस दिन हमारा सपरिवार डिनर का प्रोग्राम था, शाम को जब टेबल पर मनोरंजन करने बैठे तो वह लगा मेरा दिमाग चाटने। बातो को कैसे घुमाना है, कैसे तोड़मरोड़ कर पेश करना है, कोई उससे सीखे। उसने जल्दी-जल्दी दो पग लिए और बोला यार, मैं आज तेरे को अपनी एक सच्ची कहानी सुनाता हूँ, तुम चुपचाप सुनो, नाराज मत होना। मैंने कहा सुना भई, मैं भला क्यों तेरी कहानी से नाराज होऊंगा? बस फिर वह लगा अपनी राम कहानी सुनाने।
१९८५ के आस-पास की बात है, वह तभी से मेरे साथ हो ली थी, जब से मैं अपने विद्यार्थी जीवन को त्याग रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से शहर को निकला था। उससे पहले भी वो कभी-कभार मेरे साथ हो लेती थी, मगर उस बेफिक्र जीवन में मुझ जैसे स्वार्थी इंसान को उसकी ख़ास जरुरत महसूस नहीं होती थी। मेरे हर अच्छे बुरे निर्णय में वह मेरे साथ रहती। बस यूँ समझो कि हरपल वह मेरे साथ रहती, मेरी परछाई की तरह । नौकरी मिली, उसके बाद घर वालो ने मेरे शादी तय की । इस शादी तय करने के मामले में न उसने और न मैंने, अपने घर वालो का साथ दिया था, मैंने अपने घरवालो से सिर्फ यह कह दिया था कि जो आपलोगों को उचित लगे, करो । फिर शादी का दिन भी आ गया । मुझे याद है, उसने मेरे शादी के साजो-सामान को चुनने/खरीदने में भी मेरी पूरी मदद की थी । कहाँ क्या बोलना है, नवेली दुल्हन के साथ क्या बात करनी है कैसे बर्ताव करना है, हर एक बात वह मुझे बारीकी से समझा देती थी । घर-गृहस्थी बसाने के बाद बच्चे हुए, शहर में मकान खरीदा, बच्चो को स्कूल में भर्ती करवाया । यहाँ भी मेरे हर एक निर्णय और हर कदम पर वह एक सच्चे दोस्त की भांति मेरे साथ रही। मैं कभी-कभी इस सोच और फिक्र में डूब जाता कि वह मेरे लिए इतना त्याग करती है, मगर मैंने इसे सिवाए प्यार के और क्या दिया ?
दिन, महीने, साल गुजरते रहे, मगर वह मेरा साथ छोड़ने को तैयार न थी । एक साये की तरह मेरे पीछे थी । मुझे जब भी उदास अथवा चिंतित देखती, मेरा हाथ पकड़ मुझे बाहर गाड़ी तक खींच लाती और कहीं चलने को कहती । अभी कुछ दिन पहले की बात है, क्रिसमश की छुट्टी होने की वजह से, मैं घर के बाहर बरामदे में बैठा सर्दियों की धूप का आनंद ले रहा था और भारत पाकिस्तान के बीच आंख मिचोली के खेल के बारे में विचार मग्न था, कि तभी अचानक वह फिर आ गई । मुझको ढंग के कपड़े पहनने का निर्देश दे, ख़ुद बरामदे के एक कोने पर खड़ी होकर धूप सेकने लगी । मैं अन्दर गया, कपड़े बदले और तैयार होकर बाहर निकला । गाड़ी स्टार्ट की और चल दिए, वह मेरी बगल वाली सीट में बैठ गई। सफेद लिवास में आज वह कुछ ज्यादा ही खुबसूरत दिख रही थी ।
वह मुझे शहर के एक बड़े चर्च में ले आई थी। चर्च में काफ़ी लोग इकट्ठा थे, क्रिश्मश मनाने के लिए । जिनमे बच्चे और युवा ज्यादा थे । उसके द्वारा बहुत सी क्रिश्चियन हसीनाओ से मुझे मिलाया गया। वो हसीनाये मुझे 'मैरी क्रिसमस' कहकर मेरे गाल पर किस करती और मिठाईया खिलाती, मैं गदगद था । शाम को पास के होटल में कॉकटेल पार्टी थी । मैं भी स्वाद के मारे रेड-वाईन के काफ़ी पैग ले चुका था । अब तक मैं तो अपने घर की तरफ़ से एकदम बेफिक्र सा था, मगर वह हर इंसान की भावनाए जानती और समझती थी, अतः उसने मुझे मेरी पत्नी को घर पर फोन करने को कहा । मैंने अपने मोबाईल फ़ोन से घर फ़ोन किया, उसने धीरे से मेरे कान में कहा कि इस समय तुम होश में