<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496</id><updated>2012-02-11T23:38:19.499-08:00</updated><category term='Stories'/><category term='TirchiNazar'/><category term='Novel'/><title type='text'>Tirchhi Nazar (अंधड़ से कहानी और लेख संग्रह )</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>92</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-8755823757649753389</id><published>2011-02-27T21:05:00.000-08:00</published><updated>2011-04-25T03:53:01.142-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>शारदा !</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;कृष्णा बाथरूम से नहाकर ज्यों ही &lt;span style="font-size: large;"&gt;बाहर&lt;/span&gt; अपने कमरे में पहुंचा और उसने तौलिये से अपने गीले बालों को हौले-हौले रगड़ना शुरू किया, तभी किचन से स्वाति ने भी कमरे में प्रवेश किया और बोली; सुनो जी, आज गणतंत्र दिवस की छुट्टी है, मार्केट बंद रहेगा। &lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;वो तो हर&amp;nbsp;होता है, नया&amp;nbsp;क्या है इसमें&amp;nbsp;? कृष्ण&amp;nbsp;ने बिना&amp;nbsp;स्वाति&amp;nbsp;की तरफ&amp;nbsp;देखे&amp;nbsp;ही सवाल किया। नहीं मेरा कहने का मतलब&amp;nbsp;यह था कि&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt; तुम भी फ्री हो, क्यों न आज हम लोग माँ को मिलने चलें, हमारी शादी के बाद जबसे बेचारी जेल गई है, हम लोग एक बार भी उनकी कुशल-क्षेम पूछने नहीं गए। एक बार राहुल को तो उनसे मिला देते, वह भी दो-ढाई साल का हो गया है, उसने भी अभी तक अपनी दादी को नहीं देखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाति की इस बात पर एक बार तो कृष्णा भड़क ही गया, और स्वाति की तरफ देखते हुए गुस्सैल अंदाज में बोला, यार मैं तुम्हे कितनी बार बता चुका कि मुझे नहीं मिलना किसी माँ-वां से, मेरी माँ पांच साल पहले मर चुकी, अब मेरी कोई माँ-वां नहीं है। कृष्णा की बात सुनकर, थोड़ा रूककर स्वाति&amp;nbsp; अपने दोनों हाथों से उसका बाजू पकड़ते हुए उसे पुचकारते हुए बोली "यार, वो तुम्हारी माँ है, तुम कैसे निष्ठुर बेटे हो। एक बार भी यह नहीं सोचते कि बिना उनकी बात सुने ही हम लोगो ने उनसे इसतरह किनारा कर लिया। कोई तो बात रही होगी जो तुम्हारी माँ ने इतना कठोर कदम उठाया। इतनी तो उनके लिए नफ़रत मेरे दिल में भी नहीं है, जो उनकी बहु हूँ, और जिसने अपने पिता को …......."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाति ने अपनी बात अधूरी ही छोड़ दी, उसके मोटे-मोटे नयन छलछला आये थे। यह देख कृष्णा नरम पड़ते हुए, अपनी हथेली से उसके गालो पर लुडक आये आंसूओं को फोंछ्ते हुए बोला, अच्छा बाबा,ब्लैकमेल करना तो कोई तुमसे सीखे। चलो ठीक है, अगर माँ से मिलने की तुम्हारी इतनी ही हार्दिक इच्छा है तो फटाफट नाश्ता तैयार करो। राहुल को जगाकर उसे भी तैयार कर लो, फिर चलेंगे। कृष्णा पर अपनी बात का असर होता देख स्वाति का चेहरा एक बार फिर से खिल उठा। अपने गालो को अपने दोनों हाथों से साफ़ करते हुए उसने उछलकर अपने से तकरीबन एक फुट लम्बे कृष्णा की गर्दन में अपने दोनों हाथ फंसाकर उसकी गर्दन नीचे खींचते हुए उसे थैंक्यू कहकर उसका माथा चूम लिया। उसके बाद वह वापस किचन में चली गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन भाग्य को तो शायद कुछ और ही मंजूर था। और कभी-कभार यह देखा भी गया है कि जिस बात का अचानक ही जुबां पर कभी कोई जिक्र आ जाए, उसके पीछे उससे सम्बंधित कोई अदृश्य घटनाक्रम या तो पहले ही घटित हो चुका होता है, या फिर घटित होने वाला होता है। कृष्णा के लिए किचन में चाय तैयार करते हुए इधर स्वाति इतने सालों बाद पहली बार अपनी सासू माँ से जेल में मिलने जाने के ख्वाब सजाते हुए अपने मानस पटल पर उस वक्त के भिन्न-भिन्न काल्पनिक परिदृश्य, जब वह अपनी सासू माँ से जेल में मिल रही होगी, किसी चित्रपट की तरह परत दर परत आगे बढ़ा रही थी, और उधर बाहर मेन गेट पर एक खाकी वर्दीधारी जोर-जोर से गेट का ऊपरी कुंडा खटखटा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आवाज सुनकर स्वाति जब किचन से निकलकर घर के मुख्य द्वार पर पहुची, तो उसने देखा कि कृष्णा पहले ही आँगन के बाहर मेन गेट पर पहुँच चुका था, और उस खाकी वर्दीधारी से कुछ बातें कर रहा था। कुछ देर बातें करने के बाद जब वह खाकी वर्दीधारी वहाँ से चला गया तो कृष्णा भी घर के मुख्य द्वार की तरफ मुडा। भारी डग भरते हुए जब वह स्वाति के पास पहुंचा तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। बिना एक पल का भी इन्तजार किये स्वाति ने आशंकित और कंपकपाती आवाज में पूछा; क्या हुआ, कौन था वो वर्दीधारी? कृष्णा ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया और स्वाति को अन्दर चलने का हाथ से इशारा भर किया। ड्राइंग रूम में पहुंचकर दोनों साथ-साथ सोफे पर बैठ गए। जबाब सुनने को आतुर स्वाति ने फिर से वही सवाल दुहराया। कृष्णा ने सुबकते हुए अपना सर बगल में चिपककर बैठी स्वाति के सर पर रखते हुए कहा; जेल से था, मुझे तुरंत आने को कहा है....माँ ने कल रात को अपनी हाथ की नशे काटकर आत्महत्या कर ली। कृष्णा की यह बात सुनकर स्वाति हतप्रभ रह गई, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक पलटी इस तकदीर की बाजी पर वह खुद रोये या फिर कृष्णा को ढाढस बंधाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ पल यों ही बेसुध बैठा रहने के बाद फिर कृष्णा उठा और स्वाति को राहुल के पास घर पर ही ठहरने की सलाह देते हुए जिला जेल जाने की तैयारी करने लगा। वहाँ पहुँचने पर वह सीधे जेलर के दफ्तर में घुसा। जेलर जोशी मानो उसी का इन्तजार कर रहे थे। उसे अपने सामने की कुर्सी पर बिठाते हुए जेलर ने कृष्णा से अपनी संवेदना व्यक्त की और उसे उसकी माँ का वह पत्र सौंपा, जिसे वह पिछली शाम को ही जेल के एक कर्मचारी को यह कहकर सौंप गई थी कि इसमें उसने अपने बेटे-बहु के लिए अपनी कुशल-क्षेम और पोते के लिए आशीर्वाद भेजा है, और इसे वह उन&amp;nbsp;लोगो तक पहुंचा दे। आज सुबह तडके जब हमें इस घटना की जानकारी मिली, तब उस कर्मचारी ने यह पत्र मुझे दिया। लाश अभी पोस्टमार्टम के लिए गई हुई है, तुम्हे कुछ देर इन्तजार करना होगा, यह कहकर जेलर जोशी अपने काम में व्यस्त हो गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ का दाह-संस्कार संपन्न करने के उपरान्त रात को कृष्णा ने बड़े ही सलीखे से एक बंद लिफ़ाफ़े में रखा हुआ, माँ का वह ख़त खोला जो जेलर ने उसे सौंपा था। चिट्ठी क्या थी, बस एक तरह से २५ जनवरी २०११ का अपने हाथों का लिखा माँ का आत्म-कथ्य था। लिखा था;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;बेटा,&lt;br /&gt;मैं बहुत थक गई हूँ, विश्राम लेना चाहती हूँ। प्रभु के दर्शन की इच्छा ने मेरी भूख, प्यास और नींद भी छीन ली है। मैंने अपनी आत्मा के अन्दर बहुत से सवाल समेटकर रखे है, उस पार अगर सचमुच कोई अनंत-परमेश्वर है, और मेरा सामना वहाँ उनसे होता है, तो इन&amp;nbsp;सवालों की पोटली को उनके समक्ष खोलूँगी जरूर। आशा करती हूँ कि मेरे इस पत्र को पढने के बाद तुम और स्वाति मुझे माफ़ कर दोगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते है कि सब कुछ यहाँ भाग्य पर निर्भर होता है। लेकिन, मैं जब पलटकर देखती हूँ तो न जाने क्यों मुझे लगता है कि तमाम उम्र अपने भाग्य के दिन तो मैंने खुद ही तय किये। और आज फिर से आख़िरी बार भी वही दोहरा रही हूँ। इंसान क्या सोचता है और क्या हो जाता है। जानती हूँ कि जो कदम मैं उठाने जा रही हूँ, सामान्य परिथितियों में कोई भी विवेकशील पढ़ा-लिखा इंसान उसे पसंद नहीं करता। मगर कभी-कभी जीवन में वो मोड़ भी आ जाते है, जब क्या अच्छा है और क्या बुरा, जानते हुए भी इंसान खुद को मन के प्रवाह में बहने से नहीं रोक पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में तुझे हमसे हमेशा यह शिकायत रहती थी कि इलाके के अन्य बच्चों की तरह हम लोग भी तुझे छुट्टियों में तेरे दादा-दादी, नाना-नानी से क्यों नहीं मिलवाने ले जाते। आज तेरी उस शिकायत पर अमल न करने की वजह भी मैं तुझे&amp;nbsp;बताये देती हूँ। साथ ही स्वाति की वह शिकायत भी दूर करूंगी कि मैंने क्यों उसके पापा की ह्त्या की थी। हाँ, मेरे नन्हे पोते की भी जरुर मुझसे यह शिकायत होगी कि मैं उसे क्यों नहीं मिली, तो उसकी मैं इसबात के लिए जन्म-जन्मों तक गुनाहगार रहूंगी कि मैं उसकी शिकायत&amp;nbsp; दूर नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;कर पाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटा, तेरे नाना, यानि&amp;nbsp;&amp;nbsp;मेरे पापा गरीब तबके के लोग थे, और मोदीनगर में एक टैक्सी ड्राइवर थे। वे मुख्यत: सूगर मिल के अधिकारियों को लाने, लेजाने का काम करते थे। हम लोग मोदीनगर में एक छोटे से मकान में रहते थे, जो मोदी भवन के ठीक सामने लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास में था। चार भाईबहनो में मैं सबसे बड़ी थी, और मेरे पापा मुझे बहुत लाड देते थे। वे मुझे पढ़ा-लिखाकर एक सशक्त लडकी बनाना चाहते थे, अत: घर की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी उन्होंने मुझे ग्रेजुएशन करवाया। खाली समय में वे मुझे टैक्सी चलाना भी सिखाते थे, उस जमाने में मुख्यतया दो तरह की ही गाड़ियां लोगो के पास थी, एक फिएट और दूसरी एम्बेसडर। मैं अपने कॉलेज की कबड्डी की एक कुशल खिलाड़ी भी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फाइनल इयर के दौरान एक बार अंतर्राज्य खेल प्रतिस्पर्धा के लिए मैं और मेरी टीम के अन्य सदस्य महीने भर के कैम्प में दिल्ली गए हुए थे। जालिम दुनिया के फरेबों से बेखबर मैं पूरी लग्न से अपने खेल की प्रेक्टिस में जुटी थी कि वहीं एक सुन्दर, हट्टा-कट्ठा नौजवान मेरे इर्दगिर्द मंडराने लगा। मेरे खेल की तारीफ़ के बहाने वह मेरे करीब आया और बड़े ही शालीन ढंग से उसने अपना परिचय कीर्तिनगर, दिल्ली निवासी मनोज गुप्ता के रूप में दिया। अब वह हर रोज ही हमारे कैम्प के आस-पास मंडराने लगा था। एक दिन फिर वह हमारी खेल टीचर से मीठी-मीठी बाते कर मेरा पता भी पूछ बैठा। उसने मुझे बताया कि वह ब्रिटेन में नौकरी करता है, और अगले सप्ताह वह वापस ब्रिटेन चला जाएगा। फिर एक दिन वह थोड़ी देर के लिए आया और झट से यह कहकर चला गया कि वह सिर्फ मुझे बाय कहने आया था क्योंकि उसके पास अब समय कम है, उसे वापसी की तैयारी करनी है। और साथ ही यह भी बता गया कि उसके पिता जोकि एक जाने-माने व्यापारी है, मेरे पिता से मिलने मोदीनगर आयेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर कुछ दिनों&amp;nbsp;बाद एक दिन शाम को हमारे घर के आगे एक एम्बेसडर कार रुकी। एक ५८-६० साल का अधेड़ मेरे पिता के साथ हमारे घर&amp;nbsp;आया। उसने खुद को मनोज का पिता बताया और कहा कि वैसे तो बराबरी में हम&amp;nbsp; लोग उनके&amp;nbsp;मुकाबले कहीं भी नहीं ठहरते थे, लेकिन चूँकि हमारा&amp;nbsp;लड़का आपकी बेटी को पसंद करता है, और&amp;nbsp;उसे बोल्ड और निर्भीक लडकिया पसंद है, अत: बेटे की जिद के आगे मैं यह रिश्ता करने के लिए मजबूर हूँ। उस व्यक्ति ने&amp;nbsp;आगे&amp;nbsp;कहा&amp;nbsp;;&amp;nbsp;हमें आपसे दहेज़ में कुछ भी नहीं चाहिए, और न ही हम किसी गाजेबाजे के साथ आयेंगे, मेरा बेटा साधारण ढंग से शादी करने का पक्षधर है। लेकिन आप यह भली प्रकार से समझ ले कि शादी के बाद आपकी बेटी को तुरंत मेरे बेटे के साथ ब्रिटेन रहने के लिए जाना होगा। बेटी के लिए एक अच्छा घर मिलने की आश में मेरे पिता ने भी तुरंत हामी भर ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर करीब तीन महीने बाद तय-शुदा दिन पर दुल्हा मनोज गुप्ता दस-ग्यारह लोगो की एक बारात के साथ हमारे घर पर उतरा। घरवाले खुश थे कि उनकी बेटी एक बड़े घर में जा रही थी। और जल्दी ही विदेश भी चली जायेगी। भोर पर डोली विदाई हुई और मैं दुल्हन बनकर दिल्ली आ पहुँची। घर न जाकर बारात सीधे दिल्ली के एक होटल में गई। जहां न सिर्फ दिनभर, बल्कि रात दस बजे तक पार्टी चलती रही। इस बीच मैं यह नोट कर रही थी कि मेरा दुल्हा मुझसे मिलने कम&amp;nbsp;और दुल्हे का पिता&amp;nbsp;यानि&amp;nbsp;मेरा तथाकथित ससुर, मेरे इर्द-गिर्द ज्यादा घूम रहा था। मेरे साथ विदा करने आया मेरा छोटा भाई और एक चचेरा भाई भी दिन में वापस मोदीनगर लौट चुके थे। फिर रात दस बजे तीन-चार कारों का काफिला कीर्तिनगर, मनोज के घर को चल पडा। घर पहुंचकर मैंने देखा कि घर पर कोई ख़ास चहल-पहल नहीं थी। मेरे अंतर्मन के चक्षु किसी संभावित खतरे से आशंकित थे। और फिर एक ३०-३५ साल की महिला मेरा हाथ पकड़कर ड्राइंग रूम से उस घर के बेसमेंट स्थित एक बड़े से कमरे में ले गयी, और मुझे रिलेक्स होकर बैठने की सलाह देकर खुद कहीं चली गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमरा सामान्य ढंग से सजाया गया था। मैं दुल्हन के लिबास में सिमटी बेड के एक कोने पर बैठ गयी। रात करीब साढ़े बारह बजे मैं यह देख हतप्रभ रह गई कि उस कमरे में नशे में धुत हुआ&amp;nbsp;मनोज का बाप घुस आया था। मै कुछ समझ पाती इससे पहले ही उसने अन्दर से दरवाजा बंद कर लिया। उसके हाथ में कुछ चाबियों के गुच्छे थे, उसमे से एक चाबी का गुच्छा उसने सामने पडी मेज पर रख दिया, वह कार की चाबिया थी। मैं बेड से उतर फर्श पर खडी हो गई। मै मनोज-मनोज चिल्लाना चाह रही थी, मगर डर के मारे मेरे मुह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। उसने लडखडाते हुए मुझे शांत रहने को कहा और हाथ में पकडे दूसरे चाबी के गुच्छे से सामने दीवार पर लगी लकड़ी की आलमारी खोलने लगा। बड़ी मुश्किल से वह&amp;nbsp; आलमारी खोल पाया और फिर आलमारी से ढेर सारे नोटों के बण्डल और गहने निकाल-निकालकर सामने पडी टेबल पर डालने लगा। फिर उसने आलमारी से एक शराब की बोतल और दो गिलास भी निकाले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै दरवाजे की तरफ भागी, मगर दरवाजे पर उसने ताली से अन्दर से लॉक लगा दिया था। वह उसी अवस्था में हँसते हुए मेरी तरफ&amp;nbsp;&amp;nbsp;बढ़ा और मुझे बेड की तरफ खींच कर ले गया। मुझे बेड पर बैठने का इशारा करते हुए उसने उन&amp;nbsp;नोटों&amp;nbsp;के बंडलों की तरफ इशारा करते हुए अपनी अमीरी की डींगे हांकी और मुझे तरह-तरह के सब्ज-बाग़ दिखाए। फिर उसने जो खुद की&amp;nbsp;कहानी सुनाई तो उसे सुनकर मैं दंग रह गई। उसने बताया कि न तो मनोज गुप्ता उसका बेटा ही था, और न शादी में आये मेहमान उसके कोई रिश्तेदार। सब किराए पर लिए गए आवारागर्द, चोर-मवाली थे। वह एक विधुर था और उसके एक बेटी भी थी, जिसकी शादी हो रखी थी। हवस के भूखे उस दरिन्दे इंसान को एक जवां बीवी चाहिए थी, और पैंसे के बल पर उसने मुझे पाने का वह सारा नाटक रचा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारी परिस्थिति को समझने और उसकी नशे की स्थित को भांपने के बाद मैंने भी मन ही मन तुरंत एक फैसला कर लिया था, और दिमाग से काम लेने की ठान ली थी। वह लडखडाता हुआ ज्यों ही बेड पर बैठा, मैंने लपककर सामने रखी शराब की बोतल उठाई और एक बड़ा सा पैग बनाकर उसकी तरफ बढ़ा दिया। मेरे इस बदलाव पर वह खुश था। उसने मुझे भी शराब पीने को कहा, लेकिन मैंने ना में सिर्फ सिर हिलाया। एक-एककर वह तीन बड़े पैग पी गया और वहीं बेड पर एक तरफ को लुडक गया। मैंने हौले से वह शराब की बोतल उसके सिर पर दे मारी। यह सुनिश्चित करने के बाद कि वह पूर्ण अचेतन अवस्था&amp;nbsp;में जा चुका है, मैंने सामने पडी चाबियों का गुच्छा उठाया और दरवाजे को खोलने की कोशिश करने लगी। शीघ्र ही दरवाजे की चाबी गुच्छे में से मुझे मिल गई। मैंने धीरे से दरवाजा खोला और बाहर बेसमेंट के हॉल का जायजा लिया, कही कोई आहट नहीं थी। मै फिर ऊपर सीढिया चढ़कर मुख्य दरवाजे तक पहुँची, दरवाजे पर भी अन्दर से लॉक लगा था, मैंने पास की खिड़की के शीशे से बाहर का जायजा लिया, बाहर गेट पर एक एम्बेसडर कार खडी थी। मै तुरंत ही फिर से बेसमेंट में गई और कमरे और आलमारी में रखे खजाने को वही रखे एक वैग में जल्दी-जल्दी समेट लिया और सामने टेबल पर पडी कार की और अन्य चाबियों का गुच्छा उठाकर गेट की तरफ लपकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्यशाली पलों में मेरा यह तनिक सौभाग्य ही कहा जायेगा कि न सिर्फ़ मैं उस नरक से छूट्कर बाहर आ गई थी, अपितु कार की चाबियां भी मेरे पास मौजूद थी। मैंने तुरंत बैग को कार की पिछली सीट पर रखा और जल्दी से कार स्टार्ट कर उसे दिल्ली की&amp;nbsp;सुनसान&amp;nbsp;सड़कों पर दौडाने लगी। पिता का सिखाया ड्राविंग हुनर आज बहुत काम आ रहा था। करीब एक घंटे बाद मैं मोदीनगर के समीप थी, मगर मैंने घर न जाने का फैसला कर लिया था। मैंने कार हाइवे पर मेरठ की तरफ बढ़ा दी। और तडके ही विजय, यानि तुम्हारे पिता के मेरठ स्थित निवास पर पहुँच गई। यह भी बता दूं कि विजय मोदीनगर में हमारे पड़ोसी थे, और मुझसे शादी करना चाहते थे। वे अनाथ थे और अपने ननिहाल में पले-बढे थे। मगर उनके मामा इस रिश्ते के खिलाफ थे, अत: उन्होंने उनकी शादी दूसरी जगह कर दी थी।&amp;nbsp; लेकिन दूसरे प्रसव पर उनकी पत्नी&amp;nbsp;चल बसी। तेरी बड़ी बहन संध्या मेरी अपनी कोख से नहीं जन्मी&amp;nbsp;बल्कि&amp;nbsp;&amp;nbsp;वह उसी माँ की प्रथम संतान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ पहुँचकर मैंने सारी वस्तुस्थित विजय को बतायी और इस शर्त पर उनसे शादी करने को राजी हुई कि हम इस शहर को छोड़कर तुरंत कही दूर किसी दूसरी जगह चले जायेंगे। विजय विधुर थे, और उनके समक्ष नन्ही संध्या का भी सवाल था, अत: वे मेरी हर शर्त को मानने के लिए तैयार थे। और तब हमने तुरंत ही मेरठ से सिफ्ट होकर नैनीताल से बारह किलोमीटर दूर किल्बुरी के समीप बसने का फैसला किया। दिल्ली से उठाकर लाई गई धन-दौलत हमारे खूब काम आई और तुम्हारे पिता पर्वतीय क्षेत्रों में एक होटल चेन खोलने में भी सक्षम रहे थे। और उनकी मौत के बाद अपने परिवार के लालन-पालन और तुम दोनो भाई-बहनो की शादि-ब्याह मे भी मुझे उस धन की बदौलत कोई दिक्कत नही हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मेरी किस्मत यंही तक मुझसे इंतकाम लेने से संतुष्ट नहीं थी। इस ऊँचे-नीचे जीवन सफ़र में चलते-चलते मैं उस मनोज गुप्ता की शक्ल-सूरत भी भूल गई थी, जिसने कभी मेरी जिन्दगी के साथ ऐसा खिलवाड़ किया था। किन्तु, फिर जिन्दगी ने एक और करवट ली और तुम अपनी जवानी में जिस लडकी के प्यार में फंसे, और जिसे तुमने अपनी जीवन संगनी बनाया, वह जब दुल्हन बनके हमारे घर आई तो अतीत का वह दैत्य भी पीछे-पीछे हमारे घर चला आया। तुम लोग हनीमून के लिए गए थे और मैं घर पर अकेली थी। वह दैत्य, जो अपने कुकृत्यों के बल पर अब एक विधायक था, न सिर्फ मेरे साथ लिए गए सात फेरों की दुहाई देकर उम्र के इस मोड़ पर भी मेरा जिस्म पाने की फिराक में था, अपितु अपनी विधायकी की धौंस देकर मुझे ब्लेकमेल भी करना चाहता था। मैंने उसी वक्त गंडासे से उसका क़त्ल कर डाला और यह सोचकर कि अगर मैंने खुद अपना जुर्म नहीं कबूला तो पोलिस तुम लोगो को परेशान करेगी, सीधे थाने जाकर आत्मसमर्पण कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो बात मैं तुम्हे आज बता रही हूँ, वह तब भी तुम्हे बता सकती थी। लेकिन इस डर से कि कहीं तुम इसका दोष स्वाति पर&amp;nbsp;मढने लगो, मैं खामोश रही और सच कहूँ तो जो कदम अब उठा रही हूँ , इसी वजह से तब नहीं उठाया था। अब मैं सुनिश्चित हूँ कि तुम ऐसी कोई नादानी नहीं करोगे जिससे तुम्हारे और स्वाति के रिश्तों में कोई दरार आये। क्योंकि स्वाति भी एक समझदार लडकी है, और तुम्हारा पूरा ख्याल रखती होगी ऐसी मुझे उम्मीद है। यहाँ जेल में सभी लोग बहुत अच्छे ढंग से मेरे साथ पेश आते थे, और यहाँ तक कि तुम लोगो की कुशल-क्षेम भी मुझ तक पहुंचाते थे। मुझे मेरा दादी बनने की&amp;nbsp;शुभसूचना&amp;nbsp; भी इन्ही लोगो ने मुझे दी थी। तुम्हे एक बार फिर से यह वचन देना होगा कि तुम उस मनोज गुप्ता के कुकृत्यों का कोई भी दोष उसकी बेटी को नहीं दोगे। मैं तुम्हारे सुखी-संपन्न पारिवारिक जीवन की एक बार फिर से कामना करती हूँ ! मेरे पोते को मेरा ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद देना।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी अभागन माँ ,&lt;br /&gt;शारदा &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;स्थान और पात्र काल्पनिक !&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-8755823757649753389?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/8755823757649753389/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=8755823757649753389' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8755823757649753389'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8755823757649753389'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2011/02/blog-post_27.html' title='शारदा !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-3585689553109509245</id><published>2011-02-14T00:51:00.000-08:00</published><updated>2011-02-14T00:57:03.115-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>पीच्ची !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;माय डियर पीच्ची ;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहचान गई न ? तुम्हे मुझसे अक्सर यह शिकायत रहती थी कि मैं क्यों जानबूझकर तुम्हारे नाम को गलत उच्चारित करता हूँ। और देखो, आज भी वही गुस्ताखी फिर से दुहरा दी है मैंने, हा-हा॥ किन्तु तुम्हारे इस गिले-शिकवे को कि "तुम ये क्या पिच्ची-सिच्ची करते रहते हो, मुझे मेरे सही नाम से क्यों नहीं पुकारते ", मैं अब और पेंडिंग नहीं रखना चाहूँगा, क्या पता फिर कभी मुझे तुम्हे एक्सप्लेन करने का मौक़ा मिले, न मिले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे ! किन्तु प्रोमिस करो कि तुम इसका मीनिंग जानकार मुझे मन ही मन बुरा-भला नहीं कहोगी। पीच्ची शब्द हमारे आंध्रा में तेलगु भाषा में किसी को पागल कहने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। तुम्हारी कॉलेज के दिनों की हरकतों को देखकर ही मैं तुम्हे इस तरह से सम्बोद्धित करता था। उस वक्त तो इसे सुनकर तुम बुरा मानती थी, लेकिन आई एम् स्योर, इस वक्त पीच्ची का यह ख़ूबसूरत सा अर्थ जानकार तुम्हारे उस शोभायमान चेहरे पर जरूर अब तक एक लम्बी-चौड़ी मुस्कान दौड़ गई होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तुम्हे यह भी आश्चर्य अवश्य ही हो रहा होगा कि मुझे तुम्हारा इ-मेल पता मिला कहाँ से ? जैसा कि मैंने पहले कहा, आज मैं तुम्हे किसी भी असमंजस में नहीं रखूंगा। तुम्हें शायद याद होगा वो अपना कॉलेज के दिनों में हमें अक्सर कैंटीन में मिलने वाला अपना वह दोस्त, महेश, जो अक्सर ही मुझे 'कमीना' कहकर संबोधित करता था। बस, आज वही एक कॉलेज के दिनों का अपना मित्र है, जिससे मेरा यदा-कदा संपर्क रहता है। आजकल इंदौर में किसी कम्पनी में पर्सनल मैनेजर है. उसी ने तुम्हारा यह ई-मेल ऐड्रस मुझे दिया. अब तुम यह भी जानना चाहोगी कि उसे कहाँ से यह एड्रेस मिला ? तो यह भी एक दिलचस्प कहानी है। जैसा कि मैंने कहा, वह एक कम्पनी में पर्सनल मैनेजर है, अभी कुछ दिनों पहले उसने अपनी कंपनी के लिए रिजूमे सर्च करने हेतु एक ऑनलाइन रेजुमे डैटा बैंक पोर्टल हायर किया था, और पोर्टल पर सर्च के दौरान ही उसे अभी हाल का तुम्हारा अपना पोस्ट किया हुआ बायो-डाटा मिला. बस, वहीं से उसने तुम्हारा ई-मेल ऐड्रस लिया और मुझे मेल कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने दिल पर ढेर सारा बोझ लाधे लम्बे वक्त से एक अजीब सी कशमकश में जी रहा था, सोचा, तुम्हारे साथ शेयर करके क्या पता इसे कुछ हल्का कर सकूं। पहले तो यह संकोच हुआ कि अगर तुम शादीशुदा हुई तो खुदानाखास्ता यह मेल अगर तुम्हारे पति या इन्लौज में से किसी ने पढ़ लिया तो वह कुछ गलत ना समझ बैठे, और तुम्हे कोई दिक्कत पेश न आये। लेकिन जब महेश से फोन पर बात हुई और उसने कहा कि अभी दो महीने पुराने तुम्हारे बायोडाटा में उसने तुम्हारा पैतृक सरनेम ही तुम्हारे नाम के आगे देखा है, तो मै यह ऐजूम कर बैठा कि तुम अभी अनमैरीड ही हो, तुम्हे यह मेल करने की लिबर्टी ले रहा हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि तुम्हे मालूम है कि मेरे ग्रेजुएशन करते ही मेरे दबंग डैड अपनी सेन्ट्रल सेकेट्रीएट की नौकरी से रिटायर हो चुके थे। आजीवन दिल्ली में ठहरने का उनका कभी भी मन नहीं रहा। तुम यह भी बहुत बेहतर ढंग से जानती हो कि चूँकि मेरी माँ पुराने ख्यालात की एक आज्ञाकारी पतिव्रता नारी थी, इसलिए घर के अन्दर दो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की भिन्न धूरियाँ होते हुए भी उसने कभी अपने पति की मर्जी के विरुद्ध कोई ऐतराज नहीं जताया. सब कुछ बस खामोश रहकर ही बर्दाश्त किया। माँ के संस्कारों के आगे, इस तड़क-भड़क की कलयुगी दुनिया में हम दोनों भाई-बहन भी कब आज्ञाकारी सतयुगी औलाद बन गए, हमें भी नहीं मालूम। अत: उनके रिटायर होते ही उनकी मर्जीनुसार हम लोग अपने नेटिव-प्लेस आंध्रा में सिफ्ट हो गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हे यह भी शिकायत होगी कि मैंने तुमसे उसके बाद फिर कभी संपर्क साधने की चेष्ठा क्यों नहीं की, तो उसका भी जबाब मैं दूंगा। वहाँ से स्थानांतरित होने के पश्चात एक साल बाद ही पापा मेरे लिए एक रिश्ता ढूंढ लाये। लडकी का बाप स्थानीय बिक्रीकर विभाग में कोई बड़ा अधिकारी था। और शायद मेरे लालची डैड को लडकी में मौजूद गुण-दोष कम और लडकी के बाप का यह गुण ज्यादा आकर्षित कर रहा था कि वह सेल्स-टैक्स विभाग में कार्यरत थे। मुझे बिना लडकी से मिलाये ही उन्होंने रिश्ता पक्का कर लिया और मंगनी भी हो गई। मैं उसवक्त एक कंप्यूटर कोर्स बंजारा हिल्स, हैदराबाद से कर रहा था. मेरे डैड इस बात से बहुत खुश थे कि उनके नालायक बेटे की कीमत उस वक्त नौ लाख आंकी गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन फिर करीब चार महीने बाद पता नहीं क्या हुआ कि मेरे और लडकी के पिता ने यह रिश्ता तोड़ने की घोषणा कर दी। हमारे यहाँ ऐसी प्रथा है कि यदि रिश्ता टूट जाए तो सगाई के दरमियां लडकी के परिवार द्वारा दी गई तय शुदा दहेज़ की राशि की अग्रिम किस्त, पंचायत बुलाकर लड़के के परिवार द्वारा आवश्यक खर्चे, जो इस बीच लड़के वालों ने किये हो, उस अग्रिम दहेज़ की किस्त में से काटकर बाकी रकम लडकी वालों को लौटा दी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी बता दूं कि सगाई के कुछ समय बाद लडकी और उसका परिवार मुझसे मिलने हैदराबाद आया था, और उसी दौरान मैंने अपनी माँ के कहने पर एक बड़े स्टोर से लडकी को एक कीमती पर्ल-सेट अपने क्रेडिट कार्ड से खरीदकर गिफ्ट किया था। कुछ दिन बाद जब मै छुट्टी पर घर गया तो मेरे डैड ने उस लेनदेन के बिल वगैरह अपने पास रख लिए थे। महेश तो मुझे पहले से ही कमीना कहता रहता था, किन्तु यह जानकार तुम हंसोगी कि मेरा बापू कमीनेपन में मेरा भी बाप निकला। क्योंकि बाद में मुझे मालूम पडा कि रिश्ता टूटने पर जब सगाई पर मिली दो लाख की रकम को पंचायत के समक्ष लौटाए जाने का हिसाब-किताब चल रहा था, तो मेरे डैड ने उस पर्ल-सेट की बिल राशि और क्रेडिट-कार्ड की पर्ची दोनों की रकम जोड़कर उतनी राशि दो लाख में से काट ली थी, जबकि होना यह चाहिये था कि बिल अथवा क्रेडिट पर्ची में से किसी एक को कंसीडर करते, और मैं नहीं समझता कि यह उन्होंने अनजाने में किया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, बात आई-गई हो गई, लेकिन मेरे डैड के सिर पर हमेशा यह भूत सवार रहता था कि वे अपने लड़के की अच्छी कीमत कैसे वसूल पाए। दहेज़ की यह बीमारी यों तो हमारे पूरे ही देश को भ्रष्टाचार के दल-दल में डुबाये हुए है, मगर मैं समझता हूँ कि आंध्रा और बिहार दो ऐसे क्षेत्र है, जहां यह एक महामारी की तरह है। इस बीच हमारे ऊपर उस वक्त दुखों का पहाड़ ही टूट पडा जब मेरी बहन संध्या की मौत की खबर मुझे हैदराबाद में मिली। वह बीमार भी नहीं थी मगर, घर वालों को एक दिन सुबह अचानक अपने कमरे में मृत मिली। न जाने क्यों मुझे कभी-कभी संदेह होता है कि कही उसकी मौत की वजह भी मेरे लालची डैड का धन-माया से अगाध-प्रेम ही न रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय उपरान्त कंप्यूटर कोर्स पूरा कर मैं घर लौट गया. इसी दरमियां मेरे डैड को न मालूम किसने बताया कि एक अमेरिकी यूनिवर्सिटी भारतीय छात्रों को अमेरिका में पढने का अवसर दे रही है, बस तभी से उन्हें मुझे यूएस भेजने का भूत सवार हो गया। मुख्य मकसद यह नहीं था कि मैं वहाँ जाकर उच्च शिक्षा हासिल करूँ, बल्कि मुख्य-ध्येय यह था कि तत्पश्चात उन्हें अपने लड़के की अच्छी कीमत वसूलने के लिए पृष्ठभूमि बनाने में मदद मिले। दिल्ली में अपने पुराने संपर्कों के जरिये उन्होंने मुझे अमेरिका भेजने की सब कुछ तैयारियां पूरी कर ली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर एक दिन मैं अमेरिका के लिए रवाना हो गया। यहाँ आकर कुछ वक्त तो यहाँ की चकाचौंध में बहुत अच्छा गुजरा. मगर फिर शीघ्र ही ऊबने लगा। घर, देश और माँ की बहुत याद आती थी। मेरे दुखों का शायद यहीं छोर नहीं था, छह महीने बाद एक दिन डैड ने यह दुखद समाचार मुझे दिया कि मेरी माँ भी इस दुनिया से चल बसी। यहाँ, मुझे ढाढस बंधाने वाला भी अपना कोई नहीं था। चेल्ली(छोटी बहन संध्या ) की असामयिक मौत के बाद से ही वह बीमार रहने लगी थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मैं उससे विदा लेकर यहाँ के लिए चला था तो उसने डैड की वजह से खामोश रहकर अपनी पथराई सुर्ख आँखों से आसुओं का सैलाब बहाकर ही मुझे विदा किया था, मगर उसके झुर्रियां से लदे चेहरे की एक संतृप्त उदासी और सूखे अधरों पर जमी पपड़ी यह साफ़ बताती थी कि वह अन्दर ही अन्दर बहुत डरी हुई थी, क्योंकि उसके जिगर का टुकडा पहली बार उससे अलग होकर बहुत दूर एक अनजाने परदेश में अजनबियों के बीच जा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं, पूरी तरह से टूट चुका था, जीने की कोई ख्वाइश भी अब दिल में नहीं रह गई थी। साथ ही मैं यह भी भली प्रकार से जानता था कि मेरे लोभी डैड ने माँ के देहांत की सूचना भी मुझे जानबूझकर इसलिए दो हफ्ते बाद दी, ताकि मैं कहीं तुरंत घर वापसी के लिए न चल पडू और आनेजाने में ही डेड-दो लाख और खर्च हो जायेंगे। कहानी अभी यहीं ख़त्म नहीं हुई थी, एकदिन अचानक अमेरिकी सुरक्षा अधिकारी हमारे कम्पाउंड में आ घुसे और हमें जानवरों की भांति रेडियो कॉलर पहनाने लगे। बाद में मालूम पडा कि जिस यूनिवर्सिटी के जरिये अध्ययन के लिए हम यहाँ तक पहुचे थे, वह फर्जी और गैरकानूनी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं मालूम कि तुम किस तरह मेरे इस मेल को लेती हो, लेकिन यही सब वजहें थी कि मैं अपने किसी पुराने मित्र के संपर्क में नहीं रह सका। अवसाद से पूर्णतया ग्रसित मेरा मन अब समझ नहीं पा रहा कि किस्मत के इस नए ड्रामे पर हँसे या फिर रोये। यह दिलो-दिमाग कभी-कभी तो अपने लिए ही बुरे-बुरे सपने देखने लगता है। अब वापस लौटने की भी तमन्ना नहीं रही दिल में। कभी अपने उस खूसट डैड पर भी हंसी आ जाती है, पता नहीं, ढेर सारे दहेज़ के क्या-क्या सपने देख रहे होंगे। सचमुच, बहुत अजीब किस्म के लोगो से भरी पडी है यह दुनिया, जो सिर्फ कुछ अतिरिक्त धन पाने के लिए अपना जीवन, अपनी पूरी फेमली ही दांव पर लगा देते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो सिर्फ एक जीवन-संगनी की चाहत रखी थी ....जस्ट ओनली ब्राइड ( विदाउट ऐनी बॉयफ्रेंड ) :)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न तलाश-ए-मुकद्दर मैं निकला,तकदीर भी हरजाई थी,&lt;br /&gt;वैभव-विलासिता की न कभी, मैंने कोई आश लगाई थी,&lt;br /&gt;खोज-ए-मंजिल-ए-सफ़र में बस इतनी सी ख्वाइश थी&lt;br /&gt;ऐ जिन्दगी, कि काश तू वैसी होती, जैंसी मैंने चाही थी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हूहु..बेचारा लालची, पीच्ची बुढऊ........ !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा....&lt;br /&gt;उदय, &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-3585689553109509245?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/3585689553109509245/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=3585689553109509245' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/3585689553109509245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/3585689553109509245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2011/02/blog-post_14.html' title='पीच्ची !