Friday, May 11, 2012

इस कार्टून में ऐसा गलत क्या था?


अंधेर नगरी चौपट राजा.... शायद यह कहावत एकदम सही चरितार्थ होती है हमारे राजनीतिज्ञों पर ! यूं तो हमारी एनसीईआरटी की किताबों में हमारे बच्चों को बहुत कुछ गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है, मसलन महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया !(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28) जिसकी तरफ हमारे इस सेक्युलर देश के ज्ञानी, विद्धवान राजनीतिज्ञों का कभी या तो ध्यान गया ही नहीं या फिर उनके लिए यह इतनी अहमियत ही नहीं रखता ! किन्तु प्रसिद्द कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा बनाए गए इस कार्टून उन्ही किताबों में छपे संविधान निर्माता डा० भीमराव आंबेडकर का यह कार्टून उनका अथवा हमारे समाज के दलित वर्ग का क्या अपमान कर रहा है, यह मेरी समझ में नहीं आया !



एनसीईआरटी की किताब में इस कार्टून में संविधान नामक घोंघे पर आंबेडकर बैठे दिखाए गए हैं और नेहरू पीछे से घोंघे को सोंटा लगा रहे हैं! दक्षिण के एक सांसद द्वारा उठाये गए इस मुद्दे को क्या कौंग्रेस, क्या बीजेपी और क्या अन्य जिनमे लगभग सभी दलों के नेता, मायावती, पासवान इत्यादि सम्मिलित है, ने यह कहकर हंगामा खडा कर दिया कि इसमें आंबेडकर और दलितों का अपमान किया गया है !कार्टून देखने के बाद मेरे को तो जो तुरंत समझ में आया था वह यह था कि कार्टूनिस्ट ने यह दिखाने की कोशिश की है कि नेहरु उस घेंघे रूपी संविधान को अपने हिसाब से हांकना चाहते थे किन्तु आंबेडकर ने घेंघे ( संविधान ) पर अपनी लगाम कसे रखी ! इसमें तो उलटे उनका मान बढाया गया है !



मगर तरस आता है इन जेनयू जनित दलित बहुसंख्यक कामरेडों की बुद्धि पर, जोकि हुसैन के एक नंगी औरत के उपर सीता लिखने को कला की स्वतंत्रता का नाम देते नहीं थक रहे थे, वो ही अंबेडकर का एक नार्मल कार्टून नहीं पचा पा रहे हैं! इन दोगले लोगो ने अभी प० बंगाल की मुख्मंत्री ममता बनर्जी के कार्टून पर भी बहुत कुछ कहा और यहाँ पलटी मार ली ! अगर कार्टून में मज़ाक ही न हो तो वो कार्टून ही क्या , मगर अफ़सोस कि "दलित" मसला भी इस देश में कुछ कुछ इस्लाम जैसा बन गया है जहाँ वर्णमाला की छोटी बड़ी मात्रा पर भी ख़तरे का अलार्म बज उठता है! जहां तक मैं समझता हूँ , देश काल के हिसाब से यह कार्टून कुछ भी ग़लत नही है, लेकिन आज जब बात दलित, अल्प-संख्यक, मुस्लिम, ईसाई, आदि की हो रही हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे कोई विषय ही नहीं रह जाता है हमारे लोकतंत्र में, हाँ, हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए ये भले ही बीफ फैस्टीबल का आयोजन विद्या मंदिरों में ही भले क्यों न करें !



2 comments:

JHAROKHA said...

aapka kathan bilkul sach laga mujhe .
isme koi galat baat nazar nahi aati.
mai aapki baat se purntaya sahmat
hun.
dhnyvaad
poonam

सुरेन्द्र चतुर्वेदी said...

ज़रा इसे भी देखिये 'शर्म क्‍यों मगर हमें नहीं आती''-bhrashtindia.blogspot.com