नही हो, इसलिए ज्यादा बात मत करना और यह कहदो कि मैं यहाँ पर क्रिसमस की पार्टी अटेंड कर रहा हूँ, दोस्तों के साथ, अतः रात को घर नहीं लौटूंगा, तुम लोग खाना खाकर सो जाना। मेरे अधिक ले लेने के बाद उसने मह्सुश किया कि मैं अब ड्राइव करने लायक नही रहा, अतः उसने होटल में ही मेरे लिए कमरा बुक किया और मैं वहीँ एक कमरे मे सो गया, वह मेरे पास में ही बैठी थी और धीरे-धीरे मेरे बालो को सहला रही थी और एक गीत गुनगुना रही थी: आ चल के तुझे मैं लेके चलू इक ऐंसे गगन के तले.....फिर मैं सो गया ।
अब तक में उसकी वह राम कहानी बड़े धैर्य से सुन रहा था, किन्तु चूँकि मैं भी नशे में था , अतः मुझे उसकी कहानी सुनकर उसपर गुस्सा आ गया और मैंने गुस्से में उसे लगभग गाली देते हुए कहा, मैं तो तुझे एक शरीफ इंसान समझता था, पर तू तो बड़ा ही आवारा-बदचलन किस्म का इंसान है, अपने बीबी बच्चो को छोड़ किसी और के साथ गुलछर्रे उडाता है। बेटा, यह सुख ज्यादा दिन नही भोग पायेगा, दो नावों में सफर करने वाला बुरी तरह भंवर में डूबता है। मेरी बात और गालियों को शांत ढंग से सुनते हुए वह मंद-मंद मुस्कुराया और बोला, इसका मतलब मेरी कहानी अच्छी लगी तुझे । मैंने उसको घूरते हुए देखा और मैं बोला कुछ नहीं । वह बोला, मुझे मालूम है कि तेरा ये कबाडी दिमाग आगे क्या सोच रहा होगा, तू अपने दिमाग पर जोर डाल कर सोच रहा होगा कि यह जानते हुए भी कि यह एक शादी-शुदा इंसान है, वह कौन कलूटा होगी जो इसको इतना चाहती है ? तो सुन, पता है वह कौन थी? अरे इडियट, वह मेरी खुद की कल्पना थी, मेरी अपनी कल्पना,... इट वाज जस्ट माय इमेजिनेशन... उसकी बात सुन मैंने पुछा, तू सच बोल रहा है न ? उसने अपने बच्चो की कसम खाते हुए कहा, यार तुझे मुझ पर भरोसा नहीं ? उसकी बात सुन मैंने और उसने जोर का एक ठहाका लगाया, और उसने भी इस खुशनुमा माहौल का फायदा उठाते हुए जल्दी से जो कुछ बोतल के निचले भाग में बची थी, उसे भी अपने गिलास में उडेल दिया। मैं उसका मुह देखता रह गया था।
गोदियाल
१९८५ के आस-पास की बात है, वह तभी से मेरे साथ हो ली थी, जब से मैं अपने विद्यार्थी जीवन को त्याग रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से शहर को निकला था। उससे पहले भी वो कभी-कभार मेरे साथ हो लेती थी, मगर उस बेफिक्र जीवन में मुझ जैसे स्वार्थी इंसान को उसकी ख़ास जरुरत महसूस नहीं होती थी। मेरे हर अच्छे बुरे निर्णय में वह मेरे साथ रहती। बस यूँ समझो कि हरपल वह मेरे साथ रहती, मेरी परछाई की तरह । नौकरी मिली, उसके बाद घर वालो ने मेरे शादी तय की । इस शादी तय करने के मामले में न उसने और न मैंने, अपने घर वालो का साथ दिया था, मैंने अपने घरवालो से सिर्फ यह कह दिया था कि जो आपलोगों को उचित लगे, करो । फिर शादी का दिन भी आ गया । मुझे याद है, उसने मेरे शादी के साजो-सामान को चुनने/खरीदने में भी मेरी पूरी मदद की थी । कहाँ क्या बोलना है, नवेली दुल्हन के साथ क्या बात करनी है कैसे बर्ताव करना है, हर एक बात वह मुझे बारीकी से समझा देती थी । घर-गृहस्थी बसाने के बाद बच्चे हुए, शहर में मकान खरीदा, बच्चो को स्कूल में भर्ती करवाया । यहाँ भी मेरे हर एक निर्णय और हर कदम पर वह एक सच्चे दोस्त की भांति मेरे साथ रही। मैं कभी-कभी इस सोच और फिक्र में डूब जाता कि वह मेरे लिए इतना त्याग करती है, मगर मैंने इसे सिवाए प्यार के और क्या दिया ?