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-7164089231003288848</id><published>2011-02-14T00:46:00.000-08:00</published><updated>2011-02-14T00:59:29.506-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>अबूझ पहेली !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;दक्षिणी दिल्ली के महारानी बाग स्थित उसके उस किराये के फ्लैट का मुख्य दरवाजा आधा भिडा देख दिल को एक अजीब किस्म की तसल्ली सी हुई थी, और शकून भी मिला था कि चलो अपनी मेहनत,अपना खर्च किया पेट्रोल और शनिवार का अवकाश बेकार नही गया, वह अवश्य घर पर ही होगा। आज की इस ४५-४६ की उम्र तक पहुचते-पहुचते कुछ ही ऐसे गिने-चुने मित्र मेरे पास रह गये है, जिनसे मिलकर दिल की हर बात बताने मे कोई हिचक नही होती। वह भी मेरे न सिर्फ़ कालेज के दिनों का मित्र है, अपितु १९८५-८६ मे पोस्ट-ग्रेजुएशन के उपरान्त हम साथ ही दिल्ली आये थे, और लाजपत नगर रेलवे कालोनी मे कमरा लेकर शुरुआती सालों मे इकठ्ठे ही रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधे ऊपर उसके कमरे की तरफ़ डग बढाने की बजाये मैं यह सोचकर वापस गाडी की तरफ़ मुडा कि ठीक से गाडी पार्क कर लूं, फिर उससे मिलने जाता हूं, ताकि यदि उसके साथ गपों मे ज्यादा देर हो भी जाये तो गली से गुजरते किसी बडे वाहन वाले को कोई दिक्कत न पेश आये। और आखिर आज हमारी मुलाकात भी तो करीब तीन महिने बाद होनी थी। अत: न सिर्फ़ ढेर सारी बातें थी, अपितु दिल मे गिले-शिकवे भी बहुत थे कि मैं पिछले करीब दो महिने से चिकनगुनिया से इस कदर पीडित रहा, मगर उसने एक बार भी मेरी कुशल-क्षेम पूछना तक तो दूर, एक फोन तक करना मुनासिब नही समझा। दिल मे जहां इस बात से उसके प्रति गुस्सा भरा पडा था, वहीं किसी कोने मे एक फिक्र भी थी कि आखिर इतने दिनों से उसका फोन भी तो नही मिल रहा, जब कभी उसका फोन बजता भी है तो वह उठाता क्यों नही? न्यू-इयर ईव पर ही उसका सर्व-प्रथम निमंत्रण आ जाता था कि आज की शाम मेरे नाम, मगर इस बार नये साल पर भी जब उसका वधाई संदेश नही आया, तो शनिवार दोपहर बाद मुझसे न रहा गया, और मैने सीधे उसके घर का रुख कर लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाडी ठीक से गली के एक कोने पर लगाने के बाद मैं उसके फ़्लैट की तरफ़ बढ चला। मकान के प्रथम-तल की सीढिया चढ्ने के बाद अध्-भिडे दरवाजे को बिना खट्खटाये खोलते हुए ज्यों ही मैने कमरे के आगे की छोटी सी लौबीनुमा जगह पर पर कदम रखा, मेरी नजर अन्दर कमरे के दरवाजे के ठीक सामने दीवार से सटे उसके दीवाननुमा बेड पर गई। वह रजाई के अन्दर दुबका बैठा लैपटौप पर व्यस्त था, बेड के दूसरे छोर पर उसकी पत्नी उमा रजाई के दूसरे सिरे को अपने पैरों मे ओढे बैठी कुछ बुनाई का काम कर रही थी। मैं अभी सोच ही रहा था कि मैं उसपर अपना गुस्सा उतारने के लिये क्या गाली इस्तेमाल करुं क्योंकि उमा भाभी भी सामने बैठी थी, कि तभी अपने चश्मे के पार से मेरी तरफ़ कातिलाना नजर डालते हुए वह बड्बडाया, " स्स्साले, कमीने, मिल गई तेरे को फुर्सत". उसका यह व्यंग्य-बाण शायद मैं झेल न पाता अगर उमा भाभी सामने न होती। खैर, अपने को काबू करते हुए मै भी व्यंग्यात्मक तौर पर बोला; तू तो स्सा ....मेरी खोस-खबर पूछते-पूछते थक गया...... । शायद अब तक उसकी नजर मेरे लचकते कदमों की तरफ़ भी जा चुकी थी, अत: अपने चेहरे को सहज करते हुए उसने पूछा, क्यों ये क्या हुआ तेरे को ? मैने भी प्रति-सवाल करते हुए पूछा और तुझे क्या हुआ जो रजाई मे दुबका इतना सड रहा है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ क्षण बाद जब स्थिति थोडी सहज हुई तो वह अपने लैपटोप को बेड के पास पडे एक टेबल पर रख खांसते हुए बेड से उतरने को हुआ। मैने सामने पडी कुर्सी उसके बेड की तरफ़ खिसकाते हुए कहा, बैठा रह, कहां उतर रहा है? कुर्सी इधर खींच..... वह बोला। मैने कहा, रहने दे ज्यादा फ़ोर्मल्टी निभाने की जरुरत नही है, मै खुद ही खिसका लूंगा। इस बीच उमा भाभी भी किचन से पानी का गिलास ले आई थी, ट्रे से पानी का गिलास पकडते हुए मैने पूछा, भाभी जी, आप कब आई गांव से ? बच्चे लोग कहां है? मैं उमा भाभी से अभी यह सवाल कर ही रहा था कि वह बेड पर सहजता से बैठ्ते हुए और तकिया अपनी गोदी मे रख उस पर अपनी दोनो हाथो की कोहनिय़ां टिकाते हुए मुरझाये चेहरे पर थोडी मुस्कुराहट बिखेरते हुए मेरी बात काटता हुआ बोला, अच्छा पहले तू सुना, क्या हालचाल हैं तेरे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उमा भाभी किचन मे चाय बनाने चली गई,थोडी देर तक मैने उसे अपने गुजरे बुरे वक्त की दास्तां विस्तार से सुनाई कि कैसे मैंने चिकनगुनिया की मार झेलते हुए कुछ दिन नर्सिंग होम मे भर्ती रहकर बिताये, घरवाले किस हद तक परेशान रहे, इत्यादि...इत्यादि...! उसने एक लम्बी सांस छोडते हुए मेरी तरफ़ देख कर कहा " सॉरी यार, तेरे साथ इतना कुछ हुआ और मैं खामखा तुझ पर लाल पीला हो रहा था। लेकिन क्या करु मैं भी बडी अजीबोगरीब स्थिति से गुजर रहा हूं आजकल, तू सुनेगा तो..... । तेरे साथ कम से कम तेरे अपने तो है सुख-दुख मे, मैं तो यहां अकेला.... जब बहुत परेशान हो गया तो अभी दस दिन पहले घर से उमा को बुलाना पडा। कभी सोचता हूं कि बच्चों के पास नेटिवप्लेस चला जाऊं, लेकिन फिर सोचता हूं कि ज्यादा दिन वहां ठहरा तो बूढ़े मा-बाप भी टेंशन करेगे, इसी दुविधा मे लट्का पडा हूं।" मैने कुर्सी उसके थोडे और समीप खींचते हुए उससे पूछा, मुझे बता क्या प्रोब्लम है तेरे साथ, मैं हू न । तू भले ही जरूरी ना समझता हो अपना दुख-दर्द मुझे बताना, मगर मै तो जब तेरा फोन नही आया तो सीधे इधर…..। अबे यार, क्या बताऊ, तंग आकर मैने फोन का सिमकार्ड भी अपने पर्स मे रख डाला है। और फिर जो आप बीती उसने सुनाई, उसे सुनने के बाद पहले तो मैं हंसा, मगर फिर विषय की गम्भीरता को देखते हुए सोचने पर मजबूर हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोद मे रखी तकिया पर दाहिने हाथ से दो-तीन घूसे मारते हुए उसने बोलना शुरु किया, तू तो मेरे दफ़्तर मे मुझसे मिलने एक बार पहले का आ ही रखा है। और तुझे यह भी मालूम ही है कि प्रथम माले पर स्थित हमारे दफ़्तर की बनावट कैसी है। मैं कम्पनी का वित्त-अधिकारी होने के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी हूं, अत: दफ़्तर मे शुरु से यह परम्परा सी बनी हुई है कि शाम को ६ बजे दफ़्तर की छुट्टी होने पर मेरे अधीनस्थ दफ़्तर के सभी लोग अक्सर मेरे केविन तक आकर "बाय सर,गुड नाईट, मै निकल रहा/रही हूं" कहकर जाते है, और उन्हे यह भी मालूम है कि मैं तो अमूमन हर रोज सात बजे तक ऑफिस मे ही बैठता हूं। रेखा पिछले तकरीबन चार सालों से हमारे यहां प्रोजक्ट-कोऑर्डिनेटर के पद पर कार्यरत थी। सुंदर, हंसमुख और खुश मिजाज। चुंकि उसकी चार्टड-बस ६ बजे से कुछ पहले ही स्टॉप पर आ जाती थी, अत: वह दफ़्तर से अक्सर पांच बजकर पैंतालिस मिनट पर निकल जाया करती थी। जाते वक्त वह भी मेरे उस आधे ढके केविन के बाहर से गर्दन लम्बी कर अन्दर केविन मे झांकते हुए ’बाय सर’ बोलकर निकलती थी। उसे यह मालूम नही था कि मै यहां पर बिना परिवार के अकेला रहता हूं, इसलिये सर्दियों के मौसम के दर्मियां शाम को दफ़्तर से निकलते वक्त "बाय सर" बोलने के उपरांत वह कभी-कभार मजाक मे यह डायलोग मारने से भी नही चूकती थी कि "सर, आप भी जल्दी निकलिये, घर पर भाभी जी वेट कर रही है, मुझे अभी-अभी फोन कर बता रही थी कि आज गाजर का हलवा बना रखा है उन्होने"।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब एक साल पहले उसकी शादी गुडगांव मे रहने वाले किसी इंजीनियर के साथ हुई थी। मूलरूप से उसकी ससुराल कहीं जींद के आस-पास, हरियाणा मे थी। हालांकि शादी के बाद भी उसने नौकरी जारी रखी थी, मगर उसके चेहरे की खामोशी से साफ़ जाहिर होता था कि वह इस शादी से बहुत खुश नही थी। धीरे-धीरे दफ़्तर से उसकी अनुपस्थिति भी बढ्ती गई, और फिर एक दिन उसने नौकरी से इस्तीफा भी दे दिया। कुछ समय बाद फिर एक दिन यह अपुष्ट बुरी खबर आई कि वह जींद अपनी ससुराल गई हुई थी और वहीं उसने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। इस घटना को हुए अब करीब पांच महिने बीत चुके है। पूरे दफ़्तर को इस खबर पर बडा अफ़सोस हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते मै और मेरे ओफ़िस का सफ़ाई कर्मचारी, हम दो ही ऐसे शख्स है जो प्रात: सबसे पहले दफ़्तर पहुंचते है। चुंकि वह दफ़्तर के पास की ही बस्ती मे रहता है, इसलिये वह पहले ही गेट पर खडा मेरा इंतजार कर रहा होता है। दफ़्तर की चाबी का एक सेट चपरासी के अलावा मेरे पास होता है जिसे मैं उस सफ़ाई कर्मचारी को सौंप देता हूं, ताकि वह दफ़्तर के ताले खोल सके। शनिवार के दिन अक्सर दिल्ली की सडकों पर अन्य दिनों की अपेक्षा कम वाहन होने की वजह से मैं अपने दफ़्तर थोडा जल्दी पहुच जाता हूं,, अगर तबतक सफ़ाई कर्मचारी न पहुंचा हो तो कभी-कभार दफ़्तर के ताले मुझे खुद ही खोलने पडते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही करीब डेड-पौने दो महिने पहले एक शनिवार को जल्दी पहुंच जाने की वजह से मैने दफ़्तर का मुख्य द्वार खोला और रिसेप्शन की मेज पर अपना सामान रख आदतन रिसेपशन मे रखे इक्वेरियम मे मछलियों को चारा दिया। कुछ देर तक खामोश रहने के बाद थोडा उचकते हुए वह फिर बोला, तुझे याद है, जब तू मेरे दफ़्तर आया था तो तूने नोट किया होगा कि रिशेप्सन के ठीक बाद हमने अपने दफ़्तर को कांच के फ्रेम से कवर किया हुआ है, और उसपर भी एक कांच का दरवाजा है जिसे भी शाम को चपरासी ताला लगाकर जाता है। अन्दर आधे कवर किये हुए सभी केविनों मे सीटिंग अरेंजमेट इस तरह का है कि बाहर रिशेप्सन से अंदर झांकने पर अन्दर बैठे कर्मचारियो की पीठ दिखती है, यानि उनके सामने के मेज पर रखे कंप्यूटर के मौनिटर का सामने का हिस्सा रिशेप्सन की तरफ़।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर मेज पर रखे चाबियों के गुच्छे को उठाकर कुछ बेखबर सा मैं उस कांच के दरवाजे को खोलने के लिये हाथ से ज्यों ही चाबी को लिए आगे बढ़ा, क्या देखता था कि रेखा पहले से अन्दर मौजूद अपनी सीट पर कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें गडाये बैठी है। यह देख मेरे बदन मे एक हल्की सी सिहरन दौड गई। मैने खुद को कोई गलतफहमी होने के अन्देशे से चाबियों का गुच्छा बाये हाथ मे पकडते हुए दाहिने हाथ से अपनी दोनो आंखे मली और फिर से अन्दर झांका। सीट पर कोई नही था, हां कंप्यूटर स्क्रीन बदस्तूर सक्रीय थी। दरवाजा खोलने अथवा न खोलने की दिमागी कशमकश मे फंसा मै वहां खडा ध्यानमग्न था कि पीछे से मुख्य दरवाजे पर चरमराहट हुई। बदन पर हल्की सिहरन लिये मैं तेजी से उस ओर मुडा,यह देख तसल्ली हुई कि वह अपना सफ़ाई कर्मचारी था। उसके आ जाने के बाद मुझमे हिम्मत सी लौट आई थी, मैने दरवाजा खोलने के लिये की होल मे चाबी डाली तो वह झट से बोला, लाईये सहाब, आज मुझे थोडी देर हो गई, मै खोले देता हूं। मैने चाबी उसको पकडा दी, जैसे ही उसने दरवाजा खोला, मै सीधे रेखा वाली सीट की तरफ़ लपका। एक अच्छे जांचकर्ता की भांति मैने उसके केविन का मुआयना लिया। सिवाय कंप्यूटर के वहां कुछ भी असहज नही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडी देर तक सोचने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वह सिर्फ़ मेरी आंखों का भ्रम रहा होगा और रेखा की जगह पर नये आये कर्मचारी ने पिछली शाम को कंप्यूटर बन्द नही किया होगा और आफ़िस के मेन गेट को खोलते वक्त जमीनी कम्पन की वजह से कम्प्युटर स्क्रीन सक्रीय हो गई होगी। अपने ही दिमाग से उपजे इस तर्क मे दम होने की वजह से बात आई गई, मैने उसका जिक्र भी किसी से नही किया। हमारे यहां शनिवार को सिर्फ़ आधे दिन ही आफ़िस खुलता है, यानि दोपहर दो बजे बाद छुट्टी। आज से ठीक दो शनिवार पहले दो बजे के आस-पास लगभग पूरा दफ़्तर खाली हो गया था, दफ़्तर मे सिर्फ़ मैं था और हमारे औफ़िस का चौकीदार था। शाम को करीब पांच बजे मै अपनी सीट पर बैठा इंटरनेट पर एक खबरिया वेबसाइट पर एक ताजा खबर पढने मे व्यस्थ था कि तभी उसी अपने पुराने अंदाज मे रेखा ने मुस्कुराते हुए केबिन के बाहर से अन्दर झांका और मेरी तरफ़ देखती हुई वही “बाय सर, मै जा रही हूं” बोली तो मैने भी फिर से नजर कम्प्युटर स्क्रीन पर उस खबर पर गडाते हुए उसे ’बाय’ कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर तुरन्त ही मेरा माथा ठनका और मैने जोर से अपने सिर को झटका दिया। यह सोच मेरे रौंगटे खडे हो गये कि यह तो रेखा ही थी। मैं तुरन्त अपनी सीट से उठकर रिशेप्सन की तरफ़ लपका। दफ़्तर का चपरासी मोहन रिशेपसन मे बैठा फोन पर किसी से बातें करने मे मसगूल था। मुझे बदहवास अवस्था मे देख वह भी फोन रखते हुए तुरन्त खडा हो गया, मुझसे पूछने लगा, क्या हुआ सहाब ? मैने कहा, तुमने अभी किसी को यहां से बाहर जाते देखा ? वह बोला, कैसी बात करते हो सहाब, मै तो यहां पर पिछले डेड घंटे से बैठा हुआ हूं, न तो कोई अन्दर आया और न कोई बाहर गया। उसकी बात सुन मैं वापस मुडा और मैने रिशेप्सन और मेन आफ़िस के बीच स्थित उस कांच के दरवाजे को अंदर को ठेला तो नजर सीधी रेखा वाली सीट की तरफ़ गई। यह देख फिर से मेरे रौंगटे खडे हो गये कि उसका कम्प्युटर चल रहा था और कम्प्युटर की स्क्रीन ऐक्टिव मोड मे थी। मैने अपने को सम्भालते हुए मोहन को दफ़्तर बन्द करने को कहा और तुरन्त अपना कम्प्युटर बंद करके बैग उठाकर बाहर निकल आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे रास्ते मैं उसी बारे मे सोचता रहा, मैने तुझे भी फोन लगाया मगर तेरा फोन बार-बार इंगेज आ रहा था। घर पहुंच कर रात को मैने ठीक से खाया भी नही, एक भय सा मेरे अन्दर बैठ गया था, घर मे दो पैग के करीब बोतल पर पडा था, मैने एक ही बारी मे पूरा गटक लिया। जिससे दिन भर की मानसिक थकावट के चलते मुझे झपकी आने लगी और मैं जल्दी ही लाईट जलती छोडकर सिर तक रजाई ओढकर सो गया। रात करीब ग्यारह-सवा ग्यारह बजे मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे सामने खिडकी पर कोई है, मैं उठकर देखना चाहता था मगर मै उठ न सका, ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे दबाये हुए है। मैने हिम्मत जुटाते हुए एक जोर का पलटा मारा और चीखता हुआ सा फर्श पर सीधा खडा हो गया। मैने तुरन्त अपने पुराने औफ़िस के एक दोस्त रमेश को फोन लगाया जो पास ही गढ़ी मे रहता है, उससे बातचीत के बाद उसी वक्त मै यहां ताला लगाकर उसके घर चला गया, और वापस तभी यहां लौटा जब गांव से उमा मेरे छोटे भाई के साथ यहां आ गई। अपनी बातों को उपसहार देते हुए वह एक लम्बी सांस छोड़कर बोला; यार, तू मेरा यकीन नही करेगा मगर मैं सचमुच बहुत डर गया हूं, मैने कभी सपने मे भी नही सोचा था कि मेरे साथ ऐसी स्थिति भी आ सकती है। मैने तबसे दफ़्तर जाना भी छोड दिया है, दफ़्तरवालों के बार-बार फोन आ रहे थे, इसलिये मैने अपने फोन का सिमकार्ड भी निकाल कर पर्स पर रख दिया है। अभी कल सुबह तो उमा को छोड्ने गांव जा रहा हूं क्योकि दोनो बच्चों के छमाही इम्तहान शुरु होने वाले है, मगर उसके बाद कैसे चलेगा समझ नही पा रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर लौटते हुए वापसी मे मुझे इस बात की संतुष्ठी थी कि मैने उसे इस बात के लिये मना लिया है कि जब वह उमा भाभी को गांव छोडकर वापस लौटेगा तो तब तक मेरे ही घर पर रहेगा, जब तक कि इस साल की बच्चों की परिक्षाये खत्म होने के बाद उसका परिवार गांव से उसके पास नही आ जाता। मगर इस मुलाकात के बाद से एक बात जो मुझे मेरे जहन मे बार-बार कुरेदे जा रही है, वह यह कि जो समस्या मेरे मित्र ने बताई, वह अगर कुछ सीमा तक भी यदि सच है तो क्या इस वैज्ञानिक युग के बावजूद भी इन प्राचीन बातों की प्रासांगिकता हमारे इस विकसित समाज मे अभी भी विद्यमान है ? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-7164089231003288848?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/7164089231003288848/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=7164089231003288848' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/7164089231003288848'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/7164089231003288848'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='अबूझ पहेली !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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दूकानदार जो दाम बताये, उससे ठीक आधे पर भाव तय करना। रश्मि को तो बस दादा-दादी के देश पहुचने की हडबडी थी, अत: वह माँ की बात को बहुत महत्व न देकर फोर्मलटी के लिए सहमती के तौर पर सिर्फ अपनी मुण्डी हिलाकर बार-बार " डोंट वोरी मोंम " कह देती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता के लिए तो ब्रिटेन से भारत आना मानो दिल्ली से आगरा की ओवर नाईट जर्नी के समान था, और अपने माता-पिता के पास वो अक्सर साल-भर में जब-जब मौक़ा मिलता दसियों बार आ जाते थे। मगर रश्मी अपनी उस १५ साल की उम्र में पहली बार दादा-दादी से मिलने उनके देश, उनके गाँव आ रही थी। उसका जन्म और लालन-पालन ब्रेटन में ही हुआ था। रश्मी के पिता अपनी युवावस्था में एक हार्डवेयर इंजीनियर के तौर पर ब्रिटेन गए थे, और वहीं उनकी मुलाक़ात रश्मी की मम्मी अमृता से हुई थी, जो काफी पहले अपने माँ-बाप के साथ ब्रिटेन आकर बस गए थे। दोनों ने एक साल बाद वहीं ब्रिटेन में इक-दूजे संग शादी रचा ली थी। हालांकि रश्मि के दादा-दादी के अरमान कुछ और थे, मगर वे बेटे की खुशियों के आगे लाचार थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साढ़े आठ घंटे की हवाई और तदुपरांत तीन घंटे की सड़क यात्रा तय कर, रश्मि जब दादा-दादी के पास पहुंची तो मानो उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही न था। दादाजी ने तो अपनी लाडली रश्मि को सर आँखों पर ही बिठा लिया था। अभी एक साल पहले ही तो वे लोग तकरीबन तीन महीने रश्मि के साथ ब्रिटेन में गुजारकर आये थे, और रश्मि का मृदु स्वभाव उनके रोम-रोम को जीत गया था। कस्बे में दादा-दादी और कस्बे वालो का प्यार पाकर रश्मि भी सब कुछ भुला बैठी थी, वह यह भी भूल गई थी कि उसकी मम्मी उसे ब्रिटेन में मिस कर रही होगी। उसे वहाँ के वातावरण और लोगो से घुलने- मिलने में तनिक भी परेशानी नहीं हुई थी, क्योंकि पश्चिमी सभ्यता के साथ-साथ माता-पिता, खासकर रश्मि के पिता ने उसे अपनी हिन्दुस्तानी संस्कृति से भी बखूबी जोड़े रखा था, उसे न सिर्फ हिन्दी बोलना सिखाया अपितु हिंदी और संस्कृत लिखना-पढ़ना भी सिखाया था। इसी का नतीजा था कि रश्मि अच्छी तरह से हिन्दी बोल, लिख और पढ़ सकती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लाड-प्यार के बीच पखवाड़ा कब गुजर गया, रश्मि को पता भी न चला, इस बीच वह पिता के साथ एक पास के हिल स्टेशन भी घूम आई थी। और फिर एक दिन सुबह जब रश्मि उठकर बाहर आँगन में अखबार पढ़ रहे दादाजी के पास पहुँची तो दादाजी ने झट से पैर पसारे हुए पैरो के नीचे रखे मोड़े को पास खिसकाकर, रश्मि के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे वहां मोड़े पर बैठने को कहा। मोड़े पर बैठ रश्मि ने ज्यों ही अखबार हाथ में लिया, अखबार के फ्रंट पेज की मुख्य खबर पढ़कर और वहां छपे चित्र को देख वह एकदम चौंक सी गई। खबर यह थी कि जहरीली शराब पीने से उनके कस्बे के पास ही स्थित एक दूसरे कस्बे में २९ लोगो की मृत्यु हो गई थी। चित्र में कुछ लाशों के ऊपर विलाप करते परिजनों को दिखाया गया था। रश्मि ने कौतुहल बस खबर और चित्र के ऊपर उंगली टिकाते हुए दादाजी को जब संबोधित किया तो दादाजी ने दुखी मन से बस इतना कहा कि हाँ बेटा, क्या करे इनका इतना ही दाना-पानी था, मर गए सब। रश्मि ने सवाल किया, लेकिन दादाजी शराब जहरीली कैंसे हो गई होगी ? बेटा, कोई देशी ठर्रा पी गए होंगे, ये अभागे, सस्ते के चक्कर में ! दादाजी ने फिर संक्षिप्त जबाब दिया। तो क्या दादाजी, ये देशी शराब जहरीली भी होती है ? रश्मि ने फिर सवाल दागा । और दादाजी से नपा-तुला जबाब आया, बेटा, ये देशी माल कहाँ सही होता है, अनाप-सनाप ढंग से बनाते है। दादाजी के ये आख़िरी शब्द "देशी मॉल कहाँ सही होता है" रश्मि के अबोध मस्तिष्क पर हथोड़े की तरह प्रहार करने लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन हफ्तों की इस अविस्मर्णीय भारत यात्रा के बाद आज रश्मि उदास मन से वापस ब्रिटेन लौट रही थी। लौटते में नई-दिल्ली तक के लिए उन्होंने ट्रेन पकड़ी थी। पापा के बगल में खिड़की के समीप वाली सीट पर बैठी रश्मि अभी- अभी ट्रेन में टोइलेट से होकर आई थी, और जिस वक्त वह ट्रेन के द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित डब्बे के टोइलेट के पास गई थी, तो पापा टोइलेट के बाहर तक उसके साथ आये थे। रश्मि ने ज्यों ही एक तरफ की टोइलेट का दरवाजा खोला था तो अन्दर मची गन्दगी को देख उसके मुह से तुरंत निकला 'ओह बॉय' ! उसके नाक पर हाथ रखने के अंदाज को भांपते हुए, उधर से गुजर रहे एक बुजुर्ग पेंट्री-मैंन ने रश्मि के पिता की तरफ देखते हुए, रश्मि को संबोधित करते हुए कहा था, ये देशी स्टाइल की टोइलेट है, आप बगल वाली में चले जाओ, वह वेस्टर्न है, और साफ़ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीट पर खामोश बैठी रश्मि याद कर रही थी कि जब वह करीब नौ साल की थी और मम्मी के साथ बाजार गई थी, तो बाजार में उन्हें एक भारतीय युगल मिले थे। मम्मी थोड़ी देर तक उनसे बातें करती रही थी, और जब वे चले गए तो उत्सुकताबश रश्मि ने पुछा था कि मोंम ये कौन लोग थे ? और माँ ने अजीब सा मुह बनाते हुए कहा था कि अपने ही इधर के देशी लोग है। तभी पहली बार रश्मि का इस 'देशी' शब्द से पाला पडा था। मगर मम्मी के बताने के अंदाज और मुख मुद्रा से नन्ही रश्मि इतना तो समझ ही गई थी कि यह 'देशी' शब्द ज्यादा वजनदार नहीं है। फिर भारत आते वक्त मम्मी ने उसे बार-बार हिदायत दी थी कि वहाँ ज्यादा कूड़ा-करकट मत खरीदना, लोग देशी मॉल पर विलायती ठप्पा लगाकर माल को बेचते है। और फिर वह मनहूस दिन, जब उस देशी को पीने से वो २९ जिंदगियां हाथ धो बैठी थी। और तो और, जब वह पापा के साथ हिल-स्टेशन पर रात को जिस होटल में ठहरे थे, तो होटल मैनेजर ने तपाक से कहा था कि आपको कमरा सस्ता वाला चाहिए तो देशी स्टाइल का मिल जाएगा, और अगर महँगा चाहिए तो वेस्टर्न स्टाइल का मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे घटनाक्रम को चलचित्र की भांति दिमाग पर दौडाते हुए और खिड़की से बाहर  झाँक रश्मि भारी मन से मंद-मंद मुस्कुरा दी थी। उसे लग रहा था कि जैसा कि मम्मी उसे बताया करती है, सच में यह देश मानसिक तौर पर अभी भी गुलाम है। वह तो सोचा करती थी कि अपने इस दादाजी-पितीजी के देश में "देशी" शब्द बड़ा ही आदरपूर्ण होता होगा। लेकिन यहाँ तो हर घटिया चीज को 'देशी' की संज्ञा दी जाती है। &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-5533025801572946397?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/5533025801572946397/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=5533025801572946397' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5533025801572946397'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5533025801572946397'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2010/02/blog-post_19.html' title='देशी !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-440522806153332660</id><published>2010-01-31T00:04:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.543-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>मिथ्या ही मान लो कि भगवान सब देखता है पर .. !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;और यह रही मेरी पहली टिप्पणी अलग से मेरे ही  पिछले लेख पर : आज जो हम लोग आम जीवन मे मानवीय मुल्यों का इतना ह्रास देख रहे है, उसकी एक खास वजह यह भी है कि हमारे धर्मो द्वारा निर्धारित जीवन के मुल्यों का कुछ स्वार्थी और तुच्छ लोगो द्वारा अपने क्षणिक स्वार्थो के लिये इनकी अनदेखी करना, इनका उपहास उडाना, खुद को इन मुल्यों से उपर बताना, इत्यादि । इसे मैं इस उदाहरण से समझाता हूं; मान लीजिये आपके आस-पास कहीं चोरी हो गई और आप पति-पत्नी घर पर बच्चो संग उसी विषय पर चर्चा कर रहे है, तो आपके चर्चा के दो नजरिये हो सकते है। एक यह कि चोरी करना बुरी बात है, और चोर को इसका फल जरूर मिलेगा । दूसरा नजरिया यह कि अरे भाई, उसको जरुरत थी तभी तो उसने चोरी की, अगर उसका भी पेट भरा हुआ हो तो भला वह चोरी करने ही क्यो जायेगा?( इस नजरिये को मानने वाले भी तभी तक उसे मान्यता देते है जब तक वह चोर दूसरों के घर मे चोरी कर रहा होता है ,उनके घर मे नही) आप इसमे से पहले नजरिये को धार्मिक अथवा आजकल की भाषा मे साम्प्रदायिक नजरिया कह सकते है और दूसरे नजरिये को सेक्युलर नजरिया, मगर साथ ही यह भी गहन विचार कीजिये कि आपकी इस चर्चा को सुन रहे आपके बच्चो पर कौन से नजरिये का क्या असर होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कोई भी इन्सान यहां कोई अच्छा-बुरा काम करता है तो लगभग सभी धर्मो मे यह कहा गया है कि भग्वान उसे उसका फल अवश्य देता है ! अब मान लो कि चाहे यह बात मिथ्या ही क्यों न हो, लेकिन इसका समाज पर कम से कम यह असर तो पडता था कि गलत काम करने वाले के मन मे यह भय होता था कि भग्वान उसे ऐसा करते देख रहे है, और उसे इसका दुष्परिणाम भुगतना पड सकता है, अर्थात मिथ्या पूर्ण होते हुए भी वह बात समाज के हित मे थी, लेकिन आज इन स्वार्थी तथाकथित सेक्युलरों ने तो तरह-तरह के उदाहरण पेश कर इन चोरो के मन का यह भय भी खत्म कर दिया! &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-440522806153332660?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/440522806153332660/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=440522806153332660' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/440522806153332660'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/440522806153332660'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='मिथ्या ही मान लो कि भगवान सब देखता है पर .. !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-3014125908319281182</id><published>2010-01-30T23:57:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.546-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>लो जी, दादा-नाना का गोत्र भी स्वीडन मे पेटेंट हो गया !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आज इस दुनियां मे मौजूद हर धर्म का उद्देश्य उसे मानने वाले अनुयायियों को उनके द्वारा जीवन को जीने के अपने एक खास नजरिये के प्रति प्रेरित और सजग करना होता है। हर धर्म की जहां अपनी कुछ खास विषेशतायें होती है,वही कुछ कमियां भी है। और अक्सर देखा गया है कि यहां, हमेशा ही किसी एक धर्म की दूसरे धर्म के अनुयायियों द्वारा तरह-तरह की आलोचना की जाती रही है। लेकिन शायद इस दुनिया मे हिन्दु धर्म ही एक मात्र ऐसा धर्म है जो कि न सिर्फ़ दुनियां का सबसे पुराना धर्म है अपितु इस धर्म को, इस धर्म के ही मानने वाले तथाकथित सेक्युलरों ने समय-समय पर प्रताडित किया है। जबकि देखा जाये तो अब तक इस धर्म की अनेक मान्यताओं को भले ही परोक्ष तौर पर ही सही, मगर दुनिया के अन्य हिस्सों मे मौजूद दूसरे धर्म के अनुयायियों ने भी मान्यता दी है। यह तो आप सभी जानते है कि पूर्व मे दुनियां भर के वैज्ञानिकों ने बहुत सी ऐसी चीजों की खोज की, अनेक ऐसी बातों को अपने अलग तौर पर प्रमाणिक सिद्ध किया, जिन्हे कि हिन्दु धर्म ग्रंथ और विद्वान आदिकाल मे ही जीवन-शैली मे सम्मिलित कर चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही आज की पाश्चात्यपरस्त हमारी युवा शिक्षित पीढी बात-बात पर अपने हिन्दु धर्म की मान्यताओं और रीति-रिवाजों का मजाक उडाती हो, मगर आपको मालूम होगा कि हमारे हिन्दु धर्म की मान्यताओं मे विश्वास रखने वाले कुछ लोग आज भी अपने लड्के-लड्की का रिश्ता तलाशते वक्त लड्के और लड्की के खानदान, गोत्र इत्यादि का उनके पिछ्ली सात पुस्तों का लेखा-जोखा देखते है कि लड्के अथवा लड्की की मां-दादी किस गोत्र की थी, दादा-नाना किस गोत्र के थे, उनका खानदान और चालचलन कैसा था ? इत्यादि-इत्यादि, वह इसलिये नही कि वे अन्ध विश्वासी है, बल्कि इसलिये कि इन बातों का वैज्ञानिक प्रभाव आने वाली पीढियों पर पड्ता है। और अब तो हम-आप जैसे सेक्युलर लोग भी इस बात को मानने वाले है क्योंकि अब यह बात हमारे देश के और हिन्दु धर्म के मानने वाले वैज्ञानिको द्वारा नही वल्कि स्वीडन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के बाद सिद्ध कर दी है कि अगर दादा अथवा नाना का कभी हड्डियों का विकार रहा हो अथवा उनकी रीढ की हड्डी कभी किसी दुर्घट्ना की वजह से कभी टूटी हो तो उसका असर उनके पोते पर भी पड्ता है। इसीलिये हमारे यहाम वह कहावत बहुत प्रचलित है “ बाप की बिगाडी हुई पूत को भुगतनी पड्ती है। तो चलिये, आगे से ध्यान रखियेगा कि जब भी अपने बेटे-बेटी का कहीं रिश्ता करने जावो तो अपने आने वाली पुस्तों की सलामती के लिये यह भी पता कर लेना कि कभी लड्के अथवा लडकी के बाप-दादा की रीढ की हड्डी तो नही टूटी थी?&lt;/span&gt; &lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-3014125908319281182?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/3014125908319281182/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=3014125908319281182' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/3014125908319281182'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/3014125908319281182'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html' title='लो जी, दादा-नाना का गोत्र भी स्वीडन मे पेटेंट हो गया !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-6479995627876610601</id><published>2010-01-30T23:15:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.548-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>इक्कीसवीं सदी का हमारा शहरी युवा वर्ग !