दिन, महीने, साल गुजरते रहे, मगर वह मेरा साथ छोड़ने को तैयार न थी । एक साये की तरह मेरे पीछे थी । मुझे जब भी उदास अथवा चिंतित देखती, मेरा हाथ पकड़ मुझे बाहर गाड़ी तक खींच लाती और कहीं चलने को कहती । अभी कुछ दिन पहले की बात है, क्रिसमश की छुट्टी होने की वजह से, मैं घर के बाहर बरामदे में बैठा सर्दियों की धूप का आनंद ले रहा था और भारत पाकिस्तान के बीच आंख मिचोली के खेल के बारे में विचार मग्न था, कि तभी अचानक वह फिर आ गई । मुझको ढंग के कपड़े पहनने का निर्देश दे, ख़ुद बरामदे के एक कोने पर खड़ी होकर धूप सेकने लगी । मैं अन्दर गया, कपड़े बदले और तैयार होकर बाहर निकला । गाड़ी स्टार्ट की और चल दिए, वह मेरी बगल वाली सीट में बैठ गई। सफेद लिवास में आज वह कुछ ज्यादा ही खुबसूरत दिख रही थी ।
वह मुझे शहर के एक बड़े चर्च में ले आई थी। चर्च में काफ़ी लोग इकट्ठा थे, क्रिश्मश मनाने के लिए । जिनमे बच्चे और युवा ज्यादा थे । उसके द्वारा बहुत सी क्रिश्चियन हसीनाओ से मुझे मिलाया गया। वो हसीनाये मुझे 'मैरी क्रिसमस' कहकर मेरे गाल पर किस करती और मिठाईया खिलाती, मैं गदगद था । शाम को पास के होटल में कॉकटेल पार्टी थी । मैं भी स्वाद के मारे रेड-वाईन के काफ़ी पैग ले चुका था । अब तक मैं तो अपने घर की तरफ़ से एकदम बेफिक्र सा था, मगर वह हर इंसान की भावनाए जानती और समझती थी, अतः उसने मुझे मेरी पत्नी को घर पर फोन करने को कहा । मैंने अपने मोबाईल फ़ोन से घर फ़ोन किया, उसने धीरे से मेरे कान में कहा कि इस समय तुम होश में नही हो, इसलिए ज्यादा बात मत करना और यह कहदो कि मैं यहाँ पर क्रिसमस की पार्टी अटेंड कर रहा हूँ, दोस्तों के साथ, अतः रात को घर नहीं लौटूंगा, तुम लोग खाना खाकर सो जाना। मेरे अधिक ले लेने के बाद उसने मह्सुश किया कि मैं अब ड्राइव करने लायक नही रहा, अतः उसने होटल में ही मेरे लिए कमरा बुक किया और मैं वहीँ एक कमरे मे सो गया, वह मेरे पास में ही बैठी थी और धीरे-धीरे मेरे बालो को सहला रही थी और एक गीत गुनगुना रही थी: आ चल के तुझे मैं लेके चलू इक ऐंसे गगन के तले.....फिर मैं सो गया ।
अब तक में उसकी वह राम कहानी बड़े धैर्य से सुन रहा था, किन्तु चूँकि मैं भी नशे में था , अतः मुझे उसकी कहानी सुनकर उसपर गुस्सा आ गया और मैंने गुस्से में उसे लगभग गाली देते हुए कहा, मैं तो तुझे एक शरीफ इंसान समझता था, पर तू तो बड़ा ही आवारा-बदचलन किस्म का इंसान है, अपने बीबी बच्चो को छोड़ किसी और के साथ गुलछर्रे उडाता है। बेटा, यह सुख ज्यादा दिन नही भोग पायेगा, दो नावों में सफर करने वाला बुरी तरह