</title><content type='html'>&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आज हमारे देश के शहरी इलाके ज्यों-ज्यों तथाकथित प्रगति की ओर अग्रसर है, त्यों-त्यों इन शहरी इलाकों के वाशिन्दे नित शाररिक तौर पर क्षीणता की गर्त मे डूबे जा रहे है। इसके लिये जिम्मेदार बहुत सारे प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण विध्यमान है, जिनमे से कुछ प्रमुख है, भोग और विलासिता की वस्तुए, मनोंरजन के साधन, शहर, कस्बे और मुहल्ले मे खेलने-कूदने के लिये उचित और प्रयाप्त जगहों का न होना, बच्चे का अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक न होना, माता-पिता की लापरवाही और सरकारों की इस ओर उदासीनता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और कम से कम मोदी नगर के एक स्कूल मे कल की यह घटना तो यही सिद्ध करती है कि हमारी युवा पीढी शारिरिक तौर पर कितनी कमजोर है। कल मोदी नगर के टी आर एम पब्लिक स्कूल के १८ वर्षीय बारह्वीं कक्षा के एक छात्र पवनेश पंवार की शारिरिक व्यायाम की परिक्षा के दौरान चक्कर आने से दुखद मृत्यु हो गई। घटना के बाद विधार्थी का परिवार, प्रशासन और खबरिया माध्यम जितना मर्जी हो-हल्ला मचायें, स्कूल प्रशासन को जिम्मेदार ठहरायें, लेकिन हकीकत यही है कि बाहर से लम्बे-चौडे, हष्ठ-पुष्ठ दिखने वाले ये आज के मदर डेयरी और चौकलेट पोषित युवा अन्दर से कितने खोखले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा यह मानना है कि कलयुग ज्यों-ज्यों अपने चरम की ओर बढ रहा है, त्यों-त्यों इस धरा पर सारी की सारी क्रियायें-प्रक्रियायें उलट-पुलट हुए जा रही है, और जिसके लिये इन्सान सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। खान-पान मे तो हमने खुद ही अपने हाथों पौष्टिकता का गला घोंट दिया है, मगर साथ ही भोग-विलासिता और मनोरंजन के साधनो ने आग मे घी का काम कर दिया है। आज भी अगर हम सडक पर किसी प्रौढ अथवा बूढे व्यक्ति को फुर्तीले अन्दाज मे चलते हुए देखते है, तो हमारे मुख से पह्ला शब्द यही निकलता है कि भाई अगले ने पुराने जमाने का माल खा रखा है। कभी हमने शायद ही इस बात पर गौर किया हो कि उस पुराने जमाने के माल मे ऐसी कौन सी चीज थी, जिसे खाकर वह इन्सान आज भी स्वस्थ है ? जबाब साधारण सा है कि उस समय मे भोजन मे पौष्टिकता होती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात, आज का युवा अपने आन्तरिक शारिरिक विकास और मजबूती के लिये जरा भी प्रतिबद्ध नही दीखता। पहले जमाने मे घर के बडे- बुजुर्गो के मुख पर विधार्थी के लिये बस यही दो मूल मन्त्र होते थे, एक था; &lt;span style="FONT-WEIGHT: bold"&gt;काक चेष्ठा, बको ध्यानम, स्वान निन्द्रा तथेवच, अल्प हारे, गृह त्यागे, विधार्थीवे पंच लक्षण,&lt;/span&gt; अर्थात एक सफ़ल विधार्थी वह है जिसके हाव-भाव कौवे जैसे, तीक्ष्ण ध्यान बकरी जैसा, नींद कुत्ते जैसी, खान-पान थोडा और पौष्टिक तथा अध्ययन के लिये घरेलु उपभोग और मनोरंजन की चीजों का परित्याग किये हो। और दूसरा मन्त्र होता था कि विधार्थी को रात को जल्दी सोना चाहिये और सुबह जल्दी उठ्ना चाहिये। मगर आज की हकीकत इन बातों से कोसों दूर है। मां-बाप की मेहनत तथा नम्बर दो की कमाई मे से बेटा हर घन्टे कुछ न कुछ खाये ही जा रहा है, रात को ग्यारह-बारह बजे तक टीवी पर चिपका रहता है, उसके बाद दो बजे तक वह तथाकथित पढाई करता है, और फिर सुबह अगर स्कूल जल्दी जाने की मजबूरी न हो तो दस बजे बाद मा-बाप के बार-बार उठाने पर जनाव जागते है। दो कदम अगर जाना हो, तो कार अथवा बाइक लेकर जाते है। और फिर नतीजा हमारे सामने है कि स्कूल मे व्यायाम भी नही झेल पाते, और फिर दोष स्कूल प्रशासन के सिर मढ देते है। मै यहां अपना भी एक उदाहरण देना चाहुंगा, भूतकाल मे मेरे साथ दो इतने खतरनाक ऐक्सीडेंट हुए कि मै मानता हूं कि भग्वान के आशिर्वाद के साथ-साथ मेरी शारिरिक क्षमतायें ही थी जो मैं बच गया (चुंकि मैने भी अपना बचपन का एक बडा हिस्सा गांव मे बिताया और खूब शारिरिक व्यायाम भी किये), अन्यथा मै दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरी जगह अगर कोई आज का शहरी नौजवान होता तो शायद वह उसी वक्त अल्लाह को प्यारा हो चुका होता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का निचोड यह है कि आज हमे अगर अपनी वर्तमान युवा पीढी को भविष्य के लिये सक्षम बनाना है तो हमे इन बातों पर गौर करना ही होगा,औरसरकार तथा संचार माध्यमों को भी इसमे सकारात्मक भूमिका निभानी होगी, सिर्फ़ बच्चे पर पढाई का दबाब और स्कूल प्रशासन की खामियों का रोना रोकर हम अपने युवा वर्ग को अत्यधिक विलासी बनाकर अपने देश के लिये भविष्य मे वही मुसीबत खडी करने जा रहे है, जिससे आज अमेरिका और कुछ युरोपीय देश जूझ रहे है। आज जरुरत है, अनिवार्य रूप से इनके शारिरिक ढांचे को सक्षम बनाने के लिये हर सम्भव प्रयास करना, क्योंकि स्वस्थ शरीर मे ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-6479995627876610601?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/6479995627876610601/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=6479995627876610601' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/6479995627876610601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/6479995627876610601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2010/01/blog-post_1336.html' title='इक्कीसवीं सदी का हमारा शहरी युवा वर्ग !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-5231261954185868072</id><published>2010-01-13T20:24:00.000-08:00</published><updated>2012-02-10T01:54:56.731-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>झोई-भात !</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;पिंटी और कृतिका की शादी को हुए अब तकरीबन तीन साल बीत चुके थे। उनके एक साल भर का बेटा भी था। दोनों के अगाध प्रेम, आपसी समझ-विश्वास और तालमेल का ही नतीजा था कि इन तीन सालो में एक बार भी दोनों में कभी ज़रा सी भी आपसी कहासुनी नहीं हुई थी। यूं तो दोनों ही ठंडे दीमाग वाले और बहुत सी चीजो में एक जैसी पसंद रखने वाले थे, और इस बात पर पिंटी बार-बार वह मुहावरा दुहराता भी रहता था कि 'राम मिलाये जोड़ी,एक अन्धा एक कोढ़ी', मगर दोनों के स्वाभाव में इतनी समानता होने के बावजूद भी दोनों ने ही एक-दूसरे से पहले ही यह स्पष्ट कर रखा था कि अगर कभी दोनों में से कोई एक भी गुस्से में हो तो दूसरा जुबान नहीं खोलेगा। बस, यही उनके सफल वैवाहिक जीवन का मूल-मन्त्र था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिंटी को छोटी-छोटी बातो को भूलने की एक बीमारी सी थी । कभी ऑफिस जाने से पहले शेव करना भूल जाता तो कभी दन्त-मंजन करना । और हद तो तब हो जाती, जब कृतिका का उसके ऑफिस के लिए सजाया हुआ लंच बॉक्स वह टेबल पर ही भूल जाता । आज मकर संक्रांति और पोंगल की छुट्टी थी, मगर वह यह भी भूल गया और रोज की भांति सुबह-सबेरे बाथरूम में घुसकर नहा धो लिया, और जब बाथरूम से बाहर निकला तो उसे अचानक याद आया कि वह नहा तो लिया किन्तु दंत मंजन करना भूल गया है । फिर अपने उसी चिर-परिचित अंदाज में उसने आवाज निकाली 'शिट यार', बाथरूम के एकदम सामने रसोई में मौजूद कृतिका ने यह जानते हुए भी, कि वह जरूर कुछ भूल गया होगा, उससे पुछा, अब क्या हुआ । पिंटी ने उसके सवाल का सीधा जबाब न देते हुए कहा, मैं भी न यार, एक नंबर का गधा हूँ । कृतिका तपाक से चुटकी लेते हुए बोली, चलो शुक्र है भगवान् का कि तुम्हे पता तो चला, मैं तो उसी दिन समझ गयी थी, जब शादी की बेदी में मेरे आगे पीछे रेंग रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिंटी उसकी बात सुन थोडा हंसा और फिर उसी अंदाज में उसकी चुटकी का जबाब देते हुए बोला , मुझे मालूम है यार कि तुम्हे अपनी नश्ल को पहचानने की पूरी महारत हासिल है । ब्रश करने के बाद जब वह फिर बाथरूम से बाहर निकला तो बैठक में लगी दीवार घड़ी की ओर नजर दौडाते हुए बोला, कीर्ति ( वह कृतिका को इसी नाम से पुकारता था) जल्दी लगा नाश्ता यार, टाइम हो गया । कृतिका को पहले से मालूम था कि आज छुट्टी है किन्तु वह अब तक जानबूझकर चुप थी, क्योंकि अगर पिंटी को मालूम पड़ जाता कि आज पोंगल की छुट्टी है तो वह दस बजे से पहले बिस्तर से खडा नहीं उठता। कृतिका ने पूछा, कहाँ की देर हो रही है, कहाँ जावोगे? पिंटी की समझ में कृतिका के सवाल का खुद व खुद जबाब आ गया था और उसने हाथो से माथा पीटते हुए कृतिका से शिकायती लहजे में कहा, अबे यार, तूने बताया क्यों नहीं कि आज छुट्टी है । कृतिका ने चेहरे पर हंसी बिखेरते हुए उंगलियों से उसके गालो को खींचते हुए कहा, जानू, अगर बता देती तो फिर मुझे नाश्ते के लिए भी १०-११ बजे तक इन्तजार करना पड़ता न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिंटी यह बड़बढाते हुए कि आजकल की इन सती-सावित्रियों को तो पति की जरा सी भी खुशी बरदाश्त नहीं होती, नाश्ते की टेबल पर बैठ गया। कृतिका ने मूली के पराँठे बनाए थे, जो अक्सर वह छुट्टी के दिन नाश्ते में बनाती थी, पराठे और दही की कटोरी पिंटी के सामने रखते हुए उसने फिर व्यंग्य कसा, गुस्सा छोडिये और नाश्ते का लुफ्त लीजिये, मेरे सत्यवान । फिर काफी देर तक नाश्ते की टेबल पर ही उनका हंसी मजाक चलता रहा था और फिर दोनों टीवी देखने लगे थे। ग्यारह बजे के करीब कृतिका ने पिंटी से पूछा कि लंच में क्या बनाऊ ? पिंटी ने कहा, यार बहुत दिनों से कढ़ी नहीं खायी, मैं दूकान से दही लेकर आता हूँ, आज कढ़ी-चावल बनावो, हाँ कड़ी में घीया-बेसन का पकोडा डालना मत भूलना। पिंटी का इतना कहना था कि कृतिका सहसा उदास हो गयी और उसके गालो पर आंसू रेंगने लगे । पिंटी ने उसके गालो पर से आंसू फोंझते हुए पूछा कि क्या हुआ? कृतिका बिना कुछ कहे फफककर रो पडी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर बाद माहौल जब शांत हुआ तो उसने पिंटी को बताया कि आज उसकी ठुलैईजा/जेठ्जा( अर्थात ताई जी) की पहली बरसी है । ठुलैईजा कृतिका को और कृतिका ठुलैईजा को बहुत प्यार करते थे। दोनों को झोई-भात (कढ़ी-चावल, कुमाऊ में कढ़ी को झोई कहा जाता है ) बहुत पसंद थी। और जब कभी भी घर में कोई स्पेशल खाना बनाने की बात चलती थी तो कृतिका की जुबान से जब कढ़ी-चावल शब्द निकलता था, तो ईजा (माँ) उसे बुरा-भला कहते हुए कहती कि यह कमवक्त तो एकदम अपनी ठुलैईजा(ताई जी) पर गयी है । इस कढ़ी शब्द पर भी घर में एक बहुत बड़ी समस्या थी। कृतिका का परिवार एक संयुक्त परिवार था, परिवार जब भी छुट्टियों में उत्तरांचल की पहाडियों में बसे कुमाऊ क्षेत्र में, अपने गाँव जाता था, तो कृतिका की माँ (ईजा) और ताई जी ( ठुलैईजा) के लिए चुलबुली कृतिका को संभालना मुश्किल हो जाता था। वह जब खाते वक्त जिद करती तो जोर-जोर से चिल्लाने लगती कि मुझे कड़ी-भात चाहिए । दरहसल कुमाऊं में कढ़ी को 'झोई' नाम से जाना जाता है, क्योंकि वहाँ पर कढ़ी शब्द को एक गंदे शब्द के तौर पर देखा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठुलैईजा उस जमाने की पांचवी कक्षा तक पढी एक समझदार महिला थी, उनका जन्म और लालन-पालन तो गढ़वाल क्षेत्र में हुआ था, कितु उनका विवाह उनके माता-पिता ने कुमाऊ में कर दिया था। घर गाँव की भरी महफिल के बीच जब १०-१२ साल की कृतिका कढ़ी,कढ़ी चीखती तो ठुलैईजा, सिर में धोती का पल्लू खींचकर,दांतों के बाहर लम्बी जीभ निकालकर, उसे आँखे दिखाते हुए, हे पातर कहकर झट से उसका मुह दबा देती । लेकिन कृतिका को कैसे समझाए कि कड़ी शब्द को लोग यहाँ पर किस तरह लेते है, वह उसे बस इतना कहती कि 'झोई' बोल, 'झोई'!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अब जब कृतिका को भाषा का अंतर समझ में आया तो तब तक वह बड़ी हो चुकी थी, परिवार उसकी सगाई के लिए गाँव आया हुआ था। कृतिका ने ही रसोई संभाली थी, जैबा / ठुल्बा(बड़े पापा / ताऊ) की मौत के बाद से ठुलैईजा की तबियत भी ठीक नहीं चल रही थी । अतः एक दिन जब कडाके की ठण्ड में दोपहर के वक्त भोजन में कृतिका ने कढ़ी बनायी थी तो वह एक बड़ा कटोरा कढ़ी का लेकर ठुलैईजा के कमरे में गयी थी, और सिर पर चुनरी ओढे कृतिका ने जब मुस्कुराते हुए कढ़ी का कटोरा ठुलैईजा की चारपाई के पास रखते हुए ठुलैईजा से कहा था कि :"ईजू झोई" , गरम-गरम एक कटोरी पी ले, तो ठुलैईजा ने पहली बार उसके मुह से 'झोई' शब्द सुनते हुए उसे अपने सीने से चिपका लिया था, और कहा था कि अब मेरी चेली ( बेटी ) ज्वान (बड़ी) हो गयी है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शादी के बाद कृतिका को पता चला था कि गाँव में कुछ समय से ईजा और ठुलैईजा के बीच तनातनी चल रही थी । ईजा बात-बात पर बीमार ठुलैईजा को ताने देती रहती थी। कृतिका ने कई बार अपने ढंग से ईजा को समझाने की कोशिश भी की थी, लेकिन ईजा ने कृतिका को यह कह कर झिड़क दिया था कि तू ठुलैईजा का ज्यादा पक्ष मत लिया कर। कृतिका यह सुनकर चुप रह गयी थी, वह उस दौरान ससुराल और मायके, दोनों तरफ से दुखी थी। ससुराल की तरफ से इसलिए कि वह गाँव की महिलावो को मुफ्त शिक्षा और सिलाई बुनाई की ट्रेनिंग देती थी और ससुराल वालो को इस बात का गम था कि वह उनके बेटे की कमाई इस तरह से उड़ा रही है। कृतिका ने ठुलैईजा को भी अपना दुखडा सुनाकर उसे भी समझाने की कोशिश की, कि वह ईजा की बातो का बुरा न माने, किन्तु ज्यादा असर नहीं हुआ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले साल चौदह जनवरी को अचानक जब गाँव से फोन आया कि ठुलैईजा गाँव की औरतो के साथ मकर संक्रांति के दिन स्नान के लिए पास की एक नदी में गयी थी, तो पैर फिसल जाने से डूब गयी और उसकी मृत्यु हो गयी, यह खबर मिलने पर कृतिका एकदम टूटकर रह गयी थी। यह पिंटी का ही प्यार था कि धीरे-धीरे कृतिका उस सदमे को भुला सकी,जिसे लोग दुर्घटना समझ रहे थे, वह महज आत्महत्या थी, जिसे समझदार ठुलैईजा ने इस तरह से अंजाम दिया था कि ताकि लोग इसे दुर्घटना समझे। यह बात सिर्फ कृतिका को मालूम थी, क्योंकि उनकी मृत्यु के तीन दिन बाद ही कृतिका को ठुलैईजा का लिखा वह पत्र मिला था, जिसे ठुलैईजा ने पहाडी भाषा में लिखा था और लिखा था;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेली(बेटी) ,मुझे क्षमा करना, अब और चल पाने की हिम्मत मुझमे नहीं रह गयी है, बेटी, दूसरो के प्रति उदारता का फल इंसान को अवश्य मिलता है। मैं तुझे देखती रहती थी, तुझे पढने की हमेशा कोशिश करती रहती थी । दया, करुणा, सहानुभूति तुम्हारी शक्ति है , अपने उस पक्ष को एक अभिव्यक्ति देने में कोई बुराई नहीं है, लोग यहाँ अभी इतने समझदार नहीं हुए कि इस प्रकार के भाव की सराहना कर सके, तुम अपना अच्छा काम जारी रखना।&lt;br /&gt;तुम्हारी ठुलैईजा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृतिका नम आँखों से रसोई में इत्मीनान से चांवल-कढ़ी पका रही थी और सोच रही थी कि वह आज एक पूडी पर झोई-भात अपने छत की मुंडेर पर अपनी ठुलैईजा के लिए भी रखेगी। उसे मायके से खबर मिली थी कि ठुलैईजा की पहली बरसी पर उसके परिवार वालो ने हफ्ते भर की धार्मिक पूजा-अनुष्ठान और पूरे गाँव के लिए पितृ-भोज की व्यवस्था की थी। उसे भी परिवार वालो ने आने को आमंत्रित किया था, किन्तु वह चाहकर भी नहीं जाना चाहती थी । वह सोच रही थी कि इंसान कितना स्वार्थी और मूर्ख होता है । एक व्यक्ति को तो उसके जीते जी मार देते है और फिर दुनिया के दिखावे के लिए यह सब ढ़कोसलेबाजी करने पर उतर आते है ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-5231261954185868072?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/5231261954185868072/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=5231261954185868072' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5231261954185868072'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5231261954185868072'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2010/01/blog-post_13.html' title='झोई-भात !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-5739178642894576287</id><published>2010-01-11T05:13:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.611-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>समझदार पत्नी !</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;एक बार एक पहाडी गाँव के नए-नए बने एक गरीब प्रधान जी के घर पर मेहमान को कुछ देर ठहरने का सौभाग्य मिला तो उनकी धर्म- पत्नी की बुद्धिमता की प्रशंसा किये बगैर नहीं रह सका ! आइये आपको भी सुनाते है ! प्रधान जी को चावल का गरम-गरम मांड पीने का शौक था! उनकी धर्मपत्नी ने चावल अभी चूल्हे में रखे ही थे कि हम यानी मेहमान टपक गए ! बाहर प्रधान जी मेहमानों के साथ गपो में व्यस्त थे ! उनकी पत्नी ने उबलते चावलों में से मांड निकाल कर एक गिलास में उनके लिए रख दिया था! लेकिन अब प्रश्न प्रधान जी की नाक का था कि कहीं मेहमानों के सामने मांड उन्हें पीने को देकर नाक न कट जाए ! लेकिन मांड भी ठंडा हो रहा था, ठन्डे मांड से प्रधान जी भी उस पर गुस्सा कर देंगे! अब क्या करे? अत: कुछ देर इन्तजार करने के बाद अन्दर किचन से उसने जोर से गाने के से अंदाज में बोला&lt;strong&gt; " धान सिंह का बेटा मांड सिंह , पीना है तो आओ नहीं तो &lt;span class=""&gt;शीतलपुर&lt;/span&gt; को जाता है"&lt;/strong&gt; ! &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बस प्रधान जी समझ गए, और "आप बैठिये मैं अभी आया" कहकर मांड पीने चले गए&lt;/span&gt; !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-5739178642894576287?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/5739178642894576287/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=5739178642894576287' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5739178642894576287'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5739178642894576287'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2010/01/blog-post_11.html' title='समझदार पत्नी !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-8536422736668831249</id><published>2009-12-30T21:17:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.625-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे ! (दूसरा और अंतिम भाग)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;...धीरे-धीरे शाम का धुंधलका जमीन पर पसरने लगा था, मैं फिर चलने के लिए खडा हुआ तो वह वह भी उठ खडी हो गई। अभी तक की इस मुलाक़ात से मानो किसी अधिकार पूर्ण अंदाज में जब एक बार फिर से मैंने उसे साथ चलने का इशारा किया, तो वह भी तुरंत मेरे साथ चल दी। पार्क के बाहर खडी गाडी के पास पहुँच मैंने गाडी की ड्राइविंग सीट के बगल वाली सीट के सामने का दरवाजा खोला तो वह झट से गाडी में चढ़कर सीट पर बैठ गई। और फिर मैं ड्राइव करता हुआ इंडिया गेट पहुंचा । अब तक घुप अँधेरे में पूरा इलाका डूब चुका था, मगर इंडिया गेट पर बिखरी बिजली की रोशनी से पूरा राजपथ जगमगा रहा था। एक जगह गाडी को पार्क कर हम गाडी में ही बैठे रहे। नए साल की पूर्व संध्या होने की वजह से मैंने अपने खाने-पीने का भी पहले से ही गाडी में पूरा इंतजाम रख छोड़ा था। वहाँ घूमते लोगो, ख़ासकर नए जोड़ो को निहारते और व्हिश्की के हल्के घूंटो के साथ मैं चिकन का सेवन करता और एक चिकन पीस उसकी तरफ बढ़ा देता था। वह भी बड़े चाव से आराम से बैठ कर खा रही थी, सलीके के साथ। फिर जब अचानक आकाश में कुछ आतिशबाजी दिखी, तो मैं समझ गया कि रात के बारह बज चुके है। ड्रिंक और खाने-पीने का सामान भी समाप्त हो चुका था। हमारी दिन भर की इतनी लम्बी मुलाक़ात के बावजूद भी अब तक दोनों के बीच एक भी लफ्ज का आदान-प्रदान नहीं हुआ था, बस इशारों में ही बाते हुई थी । अत: मैंने एक बार फिर से उसके सिर पर हाथ फिरते हुए कहा 'हैप्पी न्यू इयर माई डियर', अगर मैं तुम्हे 'स्वीटी' कहकर पुकारू तो तुम्हे बुरा तो नहीं लगेगा ? मेरा इतना कहना था कि उसने एक हल्की कूँ-कूँ की आवाज गले से निकाली और जोर से अपनी पूँछ हिलाते हुए, अपने दोनों अगले पंजे मेरे कंधे पर रखते हुए, दो बार भौ-भौ किया, तो मैं समझ गया कि इसे मेरे द्वारा दिया गया नाम पसंद आ गया है । बस फिर मैंने झट से गाडी स्टार्ट की और अपनी लिखी कविता की इन लाइनों को गुनगुनाता हुआ उसे अपने घर ले आया, और तबसे वह मेरे साथ है ;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;कल उषा की पहली किरण पर&lt;br /&gt;दिनकर उगेगा नव-बर्ष का,&lt;br /&gt;उज्जवलित कण-कण तुषार का&lt;br /&gt;जगत को पैगाम देगा हर्ष का !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साक्षी बनेगा रोशनी का बांकपन ,&lt;br /&gt;भोर शीतल सुहाने दृष्ठि बंधन का,&lt;br /&gt;मृदु विहगों का कलरव संगीत और&lt;br /&gt;लय भरा जीवन सृष्ठि स्पंदन का !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब और न व्यग्र जीवन होगा&lt;br /&gt;अस्तित्व के संघर्ष का,&lt;br /&gt;नव उमंग और नव तरंग संग&lt;br /&gt;उदय होगा उत्कर्ष का !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सभी की इच्छाए पूर्ण&lt;br /&gt;ऐसा उस उदित प्रभा को बनायें,&lt;br /&gt;नूतन बर्ष की नव बेला पर&lt;br /&gt;सभी को मेरी हार्दिक शुभकामनाये !&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;Wishing you &amp;amp; all your family members a very joyous new year-2010 !!!!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-8536422736668831249?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/8536422736668831249/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=8536422736668831249' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8536422736668831249'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8536422736668831249'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html' title='ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे ! (दूसरा और अंतिम भाग)'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-7612955888838479278</id><published>2009-12-29T23:21:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.627-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कब न जाने यु ही पलक झपकते दस साल गुजर गये, पता ही न चला। अचानक मुझसे मिलना और फिर कुछ ही लम्हों मे सदा के लिये मेरे साथ ही ठहर जाने का घडी भर मे लिया उसका वो फैसला आज भी वक्त बे-वक्त मुझे उन लम्हों के बारे मे सोचने पर मजबूर कर देता  है। मैं समझता हूं कि इतनी जल्दी फैसला कोई भी प्राणि दो ही परिस्थितियों मे लेता है, एक तो तब जबकि उसे जो मिला है उसको पाने की उसकी चाहत बहुत पुरानी हो और अचानक वह उसे मिल जाये, दूसरा  तब जबकि उसके पास और कोई विकल्प हो ही ना । मेरे हिसाब से उसके लिये भी शायद दूसरी परिस्थिति  ही ज्यादा प्रबल रही होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चो से बेहद लगाव रखने वाली स्वीटी ने दो बार  दस सालो के दर्मियां मां बनने का असफ़ल प्रयास भी किया, लेकिन उसका  दुर्भाग्य कि वह मातृत्व सुख पाने से वंचित रही, पैदा होने के चंद रोज बाद ही बच्चे चल बसे। स्वभाव से बहुत सरल और एक अजनवी से भी शीघ्र घुल-मिल जाने की उसकी खूबियों ने उसे शीघ्र ही मुह्ल्ले मे भी सबकी चेहती बना दिया। मौका मिलने पर हल्के-फुल्के मजाक करने से भी नही चूकती, मसलन सर्दियो मे जब सुबह-सबेरे बिस्तर से उतरते ही पैर चप्पल अथवा  स्लिपर ढूढने लगते है, तो उसे जैसे ही यह अहसास होने लगता है कि मैं पलंग से नीचे उतरने वाला हूं, तो वह तुरन्त मेरे चप्पलों को उठाकर दस कदम दूर ले जाकर रख देती है । मेरे लाख आग्रह के बावजूद भी क्या मजाल कि मै उसे चप्पल वापस जगह पर लाने के लिये मना सकू, लेकिन ज्यों ही नंगे पांव  दूर पडे चप्पलों को लेने बढता हूं, वह खुद ही लाकर चप्पल मेरे पैरों के पास रख देती और फिर मेरे से आलिंगनबद्ध हो जाती है। शाम को दफ़्तर से जब घर लौटता हूं तो मेरे घर से सौ मीटर दूर गली के मोड पर मै अक्सर ही गाडी का हौर्न बजाता हू, और वह हौर्न सुनते ही तुरन्त घर के मेन गेट पर आकर खडी होकर बेसब्री से मेरा इन्तजार करने  लगती  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३१ दिसमबर, १९९९ और दिल्ली का बुद्धा गार्डन, यही तो  थी वो तिथि जब मैं शरद ऋतु की एक ठंडक भरी दोपहर को अकेला गुम-सुम सा  पार्क की हरी दूब मे लेटकर धूप का आनन्द लेते हुए एक मैग्जीन के पन्ने पलटे जा रहा था।  वह कब न जाने मेरे एकदम समीप आकर बैठ गई, और मुझे पता भी तब चला, जब मैने कुछ आहट सुनकर मैगजीन से अपना ध्यान हटाया था। वह दीखने में एक खाते-पीते घर की लग रही थी, सुनहरा डील-डौल बदन,  खिले हुए चेहरे पर तिरछी नजरों से मुझे कुछ इस तरह देख रही थी, मानो मुझसे कुछ कहना चाहती हो।  मैं भी उसके मन के अन्दर के भावो को भांप चुका था।  कुछ देर मैंने भी जब उसे निहारा और उसने मुझ पर से नजरे नहीं हटाई तो, मैंने अपना हाथ आगे उसकी तरफ बढ़ा दिया। अरे, यह क्या, उसने भी झट से अपना हाथ मेरे हाथ में रख दिया था। मैं उसी अध्-लेटी हुई स्थिति  में घास पर खिसकता हुआ उसके करीब जा पहुचा और उसके बालो को सहलाने लगा था। बस फिर क्या था, मानो वह भी इसी वक्त की प्रतीक्षा में थी, उसने भी बैठे-बैठे अपनी गर्दन मेरे काँधे पर सटा दी और मेरे चेहरे को चूमने लगी। मैं भी अपने ओंठो को गोल-गोल घुमा कर एक हिन्दी गीत "तुम आ गए हो नूर आ गया है ...." सीटी बजाने के अंदाज में  गुनगुनाता हुआ उसके सिर पर हाथ फेर उसके बालों को सहलाता चला गया था।&lt;br /&gt;                                              ………॥ इस संस्मरण का दूसरा और अंतिम भाग कल॥      &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-7612955888838479278?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/7612955888838479278/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=7612955888838479278' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/7612955888838479278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/7612955888838479278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html' title='ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-9000825512536259115</id><published>2009-12-02T20:21:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.696-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>फ्रांस की क्रांति जैसी क्रांति क्या इस देश मे भी….. ?</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/Sxc9RpGHLqI/AAAAAAAAAMI/CT-u5mCSMVg/s1600-h/180px-LouisXVIExecutionBig.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5410860850607500962" style="WIDTH: 180px; CURSOR: hand; HEIGHT: 136px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/Sxc9RpGHLqI/AAAAAAAAAMI/CT-u5mCSMVg/s320/180px-LouisXVIExecutionBig.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शुरु करने से पहले, संक्षेप मे आये देखें कि क्या थी फ्रांस की क्रान्ति और कैसे आई थी वह क्रांति।१७८९ -१७९९ फ्रांस के इतिहास में राजनैतिक और सामाजिक उथल-पुथल और आमूल परिवर्तन की अवधि थी, जिसके दौरान फ्रांस की सरकारी सरंचना, जो पहले कुलीन और कैथोलिक पादरियों के लिए सामंती विशेषाधिकारों के साथ पूर्णतया राजशाही पद्धति पर आधारित थी, अब उसमें आमूल परिवर्तन हुए और यह नागरिकता और अविच्छेद्य अधिकारों के प्रबोधन सिद्धांतों पर आधारित हो गयी। आर्थिक कारकों में शामिल थे अकाल और कुपोषण, जिसके कारण रोगों और मृत्यु की सम्भावना में वृद्धि हुई, और क्रांति के ठीक पहले के महीनों में आबादी के सबसे गरीब क्षेत्रों में भुखमरी की स्थिति पैदा हो गयी। अधिक बेरोजगारी और रोटी की ऊँची कीमतों के कारण भोजन पर अधिक धन व्यय किया जाता था, और अन्य आर्थिक क्षेत्रों में धन का व्यय अल्प होता था। भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, और यह भी एक उलेखनीय बात है की इस क्रांति को सुलगाया वहाँ की महिलाओं ने । कहा जाता है की एक बार जब तंग आकार महिलाओ ने उस होता को घेरा जिसमें शाही परिवार ठहरा था, तो जब राजकुमारी ने उनके आन्दोलन करने का कारण पूछा तो लोगो ने कहा की हम भूखे है हमें रोटी नहीं मिलती तो उसका जबाब था की अगर रोटी नहीं है तो ब्रेड क्यों नहीं खा लेते ? बस, राजकुमारी के इस कथन ने एजी में घी का कम किया और फ़्रांस जल उठा।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/Sxc9LDUXHiI/AAAAAAAAAMA/lxe693py28E/s1600-h/180px-Sans-culotte.jpg"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5410860737387503138" style="WIDTH: 180px; CURSOR: hand; HEIGHT: 246px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/Sxc9LDUXHiI/AAAAAAAAAMA/lxe693py28E/s320/180px-Sans-culotte.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अन्य कारण यह तथ्य था कि लुईस XV ने कई युद्ध लड़े, और फ्रांस को दिवालिएपन के कगार पर ले आये, और लुईस XVI ने अमेरिकी क्रांति के दौरान उपनिवेश में रहने वाले लोगों का समर्थन किया, जिससे सरकार की अनिश्चित वित्तीय स्थिति और बदतर हो गयी। आखिरकार 9 नवंबर 1799 को (18 Brumaire of the Year VIII) नेपोलियन बोनापार्ट ने 18 ब्रुमैरे के तख्तापलट का मंचन किया जिसने वाणिज्य दूतावास की स्थापना की. इससे प्रभावी रूप से बोनापार्ट की तानाशाही को मदद मिली और अंत में (1804 में) उसे सम्राट (Empereur) बनाया गया. जो फ्रांसीसी क्रांति की रिपब्लिकन अवस्था को विशेष रूप से करीब ले आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हालात तो हमारे देश मे भी उस क्रांति के पहले के फ़्रांसिसी हालात से ज्यादा भिन्न नजर नही आते है। आज जब हमारा यह देश, जहां मंदी, महंगाई और बेरोजगारी की वजह से भुखमरी के कगार पर खडा है, जहां आज देश का गरीब तबका सौ रुपये किलो की दाल खरीदने को मजबूर है, आज जहां एक अस्सी रुपये की धिआडी कमाने वाला मजदूर अपने परिवार को दो जून की रोटी मुहैया करा पाने मे असमर्थ है, वहीं दूसरी तरफ़ महाराष्ट्रा की कौंग्रेस-एनसीपी सरकार अपने नेताऒं के युवा होनहार नौनिहालों को न सिर्फ़ अनाज से दारू बनाने के लाइसेंस बांट रही है, अपितु उन्हे अन्य सुविधायें भी सरकारी खर्च पर मुहैया करवा रही है। अब जरा सोचिये, एक तरफ़ देश की जनता के पास अपने बच्चो को भरपेट खिलाने के लिये अनाज उप्लब्ध नही है, वहीं दूसरी तरफ़ ये देश के राजनीतिज्ञ उस बहुमुल्य अनाज से दारू बनाकर मोटी रकम कमाने पर आमदा है। इनकी बला से देश और देश की गरीब जनता जाये भाड मे। हमारे इस देश के सेक्युलर मीडिया ने भले ही अपने निजी स्वार्थो के चलते इसे बडी खबर न बनाया हो लेकिन आपको शायद यह’ याद हो, कि करीब डेड साल पह्ले हमारी सरकार ने हजारों टन गेहुं आयात किया था, मगर चुंकि वह गेहुं जानवरों को खिलाने के लिये भी उपयुक्त न था, अत: उसे, जैसा कि कुछ खबरों मे बताया गया था, समुद्र मे ही डुबा दिया गया । आपको शायद मालूम हो कि हजारों टन दाल जो आयात कर कलकता पोर्ट पर आई थी, वह समय पर न उठा पाने की वजह से बन्दरगाह पर पडे-पडे ही सड गई। इन सब घटनाओ से तो ऐसा ही लगता है कि देश और जनता की किसी को कोई फिक्र नही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता तो यह है कि शायद अपने अच्छे कर्मो ( मालूम नही इस जन्म या पिछले जन्म) की वजह से मौन सिंह एकदम मौन बैठा अपनी रिटायरमेंट जिन्दगी मजे से गुजार रहा है, और उनकी प्रोक्सी तले, और इस देश की मूर्ख वोटर जमात की वजह से देश की सत्ता पर काबिज लोग, दोनो हाथों से देश को लूटने मे लगे है। गरीब और अमीर न कहकर यों कहे कि गरीब और लुटेरों के बीच खाई निरन्तर बढती ही जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह सब कुछ यों ही चलता रहेगा या फिर लोग फ़्रांस जैसी किसी क्रांति के लिये अपने हक मे उठ खडे होने का साहस दिखा पायेंगे ? दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते है कि क्या ये लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकारे भी इस देश की जनता को उस स्थिति तक पहुँचने के लिए मजबूर कर रही है ?&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-9000825512536259115?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/9000825512536259115/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=9000825512536259115' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/9000825512536259115'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/9000825512536259115'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/12/blog-post_5934.html' title='फ्रांस की क्रांति जैसी क्रांति क्या इस देश मे भी….. ?'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/Sxc9RpGHLqI/AAAAAAAAAMI/CT-u5mCSMVg/s72-c/180px-LouisXVIExecutionBig.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-5556772399839317120</id><published>2009-11-30T22:28:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.708-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>घुन लगी न्याय व्यवस्था और न्यायिक आयोगों का औचित्य !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गौर से देखे तो आज हमारी पूरी क़ानून व्यवस्था ही एक जर्जर अवस्था में पहुँच चुकी है । जो अंग्रेजो के काल से चली आ रही जटिल न्यायिक व्यवस्था इस देश में मौजूद है वह आज अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। और यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देश के तथाकथित तीन महत्वपूर्ण किन्तु भ्रष्ट खम्बो में से एक जो यह खम्बा भी है, इस पर से भी लोगो का विश्वास धीरे-धीरे उठता जा रहा है। हमारी न्यायिक व्यवस्था को पाकिस्तान से आया आतंकवादी कसाब आज मुह चिढा रहा है। सब कुछ खुला-खुला है कि इस आतंकवादी ने क्या किया, मगर सालभर से अधिक का वक्त और ३१ करोड़ रूपये खर्च करने के बाद भी हमारी न्याय व्यवस्था उसके साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेल रही है। दूसरी तरफ लिब्राहन आयोग, और अन्य इसी तरह आयोग हमारी जांच प्रणाली पर ही सवालिया निशान लगा रहे है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया, यह कहावत सिर्फ अयोध्या के ही केस में नहीं चरितार्थ होती अपितु अन्य मामलो जैसे बोफोर्स, १९८४ के दिल्ली दंगे, नब्बे के दशक के मुंबई दंगे और बमकांड, चारा घोटाला इत्यादि-इत्यादि सभी पर लागू है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकारिया काम-काज के तरीके और राजनीतिज्ञो के आचरण से भी नहीं लगता कि कोई इस बारे में गंभीर भी है। आज जरुरत है कि जनता एक स्वर में उठ खडी हो, और इन तीनो खम्बो में सुधार की मांग करे। यदि सरकार किसी जांच के लिए कोई आयोग बनाती है और आयोग को रिपोर्ट देने के लिए तीन महीने का समय देती है, लेकिन यदि तीन महीने बाद वह इस जांच के लिए समय अवधि में फिर से विस्तार करती है, तो यह समझ लेना चाहिए कि या तो सरकार या फिर जांचकर्ता ईमानदार नहीं है, उनमे से किसी एक अथवा दोनों के दिलो में खोट है । कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों और देश हित में अगर इस समयाविस्तार की जरुरत पड़ती भी है, तो सरकार को यह क़ानून बनाना चाहिए कि कोई भी आयोग किसी भी स्थिति में एक साल से अधिक का समय नहीं ले सकता, और कोई भी न्यायालय किसी केस को दो साल से अधिक नहीं खींच सकता, चाहे केस भले ही कितना भी जटिल क्यों न हो। उसे दो साल के अन्दर हर हाल में फैसला सुनना ही पड़ेगा,फिर देखिये कैसे नहीं आती न्याय व्यवस्था पटरी पर । &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-5556772399839317120?