भंवर में डूबता है। मेरी बात और गालियों को शांत ढंग से सुनते हुए वह मंद-मंद मुस्कुराया और बोला, इसका मतलब मेरी कहानी अच्छी लगी तुझे । मैंने उसको घूरते हुए देखा और मैं बोला कुछ नहीं । वह बोला, मुझे मालूम है कि तेरा ये कबाडी दिमाग आगे क्या सोच रहा होगा, तू अपने दिमाग पर जोर डाल कर सोच रहा होगा कि यह जानते हुए भी कि यह एक शादी-शुदा इंसान है, वह कौन कलूटा होगी जो इसको इतना चाहती है ? तो सुन, पता है वह कौन थी? अरे इडियट, वह मेरी खुद की कल्पना थी, मेरी अपनी कल्पना,... इट वाज जस्ट माय इमेजिनेशन... उसकी बात सुन मैंने पुछा, तू सच बोल रहा है न ? उसने अपने बच्चो की कसम खाते हुए कहा, यार तुझे मुझ पर भरोसा नहीं ? उसकी बात सुन मैंने और उसने जोर का एक ठहाका लगाया, और उसने भी इस खुशनुमा माहौल का फायदा उठाते हुए जल्दी से जो कुछ बोतल के निचले भाग में बची थी, उसे भी अपने गिलास में उडेल दिया। मैं उसका मुह देखता रह गया था।
गोदियाल
Tuesday, December 9, 2008
बीजेपी बनाम पाकिस्तान !
टीवी पर चुनाव के नतीजों के समाचारों और विश्लेषणों से उकताकर एक कोने में बैठा मूंगफली के छिलकों को अपने कोपभाजन का शिकार बना रहा था कि यूँ ही बहुत सारे ख़याल दिलोदिमाग में आए और आते चले गये ! इनमे से कुछेक को यहाँ लेखनी में बंद कर रहा हूँ !
पुरे देश के मतदातावो की तुलना में, मैं समझता हूँ कि दिल्ली का मतदाता ज्यादा पढ़ा-लिखा होगा ! और ज्यादा नही मगर कुछ मायनो में दिल्ली के चुनाव परिणाम वाकई चौंकाने वाले है ! भूल जाईये आतंकवाद को क्योंकि अब ज्यादातर हिन्दुस्तानी इसके आदी हो चुके मगर क्या दिल्ली के मतदातावो की याददाश्त वाकई इतनी ख़राब हो गई है कि इन्हे अभी एक महीने पहले तक की दिल्ली की सडको का वह बदहाल नक्शा भी याद नही रहा जो इन्होने विकास के नाम पर ( जैसा कि कांग्रेस वाले कह रहे है ) वोट दिया ? या फिर बीजेपी के जोकरों की शक्ल इतनी भद्दी थी जो इनको रास नही आई ? कुछ तो अजूबा है , दाल में काला न सही , दाल में कंही गंध जरूर है !
बीजेपी की बात चली है तो यह भी एक इत्तफाक ही कहूँगा कि दक्षिण एशिया के इस तथाकथित सबसे बड़े लोकतंत्र के परिदृश्य में परदे पर जो दो दृश्य इस वक्त कुछ ज्यादा ही नजरो के सामने है, उनमे से एक है पाकिस्तान और दूसरा बीजेपी ! आगे बढ़ने से पहले बता दूँ कि यहाँ अगर बीजेपी और पाकिस्तान की बात चल पड़ी है तो अपनी कांग्रेस को अमरीका और ब्रिटेन के समक्ष रखना होगा जिनका मूल मन्त्र है फूट डालो और राज करो !.... येन-केन प्रकारेण अपना हित सर्वोपरि बाकी दुनिया जाए भाड़ में....... !