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/5556772399839317120/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=5556772399839317120' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5556772399839317120'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5556772399839317120'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='घुन लगी न्याय व्यवस्था और न्यायिक आयोगों का औचित्य !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-8752925676486064268</id><published>2009-11-22T21:27:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.724-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>फिर सनक गया दिमाग कार्टून बनाने को.....</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/SwoeHDrvdKI/AAAAAAAAAJ8/LvkIAaNWMI4/s1600/DSC02841.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407167409208390818" style="WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/SwoeHDrvdKI/AAAAAAAAAJ8/LvkIAaNWMI4/s400/DSC02841.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ट्वींकल-ट्वींकल औल दि नाईट !&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रविवार की व्यस्तता की वजह से कल रात को कुछ खास नही लिख पाया ! लोग कहते हैं कि इंसान का कबाडी(साहित्यिक) दिमाग पैदाइशी होता है, एक हास्य (पैरोडी कहना पता नही कहां तक उचित होगा, मुझे नही मालूम) तब लिखी थी, जब नौवीं-दसवीं मे पढ्ता था ! और मेरा तो यह मानना है यह एक ऐसी पोएम थी, जिसे ज्यादातर लोगो ने समय-समय पर अपने तरीके से भिन्न-भिन्न रूपों मे प्रस्तुत किया, आइये आपको भी सुनाता हूं! कुछ व्याकरण की गलतियों को जो उस समय पर मेरे हिसाब से सही थी, मैने उनमे सुधार नही किया, शब्द अगर अशोभनीय लगे तो अग्रिम माफ़ी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्वींकल-ट्वींकल औल द नाईट&lt;br /&gt;जीरो वाट की धुमली लाईट&lt;br /&gt;वन मिड नाईट वेन माई वाइफ़ वज&lt;br /&gt;डीपली सिलेप्ट ऐट माई लेफ़्ट साईड&lt;br /&gt;सपने मे सी सौ अ पिक्चर,&lt;br /&gt;ऐज वह ट्रैवलिंग इन अ ऐयर फ़्लाईट&lt;br /&gt;जिसमे सौ हर मोस्ट ब्युटी,&lt;br /&gt;भेरी डेंजरस अ ग्रीडी काईट&lt;br /&gt;हर ब्युटिफुल फ़ेस हैड डर के मारे,&lt;br /&gt;तुरन्त बिकेम फ़्रोम रेड टु वाईट&lt;br /&gt;ऐट लास्ट जब काइट रीच्ड नियर हर,&lt;br /&gt;बचाओ-बचाओ ! सी क्राईड&lt;br /&gt;मै जागा ऐन्ड वोक्ड हर अप&lt;br /&gt;बाय हर आर्म्स सी होल्ड मी वेरी टाईट&lt;br /&gt;सुन कर हर व्वाइस अवर पडोसी,&lt;br /&gt;सोचा दिस कि दे हैव अ फाईट&lt;br /&gt;पर जब दे पीप्ड विन्डो से अन्दर,&lt;br /&gt;बोले, अच्छा फूल बनाया राइट-राइट&lt;br /&gt;ट्वींकल-ट्वींकल औल द नाईट&lt;br /&gt;जीरो वाट की धुमली लाईट &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-8752925676486064268?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/8752925676486064268/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=8752925676486064268' title='24 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8752925676486064268'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8752925676486064268'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html' title='फिर सनक गया दिमाग कार्टून बनाने को.....'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/SwoeHDrvdKI/AAAAAAAAAJ8/LvkIAaNWMI4/s72-c/DSC02841.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-4032549345848259709</id><published>2009-11-21T05:29:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.731-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>लघु  कथा- परवेज</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आज मुझे छुट्टी से लौटकर अपनी यूनिट आये पूरे आठ महीने बारह दिन हो गए, लेकिन साले, तूने इस दौरान मुझे एक भी ख़त नहीं लिखा ! यहाँ हमारे पास इ-मेल भेजने का कोई साधन नहीं , इसका मतलब यह तो नहीं कि तू ख़त भी न लिखे ! तुझे याद हो न हो, लेकिन मुझे अच्छी तरह से याद हैं वो कॉलेज के दिनों की बाते, और वो पी. सी. की फुल फॉर्मस, सारी की सारी ....! अगर मैंने एक-एक कर कभी भाभी जी को सूना दी&lt;br /&gt;तो फिर रोयेगा, मैंने बता दिया ! अगर बचना चाहता है तो हर महीने कम से कम एक ख़त मुझे जरूर लिख दियाकर ! साले, एक तू और रेखा ही तो हैं मेरे इस दुनिया में, जिन्हें मैं दिल की हर बात बता पाता हूँ, और मन का बोझ हल्का कर पाता हूँ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज फिर से इस पत्र के माध्यम से, तुझे मैं अपने दिल की एक और बात बताना चाहता हूँ ! सोचा था कि यह बात मैं अभी अपने ही दिल में दफ़न करके रखूगा, और जब काफी साल गुजर जायेंगे, तब तुम्हे बताऊंगा ! लेकिन अपने मुल्क से दूर, यहाँ इस विदेशी मुल्क में न जाने कभी-कभी ऐसा क्यों लगने लगता है कि इस साल की दो महीने की छुट्टियाँ अपने घर वालो और तुम जैसे लोगो के साथ बिता पाने का सुअवसर शायद फिर से मिले न मिले ! यूँ तो मौत पर किसी का भी बर्चस्व नहीं है, मगर यहाँ हमारे साथ कदम-कदम पर अनिश्चित्ताये..... तुम समझ सकते हो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले साल का यह वाकया है, बी आर के इंजीनियरों की सुरक्षा का जिम्मा मुझे सौंपा गया था ! उन्ही इंजीनियरों में से एक था, परवेज आलम ! एक दिन सुबह जब हम लोग उन्हें एस्कोर्ट करते हुए एक निर्माणाधीन पुल की और ले जा रहे थे, तो तालिबानियों ने विस्फोट कर दिया ! मेरे दो जवान और एक इंजीनियर उसमें शहीद हो गए थे, और परवेज तथा उसका एक और साथी गंभीर रूप से जख्मी ! परवेज को खून की जरुरत थी, मगर उसका ब्लड ग्रुप किसी से मैच नहीं हो पा रहा था ! चूँकि मेरा ओ पोजेटिव ग्रुप है, इसलिए डाक्टरों ने मुझे खून देने की सलाह दी, मैंने तुरंत ही खून दिया ! करीब पंद्रह दिनों बाद परवेज फिर सही सलामत हो गया था! कुछ और महीने गुजरे, इस बीच वहाँ कैम्प में हमें चाय-पानी पिलाने हेतु एक स्थानीय १२-१३ साल का बच्चा आबिद काम करता था ! एक सुबह मैंने देखा कि परवेज उसे अपनी सरकारी जीप में ड्राइविंग सिखा रहा था, मैंने सहज यह मान लिया कि यह सामान्य सी बात है कि परवेज को शायद बच्चो से ज्यादा लगाव होगा, और साथ ही आबिद और वह एक ही धर्म से सम्बद्ध है, इसलिए स्वाभाविक तौर पर यह उसका आबिद के प्रति लगाव है, जो उसे इतनी बारीकी से ड्राइविंग सिखा रहा है ! यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा, इस बीच हमारे कैम्प के पास ही एक और आतंकवादी हमला हुआ, दोनों तरफ से हुई गोली बारी में बहुत सारे स्थानीय लोग मारे गए थे, जिसमे से एक थी आबिद की बड़ी बहन, खालिदा, अपने परिवार में वह दो भाई और तीन बहने थी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना के बाद से मैंने आबिद के व्यवहार में बहुत से परिवर्तन देखे, वह जिस तरह पहले हमारे से व्यवहार करता था, उसमे एकदम बदलाव आ गया था! मैं उसके आतंरिक दर्द को भांप रहा था ! मैंने कई बार उससे उसका दर्द बाँटने की भी कोशिश की, मगर उसमे भी पेंच थे, परवेज के अलावा वहाँ किसी और को उनकी भाषा ठीक से बोलनी समझनी नहीं आती थी ! अचानक एक दिन सुबह उठे तो पास के नाले पर कोहराम मचा हुआ था! किसी ने आबिद की दूसरी बड़ी बहन और भाई का क़त्ल कर, छोटे से नाले में डाल दिया था! जब मैं अपने कुछ जवानो के साथ वहाँ पहुंचा तो देखा कि परवेज उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा था ! मैंने आगे बढ़ परवेज से सारे हालात का जायजा लिया, तो उसने मुझे घटना की जानकारी दी ! और साथ ही यह भी बताया कि मैं इन्हें यह समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि यह घृणित काम, हो न हो आतंकवादियों का ही है, उन्होंने आबिद की बहन की अबरू लूटने के बाद उसका और उसके भाई का क़त्ल कर दिया था ! परवेज के इस जज्बे से मैं काफी प्रभावित हुआ था! एक दिन दोपहर में लंच के बाद मैं कुर्सी पर यों ही सुस्ता रहा था कि एक पठान दोनों हाथो की उंगलिया आपस में जोड़, उन्हें रगड़ता हुआ मेरे सामने आया, ड्यूटी पर मौजूद गार्ड ने बताया कि वह आबिद का अब्बू है ! वह मुझसे कुछ कहना चाहता था, मैंने उसे साहस दिलाते हुए कहा कि बताओ क्या तकलीफ है तुम्हे ! कुछ इधर-उधर देखने के बाद वह पठानी अंदाज में टूटी-फूटी हिन्दी में बोला, और जो मैंने सुना, मेरे रौंगटे खड़े हो गए थे ! एक सरीफ सा दिखने वाला इंसान इतना कमीना कैसे हो सकता था, मेरी समझ में नहीं आ रहा था! मैंने उसकी बात सुन पूरी तहकीकात का आश्वासन उसे दिया, तो वह चला गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दिमाग में आबिद के पिता/ अब्बू के कहे शब्द गूंजे जा रहे थे, अत: मैंने परवेज पर नजर रखनी शुरू कर दी थी! गर्मियों का मौसम था, मगर दूर पहाडो से आने वाली सर्द हवाए वातावरण में ठंडक पैदा किये हुए थे ! एक दिन शाम करीब सात बजे, जब मैं कैम्प के आस पास घूम रहा था तो एक टिन के सेड के पास मुझे कुछ खुसर-फुसर सुनाई दी ! दबे कदमों से मै जब पास गया, तो पाया कि परवेज किसी स्थानीय पुरुष से दबी जुबान में बाते कर रहा था! कुछ पल बाद वह चला गया, मैं वहाँ छुपकर परवेज की गतिविधियों पर नजर गडाए था! थोड़ी देर बाद आविद वहाँ आया और परवेज उसे एक पिता की तरह प्यार से कुछ समझाने लगा ! परवेज उसे कुछ निर्देश दे रहा था, और वह मासूम सहमती में अपनी गर्दन हिला देता था! इससे परवेज के चहरे पर एक शैतानी मुस्कराहट सी दौड़ पड़ती थी! मैं किसी अनहोनी की आशंका से पूर्ण सचेत हो गया था ! रात आठ बजे रोल-कॉल के बाद जवान अपने रात्रि- भोज के लिए लंगर के पास एकत्रित होते थे! परवेज द्वारा आबिद को दिए निर्देशों से मैं इतना तो समझ ही गया था कि वह उसी दौरान किसी बड़ी बारदात को अंजाम दिलाना चाहता था ! परवेज के साथ प्री-प्लान के हिसाब से ठीक आठ बजे आतंकवादियों ने हमला बोल दिया था, अत: बिना देरी किये मैंने परवेज और आविद दोनों को बिना सोचे समझे गोली मार दी! जवान आतंकियों से जूझ रहे थे, मैंने जब परवेज वाले टेंट का मुआयना किया तो पाया कि एक बारूद से भरी जीफ टेंट से कुछ दूरी पर खडी थी, जिसे शायद आबिद चलाकर लंगर तक ले जाने वाला था! चारो आक्रमणकारी मारे गए थे ! और मैंने अगले दिन यह दर्शाया कि परवेज और आबिद भी आतंकवादियों का शिकार हो गए, जबकि कहानी कुछ और थी, परवेज अपनी अतृप्त वासना की पूर्ति के लिए आबिद की दो बहिनों की बली चढ़ा चुका था, यह जानकारी आबिद के अब्बू ने मुझे दी थी ! और इसके लिए आतंकवादियों के स्थानीय आंका से मिलकर दोष हमारे सिर मढ़ कर आत्मघाती हमले के लिए आबिद का दिमाग सफाई ( ब्रेनवास) के जरिये उसको तैयार कर रहा था !&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जब तक वह एक देशभक्त था, मैंने उसे खून भी दिया,&lt;br /&gt;जब गद्दारी पर उतर आया, तो मैंने उसे भून भी दिया !!&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;तब से यह मेरे मन पर एक बोझ सा था, आज तुझे बताकर हल्का सा महसूस कर रहा हूँ ! हाँ, ध्यान रहे कि मैंने अभी यह बात रेखा को नहीं बताई और तुमसे गुजारिश है कि तुम भी मत बताना !&lt;br /&gt;तुम्हारा ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट : कहानी की घटना और पात्र सब काल्पनिक है, अत: इसे अन्यथा न लिया जाये ! &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-4032549345848259709?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/4032549345848259709/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=4032549345848259709' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/4032549345848259709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/4032549345848259709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/11/blog-post_8439.html' title='लघु  कथा- परवेज'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-161083776570599487</id><published>2009-11-14T22:29:00.000-08:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.756-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>भेडे प्रतिकार नही करती !</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;हमारे इस लोकतन्त्र मे भ्रष्ठाचारियों के हौंसले किस कदर बुलंद है, इसकी एक मिशाल निर्दलीय विधायक होने के वावजूद आंटी सोनिया, हेर-फेर के भीष्म पितामह लालू और गुरुऒं के गुरु, शोरेन गुरुजी के आशिर्वाद से एक जमाने मे झारखण्ड की सत्ता के प्रमुख बने, वहां के भूतपूर्व सम्मानित मुख्यमन्त्री श्री मधु कोडा के इस एक लाईन के बयान से मिलता है, जिसमे कल ही उन्होने कहा कि यदि उन पर आरोप साबित हो गये तो वे राजनीति से सन्यास ले लेंगे। बयान भले ही बहुत छोटा सा लगता हो, मगर खुद मे बहुत से गूढ अर्थ समेटे है। मसलन पहली बात तो यह कि हमारे प्रवर्तन निदेशालय और अन्य जांच अजेंसियों द्वारा उसके पास से जुटाये गये इतने बडे हेर-फ़ेर की सामग्री और अन्य बडे-बडे दावों के वावजूद, मधु कोडा को पूरा भरोशा है कि ये ऐजेंसियां और सरकार उन पर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध नही कर पायेंगी। दूसरी बात यह कि मधु कोडा इस बात से भी आस्वस्थ हैं कि जहां तक राजनीतिज्ञ विरादरी की भ्रष्ठता का मुद्दा है, हमारा न्यायतंत्र और कानून, खास कुछ नही कर पाते । तीसरी महत्वपूर्ण बात उनके बयान से यह निकलती है कि जैसा कि उन्होने कहा कि वे राजनीति से सन्यास ले लेंगे, इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि इस देश मे आरोप सिद्ध हो जाने के बाद भी भ्रष्ठ लोग राजनीति से जुडे रहते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे भी आगे चलकर देखें तो जैसा कि हम सभी लोग इस बात से वाकिफ़ है कि इस देश मे आजतक हुए बडे-बडे घोटालो की जांच का क्या हश्र हुआ ? मसलन चारा घोटाला, सुखराम टेलीफोन घोटाला, बोफ़ोर्स घोटाला, हाल के सडक और मोबाईल लाइसेंस घोटाले, इत्यादि । ठीक उसी तरह अगर आप मधु कोडा से जुडे प्रकरण पर भी गौर करें तो यह जांच तबसे ठण्डी पडती दिख रही है, जबसे कोडा की डायरी का जिक्र आया। मतलब सीधा सा है कि बडी मछलियों को पकडने का आह्वान करने वाली केन्द्र सरकार इस घोटाले मे भी बडी मछलियों पर आंच आने की सम्भावना से, उन्हे बचाने की कवायद के चलते, इस केस को भी ठ्न्डे बस्ते मे डालने की तैयारी मे है। आश्चर्य तो तब होता है कि जब इस देश का तथाकथित बुद्धि जीवी वर्ग यह तर्क देने लगता है कि ’लौ विल टेक इट्स ओन कोर्स’ (कानून अपना काम करेगा)। अब कौन इन महापुरुषो से पूछे कि भाई आप किस लौ(कानून) की बात कर रहे है? उस कानून की जो सिर्फ़ एक कमजोर किस्म के नागरिक पर लागू होता है, किसी बलशाली पर नही ? अन्य शब्दो मे कहुं तो गडरिये इस बात को बखूबी जानते है कि स्वभाव से भॆडे प्रतिकार नही किया करती, और कभी कर भी लेती हैं तो भी झुण्ड की साथी भेडो पर ही अपना गुस्सा निकालती है, गडरिये को कोई नुकशान नही पहुचाती और कभी अगर झुण्ड मे से कोई नरभेड तंग आकर प्रतिकार करने भी लगे, तो उसे गडरिये द्वारा मरवा दिया जाता है। अन्त मे बस यही कहुगा कि जागो !! &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-161083776570599487?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/161083776570599487/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=161083776570599487' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/161083776570599487'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/161083776570599487'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/11/blog-post_14.html' title='भेडे प्रतिकार नही करती !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-916387748444142518</id><published>2009-10-26T06:10:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.829-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>लघु कथा- वह एक नर्स थी !</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;डा० मार्क, डा० श्रीवास्तव के एक अजीज मित्र थे, और डा० श्रीवास्तव के ही आमत्रण पर अमेरिका से भारत आये थे। डा० मार्क से डा० श्रीवास्तव की जान पहचान तब हुई थी, जब डा० श्रीवास्तव अमेरिका मे डाक्टरी कोर्स कर रहे थे। कोर्स खत्म होने के उपरान्त देश सेवा और खासकर ग्रामीण समाज की सेवा का जज्बा डा० श्रीवास्तव को स्वदेश खींच लाया था। यहां लौटकर उन्होने सरकारी नौकरी ज्वाइन की और राज्य सरकार के दूर-दराज के ग्रामीण अस्पतालों मे मरीजो को अपनी सेवायें प्रदान करने लगे। उस वक्त तक उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश से अलग राज्य नही था, अत: डा० श्रीवास्तव का तबाद्ला पहाडो की तलहटी मे बसे उस कस्बे के एक सरकारी अस्पताल मे हो गया था, जिसमे केरल की रहने वाली जैनी बतौर नर्स पिछले चार-पांच सालो से कार्यरत थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि तब मै बहुत छोटा था, और शायद छठी कक्षा में पढता था। मुझे याद है कि सुन्दर और चुलबुले किस्म की जैनी स्वभाव से बहुत मिलनसार और भावनात्मक तौर पर दिल खोलकर दूसरों की मदद करने वाली थी। वह भारत के केरल प्रान्त के कोच्चि से करीब साठ किलोमीटर दूर अथीरापल्ली इलाके की मूल निवासी थी, और वाईएमसीए दिल्ली से प्रशिक्षित थी। उस कस्बे और आस-पास के गांवो के जरुरतमंद लोगो की मदद के लिये वह हमेशा तत्पर रहती थी। अस्पताल के आस-पास के इलाके मे और उस से सठे आस-पास के गांवो मे जब भी कोई प्रसव का इमरजेंसी केस होता, जैनी बिना देरी किये मदद के लिये वहां पहुंच जाती। धीरे-धीरे जैनी उस पूरे इलाके मे एक लोकप्रिय हस्ती बन गई थी। वह किसी से भी अपनी सेवाओं का कोई शुल्क नही लेती थी, अत: इलाके के जिन लोगो के यहां प्रसव के वक्त जैनी अपनी सेवायें देती, वे लोग उस वक्त जैनी को अपनी हैसियत के मुताविक इक्कीस अथवा इक्कावन रुपये तिलक के तौर पर भेंट और एक लड्डू का डब्बा पकडाने मे अपनी शान समझते थे। कम हिन्दी जानने वाली जैनी मरीज को अपने हिन्दी के रटे-रटाये दो वाक्य कि तुम चिन्ता नही करते, गौड सब ठीक करता जी , और फिर सब ठीक-ठाक निपट जाने पर खुशी-खुशी शुक्रिया और थैंकयू बोल लौट आती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा० मार्क को डा० श्रीवास्तव के पास आये तीन रोज हो गये थे कि अचानक डा० श्रीवास्तव को जिला मुख्यालय से सी एम ओ (चीफ़ मेडिकल आफिसर) का फोन आया और उन्हे एक जरूरी मीटिंग के लिये राज्य मुख्यालय, लखनऊ तलब किया गया। डा० श्रीवास्तव ने डा० मार्क की आवाभगत का भार जेनी के ऊपर डालते हुए, उसे कुछ जरूरी निर्देश दे, लखनऊ के लिये प्रस्थान किया। जैनी, मार्क के साथ व्यस्थ हो गई। चुंकि जैनी उस इलाके मे पिछ्ले चार-पांच सालो से रह रही थी, अत: वहां के कुछ जाने माने दर्शनीय इलाकों मे डा० मार्क को घुमाने ले गई। मार्क जिज्ञासू था और जैनी ज्ञाता, दोनो को एक दूसरे से जानकारी लेने और उसे समझने मे एक असीम किस्म का आनंद प्राप्त होता था। और इस समझने-समझाने के चक्कर मे कब दोनो एक दूसरे के इतने नजदीक आ गये , इसका अह्सास दोनो को ही तब हुआ, जब डा० मार्क के प्रस्थान का समय नजदीक आया। “मै तुम्हे छोड्कर नही जा सकता” डा० मार्क ने कहा। “मै भी तुम्हारे बगैर नही रह सकती” जैनी ने धीरे से गम्भीर स्वर मे कहा। “एक साथ रहने के लिये हममे से किसी एक को अपना देश छोडना पडेगा और मुझे तुम्हारा देश पसन्द है “ डा० मार्क ने कुछ सोचते हुए कहा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर कुछ दिनो की छुट्टी लेकर जैनी और मार्क ने शहर आकर एक चर्च मे शादी रचा ली। शादी के बाद दोनो ही बहुत खुश थे, उनकी इस शादी से बस अगर खुश नही थे तो सिर्फ़ उस इलाके के लोग। न जाने उन्हे क्यो यह एक गोरे और एक काले का मेल पच नही रहा था। दो साल तक तो सब कुछ ठीक-ठाक ही चला, इस दर्मियान जब डा० श्रीवास्तव का वहां से तवाद्ला हो गया और महिनों तक जब रिक्त स्थान के लिये कोई डाक्टर उस अस्पताल मे नही आया तो डा० मार्क ही स्थानीय मरीजो की चिकित्सकीय मदद करते। और फिर वह हो गया जिसका अन्देशा कुछ स्थानीय लोग पहले ही  जतला चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैनी करीब पांच-छ: माह के गर्भ से थी, काफ़ी दिनो से बात-बात पर जेनी और डा० मार्क्स के बीच खट-पट चल रही थी, और उनकी बातों से ऐसा लगता था कि उनके बीच गलत फहमी की कोई दीवार खडी हो गई थी। उस दिन सुबह-सबेरे भी उनकी किसी बात पर बहस हो गई थी। उनकी बातों से लगता था कि मानो डा० मार्क्स जेनी से नर्स की नौकरी छोड्ने की बात कह रहा था। जेनी गुस्से मे डा० मार्क को कह रही थी “आई हैडन्ट एक्स्पेक्टेड यू टु से इट वज औल राइट फ़ौर अ मैन टु गो आउट ऐन्ड अर्न हिज लिविंग, बट नौट अ ओमन” (मैने तुमसे यह उम्मीद नही की थी, आदमी के लिये तो बाहर जाकर नौकरी करना ठीक है, लेकिन एक औरत के लिये नही ) डा० मार्क ने भी उसी अन्दाज मे फिर जबाब दिया था “आइ डिडन्ट से इट. ऐज फार ऐज आइ एम कन्सर्न्ड,वोमन कैन डू व्हट एवर दे वान्ट” ( अर्थात मैने यह तो नही कहा। जहा तक मेरा सवाल है, औरत वह सब कर सकती है जो वह करना चाहे ) फिर ज्यों ही मार्क अपना बैग उठा चलने को हुआ, जेनी ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा था “ व्हेन आर यू कमिंग बैक टु इन्डिया मार्क ?” (तुम वापस भारत कब आ रहे हो मार्क्स ?), डा० मार्क ने हल्के स्वर मे बुद-बुदाते हुए छोटा सा जबाब दिया था ’आई डोन्ट नो’ (अर्थात मुझे नही मालूम) ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा० मार्क के अचानक जैनी को ऐसे वक्त पर जिस वक्त पर कि जैनी को उसके सहारे की सख्त जरुरत थी,ऐसी परिस्थितियों मे इस तरह छोड्कर चले जाने से, वह टूटकर रह गई थी। नतीजन दिन प्रतिदिन उसकी हालत गिरती चली गई। और फिर वह एक दिन भी आया जब कस्बे के बीचों-बीच स्थित अस्पताल के ठीक बगल पर बने उस मकान की उपरी मंजिल से, जिस पर जैनी पिछले पांच सालो से किराए पर रह रही थी, रुक-रुककर असहाय अबला के छटपटाने की कराहे और दर्द भरी चीखे उस सुनशान कस्बे को हिलाने लगी। लेकिन इलाके के जिन लोगो की उसने लग्न और मेह्नत से पिछले छह सालो से सेवा की थी, जो लोग कल तक उसे जैनीजी-जैनीजी कहकर पुकारते थे, वहीं आज मदद करना तो दूर, उधर से गुजरते हुए जैनी पर फब्तियां कसने से तनिक भी नही हिचकिचा रहे थे। उसकी बदकिस्मती देखो कि हाल ही में उस अस्पताल में नया आया डाक्टर भी हफ्ते रोज की छुट्टी पर अपने गाँव गोरखपुर गया था। कस्बे में एक छोटा सा निजी चिकित्सालय भी था, मगर जैनी को वहाँ पहुंचाता कौन ? और हद तो तब हो गई जब ६५ वर्षीय मकान मालकिन, जिसे जैनी रमा चाची कह कर पुकारती थी, उसके दरवाजे के समीप गई और जब जैनी अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, उस रमा चाची से मदद की गुहार लगा रही थी, तभी उसके यह कटु बोल जैनी के कानो में पड़े कि रांड, चली थी अंग्रेज बनने, अब मर, सड यहीं पर। यह सुनकर जैनी करीब १५ मिनट के लिए अपने ओठों को चबाकर कसकर बंद करके एकदम खामोश सी हो गई थी। मानो इस बीच सोच रही हो कि इन लोगो को, जिन्हें वह अपना समझकर, सुख-दुःख में इनकी इतनी सेवा करती रही, क्या उनसे उसे इसी सिले की उम्मीद थी? माना कि डा० मार्क के साथ उसका शादी रचाना लोगो को पचा न हो, लेकिन वह उसका अपना, अपनी निजी जिन्दगी के बारे में लिया गया फैसला था, उसे सही या गलत ठहराने वाले ये लोग होते कौन है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी अनजान भय की लकीरे उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई देती थी । लोग अपने घरो-गलियों में तरह-तरह की बाते करते रहे, मगर एक भी माई का लाल ऐसा न निकला जो उसकी मदद के लिए आगे आ सके। रात करीब एक डेड बजे तक जैनी की दर्द भरी कराहे वातावरण में गूंजती रही, और फिर कुछ पल बाद एक नन्हे मेहमान की रूंधन भी वातावरण में गूंजी । मगर जब कुछ जिज्ञासू तमाशबीन सुबह जैनी की देहरी पर अन्दर झाँकने के लिए पहुचे तो जैनी और उसका नन्हा मेहमान बिस्तर पर शांत सो चुके थे, सदा के लिए !&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-916387748444142518?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/916387748444142518/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=916387748444142518' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/916387748444142518'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/916387748444142518'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/10/blog-post_26.html' title='लघु कथा- वह एक नर्स थी !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-5767547921424968749</id><published>2009-10-13T03:40:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.847-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>चोरो के पैसो पर ऐश करता एक देश !</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ऐसा अनुमान है कि १९४७ में आजादी के तुंरत बाद से अब तक हम भारतीय, जिनमे हमारे नेता, अफसर और कुछ व्यावसायिक घराने शामिल है, अपने देश का धन चुराकर तकरीबन बारह खरब रूपये अकेले सिर्फ स्विस बैंक के खातो में जमा कर चुके है ! यूँ तो समय-समय पर इस देश में यह मांग उठती रही है कि विदेशी बैंको में पडा इस देश का काला धन वापस देश में लाया जाए और इस देश के विकास कार्यो में लगे, मगर यह बात भी किसी से छुपी नहीं कि हम लोग और हमारी सरकारे इस दिशा में कितनी ईमानदारी से पहल करने की कोशिश करते है ! अभी हाल के चुनावों से पहले भी यह मुद्दा खूब उछला लेकिन उसके बाद क्या हुआ ? वही ढाक के तीन पात ! सबके पास रटा-रटाया एक ही एक्सक्यूज होता है कि स्विस राष्ट्रीय बैंक अपनी गुप्त नीति के तहत इन खातो के आंकडे मुहैया नहीं करा सकती ! दुनिया भर में लोगो के बढ़ते विरोध के बाद स्विस बैंकर एसोशियेसन ने एक नया सगूफा छोड़ दिया है ! अब वे कहते है कि इस बर्ष दिसम्बर माह से वे खातेदार का अता-पता बताये बगैर जिन देशो के साथ उनकी दोहरी कर संधि है उन देशो के खाता धारियों की आय पर वे टैक्स लगाकर उस पैसे को उस देश को दे देंगे जिसके ये खाते है ! अकेले अमेरिका के खाताधारियों के ही स्विस बैंक में ४४५० खाते इस वक्त है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी हास्यास्पद बात है कि हम लोग अपने देश से धन चोरी करके ले जाकर एक विदेशी देश के हवाले कर देते है और वह मजे में बैठकर हमारे उस चोरी के माल से अर्जित कमाई से ही मोटा सेठ हुए जा रहा है और ऐश कर रहा है ! आइये एक नजर कुछ उन आंकडो पर डाले !&lt;br /&gt;२००६ में प्रकाशित कुछ आंकडो के हिसाब से स्विस बैंक में शीर्ष पांच चोरो में से भारत के चोर सबसे ऊपर थे :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्विट्जरलैंड में जमा शीर्ष पांच देशो के खाताधारियों का धन :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;India-------$1456 billion&lt;/span&gt; (यानी करीब सात खरब तीस अरब रूपये)&lt;br /&gt;Russia------$ 470 billion&lt;br /&gt;UK----------$ 390 billion&lt;br /&gt;Ukraine-----$ 100 billion&lt;br /&gt;China-------$ 96 billion&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी भारत से ही करीब सात खरब तीस अरब रूपये खातेदारों द्बारा स्विस खाते में जमा थे, और ८ % साधारण ब्याज की दर से भी स्वीटजरलैंड साल के ५६ अरब रूपये सिर्फ हमारे चोरो द्बारा जमा किये गए काले धन में से ही कमा लेता है ! तो अब आप ही बतावो कि जब बैठे -बिठाये उनकी इतनी कमाई हो जाती है तो उन्हें और कुछ करने की जरुरत क्या है ? हम दुनिया में तरह-तरह के अपराधो की बात करते है और उन देशो पर पश्चिमी राष्ट्र कारवाही करने की &lt;span class=""&gt;कोशिशे भी &lt;/span&gt;करते रहते है जो इन अपराधो को बढावा देते है ! मगर जो एक देश खुले आम आर्थिक अपराधो को इस तरह बढावा दे रहा है, उसके खिलाप कार्यवाही की कोई बात नहीं करता ! &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-5767547921424968749?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/5767547921424968749/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=5767547921424968749' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5767547921424968749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/5767547921424968749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/10/blog-post_13.html' title='चोरो के पैसो पर ऐश करता एक देश !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-1752008001563752622</id><published>2009-09-19T06:17:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.884-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>लघु कथा- और ताऊ मर गया !</title><content type='html'>&lt;em&gt;सन् ८७-८८ की बात है, महानगरी में ताऊ ( दोस्तों द्वारा दिया गया उपनाम ) की पहली नौकरी लगी थी। सुदूर गाँव से चलते वक्त ताऊ को उसके दोस्तों और परिवार के छोटे बडो ने महानगरी के बारे में काफ़ी हिदायते दी थी; मसलन सड़क ढंग से पार करना, पैसे/पर्स जेब में संभाल के रखना, किसी से झगडा मत करना, इत्यादि -इत्यादि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धोखे ही धोखे है चिरागों की चकाचौंध में,&lt;br /&gt;दर्रे-दर्रे पर वहाँ कई राज छुपे बैठे है !&lt;br /&gt;हर चीज़ को ज़रा खुली आँखों से देखना,&lt;br /&gt;कबूतर के चेहरे में बाज़ छुपे बैठे है !!