बीजेपी और पाकिस्तान रूपी दृश्यों पर जब एक साथ नज़र पड़ती है इनकी तुलनात्मक दृष्टि से जब आंकलन करने लगता हूँ तो इन दोनों के बीच मुझे काफ़ी समानताएं नज़र आने लगती है ! मसलन दोनों का बड़बोलापॅन ! अभी एक टीवी फुटेज देखी थी ! २६/११ के बाद हिन्दुस्तानी मीडिया का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तानी मीडिया ने अपने एक सुरक्षा सलाहाकार को कार्यक्रम में आमंत्रित किया ! वे भले ही अपनी पैंट ठीक से नही संभाल पा रहे हो मगर उन सुरक्षा सलाहकार महोदय के तेवरों से ऐंसा लग रहा था मानो ये अभी इंडिया पर परमाणु मिसाइल दाग देंगे ! बोलते वक्त ये भूल जाते है कि अगर हम दुसरे के खिलाफ ब्रहमास्त्र प्रयोग करने की बात कर रहे है तो क्या दूसरा यू ही हाथ पर हाथ धरे, राम भरोसे बैठा रहेगा क्या ? ( हालाँकि भारत के संदर्भ में यह बात काफ़ी हद तक फिट नही बैठती, २६/११ और उसके बाद की घटनाएं इसका ज्वलंत उदाहरण है )
दूसरी जो मुख्य बात है वह है इन दोनों की कार्य प्रणाली में संजीदगी का अभाव, इनके कामो में जमीनी सच्चाई कम और तमाशा ज्यादा छलकता है ! 'कथनी और करनी' में जमीन आसमान का फर्क ! ढीडोरा पीटना मानो इनका जन्म सिद्ध अधिकार हो ! इस किस्म के प्राणी अगर कभी लग्न और इमानदारी से भी कोई काम कर रहे हो तो देखने वाले को वह भी " ड्रामेबाजी " ही नज़र आती है !
तीसरी जो समानता है वह है नैतृत्व, ये अपने भाषणों में तो बड़ी बड़ी अग्नि और शाहीन मिसाइले छोड़ देते है मगर जब मिसाइल छोड़ने का सही वक्त आता है तो इनको यह पता ही नही रहता कि बटन किसके हाथ में है ? मिंया जरदारी साहब इधर हिन्दुस्तान आकर अपने अडवाणी जी से हाथ मिलाकर भविष्य में आतंकवाद को नियंत्रित करने के फोर्मुलो पर विचार कर रहे होते है और दूसरी तरफ अगले ही दिन उनके पाकिस्तानी बाज थाक्डे मुंबई पर हमला कर निर्दोषों को हलाल कर बकर ईद मनाने की जुगत में होते है ! नवाज़ मिंया अटल जी की गाड़ी के लिए लाहौर आने का रास्ता तैयार कर रहे होते है तो मुशर्रफ मिंया कारगिल की पहाड़ी से आगे सड़क पर बड़े बड़े पत्थर लुढ़का देते है ! मुशर्रफ- जरदारी, गिलानी-कियानी, मूसा- गुल, अटल-अडवाणी, राजनाथ-मोदी, बानर सेना- भालू सेना, सब गोलमाल, पता ही नही चल पाता कि इनका सुप्रीम कमानडर है कौन और इनकी जबाबदेही है किसके प्रति ?
चौथी और एक और प्रमुख समानता है कि हर जगह अपना राजनैतिक स्वार्थ देखकर टांग अडाना ! चाहे वह अफगानिस्तान की तालिबान का मुद्दा हो या जम्मू कश्मीर का, चाहे वह अमरनाथ जमीन का मुद्दा हो या मालेगांव के साध्वी का ! वजाय इसके कि धार्मिक मुद्दों को राजनीती से अलग रख उस पर अपना अलग रुख अख्तियार करे , ये हर जगह ठेकेदार बन कर पहुँच जाते है ! इसका जो भी सिपय-सालार वहां पहुँचता है कुछ भी बोल देता है ! क्या बोलना है क्या नही, कोई लगाम नही !
एक समय था जब मै भी यह मानकर चलता था की इस पार्टी में आगे चलकर देश को नई उचाईयो पर ले जाने की क्षमता है लेकिन लगता है मेरा यह भ्रम भी जिन्ना के पकिस्तान रूपी ख्वाबो की तरह सिन्धु नदी के तट पर दफ़न हो जाएगा ! ऐंसा नही कि इनमे पढ़े लिखे , समझदार , इमानदार और कर्मठ लोगो की कमी है दोनों तरह ऐंसे लोगो की भरमार है कमी है तो बस शालीनता की , कमी है तो बस पारदर्शिता की , कमी है तो बस एक दृड़ संकल्प की, कमी है इच्छा शक्ति की, कमी है अपने संकीर्ण दृष्टिकोण और निजी स्वार्थो को छोड़ एक व्यापक परिदृश्य में सोचने की !