&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ताऊ का क्रूरता से तो सामना उसी वक्त हो गया था, जब अंतराष्ट्रीय बस अड्डे पर रोडवेज से उतर उसने नारायणा के लिए डीटीसी की मुद्रिका बस पकड़ी थी। हुआ यह कि उसने कंक्टर से पूछना चाहा कि भाई साहब ,क्या यह बस नारायणा जायेगी, तो तपाक से जबाब मिला था "हौर तन्ने के यह मारे घर जात्ती दिख री सै, बोर्ड नि दिख रिया कै" वो तो भला हो उस दूसरे सवारी का जिसने कहा, हां जायेगी, चढ़ जा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद लाजपत नगर में ताऊ को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में एक ७५०/- रूपये प्रतिमाह की नौकरी मिल गई। मालिक था एक खूसट बनिया । कर्मचारियो का शोषण कैसे किया जाता है, कोई उनसे सीखे । महानगरी में ताऊ कुछ ही दिन में एक कोल्हू का बैल बन के रह गया । दिन भर लाला ऑफिस में काम करवाता और शाम होते ही कहता कि आज तुझे ट्रक के साथ मुज़फ्फरनगर जाना है, वहां पर लाला को एक पाइप फैक्ट्री लगाने का ठेका मिला था। और आखिर ताऊ के लिए एक मनहूस दिन आया। लाला ने उसे सुबह बिक्री-कर विभाग जाने और वहा से सी फार्म लाने का हुक्म सुनाया। साथ ही १०० रूपये( पचास-पचास के दो नोट) भी दिए और कहा कि यह बाबू को दे देना, साथ ही हिदायत भी दी कि पहले सिर्फ़ एक पचास का नोट ही पकडाना, नही माने तो तब पचास और दे देना। बिक्री कर विभाग पहुच कर ताऊ ने वही किया जो लाला ने सिखा कर भेजा था, लेकिन बाबू नही माना, फ़िर उसने पूरे १०० रूपये और ऍप्लिकेशन फार्म बाबू को दिए और सी फार्म देने को कहा। बाबू ने १०० रूपये जेब में रखे और ताऊ को ५ सी फार्म पकड़ाकर बोला, अन्दर साहब से साइन करवा ले। ताऊ फार्म लेकर अन्दर बैठे उस बाबू के पास गया। उसने पुछा क्या है ? ताऊ ने कहा " साब ये सी-फार्म साइन करने थे ", बाबू बोला कितने लाया है? ताऊ बोला, ५ फार्म । बाबू चिड़ते हुए और हाथ का अंगूठा ऊँगली पर रगड़ते हुए बोला " अरे वो कितने लाया है ?" ताऊ उसका इशारा समझ कर बोला, साब १०० लाया था, मगर जिन साब ने ये फार्म दिए, उन्होंने ले लिए। बाबू बोला "तो ठीक है साइन भी उसी से करवाले, मेरे पास क्यो आया ? "..... ताऊ हडबडाकर उस बाबू की सीट की तरफ़ लपका जिसने फार्म दिए थे, मगर बाबू सीट से गायब था ! ताऊ अन्दर वाले बाबू के पास जाकर इंतज़ार करने लगा। आधा घंटा बीत गया, मगर वह नही लौटा। अन्दर वाला बाबू बोला, चल १००/- रूपये निकाल, मैं साइन कर देता हू। ताऊ क्या करता, अपने पैसो में से १००/- रूपये उसको दिए, उसने साइन किया और कहा कि चपरासी से स्टैंप लगा ले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताऊ चपरासी के पास गया, चपरासी ने स्टैंप लगायी और २० रूपये मागने लगा, ताऊ ने किसी तरह १० रूपये में जान छुडाई। चपरासी बोला अरे साब! यहाँ एक फार्म पे स्टैंप लगाने के ५ रुपए होते है, सो आपके २५ रूपये बनते थे, मैं तो २० ही मांग रहा था । चलो खैर, मानो वह ताऊ के ऊपर एहसान कर रहा हो। ऑफिस पहुंचकर ताऊ ने फार्म लाला को दिए, लाला बोला रूपये ५० ही दिए न ? ताऊ इस डर से की कही लाला नौकरी से न निकाल दे, बोला नही साब, १०० रूपये लिए उसने ! और लग गया सीधा सीधा ११०/- रूपये का चूना ताऊ पर ! रात को लाला ने  फिर ताऊ को सामान के साथ मुज्ज़फरनगर जाने का हुक्म सुनाया। ताऊ ट्रक लेकर मुज्ज़फरनगर के लिए चल पड़ा। ट्रक में सेरामिक ईंट लदी थी, जबकि बिल में लाला ने लिखवाया था गलवानाइजिंग प्लांट एक्सेसरीज। बागपत चुंगी पर जब ड्राईवर फार्म और बिल लेकर पास बनाने गया, तो उसने फार्म भरने वाले से फार्म पर ईंट लिखा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फार्म और बिल में अंतर्विरोध देख चुंगी वाले बाबु की बांछे खिल उठी। उसने सारे कागजाद अपने टेबल की दराज में रख दिए और चाय पीने लगा। एक घंटा गुजरा, दो घंटे गुजरे, मगर कागजाद नही मिले। बाबू ने ड्राईवर से ५००/- रुपयों की मांग की थी, रात के ग्यारह बज चुके थे। ड्राईवर लोगो के लिए तो मानो यह रोज की दिनचर्या थी। ड्राईवर पास के ढाबे में खाना खाने चला गया । ताऊ उस उमस भरी गर्मी में ट्रक में बैठा एक अखबार के टुकड़े से हवा कर अपने व्यथित मन को शांत करने में लगा रहा, भूखा-प्यासा! ड्राईवर और क्लीनर खाना खा कर लौटे तो बाबू अंदर की बेंच पर खर्राटे भर रहा था। होते-करते सुबह के तीन बज गए। ड्राईवर ने हिम्मत कर बाबू को उठाया। बाबू ड्राईवर को लगभग गालिया देता हुआ उठा और बोला, यह कंपनी मुझे संदेहास्पद लगती है, इसके सारे बिल पहले मेरे पास लावो, फिर गाड़ी छोडूंगा। ड्राईवर वापस ताऊ के पास आया और उसे एक कहानी समझाई और बाबू के पास भेजा। ताऊ हाथ जोड़कर बाबू के पास पंहुचा और उससे कहा, साब मेरी अभी-अभी नौकरी लगी है, यह मेरा पहला जॉब है, मुझे एक्सपीरिएंस नही है, इसलिए फार्म में यह गलती कर गया। मगर साब, लाला मेरे को नौकरी से निकाल देगा । प्लीज़, कुछ करे ! बाबू को मानो दया आ गई हो , बोला अच्छा तेरी बात पर मै गाड़ी छोड़ रहा हूँ, मगर बर्रिएर वाले को २०० रूपये दे देना ! ताऊ मन ही मन सोच रहा था कि घूस खाने का यह भी एक अच्छा तरीका है। क्या करता, बाप बोलकर बैरियर पर बैठे शख्स को २०० रूपये दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह के चार बज चुके थे, ट्रक अपने गंतव्य की और निकल पड़ा। ताऊ सोच रहा था की ३१ दिन काम करने के ७५० रूपये मिलेंगे और ३६० रूपये अब तक वह अपने जेब से लगा चुका, यानि पहली पगार सिर्फ़ ३९० रूपये। चूँकि यह गलती सीधे-सीधे लाला की ही थी , जिसने ड्राइवर को खुद ही ईंट लिखवाने को कहा था! ताऊ झूट नहीं बोल सकता था क्योंकि वह उसने अपने सस्कारों में नहीं पाया था । मगर उसकी जेब पर घर से लाये जो भी पैसे थे वह ख़त्म हो चुके थे। लाला वेतन तो अभी देगा नहीं, झूठ वह बोल सकता नहीं कि चुंगी वाले ने ५००/- रूपये ही लिए ! अब क्या करे ? बड़ी दिमागी कशमकश के बाद उसने दृढ निश्चय लिया, ट्रक ड्राइवर से कुछ खुसफुसाहट की, उसे अपनी सारी मजबूरी बयान की । ड्राइवर नरम दिल हो गया और गाडी रोक, ताऊ से यह कहा कि अगर लाला तुम्हे फ़ोन पर आने को कहे तो तुम भी यही कहना कि हां, बाबू १०००/- रूपये मांग रहा है, पास के पी सी ओ पर लाला को फोन करने गया,और बोला कि गाडी पकड़ ली गई है, और बाबू १०००/- रूपये मांग रहा है। लाला ने पूछा, तुम्हारे पास इतने पैसे है ? ड्राइवर बोला हाँ ! और इस तरह ताऊ मर गया, हमेशा के लिए, इस महानगरी में ! &lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-1752008001563752622?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/1752008001563752622/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=1752008001563752622' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/1752008001563752622'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/1752008001563752622'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/09/blog-post_19.html' title='लघु कथा- और ताऊ मर गया !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-4978564995558660982</id><published>2009-09-13T21:54:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.897-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='TirchiNazar'/><title type='text'>गरीब-गुरबों की भाषा का दिवस !</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बडी खुशी की बात है कि आज हमारा देश ’राष्ट्र भाषा हिन्दी दिवस’ इस खास दिन पर मना रहा है । मगर वास्तविक तौर पर इस राष्ट्र भाषा की स्थिति क्या है, यह बताने की जरुरत नही। तारीफ़ करनी होगी उन अंग्रेजो की, जिन्होने न सिर्फ़ दुनिया को गुलामी की जंजीरो मे जकडा, अपितु हर एक इन्सान पर गुलामियत की एक ऐसी अनोखी छाप भी छोड दी जो, अब शायद मिटाये ना मिटे। उनकी वह भाषा अब सभ्य और अमीर कहलाने वाले लोगो की भाषा बन चुकी है। हमारे इस भारत देश मे ही देख लीजिये कि हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी आज एक गरीब-गुरबे की भाषा बन कर रह गई है। भाषा ने दिमागी तौर पर भी इन्सान-इन्सान मे अमीर-गरीब का एक ऐसा खासा अन्तर खडा कर दिया है कि यहां आपके मुख से निकले शुरुआती शब्द आपकी पह्चान और समाज मे आपकी हैसियत का माप-दण्ड बन जाते है। इसे एक उदाहरण के तौर पर इस तरह से देख सकते है कि मान लीजिये, आप देश के किसी अजनवी शहर मे जाते है, और एक होटल मे कमरा पूछने हेतु उसके स्वागत कक्ष मे पहुचकर कमरे और किराये के बारे मे जानकारी लेते है। अगर आपने अपना सुरुआती परिचय हिन्दी मे देकर पूछताछ की तो आप पायेंगे कि आपके साथ उस होटल के कर्मचारियों का व्यवहार उतना गर्मजोशी भरा नही है, जितना कि तब होता, यदि आपने अंग्रेजी मे पूछताछ की होती ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै यह एक भाषायी मानसिकता का अन्तर बता रहा हूं, जो हमारे बीच है। दक्षिण के राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु मे चले जाइये, आपको अंग्रेजी और हिन्दी की मह्ता मे क्या फर्क है, एकदम साफ मह्सूस हो जायेगा। ऐसा भी नही है कि सारा दक्षिण भारत ही हिन्दी से नफ़रत करता हो , कुछ लोग इसके अपवाद भी है, जो अपनी इस राष्ट्र भाषा से लगाव भी रखते है, ऐसे ही लोगो मे यहां इस चिठठा जगत मे अनेकों सम्मानित चिठ्ठाकार भी है, जो दक्षिण से सम्बद्ध होते हुए भी, जिन्हे हिन्दी से प्रेम है, कुछ उम्र दराज दक्षिण भारतीय चिट्ठाकारो का हिन्दी प्रेम मुझे नितांत सराह्नीय लगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, इन सब बातों से आप सभी लोग भी भली भांति परिचित है, इसलिये इस बारे मे अधिक कुछ नही कहुंगा ! जो मै आज के इस सुअवसर पर यहां कहना चाहता हूं, वह यह कि आज हम हिन्दी के हजारों चिठ्ठाकार यहां अपनी-अपनी मौलिक, समसामयिक, राजनैतिक, आर्थिक और मनोरंजनात्मक रचनाओ और विचारो को इस प्लेटफार्म पर एक दूसरे से न सिर्फ़ बांटते है अपितु एक दूसरे के सुख-दुख मे भी भागीदार बनते जा रहे है । और यह सब सम्भव हो पाया है उन लोगो और सस्थाओं के अथक प्रयास से, जिन्होने हमे यहां हिन्दी मे लेखन की सुविधा उपलब्ध कराई ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो आईये, आज हम सब "गरीब" हिन्दी चिठ्ठाकार मिलकर इस खास अवसर पर और कुछ नही तो उन सब लोगो और संस्थाओ का अभिनन्दन एवं हार्दिक धन्यवाद करें, जिन्होने अपने अथक प्रयास से हमारे लिये हिन्दी लेखन को आसान बनाने मे अपना मह्त्वपूर्ण योगदान दिया ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तज दिया सबल ने, निर्बल के मुख है डेरा, &lt;br /&gt;हिन्दी हूँ मै, वतन है  हिन्दोस्तां मेरा !!&lt;/strong&gt;जय हिन्द !&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-4978564995558660982?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/4978564995558660982/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=4978564995558660982' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/4978564995558660982'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/4978564995558660982'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/09/blog-post_13.html' title='गरीब-गुरबों की भाषा का दिवस !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-8844976835247598244</id><published>2009-09-08T06:29:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.924-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Stories'/><title type='text'>लघुकथा- कमीना शेर !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;em&gt;अभी शादी हुए मात्र चार ही साल तो हुए थे! बहुत खुश रहती थी ऋचा अपने उस भरे पूरे परिवार के साथ ! पति के साथ ही उसी दफ्तर में नौकरी करती थी! बेटा जब तीन महीने का था, दोनों बेफिक्र हो उसे उसके दादा- दादी के पास छोड़ उसी बाइक में सवार हो ऑफिस आते-जाते, जो ऋचा को उसके मामा ने शादी पर उपहार में दी थी! ऋचा के जेठ-जेठानी भी दोनों बैक मैं नौकरी करते थे, घर में हर तरफ खुशहाली थी! मगर अचानक एक दिन न जाने उनकी खुशहाली को किसकी नजर लग गई ! ऋचा फिर एक बार उम्मीद से थी, और तबियत ढीली होने की वजह से उस दिन छुट्टी कर गई थी ! दीपक सुबह अकेले ही ऑफिस गया था! और शाम को लौटते वक्त ब्लू लाइन बस रूपी काल का ग्रास बन गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अशक्त ऋचा बहुत तड़पी! बार-बार सिर पीटकर किस्मत को यही कोसती रही कि मैं क्यों नहीं आज दीपक संग दफ्तर गई ! खैर, समय बलवान होता है, और उसके समक्ष सभी को झुकना पड़ता है! कुछ दिनों के रोने पीटने के बाद घर के हालात कुछ सामान्य तो हुए, मगर अमूमन जैसा कि देखने में आता है, हवाए अब बदली-बदली सी थी!सास-ससुर और घर के अन्य सदस्यों का बर्ताव एकदम अलग था, ऋचा के साथ ! तंग आकार ऋचा उस घर को सदा के लिए छोड़, पिता के घर वापस आ गई !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों बच्चो, प्रतीक और दीपिका को नाना-नानी की देखरेख में छोड़ उसने फिर से अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली ! लेकिन बूढे माँ-बाप दिन रात इसी चिंता में डूबे थे कि हमारे बाद ऋचा किस तरह इतना लंबा जीवन सफ़र तय करेगी? काफी सोच विचार कर, और गहमा-गहमी के बाद उन्होंने ऋचा को दोबारा शादी के लिए राजी कर लिया था ! अखबारों में इश्तिहार दिए गए, लेकिन कोई सुयोग्य रिश्ता नहीं मिला! फिर एक दिन शाम को कालोनी के पार्क में बैठे-बैठे मोहल्ले के एक अन्य वृद्ध सज्जन ने उन्हें अपनी जान-पहचान में एक रिश्ता बताया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहिबाबाद के एक स्टील प्लांट में मैनेजर, मुकेश सिंह एक नहीं, अपितु दो बार का विधुर था ! पहली शादी के चंद रोज के बाद कुल्लू में हनीमून के दौरान ही एक दुर्घटना में पत्नी को खो देने के बाद, उसने दूसरी शादी की थी, मगर प्रसव के दौरान वह भी चल बसी ! माता-पिता द्बारा प्रारम्भिक जांच पड़ताल के बाद मुकेश और ऋचा की मुलाकात कराई गई, और दोनों ने एक दूसरे को पसंद कर लिया! मुकेश को ऋचा की सारी शर्ते भी मंजूर थी! अतः साधे ढंग से दोनों की शादी करा दी गई! प्रारम्भिक छह महीनो तक तो ऋचा ने अपने दोनों बच्चे, सात साल के प्रतीक और तीन साल की ऋचा को माँ-बाप के पास ही छोडे रखा, लेकिन मुकेश की बच्चो के प्रति आत्मीयता और लगाव को देख, अच्छी तरह से आस्वस्थ हो जाने के बाद, जुलाई में अपने घर के नजदीकी पब्लिक स्कूल में दोनों का दाखिला करवा कर अपने साथ ले आई थी! करीब दो महीने तो सब कुछ सामान्य चला, बच्चे भी नए घर में काफी खुश थे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर जंगल के उस नए राजा के दीमाग में तो कुछ और ही पक रहा था! चूँकि शेरनी ने उससे पहले ही यह शर्त मनवा ली थी कि उसके इन दो बच्चो के अलावा तीसरा नही ! मगर जंगल का वह कमीना राजा कैसे दूसरे शेर के बच्चो को अपना बच्चा मान लेता! उसे तो अपना बंश आगे बढाने की चिंता खाए जा रही थी! शैतानी दिमाग झाडियों में पड़े-पड़े तरकीबे सोचने में लगा था! और फिर उसके दिमाग ने वह शैतानी चाल चलने की सोच डाली जिसकी शेरनी ने  कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी! कमीने शेर को तो बस शेरनी को किसी तरह आगे संतान उत्पत्ति के लिए विवश करना था! स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चे सीधे क्रेच में जाते थे, और शाम को जब ऋचा घर लौटती तो उन्हें भी साथ घर ले आती ! एक दिन जब शेरनी भोजन की तलाश में गई थी, मौका पाकर शेर ने दोपहर के समय ही बच्चो को क्रेच से उठा लिया और फिर  ...................! पुलिस ने नाले से दोनों बच्चो के अवशेष निकाल पोस्ट मॉर्टम के लिए भेज दिए थे ! पुलिस की शक्ति बरतने  के बाद मुकेश ने भी सच्चाई उगल दी थी, और जड़-पत्थर बनी ऋचा सोच रही थी कि एक शिक्षित और सभ्य सा दिखने वाला इंसान भी कहां तक अपने कमीनेपन की हदे लाँघ देता है ! &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-8844976835247598244?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/8844976835247598244/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=8844976835247598244' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8844976835247598244'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/8844976835247598244'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/09/blog-post_08.html' title='लघुकथा- कमीना शेर !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-9040293189838914211</id><published>2009-09-08T03:45:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.928-07:00</updated><title type='text'>घर में अगर कुछ बचा-खुचा भोजन है तो दे दे माई !</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;इ-मेल के मार्फ़त यह मेसेज मुझे अभी प्राप्त हुआ ! मुझे भी नहीं मालूम कि इसको मैं अगर अपने ब्लॉग पर डालू तो क्या किसी के लिए लाभदायक सिद्ध होगा ! लेकिन हाँ , अगर यहाँ पोस्ट करने से यह सचमुच किसी के काम आता है तो मैं खुद को धन्य समझूंगा !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;If you have a function/party at your home and if there is excess food available at the end, don't hesitate to &lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;call 1098 (only in India)&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;- child helpline. &lt;span style="font-size:180%;color:#3366ff;"&gt;They will come and collect the food.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;Please circulate this message which can help feed many children.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;PLEASE, DON'T BREAK THIS CHAIN....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;"Helping hands are better than Praying Lips".&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;Pass this to all whom you know and whom you dont know as well.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;फोटो को अगर बड़े आकर में देखना चाहते हो तो कृपया फोटो पर किल्क करे !&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/SqY3O1A23qI/AAAAAAAAAG0/16szvuxHuVs/s1600-h/starving.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379047532829007522" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 239px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/SqY3O1A23qI/AAAAAAAAAG0/16szvuxHuVs/s320/starving.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427817228690766496-9040293189838914211?l=godiyalji.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://godiyalji.blogspot.com/feeds/9040293189838914211/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427817228690766496&amp;postID=9040293189838914211' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/9040293189838914211'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427817228690766496/posts/default/9040293189838914211'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://godiyalji.blogspot.com/2009/09/blog-post_4757.html' title='घर में अगर कुछ बचा-खुचा भोजन है तो दे दे माई !'/><author><name>पी.सी.गोदियाल "परचेत"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15753852775337097760</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/--AV0ccX7Tzk/Tw_H0kqdZ4I/AAAAAAAAB1g/9_uzoPg6u8U/s220/pics.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Jc4X27XnSp8/SqY3O1A23qI/AAAAAAAAAG0/16szvuxHuVs/s72-c/starving.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427817228690766496.post-3593670010730088004</id><published>2009-08-28T22:40:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T06:09:37.945-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Novel'/><title type='text'>लघु उपन्यास- वक्त के सित्तम</title><content type='html'>&lt;strong&gt;(करीब एक साल पहले अपने ब्लॉग पर एक कहानी लिखी थी, "वक्त के सित्तम" ! गिने-चुने पाठको ने खूब सराहा था, इसलिए उत्साहवश उसे उपन्यास का रूप देने की ठानी! हालांकि समयाभाव के कारण एक पूर्ण उपन्यास तो नहीं बन पाया, मगर एक लघु-उपन्यास की शक्ल देने में कामयाब रहा! अब मैं कोई जसवंत सिंह जैसी हस्ती तो हूँ नहीं, जो प्रकाशक किताब छापकर, पूरी की पूरी बीजेपी का ही बंठाधार कर दे ! मुझ जैसे अध्नटे लेखक को तो प्रकाशक ढूंढें न मिलेगा, इसलिए यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ, अगर कोई पाठकगण पढ़ना चाहें तो!)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    &lt;span style="font-size:115%;"&gt;&lt;em&gt;                       वक्त  के  सित्तम  !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडे लग्न और मेहनत के से उच्च श्रेणी के अंक प्रतिशत के साथ, इंदौर से सिविल इंजीनियरिंग में बी.ई. और फिर रुड़की से जियो-टेकनिकल में एम्.टेक करने के बाद विक्रम ने उस समय की देश में मौजूद, सिर्फ़ दो नामी-गिनामी जियोसिन्थेटिक कंपनियों में से एक कनाडा मूल की विदेशी कंपनी में बतौर प्रोजेक्ट इंजीनियर नौकरी ज्वाइन कर ली थी। एम.टेक का कोर्स खत्म होते ही कैम्पस से ही कम्पनी द्वारा उसका चयन कर लिया गया था। विक्रम आशा और रूचि के अनुरूप अचानक मिली इस सफ़लता से अत्यन्त प्रसन्नचित था। चुने जाने के तीन महिने बाद ज्यों ही फाइनल सेमेसटर के पेपर खत्म हुए और कुछ हफ़्तो बाद परिणाम घोषित हुए, उसे तुरन्त ही नौकरी ज्वाइन करने का आमंत्रण आ गया था।  विद्यार्थी जीवन से निकलकर तुरन्त कर्मभूमि में पदार्पण उसके लिए किसी टॉनिक की तरह था। उत्साह और उमंग से भरपूर जवानी की देह्लीज पर उसने इस अपनी पहली  नौकरी में खूब दिल लगाकर अपने कार्यो को करना आरम्भ किया।  उसे उसका मनपसंद तकनीकि ट्रेड जो मिल गया था। वह जो भी काम करता, सिर्फ़ इसलिए नही करता था कि वह कम्पनी का एक कर्मचारी है और उसके बॉस अथवा कंपनी के मैनेजमेंट ने उसको वह काम करने को कहा है, अपितु उसे वह अपना कोई व्यक्तिगत काम समझ कर, हर चीज को बारीकी से परखकर, उसे अंजाम देता था। वह अपने पिता की दी हुई वह सीख हमेशा याद रखता कि जीवन के जिस मोड पर वह आज खडा  है,  वह एक गर्म तपते लोहे की भांति है, जिसे जिस मर्जी सांचे मे ढालना चाहो, ढल जायेगी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी कर्मठता और कौशल के बल पर शीघ्र ही उसने अपनी एक अनूठी छाप कम्पनी के टॉप मैनेजमेंट पर छोड़कर कम्पनी मे अपने लिये एक खास जगह बना डाली थी। कम्पनी के ज्यादातर सीनियर मैनेजर उसके काम की तारीफ करते नही थकते थे। कम्पनी का प्रबन्धन उसे जौन सा काम सौंप दे, वह कभी भी उसके लिये मना नही करता था ! विपणन का काम, प्रोजक्ट मैनेजमेन्ट का काम, डिजाईन ड्राइंग का काम, जब और कोई काम न हो तो चुंकि वह पत्राचार के जरिये बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स भी कर रहा था, अत: वाणिजियिक विषयों मे भी रूची रखता था और अकाउंट्स के लोगो के साथ बैठकर देनदारों  के खाते मिलान एवं समायोजित करता रहता था।   उसकी लग्न और अच्छे काम से प्रभावित होकर तीन साल में ही कंपनी ने उसे वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर पदोन्नत कर दिया था। अब जिंदगी मजे से गुजरने लगी थी, एक अच्छा वेतन, कंपनी की तरफ़ से रहने के लिए गेस्ट हाउस और गाड़ी, सब कुछ था उसके पास। यहाँ शहर में वह अकेला था, उसका परिवार उत्तराखण्ड के सुदूर एक पहाडी गांव मे रहता था।  उसके परिवार में उसके अलावा माता-पिता, और दो छोटे भाई-बहन थे। छोटा भाई गाँव के पास के नजदीकी कस्बे से  पोलिटेक्निक से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रहा था।  पिता सरकारी मुलाजिम थे, और अब लगभग रिटायर्मेंट के करीब थे, इसलिए परिवार के भरण-पोषण के लिये  एक ठीक-ठाक वेतन उन्हे भी मिल जाता था, जिससे पूरे परिवार का निर्वाह काफ़ी अच्छे ढंग से हो  रहा था। और जब से विक्रम नौकरी  पर लगा था, तब से अपने गांव मे भी स्वत: ही उनके परिवार का कद  बढ गया था।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करते-करते विक्रम भी अब २७ साल का हो गया था, और जीवन के इस नये सफ़र की पहली मंजिल पर ही  समाज मे एक सम्मानजनक स्थिति उसने पा ली थी, अतः विक्रम के पिता ने विक्रम और अपने परिवार के अन्य सदस्यो संग सलाह-मशविरा कर, विक्रम के लिये एक सुयोग्य जीवन-संगनी तलाशनी शुरु कर दी थी, और कुछ ही समय बाद अपने ही विभाग के एक वरिष्ट अधिकारी की बेटी से विक्रम का रिश्ता तय कर दिया। जहां विक्रम का रिश्ता तय हुआ था, वहां उसकी होने वाली दुल्हन, नेहा, उनके परिवार की चौथी संतान थी, तीन भाईयो के बाद एक बहन, अतः नेहा को अपने परिवार में भरपूर लाड-प्यार मिला था। दो साल पूर्व गढवाल युनिवर्सिटी से  बीएससी करने के उपरांत, अभी इसी साल उसने बी.एड की डिग्री हासिल की थी। नेहा एक संस्कारो से परिपूर्ण सीधी-साधी मगर समझदार युवती थी। नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में विक्रम और नेहा की सगाई हुई। हालाँकि नेहा और विक्रम की पहले कभी मुलाक़ात नही हुई थी और दोनो परिवारो मे पुराने रीतिरिवाजों और ख्यालातों के चलते, सगाई से पहले लड़के-लड़की को आपस में मिलाया भी नही गया था, बस सिर्फ़ दोनो परिवारों के लोगो ने नेहा और विक्रम को देखकर उन्हे पसन्द कर लिया था।  फिर भी अपने-अपने दिलो मे संजोये अपने भावी जीवन-साथी की तस्वीर के मापदंडो पर दोनों के एक-दूसरे पर खरा उतरने से, विक्रम और नेहा सगाई के दिन पर काफ़ी खुश थे। विक्रम तो पहले-पहल नेहा की एक झलक पाकर उसकी आंखो मे ही देखता रह गया था, और एकान्त मे मौका पाकर थोडा संकुचाते हुए कह भी गया था कि आपकी खुबसूरत आंखे बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह देती है, इसलिये मैं आप से कुछ नही पूछूंगा। नेहा भी उसकी बात पर शरमा कर रह गई, कुछ बोली नही।      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर दो-ढाई महीने बाद तय समय पर फरवरी के प्रथम सप्ताह में धूमधाम से उनकी शादी भी हो गई। शादी की रस्म पर अमूमन लडकियां, बाबुल का आंगन छोड, एक अजनवी  माहौल मे जाने की सच्चाई की वजह से अक्सर उदास हो जाती है, पर नेहा इतनी खुश थी कि शादी के दिन घर पर नहलाने की रस्म अदा करते वक्त  उसने सहेलियों के संग उल्लास से ओत-प्रोत होकर, यह गीत गाया था;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मिला है मैंनू आज इक बन्ना इनाम,&lt;br /&gt;कर डाला मैंने सब उसके ही नाम,&lt;br /&gt;सखी ,खो गई ख्यालो मे उसके ही मैं,&lt;br /&gt;आँखों ने है छ्लकाया,  प्यार का जाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साल अठरा बीते मेरे अम्मा  के घर,&lt;br /&gt;मिला इक बन्ना और निकल आये पर,&lt;br /&gt;बाबुल के घर मेरा, अब है भी क्या काम&lt;br /&gt;चली रे सखी मै तो अब पिया के धाम,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ दूंगी आज अपने गाँव की गली&lt;br /&gt;बैठ के डोली  संग मैं पिया के  चली,&lt;br /&gt;चली मैं तो आज सखी पिया के गांव,&lt;br /&gt;बाबुल के घर को  करके अपना सलाम,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर धूमधाम से शादी होने के उपरान्त, कुछ दिन गाँव मे ही रुकने के पश्चात, विक्रम अपनी पत्नी नेहा को साथ लेकर शहर आ गया। विक्रम के पहले से निर्धारित प्रोग्राम के हिसाब से वे हनीमून के लिए माउन्ट आबू गए। दो दिन माउन्ट आबू की सैर के बाद वे लौटते हुए उदयपुर रुके। उदयपुर में नेहा को सहेलियों की बाड़ी काफ़ी भायी। एक पूरे दिन वहा के लेक पैलेस और ओल्ड पैलेस तथा कुछ अन्य स्थानों को घूमने के बाद वे उदयपुर से फ्लाईट पकड़ दिल्ली आ गये। यहाँ पर वैसे तो विक्रम ने पहले से गृहस्थी का सब सामान जोड़ा हुआ था, मगर घर की छोटी-बड़ी चीजे , जिनका कि अक्सर ध्यान एक गृहणी को ज्यादा रहता है , नेहा ने जोड़ना शुरू किया। और धीरे-धीरे गाड़ी पूरी तरह पटरी पर आ गई एवं दिनचर्या भी सामान्य हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुशहाली के पलो में वक्त ’पर’ लगा कर उड़ने लगा था। दिन गुजरे, महीने गुजरे और फिर वह घडी भी आ  गई जिसका विक्रम कुछ समय से इन्तजार कर रह था, एक दिन शाम को जब विक्रम ऑफिस से घर आया, और  नेहा ने चुपके से उसके कान में कुछ कहा तो वह सुनकर उछल पड़ा। विक्रम खड़े-खड़े हाथ ऊपर उठा, चिल्लाने जैसी अवस्था मे जोर से बोल पडा; अरे मै बाप बनने वाला हू।  &lt;br /&gt;कि तभी, चूँकि अडोस-पड़ोस का कोई उसकी बात न सुन ले, नेहा ने झट से विक्रम के मुह को अपने हाथ से दबा दिया। &lt;br /&gt;नेहा बोली, अरे पागल हो गये हो क्या, इतनी जोर से क्यों चिल्ला रहे हो ? अगल-बगल वाले सुन रहे होंगे तो क्या सोचेंगे ?&lt;br /&gt;अरे मेरी जान, सोचने दो, जो भी सोचे, हमे क्या ? वे भी तो कभी बाप बने होंगे ! &lt;br /&gt;नेहा विक्रम के जज्बात अच्छे ढंग से समझती थी, अत:  चेहरे पर एक गहरी मुस्कान बिखेर, विक्रम के कान पकडते हुए उसे वहां सोफ़े पर बिठा वह बोली, जानू कुछ तो शरम करो, क्या बच्चो जैसी हरकत करते हो ? अब तुम बच्चे नही रहे, बाप बनने वाले हो।          &lt;br /&gt;आज मानो विक्रम की खुशी का ठिकाना न था, सोफे पर तिरछा बैठ, उसने नेहा को भी अपने करीब बिठा दिया था और वह दोनों आने वाले मेहमान को अपने कल्पनाओ के सागर में, तरह-तरह से उसका रूप तराशने मे लग गये थे। दोनों कभी आपस में सोफे की तकिया एक दूसरे पर मारते हुए  झगड़ने लगते। विक्रम कहता. मुझे तो बेटी चाहिए, &lt;br /&gt;और नेहा कहती, नही मुझे बेटा चाहिए। &lt;br /&gt;फिर शांत करने के लिए विक्रम मजाक पर उतर आता कि अच्छा ये बता, तुझे पता चला कैसे ?  &lt;br /&gt;नेहा शर्माने का सा नाटक करते हुए बोलती, हटो ! तुम्हे तो हर समय शरारत ही सूझती है,  नही बताऊंगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम को जब से नेहा ने यह खुशखबरी दी, वह नेहा का खास तौर पर ध्यान रखने लगा था। वह उसकी हर ख्वाइस पूरी करता और कोशिश करता कि वह कभी भी तनाव में न आए और हमेशा खुश रहे। शुरू के महीनो में जब भी किसी खास दिन पर अथवा त्योहारों के वक्त, दो या इससे अधिक दिन की इक्कठा छुट्टीयां आती, वह नेहा को लेकर शहर से बाहर घूमने निकल पड़ता था। पिछले तीन-चार महिनों मे शहर के नजदीक के पर्यटन स्थलो मे से कोई ऐसी जगह बाकी नही बची रह गई थी, जहां वे दोनो घूम न आये हो। शादी के करीब पौने दो साल बाद अब नन्हा मेहमान घर आने वाला था, घर पर भी इसके लिये सारी तैयारियां कर ली गई थी। और फिर वह पल भी आ गया जब विक्रम और नेहा की पहली संतान ने जन्म लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ रोज बाद अस्पताल से छुट्टी मिलने के उपरांत ग्यारहवें दिन बड़ी धूमधाम से नन्हे मेहमान का स्वागत हुआ और नामकरण समारोह संपन्न हुआ। गाँव से भी विक्रम और नेहा का पूरा परिवार इस जश्न में शामिल होने आया था, अत: चंद दिनो तक घर मे खूब चहल-पहल और व्यस्तता का माहौल रहा। उनके चले जाने के पश्चात, अब धीरे-धीरे माहौल सामान्य हो गया था, विक्रम भी लगातार नोट कर रहा था कि उसकी जिंदगी में अचानक बहुत से बदलाव आने लगे थे। बेटे के मोह-प्यार में वह शाम को ऑफिस से भी जल्दी घर पहुचने की पुरजोर कोशिश करता रहता था। शादी के इन दो-ढाई सालो में उसने जिंदगी के वो खुशहाल पल व्यतीत किए थे, जो उसने शायद  ही पिछ्ले ३० साल के अपने जीवन में पहले कभी महसूस किए होंगे। विक्रम और नेहा ने अपने बेटे का नाम तरुण रखा था,मगर प्यार से नेहा और विक्रम उसे तेजा बुलाते थे।  तेजा काफी तीक्ष्ण बुद्दि का बच्चा था। दो साल की उम्र मे ही वह माता-पिता से ऐंसे ऐंसे सवाल करने लगता था कि कभी-कभार दोनों उसकी अबूझ पहेलियां सुनकर चकरा जाते थे। कुदरतन वह बहुत बातूनी था और नेहा तथा विक्रम आपस मे इसी बात पर उलझे  रहते कि यार, आखिर यह  गया किस पर  है , मम्मी पर अथवा पापा पर ? वह पापा को अगर थोड़ा भी ध्यान मग्न पाता तो झट से कहता, पापा आपको एक जोक्  सुनाऊ "एक गंजा था और..और न, उसकी कंघी  गुम हो गई".. फिर खुद ही खिल-खिलाकर हस पड्ता और नेहा और विक्रम भी मुस्कुराये वगैर नही रह ते, पता नही मुहल्ले के किस बच्चे से उसने यह जोक् सुना था। &lt;br /&gt;एक बार नेहा और विक्रम रविवार के दिन घर पर शादी की एल्बम देख रहे थे तो तस्बीरो मे ख़ुद को न पाकर, तेजा ने मम्मी से पूछा, इसमे मेरी फोटो क्यो नही है? &lt;br /&gt;नेहा ने कहा, हम तुम्हे शादी मे नही ले गए थे। &lt;br /&gt;तेजा ने फिर पूछा, मुझे क्यो नही ले गए थे? &lt;br /&gt;नेहा ने कहा, तेरे पापा ने मना किया था। &lt;br /&gt;बस, फिर क्या था, तेजा ने इतना सुना कि विक्रम की खैर नही थी, वह विक्रम की पीठ पर जा चढा और लगा हाथ पैर मारने कि मुझे क्यो नही ले गये थे, आपने क्यो मना किया था? विक्रम ने फिर किसी तरह, सॉरी बोल, उसे चाकलेट देकर शांत करवाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करते-करते सितम्बर १९९९ आ गया था,  इधर नौकरी के मोर्चे पर पिछ्ले कुछ महिनो से हालात कुल मिलाकर अच्छे नही थे,  पाकिस्तान के साथ तनातनी और कारगिल युद्ध के चलते,  ढांचागत व्यापार बुरी तरह से प्रभावित होने की वजह से, उसकी कंपनी के पास देश के अन्दर ज्यादा आर्डर हाथ मे नही रह गए थे, अतः उन दिनों कम्पनी देश से बाहर, मध्य और दक्षिण पश्चिम अफ्रीका और यूरोप में चल रहे अपने प्रोजक्टो पर ही ज्यादा निर्भर थी। विक्रम को भी समय-समय पर अल्पावधि के लिए इन प्रोजेक्टों की देखभाल और निरीक्षण के लिए देश से बाहर जाना पड़ता था। हालांकि सब कुछ ठीकठाक ही चल रहा था किन्तु बार-बार बाहर भ्रमण की वजह से मानसिक तनाव बना रहता था। और फिर अचानक एक दिन कंपनी के विदेश स्थित मुख्यालय से विक्रम को फिर से एक ढांचागत प्रोजेक्ट के तहत नाइजीरिया और अबिड्जन, आइवरी कोस्ट  की दो साईटों का निरीक्षण करने के लिए एक महीने के लंबे टूर पर जाने का फरमान आया। वैसे तो वह जब चार-पाँच दिनों के लिए बाहर जाता था तो नेहा अपने फ्लैट पर ही रहती थी, मगर इस बार चूँकि टूर लंबा था, अतः परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसने नेहा और बच्चे को गाँव मे माता-पिता के पास छोड़ना ही उचित समझा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहा, हालांकि इस फैसले और विक्रम के इतने लम्बी अवधि के  टूर पर जाने  से मन ही मन  दुखी थी, मगर कोई और चारा भी नही था। विक्रम ने नेहा और बेटे को गाँव छोडा और टूर के लिए निकल पड़ा। जाने क्यो इस बार का उसका टूर पर जाना, नेहा को कुछ आशंकित सा कर रहा था, उसका मन कुछ विचलित सा हो रहा था। पहाडी बस स्टेशन से विक्रम के विदा होते वक्त, नेहा के आंसू छलक आये थे, विक्रम ने उसे सँभालते हुए कहा , पगली उदास क्यो होती है, मै कोई युद्ध के मैदान मे थोड़े ही जा रहा हूँ , एक महीने की ही तो बात है, बस यूँ ही महिना गुजर जाएगा फुर्र से, तू चिंता मत कर, मै पत्र से तुम्हे अपनी कुशलता के बारे मे बताता रहुंगा, तुम अपना और तेजा का ध्यान रखना। और फिर बेटे के गालो को चूमने के बाद वह निकल पड़ा। दिल्ली पहुँच, पहले से तय कार्यक्रम और हवाई आरक्षण के मुताविक वह पहले सीधे अबिड्जन कॉस्ट पहुँचा। करीब एक हफ्ता वहा पर सभी आवश्यक कार्यो को निपटाकर उसने नाइजीरिया स्थित अपनी दूसरी साईट पर जाने के लिए केन्या एयरवेज़ से आगे की बुकिंग करवाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से वह नेहा को गाँव छोड़ आबिड्जन आया था, तब से एक तरह से उनका संपर्क बिल्कुल कटा हुआ था। जिसके चलते वह कुछ दिनों से उदास रहने लगा था, बेटे की याद आती थी। साईट पर मौजूद एक  अन्य साथी ने उसकी उदासी भापते हुए पुछा भी था कि क्या भाभीजी की याद आ रही है जो उदास नज़र आ रहे हो ? विक्रम ने बताया कि जब से वह आया है उसकी नेहा से बात नही हुई है और नेहा इस वक्त जहाँ रह रही है वहा मोबाइल तो दूर लैंड लाइन फ़ोन भी नही है। काम ख़त्म करने के बाद ३० जनवरी, 2000 को उसने आगे के सफर के लिए विमान पकड़ा। वहा के समयानुसार शाम के ६ बजे केन्या एयरवेज के ए-३१० विमान ने आबिड्जन से लागोस के लिए उडान भरी। विक्रम को विमान के पिछले हिस्से में एकदम पीछे से आगे की तरफ, तीसरी पंक्ति में दांयी तरफ वाली खिड़की के पास की सीट मिली थी। विमान ने अभी मुश्किल से दस मिनट की ही उडान भरी होगी, और निर्धारित शुरुआती प्रक्रियाये पूरी करने के बाद, चालक कक्ष से घोषणा में अभी यात्रियों को अपनी सीट वेल्ट खोलने का निर्देश ही हुआ था, तथा केबिन क्रू यात्रियों को देने के लिए पानी की ट्राली ही निकाल रहा था, कि अचानक विमान के मध्य भाग में एक जोर का धमाका हुआ और इससे पहले कि कोई कुछ भी समझ पाता, पल भर में विमान के अन्दर बैठा १६० से भी अधिक यात्रियों का वह कुनवा, विमान के कर्मचारियों के साथ हवा में कहाँ विखर गया, कुछ पता नही चल पाया ।विमान के टुकडो में विभाजित होने के पश्चात अंधेरे में क्या चीज़ कहा बिखरी, जमीन पर से या फिर आसमान में उड़ रहा कोई और विमान भी नही देख सकता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस हादसे के कुछ देर बाद, सर्वप्रथम बीबीसी ने इस ख़बर को प्रसारित किया और उसके बाद तो यह सभी संचार माध्यमो की ब्रेकिंग न्यूज़ बन गई कि १६९ यात्रियों तथा विमान कर्मचारियों  से भरा केन्या का एक विमान जो अबिड्जन से लागोस की उडान पर था, दुर्घटनाग्रस्त होकर घाना के दक्षिण में कही एटलांटिक महासागर में गिर गया है, और विमान में सवार सभी यात्रियों के मारे जाने की आशंका है। दूसरे दिन सुबह से ही इस दुर्घटना की पल पल की जानकारी टीवी चैनलों पर आ रही थी। विमान का कुछ मलवा उस क्षेत्र के आस-पास समुद्र से गुजरने वाले जहाजो ने देखा तो इसकी जानकारी बचाव दल को दी गई। बचाव दल ने मलवा इकठ्ठा किया मगर कोई इंसानी लाश अथवा जिन्दा व्यक्ति वहाँ से नही मिला था। अतः यही निष्कर्ष निकाला गया कि विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर समुद्र में गिर गया और विमान में सवार लोगो में से कोई भी नही बचा। जैसे ही रेडियो और टीवी पर नेहा ने यह ख़बर सुनी, उसकी अंतरात्मा ने भी उसे किसी अनहोनी की आशंका से विचलित कर दिया था। उसने इस विमान दुर्घटना के बारे में घर के सभी सदस्यों को भी बताया और विक्रम के पिता से पास के कसबे में जाकर, विक्रम के अबिड्जन स्थित कार्यालय को फ़ोन कर उसकी कुशल क्षेम पूछने का आग्रह किया। विक्रम के पिता ने भी बिना देर किए वैसा ही किया, लेकिन जब वे शाम को लौटे तो उनके चेहरे से उदासी और भय साफ़ झलक रहा था। उन्होंने किसी से कुछ नही कहा, बस इतना बताया कि विक्रम के ऑफिस का फ़ोन नही लग सका जिससे किसी से बात नही हो पायी। कुछ दिनों बाद आधिकारिक तौर पर केनिया एयरवेज की तरफ़ से और जिस कंपनी में विक्रम काम करता था, उनकी तरफ़ से इस बात की पुष्टि कर दी गई थी कि विक्रम की उसी विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। कंपनी की तरफ़ से १० लाख का मुआवजे का एक चेक भी नेहा को दिया गया था। विक्रम के घर पर मानो सब कुछ थम गया था, नेहा पर तो मानो वज्रपात सा हो गया था वह कभी अपने बेटे को देखती और कभी दीवार पर टंगी विक्रम की कॉलेज के दिनों की फोटो को, जब से यह ख़बर आई थी उसका रो-रोकर बुरा हाल था। मगर अब कोई कर भी क्या सकता था ,एक खुशहाल परिवार इस तरह क्षणभर में छिन्न-भिन्न हो जाएगा, किसी को उम्मीद न थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर यह भी सत्य है कि इस रहस्यमयी दुनिया में कभी-कभी ऐसे चमत्कार भी हो जाते है जिनकी कोई कल्पना भी नही कर सकता है। और एक वो कहावत है  'जाको राखे साइयां, मार सके न कोई' ! वक्त-वेवक्त यह कहावत भी चरितार्थ हो ही जाती है। उधर ठीक एक ऐंसा ही चमत्कार हो गया था, घाना के दक्षिणी भाग के तटीय शहर अक्सिम से करीब ५० मील पश्चिम में स्थित समुद्र तट के पास के पहाडी घने जंगल में । हुआ यूँ कि जब विमान में विस्फोट हुआ तो वह अनेक टुकडो में विभाजित होने के बाद इधर-उधर मलवे के ढेर में तब्दील हो गया था , लेकिन विस्फोट के बाद ऊपर आकाश से जहाँ विमान का अगला हिस्सा अटलांटिक महासागर में गिरा, तो पिछला हिस्सा घाना के दक्षिणी भाग में तटीय प्रदेश में स्थित घने जंगलो में जाकर गिरा था। पिछला जो बड़ा हिस्सा था वह विमान से इंधन के टैंक और जहाज के पंखो के पीछे से अगले हिस्से से अलग हुआ था। अलग होने के बाद, चूँकि पिछले हिस्से के अन्तिम छोर पर विमान की उठी हुई नोकिली पुँछ थी ओर साथ ही विमान के अन्दर भी अन्तिम छोर पर पेंट्री का सामान था, यानि कि लोड पीछे की तरफ़ ज्यादा था, अतः वह जब नीचे की ओर तेजी से गिरने लगा तो जमीन पर वह इस तरह गिरा कि पिछला भाग जमीन से टकराने के बाद मिटटी में धंस गया और ऊपरी हिस्सा दो बड़े दरख्तों के बीच अटक गया था। यह भी एक संयोग ही था कि यह पिछला हिस्सा विमान से जिस जगह से अलग हुआ था, इंधन के टैंक उससे आगे के ही हिस्से में रह गए थे ओर उसके पीछे की तरफ़ कोई भी ऐंसी ज्वलनशील वस्तु नही रह गई थी कि वह ज़मीन से टकराने के बाबजूद भी उसमे आग लग सके। जब यह दुर्घटना हुई तो शाम का वक्त था, अतः पूरा इलाका जल्दी ही घुप अंधेरे के आगोश में सिमट गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब बारह घंटे की एक असीम निद्रा या यु कहें कि मृत्यु लोक की सैर करने के बाद, विक्रम को जब होश आया तो उसके अगल-बगल घुप अँधेरा था, प्यास से गला सूखे जा रहा था, शरीर पसीने से तर था क्योंकि तटीय इलाका होने की वजह से वहां पर ह्युमीडिटी बहुत ज्यादा थी। वह जब थोड़ा और चेतन में आया तो उसने अंधेरे में ही महसूस किया कि उसके ऊपर किसी ओर इंसान का हाथ और शरीर का कुछ हिस्सा टिका पड़ा है। थोड़ा सा चेतन में आने ओर अपने में सहजता लाने के बाद उसने अंधेरे में फिर हाथ से इधर-उधर टटोल कर उस जगह का अंदाजा लगाने की कोशिश की तो उसे महसूस हुआ कि वह कोई स्त्री का शरीर है जो उसके ऊपर गिरा पड़ा है। उसे धीरे-धीरे वह सारा मंजर याद आने लगा जब वह सीट बेल्ट खोलकर , रिलैक्स होकर अपनी सीट को थोड़ा पीछे की तरफ झुका रहा था ओर उसकी आगे वाली सीट के पिछले भाग में लगे विडियो स्क्रीन पर गेम खेलने की तैयारी कर रहा था कि तभी उसे जोर का एक धमाका सुनाई दिया था, ओर फिर.......! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह सोचने लगा कि इस समय वह कहाँ हो सकता है ? यह कोई हॉस्पिटल का कमरा तो नही लगता, कोई आबादी वाला क्षेत्र भी नही लगता, क्योंकि आस-पास मौत का सा सन्नाटा छाया हुआ है, कोई हवा भी नही चल रही है, तो ये कौन सी जगह हो सकती है ? क्या पूरा का पूरा विमान जमीन पर ज्यो का त्यों आ गिरा ? एक इंजिनियर होने के नाते उसका मन यह भी सहज स्वीकार करने को तैयार न था। उसके मन में एक अनजाना सा डर भी बैठा हुआ था कि अगर वह कही जंगल में आ गिरा है तो जंगली जानवर, कभी भी आकर उस पर झपट सकते है, वह भूत-पिचाशो वाली मिथ्या से नही डरता था मगर जंगली जानवरों से उसको बहुत डर लगता था। एक बार फिर से साहस कर उसने अपना हाथ ले जाकर उस अनजान स्त्री की छाती पर रखा, यह जानने के लिए कि क्या वह जिन्दा है? तो उसे उस परिस्थिति में भी दिल को थोड़ा बहुत शकुन सा मिला कि उस स्त्री की धड़कने चल रही थी। विक्रम ने अंधेरे में ही आस-पास की स्थिति का जायजा लेने के लिए फिर हाथो को इधर उधर मारा, तो उसके हाथ एक पानी की बोतल लग गई। उसने लेटे- लेटे हाथ बोत्तल के ढक्कन पर किया ओर ढक्कन खोलकर उसे सूंघने की चेष्टा की, कोई किसी प्रकार की गंध न थी, जबकि बोतल भरी हुई थी ओर ढक्कन खोलते वक्त कुछ पानी छलककर उसकी छाती पर भी गिर गया था और जिससे उसको बड़ा शुकून मिला था।उसे यकीन हो गया कि यह पानी ही है। अब उसने अपना दिमाग चलाना शुरु किया कि यहाँ पर यह पानी की बोतलें कैसे हो सकती है या तो यह उस स्त्री की है जिसका शरीर उसके ऊपर गिरा पड़ा है या फिर यह विमान के अन्दर की ही सामग्री हो सकती है, जिसे केबिन क्रू यात्रियों को सर्व करने ले जा रहा था और विस्फोट के बाद वहीं विखर गया था। प्यास से तड़फते विक्रम ने पानी की बोतल अपने हलक में उतार दी । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घुप्प अंधरे के बावजूद विक्रम ने अपने शरीर को हिलाया और उठने की कोशिश की, मगर उठ नही पाया उसे लगा मानो उसके कमर से नीचे का हिस्सा सुन्न हो गया है। पानी पीने से थोडी राहत ज़रूर मिली थी, मगर चूँकि वह इलाका एक तटीय और सम-शितोषण   उष्ण कटिवन्धीय क्षेत्र होने की वजह से वह फिर पसीने से तर होने लगा था। कान लगा कर आस-पास की गतिविधियों को भी भापने की उसने बहुत कोशश की मगर सब कुछ शांत था, किसी भी तरह की कोई हलचल अथवा किसी पशु पक्षी के स्वर भी नही सुनाई पड़ रहे थे, मानो पूरा इलाका ही बेहोशी में पड़ा हो। उसने कुछ और समय तक यूँ ही लेटे रहना मुनासिब समझा, साथ ही वह उस स्त्री के अगल बगल की पोजीशन जानने के लिए जमीन पर हाथ से टटोल भी रहा था कि अगर कोई ढलान वाली जगह हुई और अगर वह उसके शरीर को अपने शरीर से अगल करने के लिए दूसरी तरफ पलटता है तो कही वह लुड़क कर ढलान में न गिर पड़े। विक्रम उसी स्थिति में अगले पल का इंतज़ार करने लगा। कुछ और समय बीतने के पश्चात उसे महसूस हुआ कि कुछ रौशनी सी होने लगी है, और आस-पास की जगह स्थिति कुछ धुंधली सी नज़र भी आने लगी है। उसने अंदाज़ लगाया कि शायद सबेरा होने लगा है, और विमान का वह खुला भाग जो अगले हिस्से से अलग होने के बाद दो पेडो के सहारे ऊपर की ओर था उस आसमान की ओर खुले हुए हिस्से से एवं खिड़कियों के शीशो से धीरे-धीरे रोशनी अन्दर आने लगी थी। और पक्षियों के चहचहाने की आवाजे भी सुनाई देने लगी थी। वह समझ गया कि वे लोग विमान के अन्दर ही किसी भाग में फंसे हुए है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ पल और गुजरने के बाद अब भोर अपने पूरे शबाब पर थी, और जिस जगह विक्रम था उसके आस पास का नजारा साफ़ नज़र आने लगा था। हालांकि उसका पूरा शरीर बुरी तरह दर्द कर रहा था, फिर भी विक्रम ने अपनी गर्दन को थोड़ा सा ऊपर उठाया ताकि भली भांति अपने आस-पास की स्थिति को ठीक से भांप सके। उसने देखा कि उसकी टांगो और आधे सीने पर जो स्त्री औंधे मुह गिरी पडी थी, वह तकरीबन १७-१८ साल की एक भूरे बालो वाली गोरी युवती थी। हालांकि वह जिन्दा थी और उसकी साँसे चल रही थी फिर भी वह अचेत थी। जिस जगह पर वो गिरे पड़े थे वह विमान के पिछले गेट के पास वाली जगह थी। उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक और युवक, जो कि पह्नावे से विमान का कर्मचारी नज़र आ रहा था, विमान के पिछले दरवाजे और पेंट्री वाली जगह के बीच, पानी की बोतलों और खाने पीने के सामान और ट्राली के मध्य़  दबा और फंसा पड़ा था, और उसके शरीर पर  कोई हलचल नही थी। युवती के सिर के बीच में चोट लगी हुई थी और काफी खून बह निकला था। विक्रम की छाती और पेट पर भी उसके  सिर का  खून बुरी तरह से फैला हुआ था, उसकी कमीज खून से लथपथ थी। दर्द से कराहते हुए विक्रम ने अपने शरीर को थोड़ा सा खिसकाया और युवती को अपने से अलग किया। ज्यो ही उसने युवती को एक तरफ हटाया उसके शरीर के निचले भाग में झनझनाहट शुरु हो गई। उसने देखा कि उसकी टांगो का निचला हिस्सा अभी भी पास में पलटी हुई ट्राली के एक हिस्से से दबा पडा है, वह समझ गया कि उसके शरीर के निचले हिस्से में रक्त संचार बंद होने की असली वजह यह पलटी हुई ट्रोली का भार ही है। काफी मशक्कत करने के बाद विक्रम अपने पैरो को ट्राली से अलग कर पाया था। कुछ क्षण बाद जब शरीर के उस हिस्से में रक्त संचार शुरू हो गया और झनझनाहट बंद हुई, वह थोडी हिम्मत कर पैरो को घुमाते हुए  ऊपर की तरफ़ मोड़ने में सक्षम हो गया और फिर विमान की दिवार पर पीठ के बल बैठ गया। गर्दन को पीछे कर सिर को दीवार पर टिकाते हुए और पैरो को आगे की तरफ़ सीधा कर वह सुस्ताने और शरीर में उर्जा पैदा करने की कोशिश करने लगा। उसने पास में पड़ी एक और पानी की बोतल उठाई और पी गया। अब उसे महसूस होने लगा था कि उसके शरीर में उर्जा संचार करने लगी है। चिंता और थकान उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी, उसने हाथ जोड़ और गर्दन को और पीछे को मोड़ते हुए ऊपर देखकर अपने इष्ट देव को याद किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब आधा घंटा गुजर जाने के बाद उसने महसूस किया कि अब वह थोड़ा हिल-डुल सकने में सक्षम था, अतः  कुछ देर तक गौर से उस अचेत पड़ी युवती को निहारने के बाद उसने पास ही पड़ी एक पानी की बोतल उठाई और उस युवती के चेहरे पर पानी के छींटे मारे। पानी के छींटे चेहरे पर गिरते ही युवती के शरीर में हलचल हुई और वह अपना मुह खोल जीभ से उन पानी के छीटों को चाटने लगी। विक्रम ने तुंरत हाथ में पकड़ी बोतल का मुह उसके मुह पर लगा दिया और धीरे-धीरे उसके मुह में पानी डालने लगा। युवती ने धीरे से अपनी आँखे खोली और विक्रम को देखा। उसकी आँखों में भय साफ़ छलक रहा था, वह एकदम उठना चाहती थी मगर किसी शारीरिक दर्द की वजह से उट ना सकी, फिर उसने अपनी गर्दन जमीन पर टिका दी, और ’ओह गोड’ की एक हल्की कराह छोड़ी। विक्रम ने बैठे-बैठे अपने को थोड़ा युवती की तरफ़ खिसकाकर, उसके शरीर को सहारा दिया और उसका सिर अपनी जांघ पर रख दिया । कुछ देर यु ही रह्ने के बाद  फिर धीरे-धीरे उसे कमर तक सीधा कर, विमान के दरवाजे के सहारे उसे पीठ के बल बिठा दिया। युवती कुछ बडबडा रही थी मगर क्या कहना चाहती थी , शब्द पकड़ में नही आ रहे थे । विक्रम ने फिर पानी की बोतल उठाई और उसी के कुर्ते के पल्लू को गीला कर, उसके मुह पर बिखरे और सूख चुके खून के धब्बो को साफ़ किया। जिस इत्मिनान  से विक्रम उसके चेहरे से खून के धब्बे साफ़ कर रहा था, वह देख उस युवती की आँखे छलक आई। उसने डबडबायी आँखों से विक्रम को देखा और फिर हल्का सा मुस्कुराने की कोशिश की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम थोडी देर तक उस युवती को निहारता रहा था। इस बुरे पल में, उसके दिल के किसी कोने में अगर उसे थोड़ा ढाढस कोई चीज़ बंधा रही थी, तो वह थी वह युवती, उसे जरा सी यह सांत्वना तो मिली थी कि वहा पर उसके साथ कोई और भी मौजूद है। उसके सिर के मध्य भाग में स्थित घाव तो साफ़ नजर आ रहा था, मगर साथ ही वह यह भी देखने की कोशिश कर रहा था कि उसे और कहाँ-कहाँ चोट लगी है। फिर अचानक उसे पेंट्री के पास दबे पड़े उस युवक का ख़याल आया, वह अपने एक घुटने को उठा फर्श पर पैर रखते हुए घिसट कर उसकी ओर बढ़ा। विक्रम ने पहले उस युवक के ऊपर गिरे सामान को अगल किया फिर आधा झुककर उसके ऊपर गिरी  ट्रोली को दूसरी तरफ़ पलटा, और फिर झुकते हुए उसके पास गया। उसने उसके हाथ की नब्ज़ को अपनी हथेली में लिया, मगर उसकी नब्ज़ बंद हो चुकी थी। विक्रम ने झुकते हुए अपना कान उसकी छाती पर लगाया मगर अन्दर कोई हलचल नही थी, उसकी दिल की धड़कने बंद हो चुकी थी। विक्रम के मुह से निकला पड़ा ’ओह माई गोड़’ ! उस युवती ने एक भयभीत नज़र से विक्रम की ओर मुड़कर देखा। विक्रम ने उसकी तरफ़ देखकर अंग्रेजी में कहा  " ही इज डेड " , वह मर चुका है, यह सुनते ही उस युवती ने एक लम्बी साँस छोड़ी और अपने सीने के दोनों तरफ़ और माथे पर अपनी दांये हाथ की ऊँगली से छुआ। फिर ना जाने विक्रम को क्या सूझी और उसने एक और पानी की बोतल खोल कर पूरी बोतल उस युवक के चेहरे और छाती पर उडेल दी, फिर थोडी देर तक उसको देखता रहा और  "सिट" कहकर हाथ को हवा में झटककर वापस अपनी जगह पर आ गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम जब कुछ पल सुस्ता लिया तो उस युवती ने उसकी तरफ़ देखते हुए हाथ से पास पड़ी पानी की बोतल की ओर इशारा करते हुए विक्रम से उसे पानी देने का आग्रह किया। विक्रम ने उसे पानी की बोतल थमा दी। पानी पीने के बाद वह अचानक सिसकने लगी। विक्रम ने उसकी भावनाओं को समझते हुए और इस विपदा की घड़ी में उसके अन्दर उमड़ रहे भय के तूफ़ान को समझते हुए, उसके पास पहुँच कर उसके कंधे पर हाथ रख उसे सांत्वना दी और धैर्य रखने को कहा। जब वह थोड़ा सामान्य हुई तो उसे विक्रम अपना परिचय देने लगा, उसने कहा मैं एक भारतीय हूँ, पेशे से सिविल इंजीनियर हूँ, और एक कैनैडियन मल्टीनेशनल कम्पनी के नई दिल्ली स्थित कार्यालय में बतौर असिस्टेंट जनरल मैनेजर-प्रोजेक्ट्स के पद पर कार्यरत हूँ । यहाँ आइवरी कॉस्ट में चल रहे एक प्रोजेक्ट का निरीक्षण करने आया था और अब नाईजीरिया स्थित दूसरे प्रोजेक्ट के निरीक्षण के लिए जा रहा था कि........आपका....? विक्रम ने अपने दाये हाथ की उगली युवति की ओर करते हुए उससे उसका परिचय पूछा। युवती ने थोडी देर शांत रहने के बाद बताया, मेरा नाम केसिना आन्द्र्पोब है, वैसे तो मैं मास्को की रहने वाली हूँ, मगर मेरे पिता एक व्यवसायी है और उनका मास्को और लन्दन, दोनो जगहो  में अपना कारोबार है, पिता ने लन्दन स्थित कार्यालय जबकि कर्मचारियों ने मास्को स्थित व्यापार सम्भाल रखा है । इसलिए मैं भी लन्दन में ही पढ़ती हूँ और पिता के साथ यहाँ के कारोबार में हाथ बंटाती हूँ । फिर थोड़ा रूककर एक गहरी साँस लेते हुए उसने कहा, अवकाश में भ्रमण के लिए अबिड्जन होते हुए लागोस जा रही थी....! उसने फिर छलछला आई आँखों से विक्रम की आँखों में देखा। विक्रम ने अपना हाथ उसके सिर पर हलके से रखा और उसके सिर की चोट का ध्यान आते ही उसने केसिना को पूछा कि बहुत ज्यादा अन्कम्फोरटेबल तो नही महसूस कर रही हो, दर्द कितना हो रहा है? केसिना ने सुबकते हुए हाथ से ना में इशारा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करते-करते काफ़ी दिन चढ़ चुका था, सूरज विमान के ऊपरी खुले हिस्से से अन्दर झाँकने लगा था। विक्रम ने विमान के उस हिस्से के फर्श पर बैठे-बैठे ऊपर की तरफ़ एक नजर दौडाई और फिर हिम्मत करके सीधा खड़ा हो गया। उसने मिटटी के ढेर में धंसे विमान के पिछले दरवाजे को खोलने की कोशिश की, मगर शायद बाहर की तरफ़ मिटटी का ढेर काफ़ी बड़ा था, इसलिए नही खुला। विपत्ति के इन कठिन पलों में हिम्मत जुटाने और शरीर में ऊर्जा पैदा करने के लिए, पास में पड़े फास्ट फ़ूड के दो पैकेट उसने उठाये और एक केसिना की तरफ़ बढाया और दूसरा ख़ुद खाने लगा। सिर में गहरी चोट लगने की वजह से केसिना अपना मुह ठीक से नही खोल पा रही थी, इसलिए एकआध सॉफ्ट आइटम लेने के अलावा वह ज्यादा कुछ नही खा पाई। उधर खाली पेट में भोजन पहुँचने के बाद विक्रम अपने को थोड़ा सा सामान्य महसूस करने लगा था। उसने केसिना की तरफ़ देखा जो अभी तक उस पैकेट को हाथ में पकड़े थी,  विक्रम ने उसके न खाने का कारण यह समझा कि इस विपरीत परिस्थिति में शायद उसका मन नही, अथवा वह जानबूझ कर नही खाना चाहती। उसने एक सयाने व्यक्ति की तरह उस १७-१८ साल की मासूम को समझाना शुरु किया। देखो केसिना, मैं भी तुम्हारी ही तरह के शारीरिक और मानसिक  सदमे से गुजर रहा हूँ, और समझ सकता हूँ कि तुम पर क्या गुजर रही होगी। लेकिन इस कठिनाई की घड़ी में हमें एक दूसरे का साथ देना है, और उसके लिए जरुरी है कि हम जिन्दा रहने की हर सम्भव सफल कोशिश करे, और जिन्दा रहने के लिए जरुरी है कि हम कुछ खांए-पिंए। हो सकता है कि शीघ्र ही कोई हमें बचाने के लिए आ जाए, और तब तक हमें जीवन के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा।केसिना उसके विचारो को समझने का प्रयास कर रही थी और उसकी भावनाओ का आदर करते हुए उसने धीरे से कहा, नही विक्रम, तुम ठीक कह रहे हो मगर मेरा जबडा चोट की वजह से ठीक से  खुल नही पा रहा, इसलिए मैं कोई शक्त चीज़ नही खा पा रही हूँ। उसकी बात सुन विक्रम ने कहा, ओह सॉरी ! फिर विक्रम ने हिम्मत जुटा, विमान के उस टुकड़े की ऊपर की तरफ़ खड़ी सीटों को  किसी सीढी की तरह प्रयोग किया और उन्हें पकड़-पकड़ कर वह ऊपर की ओर चढ़ने लगा। शरीर में दर्द के वावजूद काफ़ी मशक्कत के बाद वह उस विमान के टुकड़े के ऊपरी सिरे पर पहुँच चुका था। उसने देखा कि ऊपरी हिस्सा दो बड़े दरख्तों के बीच मे फंसा पडा  है,दरख्त की ठहनिया उस टुकड़े के ऊपरी सिरे पर लटक रही थी। उन्हें हाथ से एक तरफ़ को करते हुए उसने अपने  आस पास की स्थिति का मुआयना किया। चारो ओर नज़र दौडाने पर बस पेडो ओर झाडियों से घिरा एक घना जंगल ही नज़र आता था, इन घने जगलो के बीच, दूर-दूर तक कोई मानव बस्ती होने की कल्पना करना भी एक नादानी ही कही जाती। हां, पास ही करीब डेड-दो सौ मीटर दूर एक छोटी पहाड़ी ढ्लान पर एक छोटी नदी बह रही थी,ओर कल-कल की हलकी ध्वनी उससे निकल कर आ रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर की एक झलक देखने के बाद विक्रम समझ गया था कि इतने बड़े हादसे में बच निकलने के वावजूद भी, अब जिंदगी इतनी आसान नही रह गई थी। जिस तरह का वह वर्षा वनों वाला उष्णकटीबंदीय घना जंगली क्षेत्र था, उस क्षेत्र में किसी हवाई या ज़मीनी मदद का पहुंचना भी एक दैवीय चमत्कार जैसा ही होता। उसे अचानक ध्यान आया और उसने अपनी पैंट का जेब टटोला, उसका मोबाइल फ़ोन जेब में ही था, और उसने विमान में चड़ते वक्त स्विच आफ करके रखा था । उसने उसे हाथ पर लिया और स्विच आन किया, मगर उसे निराशा ही हाथ लगी, क्योकि मोबाइल कोई भी नेटवर्क पकड़ पाने में असमर्थ रहा था। इतना तो वह अंदाजा लगा ही रहा था कि समुद्र यहाँ से कंही बहुत ज़्यादा दूर तो नही होगा, क्योंकि दुर्घटना से पहले जब विमान ने अपनी निश्चित ऊँचाई पकड़ने के बाद सीध में उड़ना शुरु किया था तो विमान की खिड़की से नीचे एक तरफ़ पूरा फैला अटलांटिक महासागर ही नज़र आ रहा था। मगर, कदम कदम पर मौत थी, वहां  तक पहुंचना कोई आसान खेल नही था, एक तो घायल केसिना, ऊपर से हाथ में कोई भी हथियार नही और साथ ही जंगली हिंसंक पशुओं का हर कदम पर सामना। वे लोग तकदीर और कुदरत की करामात के चलते इन  घने जंगलो में ऊपर से रात के अंधेरे में सीधे नीचे ड्राप हुए थे, इसलिए निश्चित दिशा का भी उन्हे पता नही था, कि समुद्र अथवा कोई मानव बस्ती किस ओर को हो सकती है ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम का दिमाग तेजी से इस घटनाक्रम ओर इसके परिणामो के बारे में सोचने लगा। कुछ रूककर उसने निश्चय किया कि अब जो भी हो, उधार की यह जिंदगी, जितने भी पल हो सके, जीने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए। धैर्य खोकर हालात के रहमोकरम पर ख़ुद को छोड़ देने से वेहतर है, हालात से संघर्ष किया जाए और बजाय एक दर्दनाक कायरतापूर्ण मौत के एक बहादुर की मौत मरे ! उसने ऊपर से खड़े होकर विमान के टुकड़े की तलहटी में झाँका और गौर से उस जगह का निरीक्षण किया, फिर उस  इलाके का भी बारिकी से अवलोकन करने लगा कि कहीं आस-पास कोई जंगली जानवर तो नही। उसने एक नजर उन पेड़ की शाखाओं पर भी दौडाई, जिन पर विमान का वह हिस्सा टिका हुआ था। वह देखना चाहता था कि विमान का वह हिस्सा कितनी मजबूती से टिका है और पेड़ और उसकी शाखाओं में कितना दम है, उसे रोके रखने और वजन झेल पाने मे, कही जमीन पर टकराते वक्त और पेड़ से टकराते वक्त पेडो की जड़े तो नही उखड गई? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वह पूर्णतया आस्वस्थ हो गया कि वह विमान का टुकडा काफ़ी मजबूती से खड़ा है तो एक बार फिर उन्ही, सीटो को पकड़ कर वह आहिस्ता-आहिस्ता नीचे विमान के उस भाग पर उतरा, जहाँ से चढा था। केसिना उसे टुकुर-टुकुर देखे जा रही थी, उसने केसिना को उसके कंधे से पकड़ कर खड़ा करने की कोशिश की। दर्द के मारे केसिना ने एक हल्की कराह छोड़ी, विक्रम ने उसे जोर देकर कहा कि वह खड़े होने की कोशिश करे, ताकि यह पता लग सके कि उसके शरीर में हड्डियों पर कोई गंभीर चोट तो नही है। वह केसिना के एकदम आगे खड़ा हो गया था और केसिना को सलाह दे रहा था कि वह धीरे-धीरे उसके शरीर का सहारा लेकर, उसे पकड्कर खड़ा होने की कोशिश करे। केसिना ने वैसा ही किया जैसे विक्रम ने उसे निर्देश दिए थे, और वह फिर विक्रम के आगे एकदम सीधी खड़ी थी। विक्रम ने उसे अपने बाए कंधे का सहारा दिए रखा और फिर उसे सारी वस्तु-स्थिति से अवगत कराया। उसने केसिना को जो कुछ ऊपर चढ़कर बाहर का नजारा देखा था, बताया और कहा कि यहाँ हम एक ऐंसी जगह पर फँस चुके है जहाँ किसी मदद के पहुँचने की उम्मीद ना के बराबर है। विक्रम ने केसिना को समझाया कि किसी भी कीमत पर वह अपना धैर्य न खोये। उसने उसे समझाया कि अगर भगवान ने हमें यहाँ तक जिन्दा रखा है तो आगे का कोई न कोई रास्ता भी वही दिखायेगा। फिर उसने केसिना को अपना आगे का प्लान बताते हुए कहा कि तुम यहाँ एक जगह बैठ जाओ और मैं थोड़ा ऊपर जाकर विमान के इस टुकड़े की दूसरी या तीसरी कतार की सीटो की कोई खिड़की तोड़कर वहाँ से नीचे बाहर की तरफ़ उतरने की कोशिश करता हूँ, क्योंकि हमारे पास वक्त बहुत कम है  और हमें किसी तरह यह दरवाजा खोलकर इस लाश को भी बाहर निकालना है, अन्यथा गर्मी और उमस के कारण उस पर जल्दी दुर्गन्ध आने लगेगी। हमें बस सब्र से काम लेना है और यह मत सोचो कि तुम अकेली हो मैं तुम्हारे साथ हूँ और जहाँ तक बन पायेगा, हमें ही एक दूसरे का साथ देना है क्योंकि यहाँ हमारी मदद के लिए, सिवाए ऊपर वाले के कोई तीसरा नही है, इसलिए जहां तक सम्भव हो सकेगा, हमें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना है। केसिना ने अपना सिर हिलाते हुए, अपनी धीमी आवाज में उसे संभलकर और होश्यारी से यह काम करने का आग्रह किया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह फिर से धीरे-धीरे ऊपर को चढा और ठीक उस सीट पर पहुँच गया, जिस पर वह विमान में सवार होते वक्त बैठा था। विमान में सवार होते समय वह पीछे से आगे की ओर तीसरी, जिन सीटो की कतार में बैठा था, उसने तोडने के लिये उसी सीट की खिड़की के शीशे को चुना, क्योंकि उसके अंदाज़ से वह इस वक्त जमीन से करीब १०-१२ फुट की ऊँचाई पर थी, और उसे इस बात का अहसास था कि अगर वह ज्यादा नीचे वाली खिड़की का शीशा तोड़ता है तो बाहर से जंगली जानवरों के लिए उस रास्ते से अंदर आना आसान हो जाएगा। अतः उसने वह खिड़की चुनी और शीशा तोड़ डाला। लेकिन इतने भर से काम आसान नही होने वाला था, क्योंकि खिड्की इतनी छोटी थी कि वहा से शरीर को रगड्ते हुए निकाल पाना भी सम्भव न था, अत: उसने शीशे के चारों तरफ़ की रबड की पैकिंग भी उखाड डाली। अब इतनी जगह बन चुकी थी कि वह शरीर को मुश्किल से बाहर की ओर झुका सके।  फिर एक बार उसने इधर-उधर बाहर का सरसरी तौर पर मुआयना किया और फिर हाथों को सीट के ऊपरी हिस्से मे फंसाते हुए सम्भलकर दोनो पैर एक साथ खिडकी वाली जगह से बाहर निकाल दिये और कूदकर बाहर निकल गया। एक सजग प्रहरी की तरह उसने अपने आस-पास का आंकलन किया, क्योंकि उस घने जंगल में कौन सा जंगली जानवर घात लगाये बैठा हो, कोई नही जान सकता था, वह यही देख रहा था कि कोई जानवर नजदीक  तो नही कि तभी अचानक उसकी नज़र झाडियों में पड़ी एक लाश पर गई। हल्की सी सिहरन उसके शरीर में दौड़ गई, वह सतर्क रहते हुए जब लाश के पास पहुँचा तो देखा कि उससे कुछ और दूरी पर ४-५ लाशे और बिखरी पड़ी है ! उसे समझते देर न लगी कि ये सभी बदनसीब, विमान के उस हिस्से पर सफर कर रहे थे जो वहाँ गिरा था। साथ ही इस बात से उसने यह भी अंदाजा लगा लिया कि फिलहाल आस-पास कोई हिंसक किस्म का जानवर नही होगा, क्योंकि अगर ऐसा होता तो यह जो लाशे वहां बिखरी पड़ी थी, ये अभी तक उन्होंने नोच ली होती। उसने सोचा, जानवरों के आसपास न होने का एक और मुख्य कारण यह भी हो सकता है कि  विमान का यह हिस्सा जब जमीन पर गिरा होगा तो जमीन से टकराते वक्त एक जोर की आवाज़ निकली होगी और इसलिए आस-पास स्थित सभी जानवर दूर भाग खड़े हुए होंगे। फिर भी उसे सजग रहना होगा क्योंकि यह जंगल है और जंगल में कब कौन जानवर कहा विचरण करे, इसका अंदाजा कोई नही लगा सकता। अतः उसने अपने इधर-उधर देखकर एक मजबूत लकड़ी का डंडा ढूंडना शुरु किया ताकि यदि कोई जानवर अचानक उसपर हमला कर भी दे तो वह कुछ हद तक अपना बचाव कर सके। पास ही एक बाँस का झुरमुट था. उसने उसमे से एक सूखी बाँस के डंडे को उठाया और एक बड़े पत्थर से उसके दो टुकड़े कर एक मजबूत लट्ठ अपने पास रख लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद उसने बिना समय गवाए, जो उस वक्त की सबसे महत्वपूर्ण जरुरत थी, पिछले हिस्से का दरवाजा खोलना और जो मिटटी में धंसा हुआ था, उसकी तरफ़ अपने कदम बढाये। पास पहुच, उसने उस बाँस के डंडे से दरवाजे के आस-पास की मिटटी को खोदना और फिर अपने हाथो के सहारे ही तेजी से मिटटी को हटाना शुरु किया। क्योंकि विमान के उस दरवाजे ने बाहर की तरफ़ खुलना था, इसलिए उसने उसी आकार में मिटटी को हटाया ताकि दरवाजा खुल सके। और करीब आधा घंटे की कड़ी मेहनत के बाद दरवाजा खोलने में सक्षम हुआ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरवाजा खुलते ही एक हलकी सी हवा की फुहार अन्दर गई तो पसीने से तर केसिना को बड़ी राहत मिली। उसने ऊपर की ओर देख, ’थैंक गौड़’ कहा ! एक लम्बी साँस लेने के बाद बाहर आने को आतुर केसिना ने अपने दोनों हाथ खड़े कर विक्रम को उसे उठाकर खड़ा करने का आग्रह किया। विक्रम ने उसे अपनी बांहों का सहारा देकर खड़ा किया और जब वह खुली हवा में बाहर निकली तो उसने अपने हाथो और पैरो को खूब हिलाया-डुलाया। उसने महसूस किया कि सिर्फ़ सिर और थोड़ा सा बदन का ऊपरी हिस्सा ही जख्मी था, अन्यथा उसके हाथ-पैर सही सलामत थे। विक्रम ने उसे दरवाजे के पास ही एक तरफ़ खड़ा करके अन्दर पड़ी लाश को खींचकर बाहर निकाला और फिर घसीटते हुए उसे भी उसी जगह पर ले गया, जहाँ पर ५-६ लाशें पहले से पड़ी थी। फिर बारी-बारी से सभी लाशो को उसने वहाँ से थोडी और दूर ले जाकर एक गहराई वाली उबड़-खाबड़ जगह पर एकत्रित किया और फिर उन्हें पास पड़े पत्थरो और मिटटी से ढक दिया, क्योंकि उसे डर था कि जंगली जानवर अगर इंसान का खून चख लेंगे तो फिर उन पर भी आक्रमण कर सकते है। उसने मन ही मन यह तय कर लिया था, और साथ ही इससे सुरक्षित जगह उस घने सुनसान जंगल के इलाके में और शायद कोई हो भी नही सकती थी, इसलिए उसने जबतक और जहाँ तक सम्भव हो, विमान के उसी हिस्से को एक अस्थायी बसेरे के तौर पर प्रयोग में लाने का निश्चय किया। लाशो को दफनाने के बाद वह विमान के उस भाग में वापस लौटा और केसिना, जोकि उसे ही एकटक देखे जा रही थी, उसके सिर पर हल्का हाथ फेरने के बाद वह अन्दर घुसा और जिस जगह पर पैंट्री का सामान बिखरा पड़ा था, उसे तरतीब से सँभालने और उसके आसपास की सफाई करने लगा। कुछ ही देर में वह जगह दो लोगो के लिए आराम से बैठने और लेटने लायक जगह बन गई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम यह भली भांति समझ चुका था कि अगर उन्हें जिन्दा रहना है तो आगे चलकर उनको ख़ुद से, हालत से, और उस भयानक जंगल की त्रासदियों से एक लम्बी जंग लड़नी है, अतः इसके लिए उन्हें वह हर सम्भव हथियार जुटाने होंगे,जो वहा मौजूद हो सकते  है और जिनकी इस जंग में जरुरत पड़ेगी। उस जगह को रहने लायक बनाने के बाद उसने विमान के उस  टुकड़े की सीटो से गद्दिया उतारी और उन्हें पेंट्री और पिछले दरवाजे के बीच में बिछा दिया। फिर बाहर खड़ी केसिना को सहारा देकर अन्दर लाया और उसे आराम से वहाँ बिछी गद्दियों के बिस्तर पर बैठ जाने को कहा। उसे ध्यान था कि केसिना के सिर  की चोट गहरी है इसलिए उसका तुंरत उपचार न हुआ तो समस्या बढ़ सकती है। उसे विमान की खिड़की तोड़ते वक्त ही ध्यान आ गया था कि उसका हैण्ड बैग ओवरहेड लॉकर में सही सलामत होगा। केसिना की चोट की ओर ध्यान जाते ही उसे पुनः बैग का ख़याल आया क्योंकि उसमे उसका फर्स्ट एड बॉक्स भी पड़ा था जिसे वह टूर के दौरान हमेशा अपने  साथ रखता था। यह ख़याल दिमाग में आने पर वह उस सीट की ओर लपका, उसने ओवरहेड लॉकर खोला तो अपना बैग वही देख उसके दिल को ऐंसा शकुन सा मिला, मानो वह अपने घरवालो से मिल गया हो। उसकी समझ में नही आ रहा था कि इस क्षणिक