पुरे देश के मतदातावो की तुलना में, मैं समझता हूँ कि दिल्ली का मतदाता ज्यादा पढ़ा-लिखा होगा ! और ज्यादा नही मगर कुछ मायनो में दिल्ली के चुनाव परिणाम वाकई चौंकाने वाले है ! भूल जाईये आतंकवाद को क्योंकि अब ज्यादातर हिन्दुस्तानी इसके आदी हो चुके मगर क्या दिल्ली के मतदातावो की याददाश्त वाकई इतनी ख़राब हो गई है कि इन्हे अभी एक महीने पहले तक की दिल्ली की सडको का वह बदहाल नक्शा भी याद नही रहा जो इन्होने विकास के नाम पर ( जैसा कि कांग्रेस वाले कह रहे है ) वोट दिया ? या फिर बीजेपी के जोकरों की शक्ल इतनी भद्दी थी जो इनको रास नही आई ? कुछ तो अजूबा है , दाल में काला न सही , दाल में कंही गंध जरूर है !
बीजेपी की बात चली है तो यह भी एक इत्तफाक ही कहूँगा कि दक्षिण एशिया के इस तथाकथित सबसे बड़े लोकतंत्र के परिदृश्य में परदे पर जो दो दृश्य इस वक्त कुछ ज्यादा ही नजरो के सामने है, उनमे से एक है पाकिस्तान और दूसरा बीजेपी ! आगे बढ़ने से पहले बता दूँ कि यहाँ अगर बीजेपी और पाकिस्तान की बात चल पड़ी है तो अपनी कांग्रेस को अमरीका और ब्रिटेन के समक्ष रखना होगा जिनका मूल मन्त्र है फूट डालो और राज करो !.... येन-केन प्रकारेण अपना हित सर्वोपरि बाकी दुनिया जाए भाड़ में....... !
बीजेपी और पाकिस्तान रूपी दृश्यों पर जब एक साथ नज़र पड़ती है इनकी तुलनात्मक दृष्टि से जब आंकलन करने लगता हूँ तो इन दोनों के बीच मुझे काफ़ी समानताएं नज़र आने लगती है ! मसलन दोनों का बड़बोलापॅन ! अभी एक टीवी फुटेज देखी थी ! २६/११ के बाद हिन्दुस्तानी मीडिया का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तानी मीडिया ने अपने एक सुरक्षा सलाहाकार को कार्यक्रम में आमंत्रित किया ! वे भले ही अपनी पैंट ठीक से नही संभाल पा रहे हो मगर उन सुरक्षा सलाहकार महोदय के तेवरों से ऐंसा लग रहा था मानो ये अभी इंडिया पर परमाणु मिसाइल दाग देंगे ! बोलते वक्त ये भूल जाते है कि अगर हम दुसरे के खिलाफ ब्रहमास्त्र प्रयोग करने की बात कर रहे है तो क्या दूसरा यू ही हाथ पर हाथ धरे, राम भरोसे बैठा रहेगा क्या ? ( हालाँकि भारत के संदर्भ में यह बात काफ़ी हद तक फिट नही बैठती, २६/११ और उसके बाद की घटनाएं इसका ज्वलंत उदाहरण है )
दूसरी जो मुख्य बात है वह है इन दोनों की कार्य प्रणाली में संजीदगी का अभाव, इनके कामो में जमीनी सच्चाई कम और तमाशा ज्यादा छलकता है ! 'कथनी और करनी' में जमीन आसमान का फर्क ! ढीडोरा पीटना मानो इनका जन्म सिद्ध अधिकार हो ! इस किस्म के प्राणी अगर कभी लग्न और इमानदारी से भी कोई काम कर रहे हो तो देखने वाले को वह भी " ड्रामेबाजी " ही नज़र आती है !
तीसरी जो समानता है वह है नैतृत्व, ये अपने भाषणों में तो बड़ी बड़ी अग्नि और शाहीन मिसाइले छोड़ देते है मगर जब मिसाइल छोड़ने का सही वक्त आता है तो इनको यह पता ही नही रहता कि बटन किसके हाथ में है ? मिंया जरदारी साहब इधर हिन्दुस्तान आकर अपने अडवाणी जी से हाथ मिलाकर भविष्य में आतंकवाद को नियंत्रित करने के फोर्मुलो पर विचार कर रहे होते है और दूसरी तरफ अगले ही दिन उनके पाकिस्तानी बाज थाक्डे मुंबई पर हमला कर निर्दोषों को हलाल कर बकर ईद मनाने की जुगत में होते है ! नवाज़ मिंया अटल जी की गाड़ी के लिए लाहौर आने का रास्ता तैयार कर रहे होते है तो मुशर्रफ मिंया कारगिल की पहाड़ी से आगे सड़क पर बड़े बड़े पत्थर लुढ़का देते है ! मुशर्रफ- जरदारी, गिलानी-कियानी, मूसा- गुल, अटल-अडवाणी, राजनाथ-मोदी, बानर सेना- भालू सेना, सब गोलमाल, पता ही नही चल पाता कि इनका सुप्रीम कमानडर है कौन और इनकी जबाबदेही है किसके प्रति ?