सुखद अनुभूति पर वह खुश हो, या फिर रोये। उसने बैग बाहर निकाल कर अपना सामान देखा, कपड़ो के बीच छुपाये सिगरेट की डब्बी और बैग के प्लास्टिक के फोल्ड शुदा हैंडल के अन्दर छुपाये  मिनी लाइटर को उसने बाहर निकाला और जल्दी से एक सिगरेट सुलगाई, सिगरेट पीने के बाद उसे बड़ा शकुन मिला। य़ू तो २००१ के ०९/११ के अमेरिका में हुए आतंकी हमलो के बाद से तो सभी देशो में, विमानों में इस तरह की वस्तुए ले जाना ही एक कानूनी अपराध है, और बहुत सख्ती भी है, मगर उससे पहले इतनी सख्ती नही थी। और विक्रम जब भी कहीं टूर पर जाता उस मिनी लाईटर को ले जाना नही भूलता था। और उसके ले जाने के लिए उसने बैग के फोल्डिंग हैंडल को उसकी एक महफूज़ जगह बना रखा था, जो आसानी से एक्सरे मशीन पर नही आता था। फिर केसिना के सिर के घावों का ख़याल आते ही फर्स्ट एड का सामान, डिटोल और सोफ्रामायिसिन एवं बेट्नोवेट-एन ट्यूब, जो उसने बैग की जेब में रखा था, उसको ले वह केसिना की ओर बढा और उसके घावों की मरहम पट्टी की। केसिना बस अपनी कृतज्ञ नजरो से उसे देखती रही, उसे ऐसा सा महसूस हो रहा था कि मानो वह अपने किसी ख़ास दोस्त या रिश्तेदार के साथ वहाँ पर है। घावों की सफाई और मरहम पट्टी करते वक्त पानी के कुछ छींटे केसिना के चेहरे पर पड़े हुए थे, विक्रम ने अपने कमीज के पल्लू से जब उन्हें साफ किया तो केसिना अपने भावों को नही रोक पाई और रोते हुए विक्रम के सीने से लिपट गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधर में लटकी दो त्रिशंकु जिंदगियो के जीने की एक दिनभर की जद्दोजहद अब फिर से घने जंगलो के बीच धीरे-धीरे पसरते शाम के अंधेरे में डूबने लगी थी। अन्दर उजाले के लिए कोई साधन नही था, विक्रम केसिना का हाथ पकड़ उसे थोडी देर के लिए बाहर फ्रेश होने के लिए ले गया, और फिर लाईटर से विमान के उस टुकड़े के गेट के पास, दिन में इक्कठा किए कूडे को जला एक जलती लकड़ी को अन्दर ट्रोली पर रख दिया, ताकि अन्दर कुछ देर उजाला हो सके। फिर उसने विमान के गेट को ठीक से बंद कर लॉक कर दिया। विमान के उस हिस्से के अन्दर उन दोनों के लिए कुछ दिनों की खाद्य सामग्री और पानी प्रचुर मात्रा में थे, जिन्हें वहाँ विमान में सफर करने वाले उन अभागे यात्रियों को परोसने के लिए इक्कट्ठा किया गया था जो बिना कुछ खाए ही इस दुनिया से चल बसे थे। मरहम पट्टी के बाद केसिना भी काफ़ी राहत सी महसूस कर रही थी, इसलिए दोनों ने कुछ इत्मिनान से बैठ खाना खाया। विमान चूँकि उड़ते ही दुर्घटना का शिकार हो गया था, इसलिए पिछले हिस्से में मौजूद टायलेट को यात्रियो ने इस्तेमाल भी नही किया था और एक सीमा तक टायलेट साफ़-सुथरी ही थी, और उनके लिए किसी तरह की बदबू पैदा नही कर रही थी। अभी दोनों ने अपना खाना समाप्त ही किया था कि जलती हुई लकड़ी भी बुझ गई थी। कुछ देर विक्रम केसिना को जिंदगी की सच्चाईयों के बारे में अवगत कराते हुए समझाता रहा और उसे अपने और अपने  परिवार के बारे मे विस्तार से जानकारी दी, विक्रम एक प्रोफेसनल होने के नाते यह भी खूब समझता था कि केसिना और उसके बीच करीब १२ साल का अन्तर था और एक तरह से विक्रम के अनुभवों के मुकाबले केसिना अभी बच्ची थी, इसलिए वह उसे हर बात बहुत ही बारीकी से समझाता रहा और फिर दिनभर की मानसिक और शारीरिक थकान के चलते शीघ्र ही दोनों गहरी नींद में सो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी सुबह उन दोनों के लिए, पहली सुबह के मुकाबले कुछ सामान्य थी, दोनों ने लेटे-लेटे अनुभव किया कि आज पेडो पर उन्हें पक्षियों के चहचहाने की आवाजे भी खूब सुनाई पड़ रही थी। हलकी हवा की  बयार भी जंगल के उन पेडो के झुरमुट और आस-पास की हरियाली के बीच से बहती हुई उस् टूटी खिड़की से अन्दर आ जाती थी जिसे विक्रम ने पिछले दिनपर विमान से बाहर उतरने के लिए तोडा था। कुछ देर बाद बाहर पूरी तरह से उजाला हो जाने पर विक्रम ने सावधानीपूर्वक दरवाजा खोलकर बाहर झाँका यह देखने के लिये कि कंही कोई जंगली जानवर तो आस-पास नही। यह इत्मिनान हो जाने पर कि सब कुछ सामान्य है उसने केसिना को सहारा देकर बाहर निकाला, केसिना भी पिछ्ले दिन के मुकाबले, आज काफ़ी तरोताजा और स्वस्थ महसूस कर रही थी। इसके बाद फिर दोनों नित्यकर्म से निपटने के बाद वापस विमान के उसी हिस्से में आ गए। रह-रहकर जब दोनों को अपने घर की याद आती तो दोनों उदास हो जाते, पल-पल वही रटा-रटाया सवाल, अब आगे क्या ? यही ख्याल दोनों को अन्दर से झकझोर कर रख देता और फिर दोनों एक दूसरे को ढाढस बंधाते और फिर कमरकस, पुनः उस जंग में कूद पड़ते। चूँकि केसिना भी विमान के उडान भरते वक्त, उस हिस्से के सबसे पीछे से पांचवी वाली पंक्ति  की सीट में बैठी थी, अतः उसने विक्रम से अपना सामान भी ओवरहेड लॉकर से निकाल लाने का आग्रह किया, विक्रम उसका सामान भी निकाल लाया। फिर नाश्ता करते वक्त विक्रम ने विमान के उस हिस्से पर अपनी एक पैनी नज़र दौडाई, पेशे से एक इंजिनियर होने के नाते मानो अन्दर ही अन्दर कुछ खाका तैयार कर रहा हो। नाश्ता ख़त्म करने के बाद उसने उस हिस्से की सीटो के ऊपर के सारे पैराशूट निकाल डाले और उन्हें फाड़कर उसकी रस्सिया अलग की और पैराशूट के कपडे को आपस में जोड़कर उसे एक बड़े तिरपाल की शक्ल दे डाली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह उनकी इस नई जिंदगी का तीसरा दिन, विक्रम और केसिना किसी मदद के पहुँचने की थोडी बहुत जो  उम्मीद लगाये हुए थे, उन्होंने अब वह भी छोड़ दी थी। इस अनजाने से भयावह जंगल मे वो कहीं जा भी नही सकते थे, न तो रास्ते और दिशा का ही पता और न दुश्मन से लड़ने को हथियार। हथियार का ध्यान आते ही विक्रम ने एक प्लान बनाया, वह हर मुमकिन प्रयास करना चाहता था, ताकि कहीं दिल मे कही भी यह अफ़सोस न रहे कि अगर मैं ऐंसा कर लेता तो शायद.....! केसिना भी अब उसके साथ हर छोटे बड़े काम मे हाथ बंटाने लगी थी, उसने बाहर की ओर जो पिछला हिस्सा जमीन में धसा था उसके अलुमुनियम की टूटी हुई  पतली छडो और पत्ती नुमा धातु को पत्थर के सहारे तोड़कर अलग किया और फिर उन पतली लम्बी पत्तियों को एक बड़े पत्थर के ऊपर रख, उन्हें दूसरे पत्थर से कूठ-कूठ कर पतली तलवार की शक्ल दे डाली, कुछ बरछे नुमा हथियार भी उन अलुमिनियम की छडो से बना डाले, फिर जो छोटी-छोटी पत्तिया बची थी उन्हें बांस  की टहनियों को तोड़कर उनके नोकीले तीर बना डाले। बांस के एक बड़े डंडे को स्वनिर्मित तलवार की मदद से बीच से फाड़कर दो हिस्सों मे बाँट दिया और फिर पैराशूट की जो रस्सिया अन्दर पड़ी थी, उन्हें इस बांस के टुकडो पर चडा धनुष भी बना डाला। अब उसके पास आदिवासियों जैसा  हथियारों का एक पूरा जखीरा तैयार था और इसे पाने के बाद उसका आत्मविश्वास थोडा और दृढ हो गया था। केसिना इस अजनवी से इन्सान की हिम्मत देख-देख कर हैरान हो रही थी, जब हैरानी से टुकुर-टुकुर उसको देखती तो वह हँस देता और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरता। फिर कुछ देर सुस्ताने के बाद उसने आस-पास से मोटी-मोटी बांस और अन्य लकडिया इकठ्ठा की और विमान के निचले हिस्से से ऊपर की ओर दोनों तरफ़ की खड़ी सीटो के सहारे ऊपर आसमान की तरफ एकदम खड़ी गैलरी पर वह लकडिया इस तरह बांधना शुरु किया कि कोई भी नीचे से आसानी से इनपर पैर रखकर उस विमान के टुकड़े के अन्दर ही अन्दर उसके ऊपरी सिरे तक पहुँच जाए। जब यह काम सफलता पूर्वक निपट गया तो कुछ लम्बी और मोटी लकडियो से उसने बारिस से बचने के लिए न  सिर्फ़ उसके टॉप पर पैराशूट के उस तिरपाल की मदद से एक छत बना डाली अपितु उस तिरपाल के नीचे विमान के ऊपरी उस टुकडे के सिरे पर लकडियो का एक बिछोना भी बना डाला ताकि अधिक उमस और गर्मी के वक्त, वहाँ लेटकर आराम से सोया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने उस नए घर को अन्दर से सुदृड़ कर लेने के उपरांत विक्रम का अगला लक्ष्य था घर के बाहर की चारदीवारी, ताकि अगर कोई हिंसक जानवर उधर आ भी जाए तो आसानी से उनके ऊपर और उनके इस घर पर हमला न कर सके । उनके आस-पास मे ही लकडिया और पत्थर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे, अतः पहले उसने लकड़ी और बांस के डंडो को अपने द्वारा बनाये गए बरछे से विमान से कुछ दूरी पर  हटके चारो तरफ़ गोलाई मे जमीन में गाडा, फिर पास ही लटक रही चौडे पत्तो की लम्बी लम्बी बेले काट कर  उन्हें उसने रस्सी की तरह इस्तेमाल किया और उन जमीन मे गाडे गए डंडो पर सात-आठ फीट ऊँचाई तक मजबूती से उन लकडियो को बाँध दिया। लकडियो का उसने पूरा एक जाल सा बुन दिया था, और उसके बाहर से दो-तीन फीट की ऊँचाई तक गोलाकार मे  पत्थरो की एक मजबूत दीवार भी खड़ी कर दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उनका वह छोटा सा क्षेत्र एक आदिवासियों के किले जैसी शक्ल मे तब्दील हो चुका था। विमान के पिछले गेट के पास उसने इस तरह से  लकडियो और घास-फूस का झोपडी नुमा किचन भी तैयार कर लिया था कि अगर झोपडी के बाहर वाले लकड़ी के गेट को बंद कर दिया जाए तो विमान के अन्दर से कोई भी बिना किसी डर के किचन तक आ जा सके। केसिना भी हालात के मुताविक विक्रम के साथ पूरा सहयोग कर रही थी, और मन-ही मन उसकी बहादुरी और हिम्मत की कायल हो चुकी थी। वह मन ही मन उसे चाहने और उससे प्यार भी करने लगी थी। दो बड़े-बड़े पत्थरो का एक चूल्हा भी बिक्रम ने उस झोपडी के अन्दर बना डाला, और फिर दो और बड़े चौकोर पत्थर पास मे से लुड्काकर उस झोपडी के अन्दर ले आया, ताकि उन्हें बेंच की तरह बैठने के लिए इस्तेमाल किया जा सके। यह सब कर लेने के बाद उसने केसिना को समझाया कि आग इंसान की जिंदगी का एक बहुत ही अहम् हिस्सा है, और अभी हमारे पास आग जलाने के लिए सिर्फ़ यह मिनी लाईटर ही है। कल अगर इसकी भी गैस ख़त्म हो गई, या फिर यह ख़राब हो गया तो समझो हम कहीं के नही रहेंगे, इसलिए इस चूल्हे पर मैं जो आग जला रहा हूँ,  हमें कोशिश करनी होगी कि जब तक हम यहाँ है , यह कभी न बुझने पाए , इसके लिए इस जंगल मे हमारे पास प्रचुर मात्रा मे इंधन उपलब्ध है। केसिना ने उसकी बात का समर्थन यह कहकर किया कि हाँ, तुम ठीक कह रहे हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्यो-ज्यो दिन गुजरने शुरु हुए, केसिना के माथे पर चिंता की लकीरे भी बढती चली गई। खाना ख़त्म और वासी होता जा रहा था, सिवाय किसी दैविक चमत्कार के, किसी तरह की कहीं से कोई मदद आने की उम्मीद करना भी बेफजूल था।केसिना ने पैंट्री में मौजूद खाने पीने की सामग्री का स्टॉक गिना।अब सिर्फ़ कुछ चाय, कॉफी के पैकेट्स, पाँच पैकेट नमक के, दो बड़े पैकेट दूध के पाउडर के और कुछ डिब्बाबंद खाना बचा रह गया था। बचे हुए ब्रेड और सैंडविच पर गंध आने लगी थी, अतः उसने वह फेंकना ही मुनासिब समझा। विक्रम के दिन मे दो बार उसके घावों की मरहम पट्टी का ही नतीजा था कि केसिना भी अब लगभग पूर्णतया स्वस्थ हो गई थी, घाव भरने लगे थे। उन विषम परिस्थितियों का जिस तरह डटकर विक्रम मुकाबला कर रहा था, उस तरह का इंसान केसिना ने पहले कभी नहीं देखा था, और इस बात ने उसके अन्दर भी जीवन जीने की एक जागृति पैदा कर दी थी। अतः उसने वहाँ मौजूद  सामग्री को तरतीब से एक अच्छी गृहणी की तरह संभालना शुरु कर दिया था। विक्रम भी केसिना के जागते हौंसलों से प्रसन्नचित था। वह हर वक्त यही कोशिश करता कि वह खुश रहे और पुरानी यादो मे गुम होकर दुखी न हो जाए। इस समय यही वक्त की प्राथमिकता थी कि पिछली जिंदगी को भूलकर जितना भी उचित वक्त आगे जीने के लिए मिलता है उसे जिया जाए, क्योकि वहाँ हर एक पल एक अनिश्चितता से घिरा हुआ था कि कब क्या हो जाए। दिन का हल्का भोजन कर जब दोनों बाहर कीचन मे बैठे थे तो केसिना यह जानते हुए भी कि विक्रम पहले ही उसे अपने परिवार के बारे में  बता चूका है, एक बार फिर से पूछ बैठी कि विक्रम के घर मे कौन कौन है। विक्रम थोड़ा उदास हुआ और फिर उसने बताया कि घर पर उसके माँ-बाप, भाई-बहिन और पत्नी नेहा तथा एक दो साल का बेटा है। उसने बताया कि उसकी पत्नी नेहा उसे बहुत चाहती है और जी-जान से प्यार करती है। अगर अब तक उसके पास इस हादसे की ख़बर पहुँच गई होगी तो न जाने वह किस हाल मे होगी? नटखट बेटा तेजा न जाने किस हाल मे होगा, यह कहकर विक्रम की आँखे नम हो गई थी, केसिना ने आगे बढ़कर उसको अपने सीने से लगा दिया और उसे सांत्वना देने लगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिषम परिस्थितियों के बावजूद, विक्रम के प्रति केसिना के दिल मे प्यार हिलौरे भर रहा था, केसिना किचन मे एक ऊँचे पत्थर पर बैठी थी और विक्रम जमीन पर, केसिना ने विक्रम का सिर अपने एकदम करीब  खींच लिया और उसके माथे और बालो पर हौले-हौले हाथ फेरने लगी । विक्रम को भी उसका इस तरह  का व्यवहार अच्छा लगा  था और उसे शकुन पंहुचा रहा था। कुछ देर बाद उसी मुद्रा मे केसिना ने विक्रम के कानो पर अपना मुह ले जाकर  धीरे से कहा" या त्येब्या ल्युब्ल्यु", विक्रम ने कहा, व्हाट? तुम क्या कह रही हो, मैं कुछ समझ नही पाया? केसिना ने थोड़ा  हंसते हुए फिर वही शब्द दूसरी तरह से दुहराए "या लिउब्लिऊ तेबिया" ! विक्रम उसकी तरफ़ को सीधा घूम गया और फिर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखते हुए बिना कुछ कहे हाथ और उंगलियों को घुमाते हुए उसकी तरफ़ यह इशारा किया कि वह जो कुछ कह रही है, वह नही समझ पा रहा है। केसिना ने  कहा बुद्दू! मैं रुसी भाषा मे कह रही थी कि आई लव यू। विक्रम उसकी बात सुन थोड़ा मुस्कराया और फिर उसके सिर पर गोल-गोल उंगलिया घुमाते हुए बोला, आई टू।  अब दोनों आपस मे पूरी तरह खुल गए थे, और फिर इसी सिलसिले को आगे बढाते हुए  केसिना ने विक्रम को पूछा कि  तुम्हारी भाषा में 'आई लव यू' को क्या कहते है? विक्रम ने उसे बताया कि हमारे यहाँ इसको इस तरह कहते है कि ‘मैं तुमसे प्यार करता हूँ, या करती हूँ। केसिना मन ही मन उस वाक्य को रटने लगी थी, फिर उसने बताया कि वह तीन भाषाओ मे यह कहना जानती थी, अब एक और जुड़ गई है। विक्रम ने उससे तीसरी भाषा के बारे मे पूछा तो उसने बताया कि हालांकि वह स्पेनिश भाषा नही जानती मगर उसकी सहेली ने उसे सिखाया था कि स्पेनिश मे 'आई लव यू' को 'ते कुइएरो' कहते है, तो इस तरह रुसी , इंग्लिश, स्पेनिश के बाद अब वह हिन्दी मे भी आई लव यू बोलना जानती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्ही पलो के बीच  में केसिना ने जब विक्रम से कहा कि उनके पास वहा मौजूद खाना ख़त्म होने को आया है अतः वह अब आगे क्या सोच रहा है ? तो एक पल के लिए पुनः विक्रम को नेहा की याद आ गई और उसकी आँखे नम हो गई। उसे लगा मानो उस पल  नेहा ही उसके सामने बैठी, यह कह रही हो कि घर मे फलां-फलां सामान ख़त्म हो गया है और अगर मार्केट जाओगे तो लेते आना । फिर अपने को सँभालते हुए उसने केसिना के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और ऊपर की ओर ऊँगली करते और गर्दन को उठाते हुए बोला कि ऊपर वाला कोई न कोई रास्ता सुझा ही देगा, तुम फिक्र मत करो। अब शाम होने वाली थी, अतः उसने केसिना को अपने बनाए हुए धनुष और तलवार से वार  करना सिखाया। अगले दिन सुबह स्व-निर्मित तलवार, धनुष और बरछा उठाकर, एक तलवार और बरछा केसिना के भी हाथ में थमाकर, चौकन्ने रहते हुए वे दोनों करीब सौ-सवा सौ मीटर दूर बह रही उस छोटी सी नदी की ओर चल पड़े। बड़ी सावधानी से आगे बढ़ते हुए वे उस चौडी मगर कम गहरी ढलान वाली उस नदी तक पहुंचे, और यह देख विक्रम केसिना की ओर देखते हुए खुशी से झूम गया कि उस पहाड़ी नदी के तालाब  मछलियों से पटे पड़े थे। वह विमान के खाने को केसिना के साथ खाते वक्त  यह तो जान ही चुका था कि केसिना भी मांसाहारी है अतः उसने केसिना के कंधे पर बाजू टिकाते हुए पास के तालाब की ओर इशारा करते हुए कहा, देखो! मैं कहता था न कि ऊपरवाला कोई न कोई रास्ता सूझा ही देगा। हमें शिकार के लिए कहीं ज्यादा दूर जाने की जरुरत भी नही पड़ेगी । फिर तालाब से उन्होंने दो जिन्दा मछलियाँ पकडी और जल्दी से वापस बसेरे की ओर चल पड़े। वापस पहुँच विक्रम ने वहाँ बाहर पड़ी ट्रोली की तीनो ट्रे  को उसके पेंच खोलकर अलग किया, ताकि उसे कढाई और अन्य वर्तनों की तरह इस्तेमाल किया जा सके। और फिर केसिना को कहा कि अन्दर खाली पड़ी पानी की बोतलों को वह कही फेंके नही, क्योंकि वे नदी से पानी लाने और जमा करने के काम आएँगी। फिर विक्रम ने मछलियों के तलवार से टुकड़े किए और उन्हें उबालने के लिए उस ट्रे मे चूल्हे पर रख दिया, केसिना मन ही मन उसके दिमाग की तारीफ़ करते नही थकती थी। उसको बड़े ही चाव से मछलिया पकाते देखते हुए केसिना ने बताया कि उसकी माँ भी एक बहुत अच्छी कूक है। हालांकि वह ख़ुद खासकुछ अच्छा पकाना नही जानती, मगर रूस मे महिलाओं को छोटी उम्र से ही तरह तरह के व्यंजन बनाना सिखाया जाता है इसलिए उसकी मम्मी इस काम मे बहुत ही निपुण है और बहुत अच्छे और स्वादिष्ट पकवान बनाती है। उसकी बात सुन विक्रम चुटकी लेते हुए बोला, फिर तो हमें जल्दी तुम्हारी मम्मी के पास पहुंचना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन बीते, महीने बीते, जहाँ शुरु के दिनों मे एक-एक दिन सालो जैसा लगता था, जिंदगी रेगिस्तान  जैसी बीरान नजर आती थी, वह धीरे-धीरे हालत के मुताविक अब कुछ हद तक सामान्य हो चली थी। दोनों ने काफ़ी मस्सकत के बाद अपने को कुछ हद तक परिस्थितियों मे ढाल दिया था।विमान के अन्दर, खाली वक्त मे दोनों उस हिस्से मे मौजूद सभी ओवरहेड लोकर्स को एक-एक कर खोल चुके थे और उन विमान यात्रियों के सामान को देखकर फिर भाव-विभोर हो जाते, जो अपना सब कुछ छोड़ गए थे। थैलों मे पड़ी और सीटो के पीछे रखी सारी की सारी मैगजीन को वो एक-एक कर कई बार पढ़ चुके थे। कभी जब रातो को नींद नही आती थी तो दोनों अपने साथ लाये डिजीटल कैमरे की स्क्रीन की रौशनी मे मैगजीन पढने लगते थे। मोबाईल फोन की बैटरी तो शुरु मे ही ख़त्म हो गई थी, लेकिन डिजीटल कैमरे मे सेल होने की वजह से वह अभी तक साथ दे रहा था और साथ ही कुछ और बैटरियां उनको अन्य यात्रियों के सामान मे मिले कैमरों इत्यादि से भी मिल गई थी। इन वीरान घने जंगलो मे बस वो दोनों ही तो थे, और कोई नही।  केसिना कब अपना सर्वस्व विक्रम को समर्पित कर बैठी, उसे भी पता न चला। अब वह उम्मीद से भी थी, उसने जब यह बात विक्रम को बताई  और साथ ही विक्रम से मजाक करते हुए कहा  कि वह उसके बच्चे की माँ तभी बनेगी जब वह उससे अपनी उसी हिन्दुस्तानी रीति से शादी करेगा, जो कभी उसने लन्दन में एक बॉलीवुड फ़िल्म में देखी थी। तो इसपर विक्रम ने झट से कहा था कि इसमे कौन सी अनोखी बात है, अभी किए देता हूँ, और फिर उसने आस-पास के पौधों से जंगली फूल इकठ्ठा किए थे और उसकी दो मालायें बना एक दूसरे के गले मे डाली थी फिर मजाक के तौर पर उसने बाहर खुले मे बीच मे लकडियो की एक होली जलाकर अपना कुर्ते का पल्लू केसिना के कुर्ते के पल्लू से बाँध कर सात फेरे लिए और बीच-बीच मे चुटकी लेते हुए ख़ुद ही पंडित भी बन जाता था, और केसिना को एक किनारे बिठा देता और ख़ुद पल्लू खोलकर अग्निकुण्ड के समीप बैठकर कुछ फूल उस अग्नि में डालता और मंत्रोचारण करता। केसिना उसकी इस बच्चो जैसी हरकत से काफ़ी प्रसन्नचित थी और यह सब  देख जोर- जोर से हंस देती थी। यह सारा ड्रामा ख़त्म करने के बाद विक्रम केसिना को बाँहों मे  भरकर खूब रोया था। केसिना भी उसकी मन की स्थिति खूब समझती थी इसलिए उसे समझाती और उसका मन बहलाने की कोशिश करती।अपने पास मौजूद स्वचालित डिजीटल कैमरे से केसिना ने इस शादी के फेरो की एक विडियो भी बना डाली थी। विक्रम को दुखी न होने देने के लिए वह कभी-कभार इस तरह से भी ब्लैक मेल करती  कि अगर वह दुखी हुआ, अथवा रोया तो वह भी जोर-जोर से रोना शुरु कर देगी । विक्रम उसकी इस धमकी से सहज हो जाता और फिर खुश दीखने या हंसने के लिए कोई न कोई बचकानी हरकत कर बैठता। ऐंसा ही उसने केसिना के साथ फेरे लेने के बाद भी किया। इस खुशनुमा मौसम को जी भर जीने के लिए उसने केसिना को  उठा कर कंधे पर रख दिया और  नाचते हुए यह गाना गाया ; &lt;br /&gt;तकदीर ने इस  प्यार के  खातिर  घर से उजाड़ दिया&lt;br /&gt;क्या छप्पर फाड़ दिया मेंरे मौला, क्या छप्पर फाड़ दिया&lt;br /&gt;मिली मुझे इक रुसी हसीना, इस वीराने जंगल में&lt;br /&gt;और जगा दी चाह जीने की मेरे इस मन-मंगल में&lt;br /&gt;दुःख के भव-सागर में खुश रखने का क्या जुगाड़ किया&lt;br /&gt;क्या छप्पर फाड़ दिया मेंरे मौला, क्या छप्पर फाड़ दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने  भी  बसाया  था  घर , एक  अपनी शान का&lt;br /&gt;और बना था मैं भी सहारा   इक  नन्ही  जान का&lt;br /&gt;पर  तुने  खुशी  संग मुझे दुखो का  ऐसा पहाड़ दिया&lt;br /&gt;क्या छप्पर फाड़ दिया मेंरे मौला, क्या छप्पर फाड़ दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं  भी  जीने  को  आतुर  था, कुछ  पल शकुन के&lt;br /&gt;निकल  आते  है  अब तो आँखों  से आँशु  खून  के&lt;br /&gt;सरपट भाग रहे थे हम और किस्मत ने  पछाड़ दिया&lt;br /&gt;क्या छप्पर फाड़ दिया मेंरे मौला,  क्या छप्पर फाड़ दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाँद निहारे चुपके- चुपके, या फिर धुप खिली हो आँगन में,&lt;br /&gt;पतझड़ हम पर फूल विखेरे या हम भीग गए हो सावन में,&lt;br /&gt;प्यार करे हम वीराने में जी भर ,  ऐंसा जंगल-झाड़ दिया&lt;br /&gt;क्या छप्पर फाड़ दिया मेंरे मौला,  क्या छप्पर फाड़ दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इस प्रकार अब दोनों एक दूसरे  के जीवन साथी बन चुके थे, रोज की दिनचर्या के हिसाब से दोनों पास की नदी में जाते, नहा-धोकर, मछलियां पकड़ते और फिर बसेरे पर लौट आते। कभी-कभार विक्रम, भोजन में बदलाव के लिए खरगोस और अन्य छोटे किस्म के जंगली जानवर का भी शिकार कर लाता, प्रयोग के तौर पर कभी वे भोजन में बदलाव के लिए जंगल के पेड़-पौधों, झाडियों की वनस्पति भी पका कर खा लेते। शिकार के लिए केसिना, विक्रम को कभी भी अकेले नही जाने देती थी , वह हमेशा उसके साथ रहती और एक दिन रात को उसने विक्रम को अपने मन की वह बात भी बता डाली थी कि उसने निश्चय कर रखा है कि  भगवान् न करे,  अगर किसी दिन विक्रम  को कुछ हो गया तो उसी दिन वह भी अपनी जीवन लीला समाप्त कर देगी। विक्रम ने उसका सिर सहलाते  हुए कहा था कि पगली, मेरी भी वही स्थिति है, अगर तुझे कुछ हो गया तो, क्या मैं अकेला जी पाऊंगा? दोनों ही इतने सीमित तरीके से खाते थे कि बस जिन्दा रहने के लिए जो जरुरी होता है। विक्रम, केसिना के खाने का विशेष ध्यान रखता था। उन जंगलो में फल के नाम पर सिर्फ जंगल  में उगने वाला छोटे किस्म का केला ही मिलता था,  कभी कभार वे उसका भी सेवन कर लेते थे। मगर शायद जब से वे इस मुकाम पर मिले थे, दोनों ने कभी भी भरपेट भोजन नही किया था और स्वस्थ रहने के लिए उन हालातो में यह जरुरी भी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; विक्रम ने यह भी नोट किया कि आस-पास रहने वाले जंगली जानवर अमूमन उनके इलाके में कम ही फटकते थे। साथ ही वह यह देखकर ख़ुद की किस्मत पर हँसता भी था कि हालात इंसान को जैसा देश वैसा भेष के हिसाब से कितनी जल्दी ढल जाने पर मजबूर कर देते है। वातावरण में बहुत ज्यादा नमी और उमस की वजह से केसिना  कम कपड़े पहनती थी, और जब महीनो से उलझे हुए घुंघराले खुले-बिखरे बालो के साथ वह नदी में मछलिया पकड़ रही होती थी, तो थोड़ा दूर से देखने पर ऐंसा लगता था, जैसे आदिम जाति की कोई महिला मछलिया पकड़ रही हो। यही हाल उसका भी था, दोनों की त्वचा भी अब हल्का सावला रंग लेने लगी थी।केसिना के विखरे बालो पर जब विक्रम का ध्यान गया था तो उसने तुंरत ठान ली थी की वह उसके लिए जल्दी ही एक कंघी बना डालेगा और फिर उसने घर पर बैठ  जब एक चौडी चपटी लकड़ी पर तलवार से खांचे बना बना कर उसे कंघी की शक्ल देनी शुरु की तो केसिना बोली, बुद्दू ये क्या कर रहे हो, मेरे पास पहले से ही बैग में कंघी है लेकिन मैं जान बूझकर उसे इस्तेमाल नही करती, इस जंगल में कौन हमारे बालो को देख रहा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, अब  सब कुछ भगवान् भरोसे ही चल रहा था, जिस जगह पर वे आकर गिरे थे, उस जगह की भोगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वे नीचे जमीन के धरातल से मुश्किल से ५० मीटर दूर आगे तक भी ठीक से नही देख पाते थे। वो तो खुशकिस्मती से वह दोनों साथ थे इसलिए किसी तरह समय व्यतीत हो रहा था, अगर उनमे से कोई एक ही अकेला उस जगह पर होता तो वह खुद ही पागल हो जाता। इस बीच विक्रम को एक और अप्रत्याशित घटना देखने को मिली। प्रसव के आखिरी महीनों में जब केसिना एक-दो बार अस्वस्थ रही तो वह केसिना को घर पर ही छोड़कर, ख़ुद ही नदी तक शिकार पर जाया करता और जितनी जल्दी हो सके भोजन का वन्दोवस्त कर तुंरत लौट आता था। कुछ हफ्तों से पास ही की झाडियो और पेडो के झुरमुट  में चिम्पैंजी का एक झुंड आकर ठहरा हुआ था। विक्रम जब भी बाहर जाता, केसिना को हिदायत दे देता कि वह दरवाजा बंद रखे ताकि कोई चिम्पांजी अन्दर न आने पाये, साथ ही वह इससे चिंतित भी रहता, मगर केसिना और उस झुंड के एक मादा चिम्पैंजी, जो कि शायद उस झुंड की मुखिया थी, के बीच दोस्ती हो गई थी। हुआ यूँ कि जब भी वह मादा चिम्पैंजी उनके घर के पास आती, केसिना अन्दर से बचा हुआ मछलियों और जानवरों का उबला और भुना हुआ मांस, उसके पास पत्ते में रख देती, चूँकि वे विमान में पड़े नमक के उन ५-६ पैकेटों  को बड़ी किफायत के साथ इस्तेमाल कर रहे थे, पकाने में न डाल वे मांस को उबल जाने के बाद उस पर हल्का नमक छिड़कते थे, इसलिए अभी भी ४ पूरे पैकेट बचे हुए थे। चिम्पैंजी को शायद उसी का स्वाद लग चुका था, अतः वह रोज केसिना के पास आ जाती और घंटो वहीँ बैठी रहती। बाकी चिम्पैंजियों का दल भी आस पास ही खेलता कूदता। कुछ ही दिनों में वह पूरा का पूरा दल मानो इन लोगो से पूर्णतया घुल-मिल चूका था और जैसे पहले, जब कभी विक्रम बाहर से अन्दर या फिर अन्दर से बाहर जाता था तो उसे देख ये चिम्पैंजी भागकर इधर-उधर पेडो के तनो के अगल बगल बैठ जाते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने डरना बंद कर दिया था और बेझिझक वही पर डटे रहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस रोज तो विक्रम और केसिना के भी आश्चर्य का ठिकाना नही रहा, जब एक दिन शाम को वह मादा चिम्पैंजी दो मरी हुई जल मुर्गिया लेकर उसके पास आई और उसके गेट के सामने रख कर चली गई। वे दोनों समझ गए कि यह चिम्पैंजी क्या चाहती है। विक्रम हालांकि अपने लिए दिन में ही रात के भोजन का बन्दोबस्त करके  रखा था, फिर भी उसने चाव से उन मुर्गियों को अंगारों में भुना और एक को दोनों ने खाया तथा दूसरी मुर्गी को भूनकर उस चिम्पैंजी के लिए रख दिया। अगले दिन जब चिम्पैंजी फिर से आई तो केसिना और विक्रम ने वह तंदूरी मुर्गी उसके पास रख दी, मुर्गी हाथ में ले चिम्पैंजी ने मुह से दो तीन जोर-जोर की आवाजे निकाली। थोडी देर में उसके साथी चिम्पैंजी भी आ गए थे। उन तीन-चार जिम्पैंजियो ने मिल बांटकर बड़े चाव से वह खाया और फिर कुछ देर के बाद वापस जंगल में चले गए। इसके बाद अगले दिन वह फिर से एक छोटा हिरन मारकर लाये और उसे भी केसिना के आगे पटक दिया। विक्रम का आज एक तरह से  छुट्टी का दिन था क्योंकि कल की लायी हुई दो मछलिया अभी अन्दर पड़ी थी और ऊपर से हिरन भी आ गया था। उसने बड़ी तसल्ली से हिरन का मांस बनाया और चौडे-चौडे पत्तो में  रखकर वहाँ मौजूद सभी चिम्पैंजी को अलग से वह मांस परोसा। अब तो यह एक सिलसिला सा बन गया था, विक्रम को भी मानो बीच-बीच में अवकाश मिलने लगा था, क्योंकि चिम्पैंजी शिकार करके  घर पर ही लाकर उसका काम आसान कर जाते थे। वह मादा चिम्पैंजी तो अब इतनी ढीठ हो गई थी कि बाड़े को पार कर अन्दर केसिना के पास आ बैठती और घंटो उसके पास ही बैठी रहती। केसिना भी उसकी पीठ और सिर पर अपनी उंगलिया रगड़ती तो वह उसके आगे चौडी होकर, जमीन पर पैर पसार कर लेट जाती। आराम के पलो में विक्रम यह सब देखकर यही सोचने लगता कि वाकई में वह कहावत उन दोनों पर  कितनी फिट बैठती थी कि 'जाको राखे साइयां, मार सके न कोई' ! इन विषम परिस्थितियों में कैसे उनकी सीमित ज़रूरत की लगभग सारी चीजे उन्हें प्राप्त हो गई, वह वाकई चकित करने लायक था। कभी वह सोचता कि इन घने जंगलो से बाहर निकलने के लिए वह जान की बाज़ी लगा दे, किंतु फिर बहुत से ख्याल उसे पैर पीछे खींचने पर मजबूर कर देते थे। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आख़िर वह दिन भी आ ही गया जिसका दोनों को बेसब्री से इंतज़ार था, और साथ ही दोनों को अन्दर ही अन्दर मानो किसी घातक बीमारी की तरह खाए भी जा रहा था। उन्हें विचलित कर रहा था कि क्या होगा और कैसे होगा? अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो वो कहा दौड़कर जायेंगे? सिवाय भगवान् के और किससे मदद की गुहार लगायेंगे ? और अगर बात हाथ से निकल गई तो...? हे भगवान्! विक्रम अपने बालो को नोच लेता और माथा पकड़ कर बैठ जाता। रात से ही केसिना दर्द महसूस कर रही थी, विक्रम रातभर जागता रहा और उसके सिर और हाथो को अपने हाथो से सहलाते हुए, बस धीमे स्वर में  कोई  पुराना गीत  गुन-गुनाता रहा था । इसी कसमकस में भोर हो गई थी, और कुछ देर बाद सूरज भी चढ़ आया था। केसिना की दर्द के मारे छटपटाहट और कराहे भी बढती जा रही थी, उसकी कराह सुनकर चिम्पैंजी का पूरा का पूरा झुंड भी लाईन लगाकर खामोश बाहर बैठा हुआ था, मानो इन्हे सब पता हो कि क्या होने जा रहा है, बीच-बीच में मादा चिम्पैंजी पैरो के बल खड़ी होकर अन्दर भी झाँक लेती थी और कभी विक्रम के उदास और चिंतिति चेहरे पर एक टक देखने लगती थी। विक्रम फर्श पर बैठा केसिना के सिर को अपनी गोदी में रख उसके माथे को सहलाते हुए  रुक-रूककर  वही गाना गुनगुनाये जा रहा था,  फिर केसिना ने एक जोर की कराह भरी  और तुंरत बाद एक नन्हे मेहमान की रोने की आवाज ने पूरे वातावरण को खुशनुमा कर दिया था। विक्रम हालाकि केसिना की कराह से इस कदर डर गया था कि उसकी बस जान निकलते निकलते रह गई, क्योंकि केसिना उसके तुंरत बाद बेहोश हो गई  थी।  