चौथी और एक और प्रमुख समानता है कि हर जगह अपना राजनैतिक स्वार्थ देखकर टांग अडाना ! चाहे वह अफगानिस्तान की तालिबान का मुद्दा हो या जम्मू कश्मीर का, चाहे वह अमरनाथ जमीन का मुद्दा हो या मालेगांव के साध्वी का ! वजाय इसके कि धार्मिक मुद्दों को राजनीती से अलग रख उस पर अपना अलग रुख अख्तियार करे , ये हर जगह ठेकेदार बन कर पहुँच जाते है ! इसका जो भी सिपय-सालार वहां पहुँचता है कुछ भी बोल देता है ! क्या बोलना है क्या नही, कोई लगाम नही !
एक समय था जब मै भी यह मानकर चलता था की इस पार्टी में आगे चलकर देश को नई उचाईयो पर ले जाने की क्षमता है लेकिन लगता है मेरा यह भ्रम भी जिन्ना के पकिस्तान रूपी ख्वाबो की तरह सिन्धु नदी के तट पर दफ़न हो जाएगा ! ऐंसा नही कि इनमे पढ़े लिखे , समझदार , इमानदार और कर्मठ लोगो की कमी है दोनों तरह ऐंसे लोगो की भरमार है कमी है तो बस शालीनता की , कमी है तो बस पारदर्शिता की , कमी है तो बस एक दृड़ संकल्प की, कमी है इच्छा शक्ति की, कमी है अपने संकीर्ण दृष्टिकोण और निजी स्वार्थो को छोड़ एक व्यापक परिदृश्य में सोचने की !
Thursday, September 4, 2008
इस देश को भगवान् भी नही बचा सकता ! - सुप्रीम कोर्ट
तो नौबत यहाँ तक आ पहुँची है ! एक नागरिक को न्याय पाने के लिए देश की जिस सर्वोच्च संस्था पर आखिरी भरोषा रहता है वही अगर इस तरह के रिमार्क्स दे रही हो तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति किस हद तक बिगड़ चुकी है ! हमारे ये पालनहार, जिन्हें देश चलाने की जिम्मेदारी सौपी गई है उनका भद्दा चेहरा हाल ही में देश ही नही अपितु दुनिया देख चुकी है ! परमाणु डील का दुस्वप्न दिखा कर वास्तविक समस्याओ की जानबूझ कर अनदेखी की जा रही है ! अपनी नाकामयाबियों को छुपाने के नए नए मुद्दे देश के समक्ष लाये जा रहे है ताकि वास्तविक और ज्वलंत मुद्दों की तरफ़ से लोगो का ध्यान बंटाया जा सके !
जैंसा की मैंने पहले कहा,स्वार्थ सिद्दी के लिए देश की बागडोर एक चालाक विदेशी मूल की महिला ने एक बेहद अक्षम------ इंसान को प्रोक्सी के तौर पर सौंफ रखी है ! जिस इंसान में आत्म सम्मान नाम की वस्तु है ही नही ! अगर ये वस्तु इस इंसान में होती तो हाल में हुई सारी घटनावो की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुंरत पद छोड़ चुका होता ! ये लोग एक नुक्लियेर डील की दुहाई दे कर यह भूल चुके है कि पिछले चार सालो में इन्होने देश का बेडा गरक कर दिया है ! चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, राजनैतिक क्षेत्र हो, धार्मिक क्षेत्र हो, सुरक्षा क्षेत्र हो अथवा सांस्कृतिक क्षेत्र हो , हर मोर्चे पर यह सरकार नाकामयाब सिद्ध हुई ! न जाने आगे क्या होने वाला है जब भगवान् भी इस देश को नही बचा सकता है !