मगर  कुछ  देर  बाद जब  विक्रम  ने उसके मुह  पर पानी के  छींटे मारे और बोतल के ढ्क्कन से  थोड़ा पानी लेकर उसके मुह में उडेला तो उसने आँखे खोल दी थी,और तब जाकर ही विक्रम की जान मे जान आयी और वह उस नन्हे मेहमान की ओर ठीक से देख पाया था। नन्हे मेहमान के रोने की आवाज सुनकर जैसे चिम्पैंजी ने पूरे जंगल में कोहराम मचा दिया था, वे इधर से उधर भाग रहे थे और अपने ऊपर घास फूस उछाल रहे थे, जैसे कि मानो नन्हे मेहमान के आने और सब कुछ ठीक-ठाक निपट जाने पर अपनी खुसी का इजहार कर रहे हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, ऊपर वाले की कृपा से यहाँ भी सब कुछ ठीक-ठाक ही निपट गया था। विक्रम बार-बार ईश्वर को याद कर हाथ जोड़ उसका शुक्रिया अदा कर रहा था। उसके और केसिना के पहले बच्चे ने उसकी ही हथेलियों में इस धरा को अपना पहला नमन किया था। चिम्पैंजी के व्यवहार को देख विक्रम को मानो अब इस जंगल की जिंदगी से मोह सा होने लगा था। अपने नन्हे मेहमान को अपनी बाहों में पा, कुछ देर के लिए उसकी आँखों से आंसू भी छलक आए थे क्योंकि उसे अपने बेटे तेजा की याद आ गई थी, जब तेजा हुआ था तो किस तरह उसने घंटो नर्सिंग होम  के कमरे के बाहर खड़े रह कर उस एक-एक पल को गुजारा था, और तब नर्स ने आकर उसको यह खुसखबरी सुनाई थी। फिर जब वह अन्दर गया था तो कैसे नेहा ने उसे ठेंगा दिखाया था कि उसकी जीत हुई है,  क्योंकि वह लड़का चाह  रही थी जबकि विक्रम लड़की  की उम्मीद कर रहा था। धीरे-धीरे सब पटरी पर आने लगा था, विक्रम हर वक्त केसिना और नन्हे-मुन्ने की सेवा भक्ति में ही लगा रहता, खाने का वन्दोवस्त अमुमन चिम्पैंजी कर लेते  थे। पांचवे दिन पर वह  खुद जंगल गया और एक बड़ा सा हिरन मार लाया था और उसने वहाँ मौजूद सभी चिम्पैंजी को भर पेट मांस खिलाया था, मानो बेटे के होने की खुसी में दावत दे रहा हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इस तरह फिर से घाना के उस दक्षिणी प्रदेश के जंगल में जिंदगी की जद्दो-जहद कुछ और आगे बढ़ी। विक्रम ने महसूस किया कि जहाँ एक बेटा मिल जाने से उसके समय को व्यतीत करने के लिए एक नायाब खिलौना भगवान और केसिना की तरफ़ से भेंट स्वरुप मिला था, वहीँ उसने यह भी महसूस किया कि अब वह भावनात्मक तौर पर ख़ुद को काफ़ी कमजोर भी महसूस करने लगा है। पहले जहाँ दिल में  मरने-मारने  का कोई विशेष खौफ नही रहता था, वहीँ अब बच्चे के आने के बाद से कुछ डर सा मन में घर कर रहा था। दिन गुजरे, बेटे और चिम्पैंजी के झुंड के नटखट व्यवहार को निहारते-निहारते कब डेड बर्ष गुजर गया, पता ही नही चला। समय का अहसास उन्हें तब हुआ जब केसिना ने एक बार फिर से उम्मीद से होने की बात विक्रम को बताई। यह सुनकर विक्रम सिर्फ़ मुस्कुरा भर दिया था और उसके सिर को सह्लाया। विमान के उस भाग में मिले अन्य यात्रियों के सामान में से उन्हें अगले कई सालो के लिए पहनने के कपड़े मिलगये थे, लेकिन उनमे ऐसा कोई कपड़ा नही था जो बच्चे के पहनने के काम आ सके। काफी दिमाग लगाने के बाद दोनों ने एक फैसला लिया। कुछ बड़ी कमीजों को फाडा गया, बाजुवो को अलग कर, कमीज के आगे और पीछे के पल्लुवो को दो अलग भागो में बाँट कर फिर उसे बच्चे की कमीज के नाप में तलवार से काट कर अलुमिनियम की ख़ुद की बनाई एक मोटी सुई से तुलप दिया और  बाजुवो का उसके लिए तहमत या लंगोट बना डाला। जब वे लोग शिकार पर जाते तो पैराशूट के बचे हुए चिकने मजबूत  कपड़े से विक्रम उसको आदिवासियों की तरह अपनी पीठ पर बाँध देता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले बेटे के दो साल के होने पर एक बेटी भी घर में आ गई थी, उसकी बारी भी वही सारी स्थिति उन दोनो के सामने रही, जो बेटे के समय रही थी। हां, चूँकि अब चिम्पैंजी पूरे परिवार से अच्छी तरह घुल मिल गए थे, इसलिए अबकी बार वे भी एकदम विमान के गेट पर ही आकर बैठ जाते थे। चूँकि बेटे के होने के बाद उसका नाम विक्रम ने हिन्दुस्तानी तर्ज पर प्रेमवन रखा था, जिसका मतलब था कि वह उन्हें वन में एक दुसरे के प्रेम के तौर पर  मिला था, इसलिए विक्रम ने उसका नाम प्रेमवन रखा था। अबकी बार बेटी के होने पर विक्रम ही उसका भी कोई हिन्दुस्तानी नाम रखना चाहता था मगर जिद्दी केसिना ने पहले ही शर्त रख ली थी कि चूँकि लड़के का नामकरण विक्रम ने किया था इसलिए बेटी का नामकरण वह करेगी। अतः पहले से सोचे नाम के मुताविक केसिना ने उसका नाम रुसी परम्परा और नामो के मुताविक कैरिना रखा था, विक्रम के पूछने पर उसने उसे बताया कि कैरिना शब्द ग्रीक भाषा  के शब्द ‘करेन’ से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है शुद्ध। बेटी के नामकरण पर भी विक्रम ने जी भरकर चिम्पैंजी के झुंड को दावत दी थी, इस जंगल में अब वही एक तरह से उनके नाते रिश्तेदार बनकर रह गए थे। दोनों पार्टियों के बीच अब इतना विश्वास बन चला था कि जब कभी केसिना और विक्रम को पास की नदी से पानी इत्यादि के लिए जाना पड़ता था तो वे विमान के उस हिस्से के अन्दर बच्चो को किवाड़ बंद कर, बाहर से चिम्पैंजी के भरोसे छोड़कर भी चले जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे अब धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे थे, विक्रम को उनके भविष्य की चिंता खाने लगी थी, वह दिन रात उस जंगल से बाहर निकलने के तरह-तरह के विकल्पों के बारे में सोचता रहता था, लेकिन बहुत सोच बिचारने पर भी बच्चो और केसिना के प्रति जंगली जानवरों का भय उसे किसी अंजाम तक नही पहुँचने देता था। कभी वह सोचता कि काश अगर ये चिम्पैंजी उसकी भाषा समझ पाते या फिर वह उनकी भाषा बोल पाता तो वह इनसे जरूर यह निवेदन करता कि किसी तरह उन्हें वह इस जंगल से निकलने में मदद करे। केसिना भी बच्चो की पढाई और उनके भविष्य के बारे में चिंतित रहने लगी थी, विमान के उस हिस्से में मिले कुछ और लोगो के सामान में से उन्हें कुछ नोट-बुक और किताबे भी मिली थी, साथ ही विमान की सीटो के पीछे की जेबों  में भी उन्हें बहुत सी पेन पेन्सिल और नोट बुक तथा मैगजीन प्राप्त हुई थी। विक्रम और केसिना एक जागरुक माता-पिता की तरह अपने बच्चो को उन नोट बुक पर पढ़ना-लिखना सिखा कर अपनी तरफ़ से उन्हें शिक्षित करने की  भरपूर कोशिश कर रहे थे। विक्रम अंग्रेजी, हिन्दी  और गणित सिखाता तो केसिना अंग्रेजी और रुसी भाषा उन्हें सिखाती। केसिना ने तो विक्रम से हिन्दी भाषा का पिछले साढे तीन सालो में काफी अच्छा ज्ञान हासिल कर लिया था। जब वह बच्चो को दिन में रुसी भाषा सिखा रही होती थी तो विक्रम भी रुसी सीखने के लिए बच्चो के साथ बैठ जाता था। केसिना बच्चो को बेसिक बातें सिखाने के बाद विक्रम को भाषा की बारीकिया भी बताती कि रुसी भाषा एक खड़ी बोली के समान है और सपाट बोली जाती है जैसे कि  नम्रता वाली अंग्रेजी भाषा में हम कहते है कि 'क्या आप कृपा कर मुझे एक गिलास पानी देंगे?' तो रुसी भाषा में इतना लंबा न जाते हुए  सीधे कहा जाता है ' कृपया एक गिलास पानी दो!' अंग्रेजी भाषा के 'बी' को रुसी भाषा में 'भी' उच्चारित किया जाता है। इसी तरह 'ई' को 'ये' , 'एच' को 'एन', 'सी' को 'सै', व्हाइ को 'ऊ' और 'एक्स' को 'एच' उच्चारित किया जाता है। लिखते वक्त जहा 'या' शब्द प्रयुक्त होता है वहा अंग्रेजी वर्णमाला का 'R' प्रतिविम्बित या उल्टे रूप में लिखा जाता है साथ ही अंग्रेजी भाषा के 'डब्लू' को 'श' की तरह इस्तेमाल करते है। केसिना ने धीरे-धीरे रुसी भाषा की ऐसी ही अनेक बारीकिया और जानकारिया उनको समझा दी थी, और कुछ हद तक विक्रम भी रुसी भाषा लिखने पढने लगा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फरवरी २००८, इस हादसे को हुए अब करीब आठ साल गुजर चुके थे, बेटा प्रेमवन अब तकरीबन साढ़े छः साल का और बेटी कैरिना ४ साल की हो गई थी। कैरिना उस दिन थोड़ा अस्वस्थ थी, उसे तेज बुखार था। विक्रम का फर्स्ट ऐड बॉक्स ऐसे हालात् में काफी काम आता था। हालांकि भोजन की तलाश में जाते हुए अब बच्चे भी ज्यादातर विक्रम और केसिना संग पैदल ही रास्ता तय करते थे, लेकिन नन्ही कैरिना जल्दी थक जाती और पिता&lt;br /&gt; के कंधे पर जा बैठती। चूँकि आज उसकी तबियत ठीक नही थी, अतः विक्रम ने केसिना को घर पर बच्चो के साथ ही ठहरने को कहा था और ख़ुद ही हथियार उठा जंगल को चला गया था। करीब तीन घंटे बाद जब एक खरगोश का शिकार करने के बाद वह वापस ठिकाने पर लौटा तो वहाँ का नजारा देख दंग रह गया। बाहर आहते में दो चिम्पैंजी बेहोश पड़े थे, पास में छुपे बैठे तीन-चार चिम्पैंजी विक्रम को देख, आस पास पड़ी झाडिया, घास-फूस और पत्थर उछाल कर छाती पीटते गुर्राने लगे थे। विक्रम ने केसिना को आवाज लगायी मगर कोई जबाब नही मिला, विक्रम समझ गया कि उसकी अनुपस्थिति में कोई बड़ी घटना घटित हो गई है। वह दौड़कर अन्दर गया तो कोई नही था और वहाँ सब कुछ बिखरा हुआ पड़ा था, वह केसिना और प्रेम का नाम लेकर जोर से चिल्लाया, मगर सब बेकार। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच उसके चिल्लाने से विमान के उस टुकड़े के ऊपरी सिरे  से कैरिना के रोने की आवाजे आने लगी, विक्रम हांपता हुआ तेजी से ऊपर चढा, वहा सिर्फ़ कैरिना ही थी जिसे शायद केसिना ने सुला रखा था। उसको गोदी में उठा, नीचे उतारकर, विक्रम ने आस-पास के पूरे आँगन को और बाहर के इलाके को छान मारा,नन्ही कैरिना से भी उसकी  मा और भैया के बारे मे पूछ्ने की कोशिश की, मगर केसिना और प्रेमवन का कहीं कोई आता-पता नही था। जहाँ पर वह मादा चिम्पैंजी और एक और चिम्पैंजी बेहोश गिरे पड़े थे, वहा पर की स्थिति को देखने से स्पष्ट होता था कि हमलावर के साथ चिम्पैंजी ने काफ़ी संघर्ष किया होगा। विक्रम ने कैरिना को पीठ पर बाँधा और बदहवास सा केसिना को आवाजे मारता हुआ इधर उधर भागने लगा। तभी उसे कुछ सूझा तो वह दौड़कर अन्दर गया और एक पानी की बोतल उठा लाया। मादा चिम्पैंजी के पास पहुँच उसके शरीर को टटोला, उनके उठते पिचकते पेट को देख कर साफ़ था कि उनकी साँसे चल रही थी, पूरे शरीर पर सिर्फ़ दो ही जख्म थे। उसने चिम्पैंजी के मुह पर पानी के छींटे मारे और उन जख्मो पर पानी डाला तो जख्मो से एक सफ़ेद किस्म का तरल पदार्थ बहने लगा। विक्रम समझ गया कि चिम्पैंजी पर हमला किसी मानव ने किया है और जो तीर इस्तेमाल किए गए होगे, उनमे एक ख़ास किस्म का जहरीला पदार्थ लगा होगा जो शरीर पर चुभते ही खून में मिलकर, लगने वाले को बेहोश कर देता है, उसने आस पास पड़े सभी तीर समेटकर अपने पास रख लिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच उसने देखा कि मादा चिम्पैंजी के शरीर में हरकत होने लगी है, उसने तुंरत ही पास ही बेहोश पड़े दूसरे चिम्पैंजी के घावों पर भी पानी डाला ताकि जहर बह जाए, फिर उसके चेहरे पर भी पानी के छींटे मारे। कुछ ही देर में दोनों चिम्पैंजी को होश आ गया, खौफ और गुस्सा उनके चेहरों से स्पष्ट होता था। विक्रम ने पास पड़े एक ट्रे पर बोतल का पानी डाला और चिम्पैंजी के सामने रख दिया। मादा चिम्पैंजी ने ही पानी पिया दूसरे ने नही। विक्रम ने जब हाथो के इशारे से चिम्पैंजी को पूछा की केसिना और प्रेम कहाँ है तो मादा चिम्पैंजी उठ खड़ी हुई और जोर-जोर की आवाजे लगाने लगी, आसपास मौजूद चिम्पैंजी का पूरा झुंड इक्कठा हो गया था। बिना देरी किए ही मादा चिम्पैंजी ने विक्रम का हाथ अपनी ओर खींचा, मानो उसे अपने साथ आने के लिए कह रही हो। विक्रम उसके इशारे को समझ गया था, उसने अपनी तलवार और धनुषबाण उठाये और आगे-आगे मादा चिम्पैंजी और उसके पीछे विक्रम तथा चिम्पैंजी का पूरा झुंड गुर्राते हुए जंगल में एक तरफ़ को तेजी से बढ़ने लगा। मादा चिम्पैंजी इस तरह उस खास दिशा की ओर तेजी से बढ़ रही थी मानो उसको सब मालुम था कि आक्रमणकारी किस ओर गए है। विक्रम चिंतित मुद्रा में आगे आने वाली चुनौतियों के बारे में सोचता, इधर उधर देखता, आगे बढ़ रहा था, कैरिना उसकी पीठ पर ही फिर से सो गई थी। दो घंटे तक लगातार जंगलो के बीच चलते-चलते वो करीब सात-आठ किलोमीटर का सफर तय कर चुके थे।अचानक एक ऊँचे टीले के पास मादा चिम्पैंजी रुक गई, विक्रम आगे कुछ देखने की कोशिश कर रहा था कि दौड़कर  आगे गए दो युवा चिम्पैंजी पुनः दौड़ते हुए वापस आए और गुर्राने लगे, शायद इन सभी को उस हमलावर की गंध महसूस हो गई थी। मादा चिम्पैंजी ने भी एक धीमी गुर्राहट की और विक्रम की तरफ़ देखा, और फिर धीरे- धीरे आगे बढ़ने लगी । &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;करीब दस कदम और आगे बढ़ने पर एक उबड़-खाबड़ पगडण्डी ढलान पर एक छोटी सी घाटी की तरफ़ जाती थी, वहा पहुँच मादा चिम्पैंजी फिर से रुक गई, झुंड के अन्य सदस्य भी बहुत ही धीमी चाल से डरे हुए अंदाज में कदम बढ़ा रहे थे। विक्रम, मादा चिम्पैंजी से कुछ आगे बढ़ नीचे को देखने लगा, और उसने जो नीचे का नजारा देखा तो उसका अंग-अंग गुस्से से फड़कने लगा। अगर उस समय उसके पास कोई बन्दूक होती तो बिना कुछ सोचे वह उन पर हमला कर देता। क़रीब २०-३० मीटर की दूरी पर अफ्रीकी आदिवासी जाति के लगभग आठ लोग  बैठे थे, उनके कुछ के ही शरीर पर टांगो के ऊपर एक खास किस्म का केंट नामक पारंपरिक बुनाई से बुना हुआ कपड़ा लुंगी की तरह पहना हुआ था। कुछ जो युवा किस्म के आदिवासी थे वो लगभग नग्नावस्था में थे। एक ने सिर पर विक्रम की वह कमीज बाँध रखी थी, जो वह उस विमान वाली जगह से उठा लाया था। पास ही केसिना और विक्रम के बैग पड़े थे, उन्हें भी वो लोग वहाँ से अपने साथ उठा लाये थे। केसिना के हाथ पैर सामने से बांधकर, दोनों हाथो और पैरो के बीच से बांस का एक लट्ठा फंसाकर उसे दो पेडो के नोकीले तनो के बीच झुलाया या यूँ कहे कि लटकाया हुआ था, और प्रेमवन को एक उम्रदराज आदिवासी ने ख़ुद पकड़ा हुआ था, जो धीरे-धीरे रोने पर लगा था। विक्रम समझ गया कि चूँकि ये लोग विमान के उस टुकड़े के ऊपरी सिरे में नही गए,  इसलिए सोयी हुई कैरिना को नही देख पाये, नही तो उसे भी साथ ले गए होते। शायद ये लोग यहाँ पर कुछ देर आराम के लिए बैठे थे। उनकी कद काठी और बनावट के हिसाब से विक्रम अंदाजा लगा रहा था कि ये  वहां  के दक्षिण तटीय प्रदेशो में पाये जाने वाली फ़न्ते और ग्यामन जाति के आदिवासी ही होंगे, क्योंकि इनके बारे में विक्रम ने ८-९ साल पहले डिसकवरी चैनल पर एक चलचित्र देखा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम एक अजीब सी कशमकश में पड़ गया था कि क्या करे? उन पर सीधा हमला करना बच्चे और केसिना के लिए भी घातक हो सकता था। और अगर वह उनके सामने जाता है तो वे उसे भी बंधक बना लेंगे, और फिर न जाने किस तरह पेश आए, क्योंकि उसे याद था कि उस डोक्यूमेंट्री में जो उसने टीवी पर काफ़ी साल पहले देखी थी, यह भी बताया गया था कि ये आदिम जाति के लोग इंसानों का मांस भी खाते थे। यह विचार मन में आने पर एक बारी उसके रोंगटे खड़े हो गए थे। कुछ सोचकर उसने धैर्य से ही काम लेने का निर्णय लिया, अतः उसने धीरे-धीरे धनुष पर बाण चढाये और उनकी तरफ़ बढ़ने लगा, उन लोगो के मुह नीचे घाटी की तरफ को थे, अतः वे विक्रम को नही देख पा रहे थे। उनके एकदम करीब पहुँचने पर विक्रम ने जैसे ही गले से एक बनावटी खांसी की, वे एकदम चौंककर खड़े हो गए और सबने अपने हथियार विक्रम की ओर तान दिए। विक्रम बचाव के लिए पहले से ही एक पेड़ के तने की ओंट में था,उसने धनुष पर से अपनी पकड़ ढीली करते हुए उस कबीले के सबसे अधिक उम्र के उस व्यक्ति की ओर चेहरा घुमाया जो प्रेम को हाथ से पकड़े था और उसकी तरह हाथ जोड़कर बोलने और इशारे करने लगा कि वह मेरा बेटा है और मेरी पीठ पर इसकी बहन है। विक्रम सतर्क रहते हुए नीचे झुका और एक बार उसने उसे फिर से अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोड़े। उस व्यक्ति  ने कुछ समझते हुए अपनी भाषा में अपने साथियो को कुछ कहा, शायद हथियार न चलाने का उनको निर्देश दिया था। फिर विक्रम की तरफ़ मुखातिव होते हुए उसने अपनी भाषा में कुछ कहा और हाथ से इशारा करने लगा, शायद वह कह रहा था कि तुम अपने हथियार फ़ेंक दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्रम ने फिर से हाथ जोड़कर उसको केसिना की तरफ़ इशारा करके  हाथो से भिन्न तरह की मुद्राए बनाते हुए, केसिना को खोलने का आग्रह किया, और धनुष एक तरफ़ को बिल्कुल समीप में ही फ़ेंक दिया, ताकि वह यह समझ सके की इसने उसकी बात का सम्मान किया है। विक्रम के इस नुख्से ने काम किया, और कबीले के उस व्यक्ति ने दूसरे को अपनी भाषा में कुछ कहा और उसने केसिना को आजाद कर दिया और साथ ही विक्रम की ओर घूमकर अपनी भाषा में कुछ कहते हुए उन्हें बार बार नीचे घाटी की तरफ़ हाथ की उंगलियों से कुछ इशारा किया। विक्रम ने बिना मौका गवाए झुककर फिर से उसकी तरफ़ हाथ जोड़े। उसने प्रेम को भी छोड़ दिया था और प्रेम दौड़कर रोते हुए अपने पापा के पास आ गया था। कबीले के उस मुखिया ने इशारे से विक्रम को आगे आने को कहा, और विक्रम ने भी तुंरत वैसा ही किया। वह जानता था कि जरा सी चूक से बात बिगड़ सकती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने कुछ लम्हों के लिए जिंदगी को एक बार फिर से भाग्य  के भरोषे छोड़ने का निश्चय कर लिया था, वह जानना चाहता था कि आगे ये लोग क्या करते है, उसके बाद ही वह कोई निर्णय लेगा। एक अपने सदस्य को उसने विक्रम और केसिना के आगे-आगे रहने को कहा और फिर विक्रम और केसिना से इशारो में उसके पीछे चलने को कहा। विक्रम ने एक नज़र ऊपर पेडो के पीछे बैठे  चिम्पैंजी पर डाली, जो पेडो के पीछे रहकर यह सब नजारा देख रहे थे। विक्रम ने उनकी तरफ़ देखते हुए हाथ से उनको इशारा किया और फिर अपने हाथ को मुह पर लाकर चूमा, मानो उनका धन्यवाद अदा कर रहा हो। कबीले के लोग एक बार फिर से उसकी यह हरकत देख कर सतर्क हो गए और हथियार उठा लिए, विक्रम ने पुनः हाथ जोड़े और उनको चिम्पैंजी की तरह इशारा करते हुए इशारो में ही समझाया कि वे चिम्पैंजी है और आपका कुछ नही बिगाडेंगे। कुछ आस्वस्थ होने के बाद कबीले के मुखिया ने अपनी भाषा में कुछ कहते हुए चलने का इशारा किया। केसिना ने भी विक्रम की ही तर्ज पर चिम्पैंजी को हाथ हिला अभिवादन किया।जब वे चलने लगे तो विक्रम ने देखा की वह अधेड़ सा दीखने वाला कबीले का सरदार पैरो से कुछ अपाहिज सा है क्योंकि वह चलते वक्त दोनों टाँगे एक भुजाकार आकृति में जमीन पर रखता था, साथ ही वह यह देखना भी नही भूला कि उन आदिवासियों ने उनके बैग उठाये या फिर वहीँ छोड़ दिए। दो युवा आदिवासियों ने दोनों बैग और एक बड़ा सा हिरन, जिसे वे जंगल से मारकर लाये थे,  उन्होंने उस बांस के लठ्ठे पर लटका  दिए थे ,जिसपर पहले वे केसिना को लटकाकर लाये थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब आधा-पौन घंटे के उबड़खाबड़ रास्तो के पैदल सफर के बाद वे लोग घनी झाडियों और पेडो के बीच खुले मैदान में बसी एक झुग्गी-झोपडी नुमा छोटी सी बस्ती में पहुंचे। बस्ती के समीप पहुचते ही बच्चो और महिलावो का एक झुंड रास्ते में उन्हें देखने के लिए आ गया। विक्रम और केसिना अपने प्लान के मुताविक अपने चेहरे और हावभावों से, अपनी मुख मुद्रा से ऐसा प्रर्दशित कर रहे थे जैसे वे किसी तनाव में नहीं है और इनके साथ खुद ही आ रहे है, और उनको यह नही महसूस होने देना चाह रहे थे कि वे डरे हुए है, और किसी दबाब में एक बंधक की भांति वहा लाये गए है, अतः दोनों ने,अगल बगल  खड़े होकर तमाशा देख रहे उन बच्चो और महिलावो को हाथ हिला-हिलाकर अभिवादन किया। साथ ही इससे यह भी माहोल बन रहा था कि उस जगह के सभी लोग उनके साथ बिना हिचक दोस्ताना तरीके से पेश आ रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस्ती के बीचोंबीच पहुँच एक बड़ी सी झोपडी के समीप जाकर उस कबीले के मुखिया ने रुकने का इशारा किया। आगे झोपडी के बाहर आहते में एक मोटा ५५-६० साल के लगभग उम्र का व्यक्ति खटियानुमा किसी चीज़ पर लेटा हुआ था, उस मुखिया ने झुककर उसे सलाम किया और अपनी भाषा में कुछ बोला। वह व्यक्ति उठ बैठा और वह भी  कुछ बोला, उसके बोलने के अंदाज से विक्रम को समझते देर न लगी कि इन आदिवासियों का असली मुखिया यही व्यक्ति है, मुखिया ने खांसते हुए विक्रम और केसिना को घूरा और फिर हाथ के इशारे से उन्हें अपने पास आने को कहा। विक्रम ने केसिना से धीरे से अंग्रेजी में कुछ कहा और दोनों ने उस व्यक्ति के समीप पहुंचकर झुककर उसे प्रणाम किया। उस व्यक्ति का वह काला कठोर चेहरा  कुछ ढीला पड़ा, मानो उनके इस अभिवादन से खुस हुआ हो, लेकिन उसके चेहरे पर देखने से ऐसा लगता था कि वह काफ़ी समय से बीमार है। विक्रम और केसिना इन्ही खयालो में डूबे थे कि उस मुखिया को एक जोर की लम्बी खांसी आ गई, वह जब लगातार खांसता रहा तो विक्रम ने केसिना से कहा कि मेरा उसको छूना शायद उसे अच्छा न लगे इसलिए तुम उसकी नब्ज देखो। वह मुखिया खांसे जा रहा था, तभी केसिना ने आगे बढ़कर उसकी हाथ की नब्ज़ को अपनी उंगलियों से दबाकर परखा तो वह बुखार से तप रहा था, केसिना ने विक्रम से कहा कि इसे तो बहुत तेज बुखार है। विक्रम ने केसिना को पूछा कि जो फर्स्ट ऐड बॉक्स उसने सुबह करीना को दवाई देने के लिए निकाला था वह उसने कहाँ रखा था? केसिना ने बताया कि उसने वह बैग में रख दिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी कबीलाई विक्रम, केसिना, उनके बच्चो और मुखिया की खटिया के इर्दगिर्द घेरा बनाये खड़े थे। विक्रम ने एक अनुभवी राजनयिक की भांति उस मुखिया को एक बार पुनः सलाम किया और दोनों हाथो के इशारे से उस व्यक्ति को, जो जंगल से उसे मुखिया  की तरह साथ लाया था, अपना बैग उसे देने का आग्रह किया। वह विक्रम के इशारे को समझ गया था, अतः उसने एक युवा आदिवासी को वह बैग वहा लाने को कहा, वह युवक दौड़ कर दोनों बैग उसके पास ले आया। विक्रम ने बैग से दवा का बॉक्स निकाला और उसमे से बुखार की एक दवा की गोली निकाल पीने का पानी लाने का इशारा किया, युवक मटका भर पानी ले आया। विक्रम ने वह दवा की गोली उस मुखिया के हाथ में थमा उसे इशारे से निगल जाने को कहा । मुखिया कुछ देर तक विक्रम को और उस दवा को निहारता रहा और जब विक्रम ने पुनः इशारे से उसे भरोषा दिलाया कि कुछ नही होगा, मैं यहाँ पर हूँ तो उस मुखिया ने पानी के संग उस दवाई को खा लिया।विक्रम ने उसे लेट जाने का इशारा किया और पास रखा एक ऊनी चादर उसके ऊपर ओढ़ दिया। पैदल सफ़र और मानसिक थकान से चूर केसिना और विक्रम वहीँ उसकी खटिया के पास ही जमीन पर बैठ गए। अब तक के इनके व्यवहार से विक्रम को इतना तो यकीन हो गया था कि अकारण यह लोग उन पर हमला नहीं करेंगे, फिर भी वह चौकन्ना था। करीब आधे घंटे तक इन्तजार करने के बाद वह मुखिया उठकर पुनः बैठ गया, उसका शरीर पसीने से तर था और परिणाम स्वरुप बुखार गायब। उसकी खुसी का अंदाज़ विक्रम ने इस बात से लगाया था कि उन्हें जमीन पर बैठा देख मुखिया ने अपनी भाषा में डांटते हुए पास खड़े दो आदिवासियों को बांस की पत्तियों और छिलकों से बना आसन लाकर विक्रम और केसिना के लिए बिछाने को कहा था। धीरे-धीरे शाम घिर आई थी, चूँकि कबीलाई आदिवासी अँधेरा होने से पहले ही रात का खाना खा लेते हैं, अतः मुखिया के आदेश पर विक्रम और बच्चो के लिए मिटटी के मटके नुमा बर्तनों पर मक्के की रोटी और गोश्त परोषा गया। मुद्दतो के बाद ,आज विक्रम और केसिना को रोटी नसीब हो रही थी, दिनभर से भूखे बच्चो और विक्रम-केसिना ने बड़े चाव से और तसल्ली से खाना खाया। उसके बाद मस्का लगाने के लिए विक्रम ने थोडी देर तक मुखिया के पैर दबाये और उसके सिर की मालिश की तो मुखिया गदगद हो गया। उसने अन्य लोगो से बगल की झोपडी में उनके लिए विस्तर लगाने का निर्देश दिया। हालांकि बिस्तर लगाने का फरमान जा चूका था, मगर चूँकि बच्चे वही उनकी गोद में सो गए थे, इसलिए सुरक्षा कारणों को भी ध्यान में रखकर विक्रम और केसिना देर रात तक मुखिया के पास ही बैठे रहे, और आखिर में फिर उसे एक और बार दवा खिलाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधी रात के करीब जब केसिना को भी नींद की झपकिया आने लगी तो वे उठकर पास की झोपडी में चले गए, जहां पर उनके लिए वही परंपरागत चटाई बिछायी गयी थी। विक्रम ने केसिना से कहा की इन अनजान आदिवासियों की जगह पर हम बेफिक्र होकर नहीं सो सकते, अतः पहले दो तीन घंटो के लिए तुम सो जावो और उसके बाद थोडा सा मैं सो लूँगा। इसतरह उनकी वह पहली रात आशंकाओ के विपरीत ठीकठाक गुजर गयी। उस आदिवासी इलाके की दूसरी भोर काफी मनमोहक थी। पेडो के झुरमुट से झांकती सूरज की पहली किरणे उस जंगली कबीले इलाके को, जहा तक नजर जा सकती थी, सौन्दर्यमय बना रही थी। कबीले का मुखिया भी एक तरह से पूर्ण स्वस्थ होकर बस्ती में चहल कदमी कर रहा था। देर से सोने की वजह से विक्रम कुछ देर से ही जागा, तब तक सूरज पूरा निकल आया था। मुखिया झोपडी के पास आकार अपनी भाषा में एक आवाज लगाकर अभी-अभी वहाँ से गया था। विक्रम उठने के बाद परिवार संग वस्ती से थोडी दूर एक नाले के पास नित्यकर्म के लिए गया था। बच्चो को खुले मैदान में बिठा, केसिना पास की झाडियों में गयी। अभी मुश्किल से पाच मिनट भी नहीं हुए होंगे की विक्रम ने झाडियों के पीछे से केसिना की घुटी-घुटी सी चीख सुनी तो चौंक गया, और दोनों बच्चे उठा, तेजी से उस तरफ भागा। उस झाडी के पीछे पहुंचकर, जहां केसिना नित्यकर्म के लिए गयी थी, विक्रम क्या देखता था कि तीन मुस्टंडे आदिवासी युवक केसिना को पकड़ उसका मुह दबा, उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे, और केसिना अपने को उनके चंगुल से छुडाने का भरसक प्रयास कर रही थी। शायद उन्होंने विक्रम को नहीं देखा था, इसलिए विक्रम ने बच्चो को पास के एक पेड़ के पीछे बिठाया और प्रेमवन को धीरे से कैरिना को सँभालने और आवाज न करने की हिदायत देकर उनकी तरफ लपका। केसीना के ऊपर झुके दो आदिवासी युवको को पीछे से उनके सिर के बाल पकड़कर उसने ऊपर उठाया और कोहनी से दोनों की छाती पर जोर से वार कर दूर धकेल दिया। तीसरा जो , अपने को छुडाने के लिए छटपटा रही केसिना का मुह दबाये था, उसके पीछे से विक्रम ने एक जोर की लात मारी तो वह आगे सिर के बल लुड़क कर सीधा खडा हो गया। बगल से वे दोनों युवा आदिवासी भी खड़े हो गए थे, विक्रम ने बरसो पहले सीखे जूडो कराटे के हुनर को आज पूरी तरह यहाँ अजमाया और दस मिनट में ही तीनो को धुन डाला। दो को वही छोड़, एक को दबोचकर विक्रम फिर वस्ती में मुखिया के पास पहुंचा और उसे इशारे से सारी वस्तुस्थिति समझाई। मुखिया उस युवक पर आग बबूला हो गया और अपना कृपाण  निकाल लाया। यह देख वह युवा आदिवासी थर-थर काँपने लगा और अपनी भाषा मे कुछ कहकर गिडगिडाने  लगा। शायद जिंदगी की भीख मांग रहा था, विक्रम ने मुखिया के समक्ष चिरपरिचित अंदाज में हाथ जोड़ उसे क्षमा कर देने का आग्रह किया। मुखिया ने विक्रम की बात मानते हुए उस युवा आदिवासी को डांटते हुए वहाँ से भाग जाने को कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुखिया, विक्रम और उसके परिवार पर पूरी तरह से मेहरबान था। हर रोज सुबह वह बारी-बारी से अपने कुनवे के पास मौजूद दुधारू मवेशियों का दूध, विक्रम के बच्चो के लिए भिजवाता था। केसीना और विक्रम अब मुखिया से काफी घुलमिल गए थे, उन्होंने बात-बात में महसूस किया था कि मुखिया अपने-आप में एक अच्छा कलाकार है। अतः वे मुखिया को अपनी बात अब ज्यादातर जमीन में मिटटी में तरह-तरह के चित्र बनाकर समझाते थे। बाद में विक्रम को पता चला था कि जिन आदिवासी युवको ने केसीना पर हमला किया था, वे उस बस्ती के नहीं अपितु उसके पास वाली दूसरी वस्ती के थे, और यह नहीं जानते थे कि विक्रम और उसका परिवार, मुखिया का मेहमान बन के इस वस्ती में रह रहे है। विक्रम हर समय अब इसी ताक में रहता था कि किस तरह वह मुखिया को समझाए कि वह उन्हें इस जंगल से बाहर किसी शहर में पहुचने में मदद करे। अभी उन्हें इस बस्ती में आये १२ दिन ही हुए थे कि एक दिन शाम के वक्त उन्होंने देखा कि फिर से बस्ती के सारे आदिवासी एक झुंड बनाकर खड़े हो रखे थे। विक्रम ने समीप जाकर वस्तु स्थिति समझनी चाही तो उसके यह देखकर खुसी का ठिकाना नहीं रहा कि कुछ दूरी पर पांच-छः अंग्रेज से दीखने वाले लोगो का एक दल उस वस्ती की और बढ़ रहा था।जब भी कोई अनजान बाहरी लोग इन आदिवासियों की बस्तियों में आते है तो ये अपने हथियार उठाकर  सतर्क हो जाते है, और जो कि इनके लिए जरुरी भी था। लेकिन जब वे लोग बिलकुल समीप पहुँच गए तो आदिवासी यह देखकर   सामान्य से हो गए कि उनके साथ उनकी आदिवासी जाति का भी एक जाना पहचाना व्यक्ति शामिल था जो कि पढा-लिखा था, और ऐसे लोगो के साथ दुभाषिये और गाइड का काम करता था। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ज्यूं ही वे लोग बहुत समीप पहुचे, विक्रम ने हाथ हिलाते हुए उन्हें हाई-हेल्लो कहा। आदिवासी कभी विक्रम तो कभी उस दल का मुह ताकते थे। विक्रम ने देखा कि उनमे तीन पुरुष और एक महिला यूरोप के थे और दो  अफ्रीकी मूल के थे, जिनमे से एक भेष-भूषा से उनका  सुरक्षा गार्ड सा लग रहा था और आधुनिक रायफल हाथ में थामे था, तथा दूसरा वह गाईड था जो इसी कबीलायी जाति से सम्बद्ध था।  इस तरह कुल छः लोग थे। विक्रम ने उन्हें अपना नाम परिचय बताया और उन्हें उस मुखिया के पास उसकी झोपडी में ले गया। फिर उस दुभाषिये गाइड ने मुखिया से उन सब का परिचय करवाया। विक्रम ने केसीना और बच्चो को आवाज देकर झोपडी से बाहर बुलाया और उनका परिचय भी अपने परिवार से करवाया। वे सभी लोग इस बात से हैरान थे कि एक एशियन और एक यूरोपियन युवती अपने परिवार संग यहाँ पर इन लोगो के बीच कैसे? अतः उन्होंने कौतुहलबश दनादन सवाल दागने शुरु किये। कुछ सुस्ताने पर विक्रम ने उन्हें सारी कहानी सुनाई तो वे लोग सुनकर द’ग  रह गए और आँखे फाड़-फाड़ कर विक्रम, केसीना और उनके बच्चो को देखने लगे। उन्होंने अपना परिचय केसीना को देते हुए बताया कि वे यूरोप के एक प्रमुख वन्यजीव सस्थान से है और  खासकर चिम्पैजी पर अनुसंधान के  सिलसिले में इन जंगलो में आये है। केसीना भी आज एक मुद्दत के बाद अपने पुराने एसेंट (लहजे) में किसी से बात कर रही थी, और उसे अच्छा महसूस हो रहा था। केसिना और विक्रम ने जब अपनी सारी आपबीती उन्हें सुनाई तो वे भी भाव-विभोर हो उठे और दोनों को गले से लगाया ! वे उन दोनों की हिम्मत की बार-बार सराहना करते नही थक रहे थे, और साथ ही उन्हें यह भी ढाढस बंधा रहे थे कि उनके बुरे दिन अब ख़त्म हुए। हम लोग तुम्हे तुम्हारे घर तक पहुंचाने में पूरी मदद करेंगे। उस दल ने उस रात वहीँ पर रुकने का निश्चय किया। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;केसीना और उस दल की महिला सदस्य शीघ्र ही दोस्त बन गए थे। केसीना को भी आज मानो अपने दिल के अन्दर बर्षो से दबाये हुए उसके  सारे दुख-दर्द को सुनने वाला कोई मिल गया था, अतः वे लोग देर रात तक बातो में लगे रहे। उससे अपने दिल की सारी बाते कहने के बाद केसीना अन्दर से काफ़ी हल्का महसूस कर रही थी। वह युवती केसीना के उस आश्चर्यचकित कर देने वाली जीवन  कहानी को सुनकर बहुत ही प्रभावित हुई थी और बीच बीच में केसीना को उसके हिम्मत की दाद देते हुए नही थकती थी। केसीना भी उसे पाकर बार-बार मन ही मन अपने भगवान् को याद कर उसका शुक्रिया अदा करती थी। उसे पूर्ण विश्वास हो चला था कि अब शीघ्र ही वह अपने माँ-बाप के पास लन्दन पहुँच जायेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह उठकर फ़्रेश होने के बाद, वे सभी लोग वहाँ इकठ्ठा हो गए। उन्होंने जब विक्रम को बताया कि वे चिम्पैंजी पर अध्ययन करने यहाँ आये है और तीन-चार दिन ठहरेंगे तो विक्रम ने उन्हें भरोषा दिलाया और कहा कि समझो उनका यह काम एक बहुत ही अच्छे ढंग से निपट गया है, उसने उन्हें अपने साथ रह रहे उन चिम्पैंजी की कहानी सुनाई। चिम्पैंजी के बारे में विक्रम की बात सुन वह पूरा दल उत्साह से भर गया था, और वे भी मान बैठे थे कि उनका यह मिशन पूरी तरह सफल रहेगा। सफ़र पर निकलने से पहले विक्रम ने उस दल के दुभाषिये को निवेदन किया कि चूँकि वह इन आदिवासियों की भाषा अच्छी तरह से जानता है, अतः वह उन आदिवासियों के मुखिया और उस व्यक्ति को जिसने जंगल में विक्रम का आग्रह मानकर केसिना के हाथ पैर खोल दिए थे, उन्हें तहे दिल से  शुक्रिया उनकी  तरफ से अदा करे। दुभाषिये ने जब विक्रम की बात उन तक पहुंचाई तो मुखिया और उस व्यक्ति ने विक्रम की तरह देख अपने दोनों हाथ खड़े किये। विक्रम ने झट से जाकर मुखिया के पैर छुए और उस व्यक्ति को गले लगा लिया, वह व्यक्ति विक्रम का यह स्वाभाव देख अपने आंसू नहीं रोक पाया। विक्रम ने कहा कि वह उन लोगो को जिंदगी भर नहीं भूल पायेगा क्योंकि हालांकि शुरु में उसे उन पर तब गुस्सा आ रहा था, जब वे केसिना और उसके बेटे को उठा कर ले आये थे, मगर अब वह सोच रहा था कि वे लोग तो उनके लिये भगवान बन कर आये थे।  ऐसा नहीं होता तो आज इन यूरोपियन लोगो से उनकी मुलाकात शायद कभी नहीं हो पाती, इसलिए जो हुआ था, वो अच्छे के लिए ही हुआ था। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;विदाई के वक्त हाथ हिला-हिला कर उन सभी ने आदिवासियों से विदा ली। विक्रम को जंगल के उस रास्ते का ठीक से पता नहीं था, जहा पर वह विमान का टुकडा था, इसलिए दल के मुखिया से कहकर उन्होंने वस्ती से दो आदिवासियों को भी अपने साथ ले लिया था। उस पूरे डेड-दो घंटे के उबड़खाबड़ और ऊँचे नीचे सफ़र में विक्रम के दोना बच्चे, प्रेमवन और कैरिना को उन दोनों आदिवासियों ने अपने कंधे पर ही बिठाये रखा। जब सभी लोग विक्रम और केसिना के उस पुराने ठिकाने के पास पहुंचे तो विक्रम और केसिना को एक बारी लगा कि मानो वे लोग पुनः अपने घर लौट आये है। वहाँ पहुँच केसिना ने उन्हें  अपना वह पूरा घर दिखाया, जिसमे वे आठ सालो से रह रहे थे, हर उस चीज़ के बारे मे उनको बारीकी से समझाया, जो उन्होंने उस दौरान प्रयोग की थी। वे सभी विक्रम और केसिना की बाते सुन-सुनकर और उस जगह की स्थिति देखकर हैरान थे, और बार-बार उनकी हिम्मत की दाद देते नहीं थकते थे। वहाँ पहुँचने में काफी वक्त लग गया था और अब शाम होने में कुछ ही घंटे बाकी थे, अतः सभी ने अपना अपना सामान जमाना शुरु कर दिया था। टेंट गाड़ने की उन्हें जरुरत नहीं थी, क्योंकि उस विक्रम की बनायीं हुई चार दिवारी और विमान के उस टुकड़े के अन्दर काफी जगह थी। खाने के लिए हालांकि उस दल के पास प्रयाप्त खाना था फिर भी विक्रम अपने उस पुराने शिकार के मैदान से रात के खाने के लिए गोश्त भी ले आया था। एक जो चिंता अब उसे सता रही थी वह यह थी कि अब तक उन चिम्पैंजी का झुंड उसे कही नजर नहीं आया था, जिसके लिए यह दल उनके साथ आया था। शाम को उसने अपने उन परंपरागत बर्तनों में गोश्त और अन्य चीजे पकाई, और फिर रात का भोजन कर वे सभी लोग आराम करने लगे। विक्रम ने गोश्त का एक बड़ा हिस्सा जान बूझकर बचा लिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली सुबह विक्रम और केसिना के लिए कोई अलग नहीं थी क्योंकि वे इस माहौल में पूरी तरह रचे बसे थे। जरुरी कामो से निपट, विक्रम ने केसिना को उसी पुरानी आवाज और अंदाज में मादा चिम्पैंजी को बुलाने के लिए आवाज लगाने को कहा, जो वह पहले अक्सर किया करती थी। केसिना ने जोर से आवाजे लगायी, मगर चिम्पैंजी का कोई अता पता नहीं था। दोनों उस जगह से हटकर काफी दूर तक  गए और वहा से भी आगे घाटी में जहां तक आवाज पहुँच सकती थी, उन्होंने आवाज मारकर उस मादा चिम्पैंजी को बुलाने की कोशिश की, मगर कोई सुराग हाथ न आया। विक्रम थोडा परेशान लग रहा था, मगर केसिना ने उसे समझाया कि वह परेशान न हो, अगर चिम्पैंजी उस इलाके से कहीं बहुत दूर न गए हो तो दोपहर के समय उस नदी के तट पर पानी पीने के लिए ज़रूर इकठ्ठा होंगे, जहा वे पहले रोज जाते थे। करीब आधा घंटा गुजर जाने के बाद जब सभी लोग झोपडी नुमा किचन के इर्दगिर्द बैठकर नाश्ता कर रहे थे, कि तभी विक्रम को बाहर  झाडियों मे कुछ हलचल होने  और पत्तो पर किसी भारी वजन वाले ज