जैंसा की मैंने पहले कहा,स्वार्थ सिद्दी के लिए देश की बागडोर एक चालाक विदेशी मूल की महिला ने एक बेहद अक्षम------ इंसान को प्रोक्सी के तौर पर सौंफ रखी है ! जिस इंसान में आत्म सम्मान नाम की वस्तु है ही नही ! अगर ये वस्तु इस इंसान में होती तो हाल में हुई सारी घटनावो की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुंरत पद छोड़ चुका होता ! ये लोग एक नुक्लियेर डील की दुहाई दे कर यह भूल चुके है कि पिछले चार सालो में इन्होने देश का बेडा गरक कर दिया है ! चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, राजनैतिक क्षेत्र हो, धार्मिक क्षेत्र हो, सुरक्षा क्षेत्र हो अथवा सांस्कृतिक क्षेत्र हो , हर मोर्चे पर यह सरकार नाकामयाब सिद्ध हुई ! न जाने आगे क्या होने वाला है जब भगवान् भी इस देश को नही बचा सकता है !
गुलाम मानसिकता
कहने को इस देश को आजाद हुए ६१ साल हो गए, लेकिन मानसिक रूप से क्या सचमुच हम आजाद हुए ? तथाकथित आज़ादी से पहले भारत में दो वर्ग होते थे , एक शासक और दूसरा गुलाम ! और आज क्या है? आज भी तो वही है ! आज़ादी के बाद हमने अपना संविधान बनाया लेकिन भारतीय राजनीति का आधार क्या हो, इस पर चिंतन करना भूल गए ! यही वजह है कि स्वतंत्रता के बाद से जब भी आम चुनाव हुए भारतीय जनता की मानसिकता राजा और प्रजा के भाव में ही सिमित रही !
आज सोचता हु कि आज़ादी के बाद भी हम भारतीय गुलामो ने पिछले ६० सालो में सिवाए राजावो की जय-जयकार और चाटुकारिता के सिवाए किया क्या ? ६० और ७० के दशक में हमने राजकुमारी इंदिरा की जय-जयकार की ! ७० से ८० के दशक में हमने राजकुमार संजय की जय-जयकार की , ८० से ९० के दशक में हमने राजकुमार राजीव की जय-जयकार की, ९० से २००० के दशक में हमने राजबहू सोनिया की जय-जयकार की, आज भी कर रहे है मगर आज के दशक में एक राजकुमार राहुल भी आ गए है और आजकल हम, हमारा मीडिया , हमारे प्रचार मध्यम सिर्फ़ उन्ही की जय-जयकार में लगे है , वह कहा गए, रस्ते में उन्होंने किस दलित के बच्चे को गोदी में उठाया, किस अल्पसंख्यक महिला से गले मिले, रात को किस दलित के घर में सोये, उनका अपने शादी के बारे में क्या ख़याल है उनको कैसे लड़की की तलाश है........... उफ़ ! मुझे लग रहा है की इन गुलामो को राजवंश की चिंता सताने लगी है की कही अगर युवराज ताउम्र कुवारे रहे तो आगे चलकर ये किसकी जय-जयकार करेंगे ?
आज सोचता हु कि आज़ादी के बाद भी हम भारतीय गुलामो ने पिछले ६० सालो में सिवाए राजावो की जय-जयकार और चाटुकारिता के सिवाए किया क्या ? ६० और ७० के दशक में हमने राजकुमारी इंदिरा की जय-जयकार की ! ७० से ८० के दशक में हमने राजकुमार संजय की जय-जयकार की , ८० से ९० के दशक में हमने राजकुमार राजीव की जय-जयकार की, ९० से २००० के दशक में हमने राजबहू सोनिया की जय-जयकार की, आज भी कर रहे है मगर आज के दशक में एक राजकुमार राहुल भी आ गए है और आजकल हम, हमारा मीडिया , हमारे प्रचार मध्यम सिर्फ़ उन्ही की जय-जयकार में लगे है , वह कहा गए, रस्ते में उन्होंने किस दलित के बच्चे को गोदी में उठाया, किस अल्पसंख्यक महिला से गले मिले, रात को किस दलित के घर में सोये, उनका अपने शादी के बारे में क्या ख़याल है उनको कैसे लड़की की तलाश है........... उफ़ ! मुझे लग रहा है की इन गुलामो को राजवंश की चिंता सताने लगी है की कही अगर युवराज ताउम्र कुवारे रहे तो आगे चलकर ये किसकी जय-जयकार करेंगे ?
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